कलमा कुरान छल्ला कशी द्वारा रोज़ी रोटी


महराजगंज कस्बे में हाईवे के ओवर ब्रिज़ की दीवार पर पेंट किये इन शब्दों का इश्तिहार मुझे समझ नहीं आया। इतना जरूर लगा कि यह मानव के अज्ञात, रूहानी भय को; और उसको किसी न किसी तरह अपने पक्ष में मोड़ने का भरोसा देने का व्यवसाय भारत में करोड़ों-अरबों का है। और यह सब इनफार्मलContinue reading “कलमा कुरान छल्ला कशी द्वारा रोज़ी रोटी”

गेर वाली हौ रे, साइकिल


नई बिजली वाली साइकिल लेकर इन दिनों गांव-देहात में घूम रहा हूँ। जैसे ही घर से निकलता हूँ, बारह-पंद्रह किलोमीटर का इलाका मेरी रोज़ की छोटी दुनिया बन जाता है। कच्ची सड़कें, खेतों की हवा, कहीं किसी घर से उठती उपलों  के चूल्हे की गंध—और बीच-बीच में बच्चों के चिल्लाने की आवाज़। सफ़र खुद-ब-खुद मुस्कुरानेContinue reading “गेर वाली हौ रे, साइकिल”

सगड़ी वाला बूढ़ा


इग्यारह बज रहे थे। कोहरे का पर्दा हल्के से ठेल कर कानी आंख से सूरज भगवान ताकने लगे थे। वह बूढ़ा मुझे मर्यादी वस्त्रालय के आगे अपनी सगड़ी (साइकिल ठेला) पर बैठा सुरती मलता दिखा। बात करने के मूड़ में मैने पूछा – आजकल तो बिजली का ठेला भी आने लगा है। वह लेने कीContinue reading “सगड़ी वाला बूढ़ा”

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