कुछ दिनों पहले मैने एक पोस्ट लिखी थी – स्वार्थ लोक के नागरिक। उस पर श्री समीर लाल की टिप्पणी थी: …याद है मुझे नैनी की भीषण रेल दुर्घटना. हमारे पड़ोसू परिवार के सज्जन भी उसी से आ रहे थे. सैकड़ों लोग मर गये मगर उनके बचने की खुशी में मोहल्ले में मिठाई बांटी गई…क्याContinue reading “श्रीमती रीता पाण्डेय की एक पोस्ट”
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स्वार्थ-लोक के नागरिक
मेरी कालोनी के आसपास बहुत बड़े बड़े होर्डिंग लगे हैं – सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिये नागरिक शास्त्र, पढ़िये केवल विनायक सर से। मैं नहीं जानता विनायक सर को। यह अवश्य है कि बहुत समय तक – (या शायद अब भी) मैं अपने मन में साध पाले रहा एक आदर्श प्रोफेसर बनने की। परContinue reading “स्वार्थ-लोक के नागरिक”
यह भय कि कहने को कुछ भी न बचेगा?
भय – हाइड्रा का एक क्लिपार्ट ओह, आपको यह भय होता है? ब्लॉगिंग में मुझे होता है। अभी मुझे नौकरी लगभग सात साल से अधिक करनी है। और कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनपर मैं कलम नहीं चला सकता। जो क्षेत्र बचता है, उसमें सतत स्तर का लिखा जा सकता है कि लोग पढ़ें? मुझे शंकाContinue reading “यह भय कि कहने को कुछ भी न बचेगा?”
