गांवदेहात का जेम्स हैरियेट


आज फिर दांतों का फॉलोअप था डाक्टर स्वमित्र के क्लीनिक में। फिर कई रेडियोग्राफिक शूट। फिर थोड़ी दांतों की घिसाई। फिर दांतों के रूट्स तक फाइल चुभाने की फाइन ट्यूनिंग। मैं कुर्सी पर आधा लेटा था। मुंह खुला। भीतर धातु के औज़ारों की खनखनाहट। बोल नहीं सकता था, पर सुन सब रहा था। इसी बीचContinue reading “गांवदेहात का जेम्स हैरियेट”

चारवाक का युग आ गया है!


“जीवन का क्या भरोसा। जितना सामने है, उसका आनंद लो। कुछ नहीं है तो ऋण लेकर घी पियो।” चारवाक ने यह बात बहुत पहले कह दी थी। तब शायद किसी ने गंभीरता से नहीं ली। आज लग रहा है — आदमी नहीं बदला, बस साधन बदल गये हैं। घी अब भी है, ऋण भी है;Continue reading “चारवाक का युग आ गया है!”

बिना शब्दों के मेरी बिजली की साइकिल का प्रशंसक


सवेरे के पौने नौ बजे थे। द्वारिकापुर गंगा-घाट से लौटते समय धूप कुछ उनींदी-सी थी। जनवरी की सुबहें वैसी ही होती हैं—आधी जागी, आधी सपनीली। बिजली की साइकिल पर चलते हुए मुझे हमेशा लगता है कि खेतों की हवा खुद रास्ता बनाती है, और हम बस उसके साथ बहते हैं। मकर-संक्रांति की गंवई भीड़, गंगाContinue reading “बिना शब्दों के मेरी बिजली की साइकिल का प्रशंसक”

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free