कीड़ी – पद्मजा पाण्डेय की पोस्ट


तेईस अक्तूबर को मेरा जन्मदिन था। मैं बारह साल की हो गई। मैं प्रयागराज में सातवीं क्लास में पढ़ती हूं। वहां से हम दिवाली की छुट्टियों में गांव आये हैं और मेरा जन्मदिन गांव में मनाया गया। गांव में मेरे सारे दोस्त दलित बस्ती (लोग उस बस्ती के बारे में ऐसा ही बोलते हैं) केContinue reading “कीड़ी – पद्मजा पाण्डेय की पोस्ट”

पुलियाबाज़ी की पुलिया गांव की नहीं है


कभी-कभी जीवन में ऐसा होता है कि कोई नई आवाज़ कानों में पड़ती है और लगता है—हाँ, यही तो सुनना चाह रहा था मैं! मेरे साथ यह अनुभव तब हुआ जब मैंने पहली बार, दो तीन साल पहले पुलियाबाज़ी पॉडकास्ट सुना। इसमें तीन लोग – प्रणय कोटस्थाने, सौरभ चंद्र और ख्याति पाठक – बतकही कीContinue reading “पुलियाबाज़ी की पुलिया गांव की नहीं है”

रात ढलते ही झींगुर गायन


रात आते ही – शाम सात सवा सात बजे झींगुर गायन शुरू कर देते हैं। और यह आवाज रात भर चलती है। गांव के सन्नाटे का संगीत है यह। पितृपक्ष लग गया है जो कोई अन्य आवाज – कोई डीजे या जै मातादी जागरण या अखंड मानस पाठ आदि नहीं हो रहा। आजकल झींगुरचरितमानस काContinue reading “रात ढलते ही झींगुर गायन”

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