सन 1985 में जब मैने रेलवे की नौकरी में पहली पोस्टिंग रतलाम में ज्वाइन की थी तो वहां मण्डल रेल प्रबन्धक कार्यलय के पास दो-बत्ती इलके में सवेरे 25-30 सफाई कर्मी झाडू लगा कर पानी का छिडकाव किया करते थे। कालांतर में यह व्यवस्था बन्द हो गयी। लगभग 15 साल वहां (दो चरणों में) रहनेContinue reading “कचरा उठता नहीं!”
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"खाइ भरे के पाई ग हई (खाने भर को मिल गया है)"
चार दिन पहले गंगा उफन रही थीं। बहाव तेज था और बहुत सी जलकुम्भी बह कर आ रही थी। बढ़ती गंगा में आसपास के ताल तलैयों, नहरों नालों की जलकुम्भी बह कर आने लगती है। वैसा ही था। खबरें भी थीं गंगा और उत्तर की अन्य कई नदियों में उफान की। किनारे एक धतूरे काContinue reading “"खाइ भरे के पाई ग हई (खाने भर को मिल गया है)"”
शैलेश का उत्तराखण्ड के लिये प्रस्थान
अगर इस देश की आत्मा है; तो उसका स्पन्दन महसूस करने वाले लोग शैलेश पाण्डेय जैसे होंगे! कल दोपहर में मैं इलाहाबाद रेलवे स्टेशन गया। शैलेश पाण्डेय ने कहा था कि वे उत्तराखण्ड जा रहे हैं, सो उनसे मिलने की इच्छा थी। 25 जून को शाम संगम एक्प्रेस पकड़ने का कार्यक्रम था उनका। मैने अपनेContinue reading “शैलेश का उत्तराखण्ड के लिये प्रस्थान”
