शहर में रहती है नीलगाय


शहर में आपसे 20-25 कदम पर चरती नीलगाय दिख जाये और आपको देख भागने की बजाय फोटो के लिए पोज देने लगे, तो कैसा लगेगा? आज मेरे साथ वही हुआ. इलाहाबाद में प्रयाग स्टेशन से फाफामऊ को जाने वाली रेल लाइन जब गंगा के पास पंहुचती है तब उस लाइन के दायें 200-250 मीटर कीContinue reading “शहर में रहती है नीलगाय”

इँदारा कब उपेक्षित हो गया?


बचपन में गांव का इँदारा (कुआँ) जीवन का केन्द्र होता था. खुरखुन्दे (असली नाम मातादीन) कँहार जब पानी निकालता था तब गडारी पर नीचे-ऊपर आती-जाती रस्सी (लजुरी) संगीत पैदा करती थी. धारी दार नेकर भर पहने उसका गबरू शरीर अब भी मुझे याद है. पता नहीं उसने इँदारे से पानी निकालना कब बंद किया. इँदाराContinue reading “इँदारा कब उपेक्षित हो गया?”

पत्थर पर प्रोफाइल


प्रोफाइल तराशने का काम केवल चिठेरे ही करते हों, ऐसा नहीं है. आज सवेरे की सैर के समय एक सवा बिस्से की जमीन पर बने घर के गेट पर लगे पत्थर पर जो लिखा देखा, वह किसी प्रोफाइल से कम नहीं है. अठारह साल में बने अपने ताज महल पर कितनी हसरत से पत्थर लगायाContinue reading “पत्थर पर प्रोफाइल”