गांवदेहात डायरी आज सुबह सात बजे साइकिल लेकर निकला तो पहली नज़र में ही लगा कि कुछ अलग है। मार्च का महीना है, इसलिए कोहरे की उम्मीद नहीं रहती। पर सामने का दृश्य जैसे धुंध की गहरी चादर में लिपटा था। शांतिधाम से साइकिल गंगा किनारे जाने की बजाय रेल पटरी की ओर मुड़ गई।Continue reading “भारी हवा की सुबह”
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साइकिल के कैरियर पर घोड़जई
गांवदेहात डायरी रास्ते में एक साइकिल-ठेले पर सरसों की कटी बालें थीं। उनके ऊपर आड़े तरीके से कुछ खरपतवार रखा था। मैंने ठेले का चित्र रुक कर लिया। बाद में जब पंकज अवधिया जी के घर उनसे मिला तो फोटो दिखा कर पूछा—यह घास क्या है? “और तो खरपतवार है, पर घोड़जई की बालें भीContinue reading “साइकिल के कैरियर पर घोड़जई”
साइकिल और गौरैया
गांवदेहात डायरी बरियापुर के शांतिधाम से निकलता हूं साइकिल ले कर तो दो विकल्प होते हैं—गंगाकिनारे पंडा जी के पास जा कर निरहू की चाय की गुमटी पर चाय पी लूं, या फिर साइकिल को रेल लाइन की ओर मोड़ दूं और उस पार के गांवों को तब तक नापूं जब तक लौटने का वक़्तContinue reading “साइकिल और गौरैया”
