भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
आज सवेरे साइकिल चलाते देखा। वह लाश की तरह सड़क किनारे सो रहा था। एक चादर या चारखाने वाली लुंगी ओढ़े। उसके सिर के बाल भर दिख रहे थे। लगा कि शायद बीमार हो। एक आशंका यह भी हुई कि कोई लाश न हो।
बगल में नीचे एक बोतल दिखी। उससे मुझे निर्णय लेने में और सहायता मिली। बंदा या तो बीमार है या टुन्न। साइकिल से उतर कर मैंने दो तीन चित्र लिये। फिर झुक कर उस बोतल का चित्र लिया। उसे जूम कर मोबाइल में देखा तो सब स्पष्ट हो गया।
उसने मदिरा सेवन किया था। दो सौ मिली की देसी मदिरा में से अभी आधी बची थी। “विण्डीज लाइम ब्राण्ड की देसी शराब (मसाला) थी वह। सत्तर रुपये की दो सौ मिली। अर्थात 350 रुपये लीटर। मैं साठ रुपये लीटर के भाव से 7.5 प्रतिशत फैट और 9 प्रतिशत एसएनएफ का दूध ले कर घर लौट रहा था। मुझे साठ रुपये में यह पौव्वा (पौव्वा तो 250मिली का होना चाहिये, यह तो पौव्वे से कम थी) भी न मिले! भला हो कि इस तरह की मंहगी वस्तु मैंने न कभी छुई न आचमन की।
वैसे मैंने ध्यान से फोटो जूम कर पढ़ा। मदिरा किसी ‘रेडिको खेतान’ नामक कम्पनी ने बनाई, रामपुर में। एफएसएसएआई का मार्क भी लगा है उसपर। देसी है पर हूच नहीं है! अल्कोहल 36 प्रतिशत है।
भला हो उस सोते व्यक्ति का। उसके कारण मुझे यह ज्ञान मिला कि देसी शराब के इनग्रेडियेण्ट्स, भाव और उत्पादक कहां/कौन हैं! और यह कि अच्छा दूध देसी दारू के मुकाबले छ गुना सस्ता है!
भला हो उस सोते व्यक्ति का। उसके कारण मुझे यह ज्ञान मिला कि देसी शराब के इनग्रेडियेण्ट्स, भाव और उत्पादक कहां/कौन हैं! और यह कि अच्छा दूध देसी दारू के मुकाबले छ गुना सस्ता है!
यह भी पता चला कि उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था कितनी अच्छी है। किसी राह चलते ने आधी भरी मदिरा की बोतल उठाने की कोशिश नहीं की। मैंने भी नहीं की। :lol:
उस भले आदमी के कारण एक 300 शब्दों की पोस्ट बन गयी। जय हो!
मुझे याद है कि सन 2007-8 तक कोकराझार का नाम सुनने पर झुरझुरी सी छूटती थी। किसी अफसर की पूर्व-सीमांत रेलवे में तबादला हो जाये तो लगता था उसे कालेपानी की सजा हो गयी है। सन 2011 में बम्बई के ताज होटल में बैठे मेरे एक मित्र श्री एन.के. सचान, जो गुवाहाटी में मुख्य माल यातायात प्रबंधक, उत्तर-सीमांत रेलवे, थे; ने जब कहा कि ऐसा कुछ नहीं है तो एकबारगी उनपर यकीन नहीं हुआ था। सन 2011 तक मीडिया पूर्वोत्तर भारत की खूंखार तस्वीर परोसता था। सन 2012 की लिखी अनिल यादव की किताब “वह भी कोई देस है महराज” पढ़ते हुये माथा खराब होता था।
आज प्रेमसागर जब यात्रा कर रहे हैं वहां की और कोकराझार से गुजर रहे हैं, तो एक बारगी मैं असहज सा हुआ हूं। पर वे बड़े मजे से पदयात्रा करते वहां से जोगीघोपा पंहुच गये। मेरे जीवन के दो दशकों में कितना बदला है पूर्वोत्तर। लेकिन, वह सार्थक बदलाव परोसने में बहुत फिसड्डी हैं दक्षिणपंथी विद्वान और लेखक। बाकी, वामपंथियों का जहां तक बस है, वे अभी भी लिखे जा रहे हैं कि असंतोष है। उल्फा वाले मरे नहीं हैं। भूटान और बांगलादेश में उनके लोग अवसर का इंतजार कर रहे हैं। सन 2018 तक का यह नेरेटिव वाम पंथ की ओर झुकाव रखने वाली पुस्तकों में मैंने देखा है।
कोकराझार रेलवे स्टेशन
खैर, प्रेमसागर की यात्रा पर लौटा जाये। वे आज प्रसन्न थे कि गुवाहाटी में फलानी जी गुवाहाटी वापस आ गयी हैं। वे भूटान गयी थीं। आने पर उन्होने प्रेमसागर की हाल खबर ली और बकौल प्रेमसागर – “अब भईया संघ वाले मेरी सहायता करेंगे।”
सवेरे कोकराझार से चल कर एक जगह उन्होने चाय नाश्ता किया। आलू में चावल का सत्तू भर कर टिक्की जैसा कुछ था और साथ में घुघुरी। चाय। “नया आईटम है भईया। फोटू भेज दिया है आपको। देखिये पसंद आयेगा।”
चाय, टिक्की और घुघुरी का नाश्ता
आगे जंगल से गुजरना हुआ। मुझे चित्र भेजे एक फूल वाले झाड़ के। “भईया आंख में कोई भी तकलीफ हो, इस फूल का रस डालने से बहुत आराम मिलता है – ऐसा लोग बताये।”
“भईया आंख में कोई भी तकलीफ हो, इस फूल का रस डालने से बहुत आराम मिलता है – ऐसा लोग बताये।”
जंगल घना है। सागौन के लम्बे वृक्ष दीखते हैं। काफी दूर तक चला जंगल।
जंगल घना है। सागौन के लम्बे वृक्ष दीखते हैं। काफी दूर तक चला जंगल। उसके बाद चम्पाबाती नदी। यह नदी आगे जा कर ब्रह्मपुत्र में मिलती है। गूगल मैप के हिसाब से जोगीघोपा जाने के लिये चम्पाबाती के दांये किनारे पर चलते रहना चाहिये था उन्हें। सड़क के साथ साथ। पर अचानक मैंने पाया कि वे नदी पार कर दूसरी ओर दिख रहे थे। पूछने पर बताया – “भईया, आठ दस लोगों ने बताया कि इस तरफ ही है जोगीघोपा और इस तरफ से पांच सात किलोमीटर कम चलना होगा।”
पर वैसा कुछ था नहीं। खेत और पगडण्डी से रास्ता निकला। एक पतली तुरीया नदी यूं ही पार की बिना पुल। उसके बाद सर्पिल रास्ते से जोगीघोपा पंहुचे तो शाम हो गयी थी यहां भदोही में। ब्रह्मपुत्र के किनारे तो रात हो चुकी होगी। इंतजाम करने वाले वो संघ के प्रचारक कभी फोन भी नहीं किये। वो फलानी जी, जिनकी बात प्रेमसागर मैहर से यात्रा शुरू करते समय भी कर रहे थे कि ‘वे गुवाहाटी में हैं और सब इंतजाम देख लेंगी, ऐसा उन्होने कहा है’, उन्होने कोई खोज खबर नहीं लीं। :sad: :sad:
प्रेमसागर को अपेक्षा थी कि शायद उनके रुकने और भोजन का इंतजाम हो जाये। रोज पचास-साठ हजार (या उससे ज्यादा) कदम चलने वाले की बस इतनी ही जरूरत है। करीब चार-पांच दिन की यात्रा बची है असम की।
पर दिन भर चलने और 53 किमी तथा 64 हजार कदम नापने के बाद पता चला कि सहायता के नाम पर ठेंगा मिला है। उन्हें एक मंदिर में रहने को कहा। मंदिर में पुजारी ने बताया कि छत के नीचे जमीन पर सो जाईये। ओढ़ने बिछाने और भोजन का कोई इंतजाम नहीं। रात में सर्दी और मच्छर से बचने को कुछ नहीं। सिर्फ मंदिर के परिसर में रुकने भर की परमीशन। किसी ने उसके बाद खोज खबर नहीं ली प्रेमसागर की।
“भईया, उनके भरोसे यहां चला आया। वर्ना अपने हिसाब से इंतजाम देखता। पीछे ही कहीं रुक जाता। आने पर सोचा कि आगे बढ़ जाऊं और 8-10 किमी; पर बताया गया कि आगे जंगल है और वहां हाथी भी आ जाते हैं।”
एक बिहार (“वैशाली जिले के थे भईया)” के भोजनालय वाले ने बिहार की बोली सुन पचास रुपये में खाना दिया, पर रुकने के लिये तो आठ सौ में जगह मिली। “एक ही जगह है भईया यहां। जोगीघोपा छोटी जगह है, और होटल/लॉज भी नहीं हैं।” – प्रेमसागर की आवाज में बहुत अर्से बाद हताशा की टोन लगी।
दिन में भी प्रेमसागर अजीबोगरीब अंदाज में चले। उन्होने गूगल मैप पर यकीन करने की बजाय उन लोगों पर यकीन किया जो जोगीघोपा में व्यवस्था करने की बात कर रहे थे और ऐन मौके पर वह व्यवस्था दिखी नहीं। गूगल नक्शे के हिसाब से उन्हें कोकराझार से अभयापुरी-बारपेटा-होजो होते कामाख्या पंहुचना चाहिये था, पर वे ब्रह्मपुत्र के किनारे जोगीघोपा चले आये। यह रास्ता करीब दस किमी ज्यादा लम्बा निकला। और इसमें भी गलत जगह पर चम्पाबती नदी पार कर खेताखेते चलते हुये करीब आठ किमी अतिरिक्त चलने का काम उन्होने किया। चल वे रहे थे, पर गणना कर मैंने बताया कि वे कोई शॉर्टकट से नहीं, ज्यादा ही चले। तब उसको उन्होने जस्टीफाई इस प्रकार से किया “भईया कच्चे पगडण्डी वाले रास्ते में गर्मी कम लगी।”
चम्पाबती नदी पार कर खेताखेते चलते हुये करीब आठ किमी अतिरिक्त चलने का काम उन्होने किया।
एक दो जगह प्रेमसागर बिना किसी रास्ते के टखने से नीचे पानी वाली तुरीया नदी पार किये। उस नदी में पानी न था पर रास्ता भी नहीं था। अगर वे सीधे नदी यूं पार न करते तो उन्हें चार पांच किमी ज्यादा चलना होता। नयी जगह हो तो खेतेखेत चलने की बजाय हाईवे या कार वाला रास्ता पकड़ना चाहिये। … यह मैं उन्हें कई बार कह चुका हूं पर वे एक जिद्दी आदमी हैं।
दिन भर मैं प्रेमसागर की यात्रा मैप पर नापता रहा। मेरा कहना तो माना नहीं प्रेमसागर से। वे मानते भी उतना ही हैं, जितना उन्हें अच्छा लगता है। कुल मिला कर आज की यात्रा सुखद तरीके से शुरू हुई और अंत उसका बहुत ही खराब हुआ।
जोगीघोपा के पास पहाड़ी। नक्शे में नाम है – करिया पहाड़।
अनिल यादव की किताब का शीर्षक – “वह भी कोई देस है महराज” मुझे बहुत सटीक लगा।
कल जोगीघोपा से आगे बढ़ना है प्रेमसागर को। वे ब्रह्मपुत्र के किनारे ही रुके हैं। मैंने उन्हे कहा – जो हुआ, सो हुआ। कल सवेरे सूर्योदय को ब्रह्मपुत्र के जल में देखियेगा। कम से कम नदी तो दिखेगी सवेरे की रोशनी में झिलमिलाती हुई।
देखें, कल क्या होता है!
हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:।
प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें। ***** प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103 कुल किलोमीटर – 3121 मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
बारोबीशा अलीपुरद्वार, पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाके के पूर्वी कोने का बड़ा गांव है। रैदक और गंगाधर नदियों के बीच। उसके आठ किलोमीटर बाद असम प्रारम्भ होता है। बारोबीशा के बाद गंगाधर नदी की तीन चार धारायें छितराई हुई बहती हैं। मुख्य धारा और एक पतली पूर्वी धारा के बीच जगह है शिमुलटापू। शिमुलटापू असम में है।
सवेरे सवेरे प्रेमसागर गंगाधर पार करते हैं। उन्हें नदी का नाम नहीं मालुम। नाम मुझे भी नहीं मालुम था। यह ब्लॉग न लिखना होता तो मुझे पता भी न चलता। लिखने के चक्कर में कितना कुछ खोजना पड़ता है। सवेरे सवेरे नदी पार करना सुखद अनुभव है। तीस्ता के सवेरे के दृश्य बहुत सुंदर आये थे। पर गंगाधर कुछ देरी से पार की प्रेमसागर ने। सवेरे नींद कुछ देर से टूटी। बदन अकड़ रहा है। पैरासेटामॉल शायद लिया है या लेना है। देर से पार करने के कारण ऊषा की अरुणिमा नहीं झलक रही जल में। फिर भी, नदी सुंदर तो लगती है!
गंगाधर नदी। देर से पार करने के कारण ऊषा की अरुणिमा नहीं झलक रही जल में। फिर भी, नदी सुंदर तो लगती है!
गंगाधर की सभी धाराओं को पार करने के बाद गोसाईगांव आता है। वह कोकराझार जिले का पश्चिमी सबडिवीजन है। बोड़ो आटोनॉमस रीजन का पश्चिमी किनारा। कोई जमाना रहा होगा जब यह बोड़ो विद्रोहग्रस्त इलाका था। अब तो सब शांत है। नदी की धारा की तरह शांत। …रैदक नदी गंगाधर में मिल कर गंगाधर बन जाती है। गंगाधर आगे जा कर ब्रह्मपुत्र में मिल कर ब्रह्मपुत्र बन जाती है। या ब्रह्मपुत्र बन जाता है? ब्रह्मपुत्र तो नदी नहीं नद है! इसी तरह तीस्ता भी ब्रह्मपुत्र में मिलती है। नदियों के नाम तलाशना और उनको नक्शे पर ट्रेस करना, उनके किनारे की जगहें और टापू नोट करना भी एक यात्रा है। डिजिटल यात्रा। वह मुझे करनी पड़ रही है।
नदी पार करने के बाद शायद शिमुलटापू है। असम शुरू हो गया है।
नदी पार करने के बाद शायद शिमुलटापू है। असम शुरू हो गया है। एक दुकान में बेंत का काम दीखता है। बिकाऊ सो-पीस और फर्नीचर। तीन चार चित्र प्रेमसागर ने रुक कर भेजे।
एक दुकान में बेंत का काम दीखता है। बिकाऊ सो-पीस और फर्नीचर।
मैं सोचता हूं कि किताब खोल बोड़ो विद्रोह के बारे मेंं पढ़ूं। फिर समझ आता है कि उसकी क्या जरूरत? इस समय तो मुझे यह देखना चाहिये कि प्रेमसागर के साथ क्या हो रहा है। प्रेमसागर अपनी समस्यायें ज्यादा नहीं बताते। पर उनकी खांसी रुक नहीं रही। कल ठण्ड लगी है या शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिला है। मैं उन्हें कहता हूं कि 50-60किमी चलने की बजाय आज 30 किमी तक अपने को सीमित करें। किसी लाइन होटल में रुक कर एक दिन और आराम कर लें। ढाबे में रुकने के पैसे तो कम लगते हैं। पर प्रेमसागर करेंगे अपने मन की।
रास्ते में ढाबे नहीं मिलते। उन्हें बताया जाता है कि कोकराझार तक चलना होगा कोई लॉज या होटल के लिये। और कोकराझार तक चलने का मतलब है आज की पदयात्रा भी 50 किमी से ज्यादा की होगी।
दिन भर की यात्रा के बारे में प्रेमसागर ने बताया – “आज भईया रास्ते पर काम खेताखेती ज्यादा चले हम। एक जगह तो चाय के बागान के बीच से गुजरे। फोटो लेना चाहते थे पर शाम हो गयी थी। फोटो ठीक नहीं आता, इसलिये नहीं लिया।”
“लोग कोऑपरेटिव मिले आज। असमिया थे। ज्यादातर ठाकुर बाभन। कुछ मारवाड़ी भी मिले।”
कोकराझार जिले की डेमोग्राफी के बारे में सर्च करने पर मैं पाता हूं कि ज्यादा बंगला भाषी हैं, उसके बाद असमिया और फिर बोड़ो और अन्य। प्रेमसागर का चुनाव स्पष्ट हो जाता है। कल बंगला लोगों ने उनका मजाक उड़ाया था। आज वे असमिया और मारवाड़ी को कोऑपरेटिव बता रहे थे। बोड़ो लोगों से आदान प्रदान की बात नहीं की। वैसे भी लगता है कि बोड़ोलैण्ड में बोड़ो बहुमत में नहीं हैं। उत्तरोत्तर जनजातीय जनसंख्या का प्रतिशत कम होता गया है। खैर, प्रेमसागर की यात्रा में जनजातीय समरसता या संघर्ष का मुद्दा तो उभरता ही नहीं। उन्हें तो अपनी शक्तिपीठ पदयात्रा करनी है। उसमें जनजातीय इण्टरेक्शन तो होना कोई पक्ष है नहींं।
“एक जगह भईया एक आदमी मिले। उन्हें लकवा था। वे बताये कि कोई बाबाजी लकवा ठीक करने के लिये उनसे पांच हजार ऐंठ कर चम्पत हो गये। भईया मैंने कहा कि जो बाबा पैसा मांगे, उससे सावधान रहें। बाबा को पैसा का क्या जरूरत? वे फिर भी मुझसे कुछ चाहते हैं तो एरण्डी का तेल बदन में मालिश किया करें। महुआ दूध में उबाल कर सेवन करें और वह भी न हो तो बासी मुंह बकरी का दूध लें। कुछ फायदा होगा इन सब से।”
[एरण्डी के तेल से बदन में मालिश; उबला महुआ खाना और बासी मुंह बकरी का दूध?! प्रेमसागर के इस क्वासी-धार्मिक-प्राकृतिक इलाज पर मेरी टिप्पणी है कि मुर्दा भी उठ कर भाग जाये; लकवाग्रस्त कौन चीज है! :lol: ]
श्रद्धा, बाबाई, धूर्तता और देसी इलाज – इन सब का गड्डमड्ड है आज के (वैज्ञानिक) देश काल में भी!
शाम को कोकराझार में बहुत से लॉज और होटल मिले। उनमें चुनाव करने की जहमत उठानी पड़ती, उसके पहले एक मारवाड़ी बासा उन्हें दिख गया। सत्तर रुपये में भरपेट भोजन मिला – गेंहू के आटे की रोटी, चावल, दाल, सब्जी, भुजिया; सब। बासा वाले एक आयुर्वेदिक डाक्टर थे। उन्होने प्रेमसागर को सलाह दी कि वे ज्यादा चल रहे हैं तो नियमित अश्वगंधा का सेवन करना चाहिये। प्रेमसागर बबूल का गोंद प्रयोग करते हैं। अब उन्होने कहा कि अश्वगंधा चूर्ण खरीदेंगे। मैंने सलाह दी कि किसी ठीक कम्पनी का खरीदें – धूतपापेश्वर, बैद्यनाथ या हिमालया का।
किसी “के आर लॉज” में 700रुपये में रुकने का कमरा मिला। बहुत दिनों बाद प्रेमसागर के मुंह से निकला – “भईया, आप तो बाबा विश्वनाथ के पड़ोसी हैं। जरा उन्हें कहिये न कि मेरा खर्चा कुछ कम करायें।”
बाबा विश्वनाथ से ज्यादा सम्पर्क मेरी बजाय उनका खुद का है। :lol:
खैर, पाठकों से अपील है कि वे कुछ सहायता उनके यूपीआई पते पर करने का कष्ट करें। यह लगता है कि प्रेमसागर का पैसा चुक गया है।
प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
नक्शे के हिसाब से बोरीबीशा से कोकराझार तक 52 किमी चले प्रेमसागर। उनका कहना है कि खेताखेती चले तो कुछ कम चलना पड़ा, पर मुझे वैसा लगता नहीं। शॉर्टकट तलाशना उनका मनोविनोद है। वैसा (सामान्यत:) होता नहीं। वैसे भी, मेरी सलाह है कि बोड़ोलैण्ड में शॉर्टकट छाप काम करने की बजाय सड़क पर ही चलना चाहिये। पर प्रेमसागर करते अपने अनुसार ही हैं।
कामाख्या तक पंहुचने में अभी 175 किमी चलना है। चार दिन की असम यात्रा शेष होनी चाहिये। देखें, कैसे होती है यह यात्रा। आज का दिन तो सकुशल रहा, बावजूद इसके कि सवेरे उनकी तबियत नरम लग रही थी।
ॐ मात्रे नम:!
हर हर महादेव!
प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें। ***** प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103 कुल किलोमीटर – 3121 मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।