भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
अमरदीप (गुड्डू) पांड़े के यहां दो दिन आराम किया प्रेमसागर ने। एक दिन तो अमरदीप जी के आतिथ्य में और दूसरे दिन आतिथ्य के कारण स्वाद में ज्यादा खाने के कारण गड़बड़ हुये पेट को आराम देने में। “अब ठीक है भईया, कल सवेरे निकलूंगा। सुल्तानगंज जा कर वहां से पदयात्रा शुरू करूंगा। भागलपुर नहीं जाना है। सीधे फेरी से गंगा पार कर नौगछिया की ओर चलूंगा। वहां से तो सीध में है पूर्निया।”
दो दिन प्रेमसागर ने आतिथ्य लेने में बिताये और मैंने “मैला आंचल” के पन्ने पलटे। उन्होने आगे की लम्बी यात्रा के पहले बमुश्किल मिला विश्राम किया और मैंने किया पूर्णिया के अंचल की जिंदगी जानने का प्रयास। प्रेमसागर की यह यात्रा सामने न होती तो मैं शायद ही सुल्तानगंज, भागलपुर, नवगछिया, पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज का अंचल तलाशता।
नीरज पांड़े, प्रेमसागर, सुनील सिंह भाजपा नेता, गुड्डू पांड़े और सूरज प्रकाश सिंह। सुनील जी के यहां भोजन पर।
प्रेमसागर का आतिथ्य जम कर हुआ। गांव के ही भाजपा नेता सुनील सिन्ह जी के यहां उनके भोज का भी आयोजन था। प्रेमसागर ने उसका चित्र भी भेजा है और उसमें लोगों के नाम भी लिखे हैं। गांव में भोजन पर बुलाने पर पता नहीं क्यों मेरे मन में पीढ़ा पर बैठ कर सामने टाठी (थाली) में दाल-चावल-रोटी-तरकारी की छवि थी। टाठी में ही दाल और उसे अलग करने के लिये टाठी में ही टेवकन (थाली के नीचे पत्थर का टुकड़ा, रोटी और भात की ओर)! पर यूपी-बिहार के गांव में भी अब वह नहीं होता। सुनील जी के यहां भी एक मेज के आसपास कुर्सी पर बैठ भोजन करते दिखे लोग। दो तीन दशकों में जीवन पद्यति में बदलाव आया ही है।
प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें। ***** प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103 कुल किलोमीटर – 3121 मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
मैंने प्रेमसागर को आगे की यात्रा में देखने-पूछने की अपनी कुंजी थमाई। वे लोगों से पूछें कि कोसी को किस भाव से लेते हैं ग्रामीण। गंगा की तरह पूजते हैं या बाढ़ के लिये कोसते हैं? गरीबी कैसी है? आम भारत की बजाय आंकड़े इस अंचल में निरक्षरता ज्यादा बताते हैं। स्कूल कैसे हैं? अस्पताल और स्वास्थ्यकेंद्र काम करते हैं या नाम मात्र को हैं? खेती ठीक से होती है या नील की खेती से बंजार हुई धरती के अवशेष अभी भी हैं। कोसी द्वारा लाई माटी की उर्वरता कैसी है। लोग खड़ी बोली समझते हैं या मगही, मैथिली, अंगिका का ही प्रयोग करते हैं। परिवहन के साधन कैसे हैं। … इनमें से कुछ मेरे अपने जिज्ञासु मन के प्रश्न हैं और कुछ फणीश्वरनाथ रेणु की आंचलिक पुस्तक की उपज हैं।
मैं नक्शे में मैला-अंचल के मेरीगंज की तलाश करता हूं। पर शायद वह काल्पनिक जगह है। कोई गांव या कस्बा पूर्णिया के अंचल में दिखता नहीं।
इस चार पांच दिन की बिहार यात्रा से मुझे जानने की बहुत उत्सुकता है। पर जिस तरह से प्रेमसागर यात्रा करने जा रहे हैं – सवेरे और शाम दो-तीन घण्टा बस में सफर कर यात्रा के स्थल पर जाना और वहां से अमरदीप जी के यहां लौटना, लगता नहीं कि बहुत जिज्ञासा शमन हो पायेगा।
अगली पोस्ट में बताऊंगा सुल्तानगंज से नवगछिया की यात्रा का हाल।
1960-70-80 के दौरान एक चौबे जी बनारस से सवेरे की पैसेंजर में गार्ड साहब के डिब्बे में अखबार के साथ चलते थे। रास्ते में नियत स्थानों पर घरों के पास अखबार फैंकते चलते थे। “आज” अखबार गोल कर सुतली से बांधा हुआ। निशाना लगभग अचूक होता था। उस पैसेंजर और अखबार की प्रतीक्षा में घर के बच्चे खड़े रहते थे। प्रतिस्पर्धा होती थी कि कौन उसे लोक कर घर में पंहुचायेगा।
विक्रमपुर गांव में बड़मनई पण्डित तेजबहादुर (मेरे श्वसुर जी के पिता) के यहां आता था आज अखबार। उनकी बखरी के पास कोंहराने के समीप चलती ट्रेन से अखबार उछाला करते थे चौबे जी। कटका स्टेशन से गाड़ी छूटी ही होती थी, सो स्पीड कम ही होती थी। शायद ही कभी हुआ हो कि उसकी सुतली खुल गयी हो और अखबार के पन्ने छितराये हों।
चौबे जी, शायद पास के गांव चौबेपुर के निवासी थे। बनारस से माधोसिंह के बीच अखबार पंहुचाया करते थे। सफेद धोती-कुरता-जाकिट और टोपी पहने कांग्रेसी थे वे। अस्सी के आसपास उनकी मृत्यु हुई। तब यह पैसेंजर से अखबार आने का सिलसिला थम गया।
उसके बाद तीन साल तक पण्डित तेजबहादुर के बड़े बेटे पण्डित आद्याप्रसाद औराई चीनी मिल से लौटते हुये अखबार ले कर आने लगे। लोगों को अखबार सवेरे की बजाय शाम को पढ़ने को मिलने लगा। पण्डित आद्याप्रसाद जी की जीप आने का इंतजार करते थे लोग अखबार के लिये। सारे गांव में एक ही नियमित अखबार आता था और पूरा गांव उसे पढ़ने आता था। एक दिन पुराना अखबार भी पढ़ा जाता।
पण्डित तेजबहादुर “बिलिट” (ब्लिट्ज – आर के करंजिया का हिंदी संस्करण वाला साप्ताहिक अखबार) के भी शौकीन थे। बनारस जाने वाले लोगों से विशेषत: बिलिट मंगाते थे। इसके अलावा उनके दूसरे बेटे – इंजीनियर साहब – की शादी में बड़ा, वाल्व वाला मरफी का रेडियो मिला था। जो ऑन करने पर गर्माने में समय लेता था। उसपर खबर सुनने के लिये भी आसपास के और गांव के बाहर के भी लोग जुटते थे। लोग रेडियो के गरमाने का धैर्य से इंतजार करते थे। पण्डित आद्याप्रसाद चीनी मिल के काम के साथ खेती किसानी भी मनोयोग से कराते थे। उनके पसंदीदा कार्यक्रम होते थे – रेडियो पर समाचार और कृषि दर्शन। कृषि दर्शन में तो पण्डित आद्याप्रसाद का कई बार इण्टरव्यू भी प्रसारित हुआ।
सन 1983-84 में महराजगंज कस्बे में किसी ने अखबार की एजेंसी ली। अखबार वहां से साइकिल से ले कर गांव में आने लगा हरकारा। गांव में बखरी, संत, लोटन, पांड़े और रेलवे स्टेशन पर आने लगा अखबार। शुरू में आज ही आता था एजेंसी के माध्यम से। फिर जागरण शुरू हुआ।
नब्बे के दशक में 89-90 में पण्डित शिवानंद, तेजबहादुर जी के तीसरे लड़के, बखरी छोड़ पसियान के अपने ट्यूबवेल (गांव की भाषा में टबेला) पर रहने चले आये। तब उनके पास भी अखबार आने लगा। हॉकर टबेले पर साइकिल से अखबार नहीं देता था। टबेले तक सड़क ही नहीं थी। अखबार कटका स्टेशन पर रख देता था और पण्डित शिवानंद का कोई कारिंदा – जयनाथ, सूरज या पांड़े स्टेशन से ले कर आते थे।
टबेला पर सन 1996 से पण्डित शिवानंद के बेटे शैलेंद्र (टुन्नू पण्डित) आ कर रहने लगे। तब से अब तक टुन्नू पण्डित यहीं जमे हैं। उसके बाद चार-पांच अखबार नियमित सप्लाई होने लगे। आज, जागरण, अमर उजाला, सहारा और हिंदुस्तान। सभी अखबार हिंदी के। अंगरेजी का कोई पढ़वैय्या न था। आज भी नहीं है।
सन 2015 में मेरी पत्नीजी और मैंने यहां जमीन खरीद कर गांव में रीवर्स माइग्रेशन किया। टुन्नू पण्डित के बगल में बनाया अपना घर। हमें अंगरेजी के अखबार की कमी खली। जोड़ तोड़ कर एजेंसी वाले सज्जन को मनाया गया कि एक हिंदुस्तान टाइम्स स्टेशन के पास चाय की चट्टी पर दे जाया करे उनका वाहन। बहुत रिलायबुल नहीं था यह सिस्टम। कभी कभी गाड़ी वाला अखबार देना भूल जाता था। कभी अंग्रेजी के “शौकीन” उसको चीथ डालते थे। पन्ने खुला अखबार मुझे कभी पसंद नहीं आया। घर पर हिंदी वाला अखबार आया करता था। पहले दो अखबार लिये फिर किफायत कर एक – दैनिक हिंदुस्तान – पर अपने को सेट कर लिया। यह सिलसिला पांच साल चला।
संदीप कुमार
दो साल पहले लोगों के समय पर अखबार का पैसा न अदा करने के कारण करीब 50-60 हजार का घाटा सह कर संदीप कुमार ने अखबार सप्लाई करना बंद कर दिया। अब गांव में कोई अखबार नहीं आता। जिसे लेना होता है, वह महराजगंज बाजार में जा कर ले आता है। बखरी वाले देवेंद्रनाथ जी दो अखबार मंगाते हैं। उनके छोटे भाई मन्ना दुबे अपनी मोटर साइकिल से रोज महराजगंज से ले कर आते हैं। देवेंद्रनाथ जी गांव के बुद्धिजीवी हैं। रसूख वाले भी हैं। उनके यहां अखबार आना ही चाहिये। पर अब पण्डित तेजबहादुर वाला जमाना नहीं रहा। लोगों को अखबार की दरकार नहीं है। लोगों के पास स्मार्टफोन हैं। उन्ही से खबरें, वीडियो और गेम देखते-खेलते हैं लोग।
अखबार की अब उतनी तलब नहीं रही लोगों में।
मेरे पास विकल्प है मेग्जटर का। दुनिया भर की पत्र पत्रिकायें मुझे अपने टैब/लैपटॉप पर घर बैठे मिल जाती हैं।
फिर भी, प्रिण्ट वाले अखबार के अपने लाभ हैं। प्रिण्ट में, सरसराता हुआ पन्ना पढ़ना अलग अनुभव है। किण्डल पर पुस्तकें पढ़ने वाले भी प्रिण्ट में किताब पढ़ने का मोह नहीं त्याग सकते। इसके अलावा घर में रद्दी के अलग उपयोग हैं। सो मैंने भी सोचा कि एक अखबार घर में आना ही चाहिये।
चार दिन पहले सवेरे महराजगंज बाजार में अखबार बांटते मंगल प्रसाद जी दिख गये।
चार दिन पहले सवेरे महराजगंज बाजार में अखबार बांटते मंगल प्रसाद जी दिख गये। उनसे मैंने अखबार खरीदे – हिंदुस्तान और अमर उजाला। घर में पढ़ने के बाद तय किया कि रोज दैनिक हिंदुस्तान लेने महराजगंज जाया करूंगा। इसी बहाने सवेरे छ किमी की साइकिल सैर भी हो जायेगी।
मंगल प्रसाद अपने घर पर सवेरे छ से सात के बीच अखबार देते हैं। कई लोग वहीं से ले जाते हैं। उसके बाद वे साइकिल से अखबार बांटने निकलते हैं महराजगंज बजरिया में। अगले दिन पूछते पूछते उनके घर पंहुचा। घर के सामने एक पर्दा लगा था। उसके पीछे चार पांच अखबारों की ढेरी रखे जमीन पर बिस्तर पर लेटे थे मंगल प्रसाद। बताया कि चार बजे अखबार आ जाता है। तब से वे यहीं लेटे-अधलेटे अखबार का वितरण करते हैं। सात बजे तैयार हो कर बाहर निकलते हैं।
अगले दिन पूछते पूछते मंगल प्रसाद के घर पंहुचा। घर के सामने एक पर्दा लगा था।
एक आदमी सड़क से ही मोटर साइकिल का हॉर्न बजाता है। पर्दे से झांक कर उसे पहचान मंगल प्रसाद सड़क पर आ कर उसे अखबार देते हैं और साथ में छुटपुट बातचीत भी। उन सज्जन का भाई बीमार है। इसलिये कई दिन से वह अखबार लेने नहीं आ रहा। पेट खराब है। डाक्टर ने कहा कि अगर ठीक नहीं होता तो पानी चढ़ाना होगा। एण्टीबायोटिक के अलावा पानी चढ़ाना अल्टीमेट दवा है ग्रामीण अंचल में। बीमारी की गम्भीरता इसी से आंकी जाती है कि “पांच बोतल पानी चढ़ा, तब जान बची।”
मंगल प्रसाद बताते हैं कि चौदह साल से वे अखबार की एजेंसी चला रहे हैं। उसके पहले बदल बदल कर लोग चलाते रहे। उनके पहले कोई पाठक जी चलाते थे एजेंसी। ज्यादा पहले की बात मंगल प्रसाद को नहीं मालुम।
Aचार पांच अखबारों की ढेरी रखे जमीन पर बिस्तर पर लेटे थे मंगल प्रसाद। बताया कि चार बजे अखबार आ जाता है। तब से वे यहीं लेटे-अधलेटे अखबार का वितरण करते हैं।pril0923
छ दशक में गार्ड के डिब्बे से अखबार ले कर चलते चौबे जी से आज के मंगल प्रसाद जी तक का अखबार का सफर! अब शायद स्मार्टफोन अखबार की तलब मार ही डालेगा। पर कोई ठिकाना नहीं। हिंदी के अखबारों का सर्क्युलेशन अब भी, कचरा परोसने के बावजूद भी, पांच सात परसेण्ट सालाना बढ़ ही रहा है। हो सकता है मंगल प्रसाद का बिजनेस चलता रहे। हो सकता है गांव में अखबार सप्लाई करने वाला कोई नया संदीप कुमार सामने आ जाये! शायद।
तेजी से बदलते युग में बिजनेस प्यादे की तरह नहीं ऊंट या घोड़े की तरह चलता है – तिरछा या एक बार में ढाई घर।
अखबार पुराण अभी चलेगा। मैं अभी जाया करूंगा मंगल प्रसाद के घर अखबार लेने को!
एक आदमी सड़क से ही मोटर साइकिल का हॉर्न बजाता है। पर्दे से झांक कर उसे पहचान मंगल प्रसाद सड़क पर आ कर उसे अखबार देते हैं और साथ में छुटपुट बातचीत भी।
विनोद दुबे मर्यादी वस्त्रालय में काम करते हैं। हजारों रेडीमेड कपड़े होंगे वहां, पर उन सब की जानकारी उन्हें होती है। दुकान के कर्ताधर्ता विवेक चौबे के खास लगते हैं। उस दिन बाबूसराय-कटका पड़ाव के बीच सवेरे साढ़े सात बजे मिल गये। मैं अपनी सवेरे की साइकिल चला रहा था। वे बाबूसराय में किसी से दो हजार का तगादा कर लौट रहे थे।
मैं चुपचाप साइकिल चलाने और आसपास निहारने के मूड में था और वे अपनी कहने के। उन्होने साइकिल पर बैठे बैठे पैलगी-प्रणाम किया। खुद ही बोले – आप पहचान नहीं रहे हैं? हम मर्यादी में काम करते हैं। कल आपका जाकिट हम ही सिलवाये थे। पैदल ही टेलर के यहां लेने गये और आये थे। जाकिट की फिटिंग तो ठीक आ रही है न?
मैं “मर्यादी वस्त्रालय” के नाम से पहचान गया।
उन्होने बताया कि उनके दांये पैर में रॉड पड़ी है। “जांघ से घुटने के बीच हड्डी के तीन टुकड़े हो गये थे। भारी एक्सीडेण्ट था। विंध्यवासिनी दर्शन को गये थे। वापसी में पास के ही दो मोटरसाइकिल सवार बैठा लिये। आगे बड़ी दुर्घटना हो गयी। दोनो तो ऊपर चले गये। मेरा इलाज चला बनारस के ट्रॉमा सेण्टर में। चार पांच लाख खर्च आया। माई का दर्शन करने गया था। उनकी कृपा थी तो बच गया।”
माई पर विश्वास की यह आस्था तर्क के परे की चीज है। दर्शन तो उन दोनो ने भी किये होंगे। और वे परोपकार भी कर रहे थे इन्हें साथ बिठा कर लाने में। पर वे चले गये ऊपर। … वैसे ऊपर जाना बेहतर था या इस भवजगत में खटना?
मर्यादी वस्त्रालय में V आकार का वैष्णवी तिलक लगाये विवेक चौबे
श्रद्धा, तर्क, आस्था, न्याय आदि पहले भी तुम्हारे भेजे में नहीं पड़ता था और अब भी; 67+ की उम्र में भी नहीं पड़ता। तुम्हें ध्यान योग अभ्यास करना चाहिये जीडी! – मैंने अपने आप से कहा।
माई की कृपा क्या है? हम जैसे कुतर्कवादी को कैसे मिलेगी माई की कृपा? विनोद दुबे तो दुर्घटना में बचने को भग्वद्कृपा मान कर मगन हैं। उन्होने मुझे यह बताया, यह अनेकानेक लोगों को बता चुके होंगे। उनके पास बताने को यह मिराकेल है, मेरे पास तो कुछ भी नहीं है।
चलते चलते विनोद दुबे ने कहा – “आप रसूख वाले हैं। आपके परिचय में बहुत लोग होंगे। मेरी बिटिया की शादी के लिये कोई सही रिश्ता अगर आप जानते हों…”
मैं तुरंत अपनी अंतरमुखी खोल में घुस गया। मुझे ज्यादा जानकारी नहीं लोगों की। बाकी, “कभी कोई पता चला तो बताऊंगा।”
वहां से मैं आगे बढ़ गया और विनोद भी मर्यादी वस्त्रालय की ओर चले। दुकान खुलने का समय होने वाला था। मैं दिन भर सोचता रहा; अब भी सोच रहा हूं; माई की कृपा मुझ पर कैसे हो सकती है? या कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझपर भग्वद्कृपा बरस रही है और मैं छाता लगाये उससे अनभिज्ञ हूं?
ॐ मात्रे नम:।
बाबूसराय-कटका पड़ाव के बीच सवेरे साढ़े सात बजे मिल गये विनोद दुबे।