सिब्बू गुरू की बारात


आज साइकिल गुन्नीलाल जी के यहाँ मुड़ गई। ग्वाले के यहाँ से वे दूध ले कर आ चुके थे। नीम की छाँव में अपना मोबाइल स्क्रॉल कर रहे थे। मुझे देख कर उठे, स्वागत किया। नीम के नीचे ही कुर्सी और टेबल लाये — धूल साफ कर बिठाया। तब बातचीत शुरू हुई। बोले — साहेब,Continue reading “सिब्बू गुरू की बारात”

घड़ी, साइकिल, बाजा बनाम राइडर


मेरे बचपन में दहेज का मानक था — घड़ी, साइकिल और बाजा – रेडियो। तेल से चुआती जुल्फी टेये नई शादी वाला दुलहा गांव में साइकिल ले कर घड़ी पहने और रेडियो पर बिनाका गीत माला सुनता निकलता था। जलवा होता था। अब समय बहुत बदल गया है। बगल में शादी तय हुई है। छेकईयाContinue reading “घड़ी, साइकिल, बाजा बनाम राइडर”

दो साइकिलों की कहानी


बटोही ने पहले गाँव-देहात दिखाया। दस किलोमीटर की परिधि में — शरबतखानी से जगतानंद धाम, पचेवरा से गिर्दबड़गांव — सब उसके साथ नापा। वह अब भी नाप सकती है। पर मेरे घुटने अब उतनी मेहनत की इजाज़त नहीं देते। इसीलिये ईबटोही आई। बटोही अब दूसरे रोल में है। रोज़ चालीस-साठ मिनट घर-परिसर में गोल-गोल चक्कर।Continue reading “दो साइकिलों की कहानी”

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