श्री बहुला शक्तिपीठ, केतुग्राम


23 मार्च 2023

आज एक के साथ एक फ्री वाला दिन था प्रेमसागर के लिये। वे सैंथिया रेलवे स्टेशन के पास के मौचक लॉज से सवेरे निकले श्री बहुला शक्तिपीठ, केतुग्राम जाने के लिये। रास्ते में फुल्लारा देवी के शक्तिपीठ का परसों दर्शन वे कर चुके थे। सो वहां तक वे बस से गये। उसके बाद उन्हें पैदल चलना था।

श्री बहुला शक्तिपीठ केतुग्राम, बर्दवान में है। यह अजय नदी के तट पर है। गूगल मैप में पैदल चलने वाले के लिये विकल्प है। उसका प्रयोग कर वे आगे बढ़ रहे थे। इस एप्प का प्रयोग वे अच्छे से सीख गये हैं। मेरे आकलन के हिसाब से रुपया में बारह आना प्रयोग आ गया है उन्हें। पिछ्ली ज्योतिर्लिंग यात्रा में रुपया में एक-दो आना भर आता था। ज्यादातर दिक्कत नहीं होती। उनकी लोकेशन के बारे में जो अनुमान होता है, देखने पर उसी के आसपास दीखते हैं। इसलिये लोकेशन की सैम्पलिंग मैंने बहुत कम कर दी है। दिन भर में दो तीन बार, बस।

“दिन में यात्रा सामान्य रही भईया। एक जगह एक मैडीकल स्टोर वाले सज्जनों ने मुझे शक्तिपीठ पदयात्री जान कर बड़े आदर से बिठाया और जलपान कराया। … यहां छेना की मिठाई बहुत सस्ती है भईया। दूध के दाम तो लगभग वैसे ही हैं जैसे यूपी-बिहार में पर चाय-मिठाई-भोजन बहुत सस्ता है। छेना 150 रुपये किलो। चाय तीन रुपये की। वैसी चाय अपने इलाके में सात-दस की मिलती होगी। आम आदमी अच्छे से भरपेट खा सकता है। मुझे छेना के साथ खूब शीरा भी दिया। ज्यादा पैदल चलने के लिये जितनी चीनी मिल जाये, उतना अच्छा!” – प्रेमसागर ने यह बात मुझे कई बार कही।

मैडीकल स्टोर वालों ने सम्मान दिया। दांये है छेना (रसगुल्ला) बेचने वाले लोगों के बर्तन।

“दिन में एक गांव से गुजरा मैं। वहां के बारे में लोगों ने बताया कि यहीं रहते थे चैतन्य महाप्रभु। वे घर बार छोड़ कर न जायें इसी लिये पत्नी ने अपने आंचल से उन्हें बांध कर रखा था। पर रात में वे धीरे से गांठ खोल कर निकल भागे और संत बन गये। उनका जन्म स्थान भी पास के किसी गांव में है। मेरे पास समय नहीं था, वर्ना उन सब जगहों की यात्रा करता।” – प्रेमसागर यात्रा मार्ग को ले कर सिंगल-प्वाइण्टेड हैं। उनकी यात्रा में इधर उधर निकलने या यात्रा मार्ग बदलने की सम्भावनायें कम हैं।

“दिन में एक गांव से गुजरा मैं। वहां के बारे में लोगों ने बताया कि यहीं रहते थे चैतन्य महाप्रभु। वे घर बार छोड़ कर न जायें इसी लिये पत्नी ने अपने आंचल से उन्हें बांध कर रखा था। पर रात में वे धीरे से गांठ खोल कर निकल भागे और संत बन गये।”

पर, आज शाम चार बजे, जब मुझे अपेक्षा थी कि वे श्री बहुला माता का दर्शन कर लौट रहे होंगे तो उन्हें रास्ते से अलग ‘अट्टहास’ नामक स्थान पर पाया। वे अट्टहास में एक शक्तिपीठ का दर्शन सम्पन्न कर रहे थे। फुल्लारा माता (अट्टहास) का दर्शन वे दो दिन पहले कर चुके हैं। यह मंदिर बीरभूम जिले में है। आज फिर अट्टहास के नाम से बर्दवान जिले में नया शक्तिपीठ?!

उनसे पूछा तो बताया कि एक जगह रास्ता टूटा था। उन्होने मार्ग बदला लोगों के कहने पर। उन लोगों से शायद उन्होने शक्तिपीठ का रास्ता पूछा होगा और लोगों ने उन्हे अट्टहास की ओर मोड़ दिया। यह स्थान भी शक्तिपीठ और यहां भी देवी का होंठ धरती पर गिरा था। शायद किसी ने उस शक्तिपीठ का स्थान यहां तय किया। उसकी क्या कथा है? कौन पुराण में उसका जिक्र है? यह जानने का समय नहीं था। वहां लोगों ने बताया कि फुल्लारा में देवी का ऊपर का होठ गिरा था और यहां नीचे का (या उसका विपरीत)। इन दोनों स्थलों पर मान्यता देवी के होंठ गिरने की है और दोनो स्थलों के भैरव भी एक ही हैं। शायद एक ही शक्तिपीठ को दो अलग अलग जगह किसी कालखण्ड में स्थापित किया गया हो।

अट्टहास के दृश्य

प्रेमसागर ने एक ऑटो वाले को तय किया था, उससे वे केतुग्राम पंहुच कर श्री बहुला माता के दर्शन भी किये और वहां से बस से वापस लौटे। करीब तीस किलोमीटर चलना था उन्हें और शेष यात्रा बस से करनी थी। मेरे आकलन से उन्हें शाम छ बजे तक वापस आ जाना था। पर वे वापस पंहुचे रात पौने नौ बजे।

“अट्टहास” का शक्तिपीठ ज्यादा व्यवस्थित था और बड़े क्षेत्र में। वहां की जगह देख कर लगता था कि यह कोई अहम मंदिर है। इसके विपरीत श्री बहुला मंदिर सामान्य सा था। लगता नहीं था कि कोई बड़ा मंदिर है। वहां व्यवस्था भी सामान्य थी। वहां के एक ताल में साफसफाई भी नहीं थी और ताल में जल भी स्वच्छ नहीं था। गंदगी थी। बहुला शक्तिपीठ में एक बाबा जी मिले प्रेमसागर को। उनके केश बहुत लम्बे थे। नौ-साढ़े नौ फीट के। बाबा ने उसे लपेट कर बांधा हुआ था, वर्ना वे जमीन को बुहारते चलते। उन बाबाजी ने जब प्रेमसागर की पदयात्रा की बात सुनी तो प्रसन्न हो कर उन्हें एक चूड़ी दी। यह कहा कि यात्रा में शक्तिपीठ दर्शन के समय उसे साथ में रखें।

श्री बहुला शक्तिपीठ में एक लकड़ी का पुल था। शायद नया बना था। उसकी मिट्टी समतल तो की गयी थी, पर रेत हल्की थी और पैर धंसने से एक डेढ़ फुट का गड्ढा बन गया। प्रेमसागर के पांव डगमगाये और दोनों पैरों में हल्की मोच आ गयी। उसके बाद वापसी यात्रा पैदल नहीं, बस से करनी थी, सो काम चल गया। रात में जब वे सईंथिया बस अड्डे पर उतरे तो पैर दर्द कर रहा था।

श्री बहुला शक्तिपीठ, केतुग्राम के दृश्य। स्लाइड शो।

आज कुछ परेशान से थे प्रेमसागर। “भईया, अब मैं अपना पूरा सामान उठा कर यहां से निकल लूंगा। शाम को बस या ट्रेन पकड़ कर वापस लौटना ज्यादा ही पड़ जा रहा है।” वैसे सेंथिया स्टेशन के इस लॉज से आसपास के शक्तिपीठों को कवर करना लगभग पूरा हो गया है। पश्चिम बर्दवान में बहुला माता के नाम से एक और शक्तिपीठ नक्शे में दीखता है। पर आज उन्होने श्री बहुला माता के दर्शन किये हैं। यह उन्हीं के नाम का दूसरा शक्तिपीठ सम्भवत: वैसा ही है जैसे फुल्लारा और अट्टहास के दो शक्तिपीठ हैं। दोनो अलग अलग जगह पर हैं, पर उनकी कथा एक सी है।

शक्तिपीठों का मानकीकरण हुआ नहीं है। और जिस तरह की हिंदू/सनातन धर्म की प्रवृत्ति है – आगे होने की सम्भावना भी नहीं है। आखिर यह अब्राहमिक धर्मों की तरह कोई धर्म गुरु या धर्म ग्रंथ द्वारा हाँके जाने वाला रिलीजन तो है नहीं। यहां श्रद्धा और आस्था तरल तरीके से बहती है।

प्रेमसागर की टांगों में मोच को ले कर परेशन थे। रात में वे कोई मैडीकल की दुकान से आयोडेक्स लेने और पैरों पर मल कर उन्हें बांध कर सोने की बात कह रहे थे। मैंने उन्हें सलाह दी कि एक दिन वे इसी लॉज में आराम कर अपने पैर सीधे कर लें। आगे दो सौ किलोमीटर की पदयात्रा के लिये पांवों को दुरुस्त करना जरूरी है। प्रेमसागर को सलाह पसंद आयी। शायद वे यही चाह भी रहे थे, बस कोई और कह दे, उसके इंतजार में थे।

उन्हें सईंथिया की इस लॉज को छोड़ कर आगे कलकत्ता की ओर बढ़ना चाहिये – रास्ते में पड़ने वाले दो-तीन शक्तिपीठों का दर्शन करते हुये। यहां रहते हुये उन्हें बहुत सहूलियत मिली। मौचक लॉज के लड्डू शाह जी का एक चित्र उन्होने भेजा। शाह जी ने उनकी बहुत सहायता की। उनकी सहायता से ही बीरभूम-बर्दवान के पांच-छ शक्तिपीठों के दर्शन वे बड़ी सहजता से कर पाये।

मौचक लॉज, सईंथिया के लड्डू शाह जी। कृतज्ञ हैं प्रेमसागर लड्डू शाह जी के।

कृतज्ञ हैं प्रेमसागर लड्डू शाह जी के। उनसे मिलते समय लड्डू शाह जी बोले – “फिर कभी आना हो तो सेवा का मौका दीजियेगा। बीच बीच में कभी कभी फोन करते रहियेगा, याद आने पर। मैं भी करता रहूंगा।”

शक्तिपीठ यात्रा के सहयात्री-सहयोगी हैं लड्डू शाह जी!

चौबीस मार्च को सईंथिया के इस लॉज में दिन भर आराम कर पच्चीस मार्च को रवाना होंगे।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
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कालिका नलटेश्वरी शक्तिपीठ


22 मार्च 23

सैंथिया स्टेशन, जहां लड्डू शाह जी की मौचक लॉज में प्रेमसागर रुके हुये हैं; से कालिका नलटेश्वरी शक्तिपीठ 45 किमी दूर है। उत्तर की ओर। बीरभूम जिले के रामपुरहाट तहसील में। आज प्रेमसागर को वहां जाना था। पैदल उन्होने शक्तिपीठ तक यात्रा की।

वापसी में नलहाटी से ट्रेन पकड़ी। सैंथिया (या सईंथिया) भी जंक्शन है और नलहाटी भी। दोनो पर लगभग सभी ट्रेनें रुकती हैं। एक घण्टा से भी कम समय लगता है ट्रेन यात्रा में।

रास्ते का एक दृश्य

आज रात की बारिश के कारण कहीं कहीं सड़क पर कीचड़ था। चप्पल फंस जा रही थी। पांच सात किलोमीटर सड़क भी टूटी-फूटी मिली। सवेरे जल्दी निकलने के बावजूद दिन भर लग गया नलटेश्वरी माई के स्थान पर पंहुचने में। रास्ते में दो मिलें दिखीं। दोनो कृषि आर्धारित मिलें। थोड़ा बहुत अद्योगिक विकास तो है बीरभूम के इस संथाली इलाके का।

शाम चार बजे वे 500 मीटर दूर थे मंदिर से। पौना घण्टे बाद नलहाटी स्टेशन से वापसी की ट्रेन थी। प्रेमसागर को दर्शन जल्दी करने थे। खैर, “माई की कृपा से” सब अच्छे से हो गया।

“मंदिर एकांत है भईया। साफ सुथरा। मन को अच्छा लगता है वहां। भीड़ भी बहुत ज्यादा नहीं थी। नवरात्रि का प्रारम्भ है तो कुछ तो लोग थे ही। भईया, यहां सती माई का गला गिरा हुआ था। यहां भैरव हैं – योगेश। आप को बता दे रहा हूं, काहे कि बाद में हो सकता है भूल जाऊं।” – प्रेमसागर ने शाम साढ़े चार बजे कहा। मैं हर बार उनसे शक्तिपीठ के भैरव का नाम पूछता हूं और यह भी कि भैरव के दर्शन किये हैं या नहीं। शक्तिपीठ अनेक हैं। कुछ लोगों ने कालांतर में और भी जोड़ लिये हैं। भैरव और उनका मंदिर संलग्न होने से शक्तिपीठ की प्राचीनता का आभास मुझे होता है।

कालिका नलटेश्वरी शक्तिपीठ। स्लाइड शो।

वे दर्शन के तुरंत बाद नलहाटी स्टेशन के लिये निकल लिये। नलहाटी जंक्शन स्टेशन मंदिर से 1300 मीटर की दूरी पर है। किसी वाहन से पंहुचे होंगे वे। ट्रेन शायद कुछ लेट थी, पर ज्यादा नहीं। स्टेशन एक दो तीन चित्र उन्होने भेजे।

बाद में मौचक लॉज लौटने पर प्रेमसागर ने बताया – “सवेरे निकलने के करीब पंद्रह किलोमीटर चलने पर एक चाय दुकान पर मैंने चाय पी। वहां से चल रहा था तो एक छोटी बच्ची दौड़ती आयी थी मेरे पास और इक्यावन रुपये दे कर माता जी को उनकी ओर से चढ़ाने के लिये बोली। उसका फोटो हींच लिया है। आपको भेज दे रहे हैं। बच्ची का नाम है शीनू मण्डल।”

“छोटी बच्ची दौड़ती आयी थी मेरे पास और इक्यावन रुपये माता जी को उनकी ओर से चढ़ाने के लिये दिया था। बच्ची का नाम है शीनू मण्डल।”

किसी भी यात्री-पदयात्री को अपनी ओर से चढ़ाने के लिये पैसा या सामग्री देना प्राचीन परम्परा है। पहले यात्रा कठिन हुआ करती थी। रास्ते निरापद नहीं होते थे। कई कई जगह रास्ते होते भी नहीं थे। जो यात्रा पर जाता था, उसे पूरा गांव और रास्ते के लोग भी विदा करते थे। अपनी ओर से भी कहते थे कि फलानी चीज या फलानी मुद्रा देवता को अर्पित कर देना। नदी में उनकी ओर से भी एक डुबकी लगा लेना। श्रद्धा को पदयात्री के माध्यम से देवता तक पंहुचाना हिंदू धर्म की विशिष्ट परम्परा है। वह बच्ची – शीनू मण्डल – उसी के अनुसार प्रेमसागर को इक्यावन रुपये दे रही थी। उसकी मां-पिताजी ने दिये होंगे वे पैसे। पर बच्ची में एक संस्कार तो डाल रहे थे उसके माता-पिता। जय हो!

शाम वापस लौटने पर मैं नलटेश्वरी माता के विषय में प्रेमसागर से पूछ्ता हूं तो वे गुड्डू मिश्र जी को फोन कर पता करते हैं। किन्ही रामचरण शर्मा जी को माता सपने में आयी थीं, तो उन्होने यहां मंदिर बनवाया। वहां नीम का एक गाछ है। जिसका पत्ता मीठा होता है। झरने पर उठा कर खायें तो कड़वा होता है। गुड्डू मिश्र जी ने नारद जी को स्वप्न में माता के आने और उससे इस पीठ को जोड़ने की बात भी बताई। सनातनी आस्थायें स्वप्न में प्रेरणा मिलना, कुछ नीम के मीठे होने जैसे चमत्कार, किसी महापुरुष के कोई वचन आदि से उत्प्रेरित होती हैं।

शक्तिपीठ चार हों, अठारह हों, इक्यावन हों, बावन-तिरपन-चौंसठ हों या एक सौ आठ। सारा खेल शक्ति-रूपा ईश्वरीय वपु का है। माता माहेश्वरी के अनेकानेक रूप हैं। उनकी कल्पना शरीर के उनके अंगों, उनकी प्रकृति और/या उनकी भौगोलिक स्थिति से होती है। मैं प्रेमसागर की यात्रा के दौरान उन्हें समझने का (असफल) प्रयास करता हूं और जब उलझन होती है तो खीझ के रूप में प्रेमसागर पर उतारता हूं। पर प्रेमसागर पर उसका कोई प्रभाव पड़ता नहीं दिखता। अगले दिन वे पुन: उसी जोश, उसी श्रद्धा से नयी यात्रा के लिये तैयार दीखते हैं। गूगल मैप पर उनके रात्रि विश्राम स्थल से हिला-चलता उनका आईकॉन बता देता है कि वे भोर में चल दिये हैं।

प्रेमसागर देवी श्रद्धा में मगन-मस्त हैं। मैं प्रेमसागार सिण्ड्रॉम से ग्रस्त हूं। ज्यादा सोचना मन के लिये खतरनाक है। :lol:

कल प्रेमसागर केतुग्राम स्थित श्री बहुला देवी शक्तिपीठ को जायेंगे। अपनी लॉज से फुल्लारा देवी तक बस से और आगे करीब तीस किलोमीटर पैदल। वापस किसी बस या ट्रेन से लौटेंगे।

ॐ मात्रे नम:। हर हर महादेव! मातृशक्ति की जय हो!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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दिन – 103
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दो शक्तिपीठ – फुल्लारा देवी और कंकालिताला देवी दर्शन


21 मार्च 23

कल प्रेमसागर ने बीरभूम जिले में नंदिकेश्वरी देवी के दर्शन किये थे। उनका नौवां शक्तिपीठ दर्शन। अब वे आगे के शक्तिपीठों की ओर चल रहे हैं।

चैत्र नवरात्रि दो दिन बाद प्रारम्भ होने जा रही है। बंगाल में लोगों के वेष बदलने लगे हैं। लोग लाल धोती और लाल कुरते में नजर आने लगे हैं। प्रेमसागर ने अपना एक जोड़ी लाल कुरता धोती पानी में भिगो कर साफ करने छोड़ दिया है। यात्रा के दौरान वे साबुन का प्रयोग नहीं करते, सो कपड़े साफ करने के लिये मात्र पानी का ही प्रयोग होता है। उनके पास एक दूसरी जोड़ी लाल टी-शर्ट और धोती है। वही पहन कर आज पदयात्रा को निकले।

रुके वे लड्डू शाह के मौचक रेजीडेंशियल लॉज में हैं। यह सैंथिया रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के पास है। वहां से सवेरे पौने छ बजे निकल कर; मयूराक्षी के बगल से दो किलोमीटर चलते हुये अट्टहास के फुल्लारा देवी शक्तिपीठ के लिये दक्षिण की ओर मुड़े। बारिश हुयी है। मौसम में धुंध है। दृश्यता कम है। चित्र साफ नहीं आ रहे।

बारिश हुयी है। मौसम में धुंध है। Slide Show

ताल और कुंये ज्यादा दीख रहे हैं। हर सम्पन्न ग्रामीण के पास एक ताल है। ताल का रखरखाव अच्छा है। ताल सिंचाई और मत्स्य पालन – दोनो के लिये है। जगह जगह धान की बुआई की गतिविधियां चल रही हैं।

चलते चलते प्रेमसागर बताते हैं – “भईया बंगाल भोजन के लिये बहुत सस्ता है। तीन रुपये की चाय है। वही चाय हमारे इलाके में पांच-दस रुपये की है। और क्वालिटी में यह चाय बीस ही होगी, उन्नीस नहीं। रसगुल्ला पांच रुपये में है। जिस साइज का रसगुल्ला हमारे यहां पंद्रह से पच्चीस रुपये का होता है, वह यहां दस रुपये का है। मन होता है फ्रिज की सुविधा हो तो ढेर सारा खरीद कर यहां से ले जाया जाये। मैंने दूध का भाव पता नहीं किया; पर सस्ता ही होगा।”

“आज निकलने के दस पंद्रह किलोमीटर पर अजीब घटना हुई। एक पुलिया पर मैं सुस्ताने बैठा था तो मेरा वेश देख कर दो तीन खेत मजदूर मेरे पास आये। मेरे बारे में पूछने लगे। बताने पर कि मैं लम्बी लम्बी पदयात्रायें कर रहा हूं, उनका भाव बदला। वे कहने लगे कि वे मुसलमान हैं, पर उनके पूर्वज तो हिंदू ही थे। ज्यादा टाइम नहीं हुआ। उनके बाबा 18-20 साल के थे तब धर्म बदला। उनके घर में रामायन-गीता है पर उसके बारे में बोल नहीं पाते। उस सब के बारे में बोलो भी तो धमकी मिलती है। मैं उनका फोटो लेने लगा तो उन्होने मना किया कि बाबा वह मत करिये और हमारे बारे में भूल कर भी कहियेगा नहीं।”

जगह जगह धान की बुआई की गतिविधियां चल रही हैं।

“भईया वे सरल लोग थे। मुझे बताया कि रास्ते की बजाय इस खेत खेत निकलेंगे तो तीन किलोमीटर चलना बच जायेगा। अगर खेत के बीच चलने में अड़चन लगती हो तो कुछ दूर वे साथ चल सकते हैं। उनके मुसलमान होने से मैं असहज था पर उन्होने बहुत अच्छे से बात किया और कोऑपरेट किया।”

इस घटना से मुझे गाजीपुर जिले की प्रेमसागर की कही बात याद आयी। उत्तरप्रदेश के उस जिले से गुजरते हुये प्रेमसागर ने मुझे बताया था कि जब भी वे किसी चाय की दुकान पर बैठते थे तो वहां मुसलमान और समाजवादी पार्टी वाले उनका वेश देख कर मुख्तार अंसारी के खिलाफ की गयी कार्रवाई को ले कर बहुत आक्रोश जताते मिलते थे। वे कई बार प्रेमसागर को उकसा कर प्रतिक्रिया करने को बाध्य भी करते थे। “पर भईया हम तो चुपचाप चाय पी कर पैसा दे कर वहां से चल देते थे। उनसे उलझने की कभी कोशिश नहीं की। हमें तो अपनी यात्रा निर्विघ्न पूरी करनी है। अपने आचरण को मुझे बहुत संयत रखना होता है भईया। कोई भी गलत बात बोलना परेशानी में डाल सकता है। कई बार तो एक शब्द हमारी भाषा में सही होता है पर दूसरे लोग उसका उलटा ही अर्थ लेते हैं।”

फुल्लारा देवी के दृश्य – स्लाइड शो।

दोपहर बारह बजे प्रेमसागर ने पच्चीस किलोमीटर चल कर फुल्लारा मां के दर्शन किये। “भईया छोटी जगह है। साफ सुथरा है। शांति है। बहुत अच्छा लगा वहां। यह जान कर कि मैं पदयात्री हूं, यहां और आगे कनकलिताला में भी पुजारी महराजों ने मेरा तिलक किया और आशीर्वाद के रूप में पीठ पर हाथ रखा। कहा कि सनातन धर्म के लिये यह करते रहो।”

अट्टहास (फुल्लारा) में सती के नींचे का ओठ गिरा था। फुल्लारा का अर्थ है पुष्प की तरह खिलना। यहां विश्वेश भैरव हैं। देवी यहां सभी कामनायें पूरा करती हैं – ऐसा पीठ निर्णय तंत्र में है। पता नहीं प्रेमसागर ने क्या कामना की। मैंने पूछा नहीं उनसे। अगली बार पूछूंगा कि शक्तिपीठों में सिर नवा कर ध्यान करते समय उनके मन में क्या कामना/आशा रहती है।

छोटी शांत जगह है अट्टहास और जंगल का इलाका था। यहां आने पर मन स्वत: अंतर्मुखी हो जाता है। बाहरी शोर खत्म हो जाता है। तभी सुनाई देता होगा माई का अट्टहास और तभी उनका खिलना महसूस होता होगा। मैं गूगल मैप पर लोगों की टिप्पणियाँ पढ़ता हूं, और उनमें कुछ ऐसे ही भाव हैं।

फुल्लारा माता के दर्शन के बाद प्रेमसागर ने पंद्रह बीस मिनट वहां विश्राम किया। मुझे फोन किया। उनके स्वर में उपलब्धि का भाव था। यहां दर्शन पर दस शक्तिपीठ वे सम्पन्न कर चुके। आगे चल कर शाम के पहले वे कंकालिताला माता के भी दर्शन कर लिये। इग्यारहवें शक्तिपीठ के दर्शन हो गये।

कंकालिताला माता के दृश्य। स्लाइड शो।

कंकालिताला में माता का वपु काली का है। वे मानस और मसान – दोनो में निवास करती हैं। यह स्थान बोलपुर में है। शांतिनिकेतन से आठ दस किमी दूर। यहां सती की कमर की अस्थियां गिरी थीं। अस्थियां इतनी जोर से गिरी थीं कि वहां गड्ढा बन गया। जो सरोवर (कुण्ड) के रूप में विद्यमान है। यह कुण्ड ही वास्तव में शक्तिपीठ है। पर इसके पास ही पूजा के लिये पार्वती जी का मंदिर बना है।

स्थान को “कंकाली” कहा जाता है। कंकाल अर्थात शरीर का अस्थि-ढांचा। भक्तों को विश्वास है कि सती की अस्थियां इस कुण्ड में अभी भी विद्यमान हैंं!

कंकालीताला को अन्य मंदिरों की तरह मुगल काल में नष्ट किया गया था। दिल्ली की मुगलिया सरकार के सेनापति काला पहाड़ (जो धर्म परिवर्तन के पहले राजीबलोचन राय था) ने जगन्नाथ पुरी, कामाख्या और कंकालीताला को क्षतिग्रस्त किया था।

कंकालिताला दर्शन के बाद वे रेलवे स्टेशन पर पंहुचे तो ट्रेन पंद्रह मिनट में आने ही वाली थी। जल्दी से टिकट लिया। तीस रुपये का टिकट। उसके बाद एक घण्टे से पहले ही वे सैंथिया जंक्शन के पास मौचक लॉज में आ चुके थे। तेरह चौदह घण्टे की यात्रा, जिसमें वे पैंतालीस किलोमीटर पैदल चले; करने से वे दो शक्तिपीठों के दर्शन सम्पन्न कर पाये। एक दिन में इतनी प्रगति, इतने व्यवस्थित तरीके से शायद ही हो।

दोनो शक्तिपीठों के इतिहास की जानकारी बढ़ा कर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। पर उतना शायद ब्लॉग में सम्भव न हो सकेगा। कभी पुस्तक लिखने का नम्बर लगे तो पुनर्लेखन की मेहनत होगी!

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
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