राधेश्याम पटेल; ऊंटवाला


दूर ऊंट जा रहा था। साथ में था ऊंटवाला। मैने पण्डाजी से पूछा – यह किस लिये जा रहा है ऊंट? इस समय तो कछार में लादने के लिये कुछ है नहीं। सब्जियां तो खत्म हो चली हैं। “वह एक कुनबी का ऊंट है। घास छीलने जा रहा होगा वह। एक दो घण्टा घास इकठ्ठाContinue reading “राधेश्याम पटेल; ऊंटवाला”

गड्डी गुरू


सवेरे गड्डी गुरू अक्सर मिल जाते हैं कछार में सवेरे सैर करते। बड़े ही यूनीक व्यक्तित्व हैं।  सैर करते हुये अक्सर ताली बजाते रहते हैं। इसमें उनका व्यायाम भी होता है। हाथ आगे ले जा कर या ऊपर ले जा कर ताली बजाते हैं। दूर से ताली की आवाज सुनाई पड़े तो अनुमान लगा सकतेContinue reading “गड्डी गुरू”

“मोदी पसन्द है। पर लोग उसे बनने नहीं देंगे!”


लोकभारती में कल सयास गया। दफ़्तर से लौटते समय शाम के सात बज जाते हैं। सिविल लाइन्स से उस समय गुजरते हुये मैने हमेशा लोकभारती को बन्द पाया। इस बीच पुस्तकें खरीदने का काम भी इण्टरनेट के माध्यम से चला। अत: लोकभारती गये सात आठ महीने हो गये थे। कुछ दिन पहले द हिन्दू मेंContinue reading ““मोदी पसन्द है। पर लोग उसे बनने नहीं देंगे!””

Design a site like this with WordPress.com
Get started