राजन भाई की पोती के स्वास्थ्य के लिये नानी के नुस्खे

नानी ने वह सब एक तरफ पटक दिया। पूरे दिन भुनभुनाती रहीं कि किताब पढ़ कर बच्चे पाले जायेंगे? बदाम के तेल से हड्डी मजबूत होगी? अरे ये सब चोंचले हैं।


सवेरे की चाय पर लगभग रोज रहते हैं राजन भाई। मेरे चचेरे भाई हैं। उम्र में मुझसे करीब छ साल बड़े। उनका घर रेलवे लाइन के उस पार अहाता में है। हमारे घर से करीब आधा किलोमीटर दूर। लॉकडाउन पीरियड में एक वही हैं, जो लगभग नियमित मिलते हैं। उनसे गांव की कई सूचनायें मिलती हैं। अन्यथा हम लोग शायद उतने सामाजिक नहीं हैं। 😆

सवेरे की चाय पर राजन भाई। राजेंद्र दुबे।

उनसे कई तरह की चर्चा होती है। आज वे थोड़ा परेशान थे। उनकी सात महीने की पोती की कुछ स्वास्थ्य सम्बंधी समस्या है। उनसे बात करते समय मुझे बरबस अपनी नानी की याद हो आयी। जब मैं अपने तीन महीने के बेटे के साथ दिल्ली से बनारस उनके पास आयी थी। आने के पहले बेटा बीमार था और मेरे साथ उसके सामान की बड़ी सी गठरी थी। उसमें थे बदाम का तेल, जान्सन के उत्पादों का पूरा किट और अनेक दवाइयां।

नानी ने वह सब एक तरफ पटक दिया। पूरे दिन भुनभुनाती रहीं कि किताब पढ़ कर बच्चे पाले जायेंगे? बदाम के तेल से हड्डी मजबूत होगी? अरे ये सब चोंचले हैं।

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नीलिमा का ड्राइवर #गांवदेहात

रामेश्वर जैसे लोग कर्जे में डूबे हैं। पगार शराब पीने और लोन चुकाने में चली जाती है और अगले महीने का राशन भी बनिया की दुकान से उधार आता है। शराब और उधार; उधार और शराब – यही नियति है रामेश्वर जैसों की।


नीलिमा मेरी सहेली है। इसी जिले के गांव में रहती है। पति की डेयरी है, खेती भी। पढ़ीलिखी है। पर पति ने शहर जाना सही नहीं समझा तो नीलिमा ने गांव को अपना लिया। उससे फोन पर बातचीत होती रहती है।

नीलिमा ने बताया कि दीदी, अपने ड्राइवर का हमने कोई वेतन नहीं काटा। महीना खतम होने पर दूसरे दिन ही उसको पगार दे दी। प्रधानमंत्री जी ने कहा था कि किसी कर्मचारी का वेतन न काटें, तो हमने उसका पालन किया। वैसे हमें दूध बेचने और पशु आहार का इंतजाम करने में दिक्कत आ रही है, लेकिन किसी काम करने वाले की राशि में हमने कटौती नहीं की।

“रविवार को हमने पैसा दिया रामेश्वर (ड्राइवर) को। और सोमवार को शराब की दुकान खुल गयी। हमने मान लिया कि कई दिनों तक अब रामेश्वर के दर्शन नहीं होंगे। महीने भर बिना शराब के रहने के बाद उसे पगार के साथ साथ शराब भी मिली होगी। सोने में सुहागा!”

“लॉकडाउन में वैसे भी कहीं निकलना नहीं हो रहा। इसलिये रामेश्वर का न आना ज्यादा खला नहीं। पर आते जाते लोगों से सूचना मिली कि रामेश्वर ने शराब पी कर हंगामा कर दिया है। अपने घर में ही आग लगा दी है। इस कारण उसके गांव में पुलीस आयी थी। उसे धमका गयी है। आजकल पुलीस की इमेज बेहतर हो गयी है, इसलिये उसे पकड़ कर अंदर नहीं किया। धमकी भर दे कर छोड़ दिया।”

शराब का असर

“दो दिन बाद रामेश्वर आया। पूछने पर उसने सफाई दी कि क्या करता। मेरी बीवी मुझपर हंस रही थी तो मैंने उसे गाली दे दी। उसने अपने मायके वालों को फोन पर बताया तो उसके बाप ने पुलीस को खबर कर दी। जरा सी बात का बतंगड़ बन गया।”

“दीदी, रामेश्वर शराब के बारे में कभी सच सच नहीं बोलता। इसलिये लगता तो है कि उसने आग लगाई होगी।”

“वैसे रामेश्वर ड्राइवर अच्छा है। नशा न किये हो तो उससे बेहतर इंसान मिलना मुश्किल है। पर शराब उसे बरबाद कर रही है। हम लोगों ने बहुत समझाया, लेकिन कुछ दिन ठीक रहने पर फिर वैसा ही हो जाता है। इसी शराब के कारण उसके मां-बाप-भाई सब उससे दूरी बनाये रहते हैं।”

“बड़ा दुख होता है दीदी कि अपने परिवार की, अपने बच्चे की फिकर ही नहीं करता रामेश्वर। भविष्य की न सोचता है, न कोई चिंता करता है। हमारे साथ इसलिये जुड़ा है कि वह ड्राइवर बहुत अच्छा है। उसे नियमित पगार चाहिये और हमें अच्छा ड्राइवर। पर उसके घर की हालत देख बहुत खराब लगता है।”

नीलिमा की बात मुझे गहरे से छू गयी। गांवों में बहुत से परिवार और लोग शराब के कारण बरबाद हो रहे हैं। रामेश्वर जैसे लोग जितना पैसा पाते हैं, उससे गांव में ठीक से रहा-जिया जा सकता है। गांव में और जरूरतें कम हैं। किसी महानगर में इससे तीन गुणा पगार पा कर भी आदमी नरक सा जीवन ही जीता है। रामेश्वर चाहे तो उसके परिवार में सब कुछ अच्छा हो सकता है। पर होता क्या है? होता है पत्नी को गाली देना, पी कर कहीं पड़ जाना या घर में आग लगाने जैसा कुछ करना। 😦

रामेश्वर जैसे लोग कर्जे में डूबे हैं। पगार शराब पीने और लोन चुकाने में चली जाती है और अगले महीने का राशन भी बनिया की दुकान से उधार आता है।

शराब और उधार; उधार और शराब – यही नियति है रामेश्वर जैसों की। उन्हें जोश आता है तो और उधार ले कर बच्चे का जन्मदिन मना डालते हैं। और उधार बढ़ता ही रहता है। गावों में शहरी मजदूरों वाली आदत बढ़ती ही जा रही है।

(पात्र और स्थान में गोपनीयता हेतु परिवर्तन किया है। इस लिये चित्र भी काल्पनिक हैं। फ्री-मीडिया लाइब्रेरी से लिये गये।)


अंगूर की बेटी

भारतवर्ष में शराब का प्रचलन बहुत बढ़ा है। ऊपर लिखा रामेश्वर अब छत्तीस साल का होगा। वह जब से पैदा हुआ, तब से औसत भारतीय आजतक दुगना तिगुना शराब पीने लगा है। पहले शराब का प्रचलन अमीर देशों – अमेरिका या योरोप में था। अब वह एशिया में प्रसारित हो गया है। अमीर देश अब पीना कम करने लगे हैं और गरीब देश ज्यादा। मेरे बचपन में शराब को सामाजिक मान्यता नहीं थी। शराब पीने वालों को बहुत हेय समझा जाता था। अब यह हाल है कि हम जैसे शराब न छूने वाले लोग उपहास के पात्र बन जाते हैं। चीन और भारत शराब पीने के प्रसार में आगे हो गये हैं।

रेलवे में थे मेरे पति, तब मैंने कई अपने समकक्ष परिवारों को भी बरबाद होते देखा है। एक दो अफसर तो इतना शराब पीते थे कि उन्हें लीवर सिरोसिस हुआ और वे असमय मर गये। एक अफसर के बारे में मेरे पति बताते थे कि वह मैले कुचैले कपड़े पहन कर आता था दफ्तर में। उसकी पत्नी घर चलाने में अपने मायके से मदद मांगती थी। एक दूसरे सज्जन जो वैसे बहुत मेधावी थे, उन्होने अपनी पत्नी को ही शराब पीने का पार्टनर बना लिया था और उनका घर दुगनी तेजी से बरबाद होने लगा था।

धनी, गरीब सब को प्रभावित करता है शराब का नशा। लोग कोरोना के पेण्डेमिक से हतप्रभ हैं। पर सही मायने में देखें तो शराब की लत उससे बड़ा पेण्डेमिक है। उससे बड़ी वैश्विक महामारी है। दुख की बात है कि सरकारें भी उससे बचाव के लिये काम करने की बजाय उससे आमदनी करने पर तत्पर हैं। अब तो एक मुख्य मंत्री यह तक कह रहे हैं कि शराब की डोर टु डोर सप्लाई करने की सोच रहे हैं।

झूम बराबर झूम शराबी। अब अंगूर की बेटी से मुहब्बत कर ले। शेख साहब की नसीहत से बग़ावत कर ले। … चालीस साल पहले यह गाना था; अब यह हकीकत है! 😦


लॉकडाउन 3.0 में #गांवदेहात का माहौल

अब बशीर बद्र की पंक्तियाँ, संशोधन कर, गांव के लिये भी लागू हो रही हैं – कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से। ये कोरोना काल का गांव है; ज़रा फ़ासले से मिला करो।


महानगरों से लोग चले आ रहे हैं। आशंका थी कि उनके आने से कोरोना संक्रमण अनियंत्रित हो जायेगा। लोग इतने बीमार होंगे और मरने लगेंगे कि सम्भाल पाना मुश्किल होगा।

कई दिन हो गये हैं लोगों के आते। कोई पैदल आया है, कोई साइकिल से, कोई छिपते छिपाते किसी वाहन में बैठ कर। अब ट्रेनें भी ला रही हैं। पर जो आया है उसे ले कर गांव वाले आशंकित हैं। उसे यथासम्भव अलग थलग रख रहे हैं। और प्रशासन भी उनको चिन्हित करने तथा क्वारेण्टाइन करने के लिए मुस्तैदी दिखा रहा है। हालात भयावह हो गये हों, और मामले तेजी से बढ़े हों, ऐसा नहीं दिखता।

पास के गांव मेदिनीपुर में कुछ लोग बम्बई से आये थे – ऐसा बताया गया। उनको पुलीस ने खोज निकाला। निकाल कर पास के स्कूल में क्वारेण्टाइन में रख दिया है। आसपास के सभी स्कूल क्वारेण्टाइन स्थल बना दिये गये हैं। उस गांव का बाहर से आया व्यक्ति उसी गांव के स्कूल में ही क्वारेंटाइन कर दिया गया है। पुलीस ने धमका भी दिया है कि अगर क्वारेण्टाइन तोड़ा तो पकड़ कर जेल में रख देंगे। लोग अपने घर के पास क्वारेण्टाइन किए गए हैं तो सामाजिक तनाव नहीं उपज रहा।

मेरे घर के पास भी प्राइमरी स्कूल है। उसमें सात आठ लोग क्वारेण्टाइन में रखे गये हैं। बगल में ही उनकी बस्ती है – पसियान। शाम के समय छत पर दो क्वारेण्टाइनार्थियों को देखता हूं। स्कूल की छत पर वे रात बिताने के लिये अपना बिस्तर बिछा रहे हैं। बगल के खेत में महिला बकरी चरा रही है। ऊपर खड़े क्वारेण्टाइनार्थी नौजवान की वह कोई रिश्तेदार लगती है। मास्क लगाये नौजवान उससे बतिया रहा है। लगभग समान्य सा माहौल है।

घर से उन लोगों को खाना मिल जा रहा है। सड़क चलते को रोक कर वे सुरती-गुटका भी मंगवा ले रहे हैं। स्कूल बड़ा है और केवल 8 आदमी क्वारेण्टाइन में हैं, सो सुविधाओं की किल्लत नहीं है। उनके घर एक दो कमरे वाले होंगे, पर यहां स्कूल में तो बहुत बड़ा परिसर उन्हें मिला है और बिजली-पानी-शौच की सुविधा है। मजे में ही होंगे वे क्वारेण्टाइन में।

सामान्यत:, एक स्कूल में एक ही जाति के लोग क्वारेण्टाइन किये गये हैं। सो जातिगत तनाव की भी समस्या वहां नहीं है।

स्कूल में क्वारेण्टाइन लोग, स्कूल की छत पर।

यह तो पसियान का हाल है। बभनान (ब्राह्मणों की बस्ती) में भी जटा का लड़का बऊ आया है बम्बई से। बताया गया कि प्रयाग से तो बेचारा पैदल ही आया। पैर में छाले पड़ गये थे। घर वालों ने पहले घर में अलग थलग रखा था, अब स्कूल में क्वारेण्टाइन कर दिया गया है। चाहे पसियान हो, अहिरान हो, केवटान हो या बभनौटी/चमरौटी हो – सब में ग्रामीण लोगों में संक्रमण का भय है और (कम या ज्यादा) सभी दूरी बना कर ही मिल रहे हैं।

पत्नी भी पति को दूर से ही मिल रही है उसके प्रवास से वापस आने पर। यह बड़ी बात है और ढाढस बंधाती है कि संक्रमण ज्यादा नहीं फैलेगा। इक्कादुक्का केस तो सामने आयेंगे ही। उनके बारे में सुन कर एकबारगी धुकधुकी बढ़ेगी और भय की लहर उठेगी, पर कुल मिला कर दो तीन दिन में जैसे हालात प्रकटित हो रहे हैं, हालत बेकाबू जैसी नहीं दिखती गांव में।

स्कूल की छत पर बिस्तर बिछाते क्वारेण्टाइन में रखे लोग। आज पूर्णिमा को वे खुले आसमान तले रात गुजारेंगे।

किसी क्वारेण्टाइनार्थी से बात चीत नहीं हुई मेरी। अन्यथा पता चलता कि हजार किलोमीटर चल कर आने से उनकी मनस्थिति क्या है। पर दूर से देखने पर स्कूल के ये लोग (जिनके चित्र मैंने बगल में अपने परिसर से लिये हैं ) ठीकठाक ही दिख रहे थे।

क्वारेण्टाइन की व्यवस्था ठीक लग रही है। मैंने वूहान, चीन के विषय में एक उपन्यासिका पढ़ी – ए न्यू वाइरस। इसमें क्वारेण्टाइन का जितना तानाशाही, भ्रष्ट और अमानवीय चित्रण है, उसके मुकाबले तो यह देसी क्वारेण्टाइन बहुत सुविधाजनक है – एक पिकनिक जैसा। दोषदर्शी लोग भयावह स्थिति बताने में कसर नहीं छोड़ेंगे, पर मुझे अपने आसपास जो दिखा, वह खिन्न करने वाला नहीं लगता।

मुझे बताया गया कि पास के नेशनल हाईवे नंबर 19 (ग्रांड ट्रंक रोड) से हजारों की संख्या में घर लौटने वाले पैदल या साइकिल पर गुजरे हैं। एक दो तो मुझे भी जाते दिखे। यह भी सुना कि रास्ते में (भय वश) लोग बहुत मदद नहीं करते उनकी। पर कहीं अराजक स्थिति नजर नहीं आयी। दारुण कथायें भी सुनने में नहीं आयीं।

पड़ोस के गांव में बम्बई से राह चलता एक नौजवान आया था। उसका घर 25-50 किलोमीटर दूर है। पैदल चला आ रहा था। यहां गांव में उसकी मौसी रहती हैंं। मौसी और उसके के परिवार वाले सोशल डिस्टेंस रख कर उससे मिले। नहाने खाने की सुविधा दी, पर घर पर रखा नहीं। दूरी बना कर रहे। उसे एक साइकिल दे दी उसके घर तक जाने के लिये, और रवाना कर दिया। बेचारा, थका हारा आने पर उसे अपेक्षा रही होगी कि बहुत आवभगत करेंगी मौसी… कोरोना मूलभूत मानवीयता के नये प्रतिमान ठेल रहा है और समाज उसे अंगीकृत करने को विवश है। गांवदेहात के लिये यह थोड़ी अजीब चीज है।

बशीर बद्र की पक्तियाँ हैं – कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से। ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।

अब बशीर बद्र की पंक्तियाँ, संशोधन कर, गांव के लिये भी लागू हो रही हैं – कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से। ये नये कोरोना का गांव है; ज़रा फ़ासले से मिला करो।


लॉक डाउन 3.0 में भी शहर और गांव अलग अलग प्रकार की प्रवृत्ति दिखा रहे हैं। शराब की बिक्री से मची अराजकता जो शहरों में दिखी, वह गांव में नहीं है। कुछ रोचक किस्से जरूर हैं शराब पीकर अपने को इंद्र मानने वाले शूर वीरों के। पर दारू के लिए यहां उतना पैसा नहीं है और उस तरह की भीड़ भी नहीं टूटी मधु शालाओं पर।

New York Times का स्क्रीनशॉट

यह लिखा मिला (New York Times में ) कि भारत में कोरोना केस डबल होना 12 दिन में हो रहा था, वह 9.5 दिन तक खिसक गया है। पर यह खिसकाव शहरी फिनॉमिना है। गांव में वह नहीं दिखता। गांव अपनी जातिगत डिस्टेंसिंग के तनाव से शापित हो सकते हैं, पर संक्रमण का दुष्प्रभाव लॉकडाउन 3.0 में भी नहीं दिखा।

आज जो दशा है, वह अपनी समझ अनुसार मैंने लिख दी है। और लोग अलहदा विचार रखते होंगे। पर गांव में रह कर इस तरह देखना सब को सुलभ नहीं होगा। अत: तुम्हारे ऑबर्वेशन की भी एक अहमियत है जीडी! 😆


हरफनमौला पिण्टू

पिण्टू बहुत मेहनती है। उसके काम में नफासत भी है। मेहनत के अनुपात में (गांव के हिसाब से) कमाता भी है। पर बचत के नाम पर कुछ भी नहीं है।



आज घर के बाहरी हिस्से में सन्नाटा है। पिण्टू का काम (भाग 1, भाग 2) खतम हो गया है। उसका पेमेण्ट भी कर दिया। कुल सात दिन उसने और उसके एक सहायक ने काम किया। उन्होने घर में बची हुई पूरी और आधी ईंटों को एकत्रित किया। उनसे करीब सवा सौ वर्ग फुट खडंजा बिठाया। खड़ंजे पर बालू-सीमेण्ट का लेपन किया। एक टप्पर बनाया बर्तन साफ करने वाली महिलाओं की छाया के लिये। सुबह से शाम तक रहते थे वे दोनो।

बाकी बची बालू और ईंटें सहेज कर रख दी हैं उन्होने।

मेरे भाई (शैलेंद्र) ने कहा कि इनका मेहनताना इनकी पत्नियों को देना चाहिये। ये तो पियक्कड़ हैं। उड़ा जायेंगे। अगर इनकी पत्नियों के पास भी पैसा हो तो किसी न किसी बहाने उनसे निकाल लेते हैं। … पिण्टू को मैने कई बार समझाया है। उसका एक ही जवाब होता है – बुआ, इतना थक जाते हैं कि रात में बिना पिये नींद नहीं आती।

पिण्टू बहुत मेहनती है। उसके काम में नफासत भी है। मेहनत के अनुपात में (गांव के हिसाब से) कमाता भी है। पर बचत के नाम पर कुछ भी नहीं है।

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