सिब्बू गुरू की बारात

Near Ganga River

आज साइकिल गुन्नीलाल जी के यहाँ मुड़ गई। ग्वाले के यहाँ से वे दूध ले कर आ चुके थे। नीम की छाँव में अपना मोबाइल स्क्रॉल कर रहे थे। मुझे देख कर उठे, स्वागत किया। नीम के नीचे ही कुर्सी और टेबल लाये — धूल साफ कर बिठाया। तब बातचीत शुरू हुई।

बोले — साहेब, बिआह-बरात-दुआर का सीजन शुरू हो गया है। ढेरों निमंत्रण मिल रहे हैं। जाना पड़ रहा है। समय भी लग रहा है और पैसा भी।

क्या रेट है? सौ रुपया? — मैंने पूछा।

गुन्नीलाल जी ने बताया — सौ का रेट पुराना हो गया। अब डबल हो गया है। दो सौ एक से कम काम नहीं चलता। महीने में पाँच-दस बरात-दुआर हो गये तो हज़ार-दो हज़ार निकल जायेंगे।

मैंने पूछा — पहले कितना रेट था? आपके बचपन में?

बोले — सन 1965 में एक रुपया रेट था। जो ज़्यादा रईस हो, वह दो रुपया देता था। मुसहर के बनाये दोना में बुनियाँ मिलती थी पानी पीने को। कोई ज़्यादा किया तो साथ में एक फाँक नमकीन भी। बराती का स्वागत भी यही होता था — पानी पिलाने में।

फिर उन्होंने मेरे हाथ को हल्के से थपकाया — एक मज़ेदार किस्सा बताता हूँ। सन 1967 की बात है। सिब्बू गुरू की बरात जा रही थी गंगा पार। दो असवारी थीं उसमें। असवारी माने पालकी।

एक असवारी में घर का बुज़ुर्ग बैठा था, दूसरी में दुलहा — यानी सिब्बू गुरू। सिब्बू गुरू छः फुट के थे, लम्बे-चौड़े। बम्बई में ट्रक चलाते थे। वज़न बहुत ज़्यादा था। लूटाबीर के किनारे पहुँची बारात — दो असवारी और पचास हम लोग, पैदल। उछलते-कूदते हनुमान जी की सेना की तरह। पर भारी शरीर होने के कारण सिब्बू गुरू की असवारी की डांड़ टूट गई।

फिर क्या हुआ? — मैंने पूछा।

गंगा किनारे बाँस काटा गया। एक नई डांड़ बनी। असवारी नाव से गंगा उस पार गई। हम लोग भी नाव से गंगा पार किये। ससुराल उस पार के गंगा किनारे के गाँव में ही थी, तो ज़्यादा पैदल नहीं चलना पड़ा।

हम सब मन ही मन सोच रहे थे कि बुनियाँ-नमकीन से स्वागत होगा। पर घराती ज़्यादा ही गरीब थे। दोना में सिर्फ दो-तीन बताशे मिले।

गुन्नीलाल जी बोलते रहे, नीम की पत्तियाँ हिलती रहीं। मैं सोच रहा था — यही गंगा है, यही किनारा है लूटाबीर का। वहीं कहीं सिब्बू गुरू की पालकी की डांड़ टूटी थी।

फिर गुन्नीलाल जी बदलाव पर आये — ये देखो साहेब, कितना अंतर आ गया है। अब बरात वालों का स्वागत छेना की मिठाई, गुलाब जामुन, काजू-बादाम वाली नमकीन और कोल्ड-ड्रिंक या कॉफी-चाय से होने लगा है। कोई कितना भी दरिद्र हो, बताशे की सोच ही नहीं सकता।

मैंने पूछा — सिब्बू गुरू अभी हैं?

नहीं, अब नहीं रहे। उनके भाई जद्दू गुरू भी ऊपर चले गये। पर अगली पीढ़ी बम्बई में ड्राइवरी करती है। सिब्बू पाँच-दस टन के ट्रक चलाते रहे होंगे — अब वाले कम से कम तीस टनर लेकर चलते हैं। एक-दो ने तो अपने ट्रक भी खरीद लिये। डांड़ टूटने वाली पालकी से तीस टन तक — यही तो सफर है। जलवा हो गया है।

तब दुआर करने का रेट एक रुपया था, अब दो सौ के पार भाग रहा है।

अब स्वागत में बताशे का ज़माना तो कभी नहीं आयेगा!


Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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