बक्सर से सेमरी – सोन नहर


6 मार्च 23

बक्सर से सवेरे रवाना होने पर गूगल ने प्रेमसागर को गोल गोल घुमा दिया। दो बार एक ही जगह वापस आ गये तो लोगों से रास्ता पूछा और आगे बढ़े। उन्हें नवानगर की ओर चलना था। जहां तक चल सकें, वहां तक। दोपहर में तीन-चार बजे से रात गुजारने की जगह तलाशने की सोच बना ली थी। जहां मिल जाये, वहीं डेरा जमाया जाये। सब महादेव पर छोड़ रखा था, पर राह चलना और जगह तलाशना उनका कर्म है – इसे वे बखूबी समझते हैं। इसके अलावा ब्लॉग पर लिखने लायक सामग्री उपलब्ध कराना भी शायद वे अपने कामों में महत्वपूर्ण समझते हैं।

बक्सर सोन नहर, उसकी बगल से जाती सड़क और नहर पर पुराना पुल

रास्ता एक नहर के किनारे किनारे चलता है। नक्शे में मैं पाता हूं कि वह सोन मेन कनाल है। एक पुल का चित्र देख कर लगा कि वह बहुत पुराने तरह का है। मुझे 80-100 साल पुराना लगा। यह जिज्ञासा हुई कि शायद यह सड़क और यह नहर अपने में पुराना इतिहास समेटे है। करीब दो घण्टे नेट पर ‘सोन मेन केनाल’ तलाशने पर सन 1853-55 का समय नजर आया। उस समय ब्रिटिश शासन नहीं था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से एक सेना के इंजीनियर लेफ्टीनेण्ट डिकेंस शाहाबाद (आरा) आये। उन्होने लोगों को कुंये से पुरवट/मोट से पानी निकाल कर बड़े श्रमसाध्य तरीके से खेती करते देखा।

डिकेंस वास्तव में गजब के इंसान थे। वे सेना में आर्टिलरी शाखा के अफसर थे और उनका जल प्रबंधन से कोई लेना देना नहीं था। पर लोगों के खेती के तरीके से द्रवित – प्रभावित हो कर उन्होने आसपास के बड़े भू भाग के जल संसाधनों का सर्वेक्षण किया। उन्होने पाया कि इलाके की दो बड़ी नदियां – सोन और गंगा के तल में काफी अंतर है। सोन का पानी अंतत: गंगा में ही जाता है। उनकी सोच थी कि सोन के पानी पर बैराज बना कर उससे नहरों द्वारा एक बड़े इलाके – उत्तर प्रदेश में कर्मनासा के पश्चिमी भाग से ले कर बक्सर और आरा के बड़े ग्रामीण इलाके को सींचा जा सकता है।

इण्टरनेट से ही मुझे गगन प्रसाद जी की एक पुस्तक/रिपोर्ट – हिस्ट्री ऑफ इर्रीगेशन इन बिहार की 200 पेजों की पीडीएफ कॉपी मिल गयी। इस पुस्तक में प्राचीन काल से लेकर ब्रिटिश काल तक का सिंचाई का इतिहास है। पुस्तक के सोन नदी की नहरों पर लिखे अध्याय के बीस-तीस पेज मैने ब्राउज किये। (आप यह रिपोर्ट इण्डिया वाटर पोर्टल के इस पेज पर दिये लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं)।

डिकेंस ने 1855 में अपनी रिपोर्ट बना कर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को पेश की। उसके अनुसार सिंचाई की नहरों और बैराज पर 61 लाख रुपये का खर्च आना था और आधा काम होने पर रेट ऑफ रिटर्न 11 प्रतिशत था। काम पूरा होने पर 19 प्रतिशत आमदनी का आकलन था। निश्चय ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी कोई काम धर्मादे खाते में नहीं करने वाली थी। कम्पनी के डयरेक्टर्स नें डिकेंस की बहुत प्रशंसा की, लेकिन रिपोर्ट पर काम तुरंत शुरू नहीं हुआ।

उसके बाद 1857 का स्वतंत्रता संग्राम हुआ। कुंवर सिंह के विद्रोह से बिहार का यह इलाका तो बहुत प्रभावित था। अंग्रेज सिमट गए पर जल्दी ही संग्राम दब गया। डिकेन्स वापस आए। तब तक वे शायद लेफ्टीनेण्ट कर्नल बन गये थे। उन्होंने आगे सोन नदी का सर्वेक्षण किया। कालांतर में डिकेंस की रिपोर्ट में सोन नदी के पूर्वी भाग की नहरेंं जो गया और पटना जिलों को भी सिंचित करतीं, जोड़ी गयीं। अंतत: 1868-69 में, जब देश कम्पनी के नहीं, ब्रिटिश सरकार के शासन में था, काम शुरू हुआ।

White Board पर मेरे द्वारा बनाया नहर सिस्टम का स्केच। सोन नदी में डेहरी के पहले इंद्रपुरी में डैम है। वहां से नहर अकोढ़ी गोला तक जाती है। अकोढ़ी गोला से दो नहरें बक्सर और आरा को निकलती हैं। अंतत: ये नहरें गंगा नदी में मिलती हैं। सोन नदी खुद भी अंतत: गंगा में पटना में मिलती है।

डेहरी ऑन सोन से 11 किमी पहले इन्द्रपुरी डैम बना। इंद्रपुरी डैम से अकोढी गोला तक नहर बनी और वहां से पश्चिमी सोन नहर बक्सर में गंगा तक आयी। पूर्वी सोन नहर अकोढी गोला से आरा जिले में गंगा तक पंहुची। दोनो नहरें करीब 100 किमी लम्बी हैं। इससे बक्सर और आरा जिलों का बड़ा खेती का इलाका सिंचित होता है।

बक्सर सोन नहर से निकली एक उप नहर। दूसरा चित्र नहर पर बनाये ग्रामीण पैदल पुल का है।

सो, आज यात्रा में, प्रेमसागर जिस नहर और उसपर बने पुल का चित्र भेज रहे थे, वह 1874 की बनी है। मैंने प्रेमसागर को कहा कि वे लोगों से पता करें कि नहर आज भी कितनी प्रभावी है। पदयात्रा करते हुये प्रेमसागर ने इस पश्चिमी सोन नहर पर अपनी यात्रा के दौरान चार बड़ी नहरें और पैंतीस छोटी नहरें निकलती देखीं। इन छोटी-बड़ी नहरों से यह पश्चिमी सोन नहर एक बड़े भू भाग को सिंचित करती है। किसानों ने प्रेमसागर को बताया कि पूरे साल नहर में पानी रहता है। किसी किसी साल पानी की कमी होने पर फरवरी-मार्च में पानी नहीं होता, अन्यथा हमेशा सिंचाई के लिये पानी मिलता है। इन नहरों के कारण लोगों ने कुंये या ट्यूब वेल का प्रयोग नहीं किया। हाल में नीतिश सरकार ने जब बोरिंग करने पर पचहत्तर प्रतिशत की सबसिडी दी, तब कुछ लोगों ने ट्यूब वेल लगाए। अन्यथा सारी सिंचाई इसी नहर से होती है।

नहर के पार जो दो छोटे कमरे दिख रहे हैं, उनमें पिपरमिण्ट का आसवन होता है।

प्रेमसागर ने कई तरह की खेती देखी। धान, गेंहू, चना, सरसों तो होता ही है। उसके अलावा कमलगट्टा और मखाना व्यापक तौर पर होता है। एक जगह प्रेमसागर को पिपरमिण्ट की खेती और उसके आसवन का एक प्लाण्ट भी दिखा।

प्रेम सागर ने ही गुजरात यात्रा के दौरान मुझे नर्मदा नहरों के द्वारा गुजरात की ग्रामीण खुशहाली दिखाई थी। कुछ वैसा ही कर्नल डिकेंस और कर्नल रेण्डाल के इन सोन नहरों से भी हुआ होगा। इन नहरों से ग्रामीणों को लाभ हुआ होगा पर लाभ ब्रिटिश लोगों ने कमाया भी खूब कमाया होगा।

पूरे दिन मैं बक्सर की इस सोन नहर और प्रेमसागर के दिये इनपुट्स से चमत्कृत होता रहा। प्रेमसागर की इस यात्रा से न जुड़ा होता तो मुझे डेढ़ सौ साल पहले का यह सिंचाई इतिहास, जो आज भी प्रभावी है; पता ही नहीं चलता।

सोन नहर के सहारे प्रेमसागर बक्सर से सिकरौड़ तक 18 किलो मीटर चले। आगे वे नवानगर/बिक्रमगंज की ओर मुड़ गये। यह रास्ता आगे दाऊद नगर में सोन नदी पार करता है।

शाम चार बजे प्रेमसागर नवानगर पार कर चालीस किमी चल कर सेमरी के आगे रात्रि विश्राम के लिये रुके। खुले में या किसी मंदिर में रुकना खतरे से खाली नहीं था। मंदिर वालों ने बताया – “बाबा, होली का मौसम है, नौजवान बदमाशी कर सकते हैं। रात में होलिका जलनी है। खुले में सोने पर कोई हो सकता है आपका सामान उठा कर होलिका में डाल दे”।

सो प्रेमसागर ने लॉज तलाशी। एक जगह उन्हें कमरा मिला। मांग तो वह एक हजार की कर रहा था, पर प्रेमसागर ने अपना सब सामान दिखा कर बताया कि वे दो सौ ही दे सकते हैं। झिक झिक हुई पर कमरा मिल गया दो सौ में। “भईया पास में ही लाइन होटल (ढाबा) से भोजन मिल जायेगा”। फिलहाल प्रेमसागर ने बताया कि उन्हें हल्की हरारत है। वे मेडीकल दुकान से दवाई ले कर सोने का प्रयास करेंगे।

आगे की यात्रा –

सेमरी से दाऊद नगर करीब 45 किमी है और उसके आगे सत्तर किमी है गया। तीन चार दिन लगेंगे गया पंहुचने में। कल होली के दिन निकलना-चलना शायद ही हो पाये। फिर भी, देखें आगे क्या होता है।

ॐ मात्रे नम:। हर हर महादेव।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

बारा से बक्सर


5 मार्च 23

सवेरे साढ़े छ बजे मैंने ही फोन कर लिया प्रेमसागर को। उस समय यात्रा के लिये प्रस्थान नहीं किया था। तेजू सिंह बिंद – मंदिर के रखवाले – चाय बना लाये थे। प्रेमसागर चाय पी रहे थे। पुजारी – राजकुमार जी ने बिना चाय पिये जाने नहीं दिया।

प्रेमसागर की बहुत खातिरदारी की उन लोगों ने उस शिव मंदिर में। तेजू जी की राशन की दुकान और आटा चक्की भी है, पास में। उन्होने रात में महराज जी (प्रेमसागर) को भोजन भी बना कर कराया और मच्छरों से बचाव के लिये गुडनाइट क्वाइल भी लाये। दो क्वाइल लगा कर आराम से सोये प्रेमसागर।

शिवाला के बगल में ही पीपा का पुल था, पर वह चालू नहीं था।

शिवाला के बगल में ही पीपा का पुल था, पर वह चालू नहीं था। पिछले साल चालू हुआ पहली बार पर फिर सात पॉण्टून पीपों में लीकेज हो गया। बदलने के लिये नये पीपे आ गये हैं और मरम्मत का काम चल रहा है। पता नहीं कब तक पीपे का पुल चालू होगा। गंगा दशहरा के बाद तो उजड़ने ही लगते हैं पीपे के पुल। अब अगर चालू भी हो गया तो दो-ढाई महीना ही काम करेगा।

चाय पीने के बाद राजकुमार जी और तेजू सिंह प्रेमसागर को घाट तक छोड़ने आये। दोनो बिंद हैं – केवट। नाव वाले को उन्होने सहेज दिया – ये हमारे गुरू महराज हैं। ठीक से ले जाना। वे नाव वाले को प्रेमसागर के किराये के लिये पैसा देने लगे तो कई मुस्लिम खेतिहर मजदूर जो उसपार खेती के लिये जा रहे थे, ने कहा कि बाबा जी इस इलाके के मेहमान हैं। उनसे आप कैसे पैसा ले सकते हैं? उन मुस्लिम ग्रामीणों के कहने पर प्रेमसागर बिना किराया दिये गंगा पार किये।

गंगा तट पर विदा लेते समय प्रेमसागर, राजकुमार जी और तेजू सिंह बिंद।

“भईया मुझे तो थोड़ा अटपटा लग रहा था। वे अपने साथ कुदाली, फरसा लिये थे। पर वे बड़ी अदब से मुझे घाट से बीरपुर तक छोड़ने आये।”

जो चित्र भेजे, उसके अनुसार डीजल इंजन से चलने वाली बड़ी नाव थी। दो-तीन दर्जन लोग चढ़े होंगे उसपर। दो साइकिलें भी लादी गयी थीं। मोटर बोट थी तो पांच-सात मिनट में प्रेमसागर नदी के इस दक्षिणी किनारे से उत्तरी किनारे लग चुके थे।

नदी का पानी साफ था। इतना साफ कि निर्मल कहा जाये। वातावरण और गंगाजी की विशाल जलराशि देख आनंद आ गया सवेरे सवेरे। उस पार पक्का घाट था। कई सीढ़ियां थीं। एक मंदिर भी था। प्रेमसागर उतर कर एक पगडण्डी पकड़ आगे चलने लगे। आगे एक डेढ़ किलोमीटर पर कर्मनासा नदी के दक्षिणी किनारे पर आ कर मिलती हैं। कर्मनासा के दक्षिणी किनारे पर होने वाले संगम के पहले ही प्रेमसागर उत्तरी किनारे पर आ चुके थे। गंगा पार करने का ध्येय यही था।

डीजल इंजन से चलने वाली बड़ी नाव थी। दो-तीन दर्जन लोग चढ़े होंगे उसपर। दो साइकिलें भी लादी गयी थीं।

मिथक है कि महर्षि विश्वामित्र और इंद्र के बीच की टक्कर में बेचारे त्रिशंकु लटक गये आसमान में उलटे। उनकी लार गिरने से बनी कर्मनासा। कैमूर की पहाड़ी से निकली यह छोटी नदी, जिसमें लगभग हमेशा पानी रहता है, 192 किमी लम्बी है। यह नदी कर्म का नाश करने वाली मानी जाती है। भयंकर अशुभ। पर इस नदी के किनारे कम से कम सौ गांव होंगे – उत्तर प्रदेश और बिहार में। उनके लोग इस नदी के जल को क्या समझते हैं? मैंने गूगल मैप पर लोगों की इस नदी पर रेटिंग देखी।

करीब तीन हजार लोगों ने इसे 4.0/5 की रेटिंग दी है। टिप्पणियों में भी ज्यादातर नदी के किनारे रहने वाले हैं जो इसके पानी को स्वच्छ बताते हैं। वे लोग इसका नित्य इस्तेमाल करते प्रतीत होते हैं। पर ‘त्रिशंकु की लार’ की मिथकीय कथा के कारण इस नदी की बड़ी बेकद्री है। इसी के चक्कर में प्रेमसागर वाराणसी से गया जाने के लिये पचास किलोमीटर लम्बा मार्ग चुनना पड़ा। वे अपने कर्मों के पुण्य का नाश नहीं चाहते!

मेरे कहने पर कर्मनासा में गंगा के संगम स्थल के उत्तरी किनारे से चित्र प्रेमसागर ने भेजे। चित्र में गंगाजी की विशाल जलराशि दीखती है पर कर्मनासा नजर नहीं आती। गंगा नदी के पीछे जहां जमीन नहीं दीखती, वहीं कर्मनासा के गंगा में मिलने का आभास मिलता है। उसके आगे भी गंगा का जल वैसा ही साफ है जैसा कर्मनासा के मिलने के पहले था। सब नदी-नाले गंगा में मिल कर गंगा ही बन जाते हैं!

गंगा नदी के पीछे जहां जमीन नहीं दीखती, वहीं कर्मनासा के गंगा में मिलने का आभास मिलता है।

बीरपुर से चार पांच किमी चल कर चाकछूटी में पुल के रास्ते गंगा पार कर प्रेमसागर को बिहार के बक्सर जिले में प्रवेश करने के लिये मैंने कहा था, पर कर्मनासा के आगे ज्यादा देर प्रतीक्षा नहीं की उन्होने। एक साधारण सी पतवार वाली नाव में बीस रुपया किराया दे कर कर्मनासा-संगम के एक किमी आगे उन्होने गंगा पार कर ली। नाव पर दो ही व्यक्ति थे – नाव वाला और प्रेमसागर।

नाव वाला अपना चित्र नहीं लेने दे रहा था तो प्रेमसागर ने अपनी सेल्फी लेने के बहाने उसे चित्र में ले ही लिया। चित्र ले सकने में यह उनकी सिद्धहस्तता ही मानी जायेगी।

नाव वाला अपना चित्र नहीं लेने दे रहा था तो प्रेमसागर ने अपनी सेल्फी लेने के बहाने उसे चित्र में ले ही लिया।

बीस रुपया किराया दे कर प्रेमसागर को बिहार में प्रवेश मिला। “भईया, नदी का जल बहुत ही साफ था। मछलियाँ भी बड़ी बड़ी थीं। पानी से उछलतीं और चित्र लेने की कोशिश करते करते फिर पानी में चली जा रही थीं।”

बड़ी और पानी के बाहर उछलने वाली मछलियाँ? मुझे लगा कि वे सोंईस होंगी। गांगेय डॉल्फिन। जब मैंने पूछा तो प्रेमसागर ने बताया कि नाव वाला भी यही कह रहा था। उसके अनुसार ये मछलियां कभी कभी नदी किनारे बैठी भी दीखती हैं।

मीठे पानी की गांगेय डॉल्फिन बड़ी संख्या में हैं – यह सुन कर मुझे अपार हर्ष हुआ। प्रेमसागर की कर्मनासा समस्या खत्म हो जाने से कहीं ज्यादा खुशी। बस ऐसे ही गंगा का जल निर्मल होता जाये। सोंईस की बड़ी आबादी मैंने अपने बचपन में ही देखी थी। अब साठ साल बाद उनकी गंगाजी में होने की बात मन प्रसन्न कर गयी। मैं डॉल्फिन को ले कर प्रसन्न था और प्रेमसागर चैन की सांस ले रहे थे – “अब करमनासा का झंझट खतम!” अपनी अपनी खुशी के अपने अपने कारण! :-)

बक्सर जिले में उसपार प्रेमसागर ने बताया कि गूगल मैप 11 किलोमीटर की दूरी बता रहा है बक्सर शहर की। उसके बाद लगता है उनकी उत्फुल्लता बढ़ गयी हो। पर वे धीरे चले। पांच घण्टे बाद बक्सर पंहुचे। चाय पानी के लिये लगता है कई जगह रुके।

बक्सर में वे किसी लक्ष्मण जानकी मंदिर में रुके पर वहां की व्यवस्था जमी नहीं। उसके बाद शाम सात बजे बताया कि उनको अयोध्या के किसी पल्टुआ अखाड़े के रामसुमिर दास जी ने शिवशक्ति धर्मशाला में इंतजाम कर दिया है। फिर धर्मशाला के मंजीत जी का भी फोन आया। “यहां सब व्यवस्था है”।

शिवशक्ति धर्मशाला के कमरे का चित्र भेजा प्रेमसागर ने। कल वे बारा के शिव मंदिर में फर्श पर तिरपाल बिछा कर रहे थे। मंदिर में भोजन और एक छत मिल गयी थी रात्रि विश्राम के लिये; वही बहुत आनंददायक था। यहां शिवशक्ति धर्मशाला में डबल बेड और एयरकण्डीशनर भी दिख रहा है। घुमक्कड़ी यात्रा का यही सरप्राइज एलीमेण्ट है। कभी पीपल की छाया, कभी मंदिर की छत, कभी किसी के घर का ओसारा और कभी वातानुकूलित कमरा। क्या पता कभी वह दिन भी आये जब महादेव उन्हें फाइव स्टार होटल की सुविधा भी दिखा दें! … मैं यह यात्रा विवरण लिखने के लिये मेहनत क्यों कर रहा हूं? शायद यह सरप्राइज एलीमेण्ट ही आकर्षित करता है।

प्रेमसागर के साथ शिवशक्ति धर्मशाला के मनजीत जी और प्रेमसागर को मिला कमरा।

शिवशक्ति धर्मशाला में रात गुजार कर कल सवेरे प्रेमसागर गया के लिये निकलेंगे। पचीस तीस किमी चलने का विचार है। आगे के बारे में बार बार वे कहते हैं – “भईया महादेव देखेंगे। माई देखेंगी। हमें तो बस चलना है।”

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

जमानिया से गहमर-बारा


4 मार्च 23

कल यात्रा रोक कर अपने लिये रात में रुकने का डेरा ढूंढने प्रेमसागर जमानिया आये थे किसी वाहन से। आज सवेरे जमानिया के लॉज से पीछे जा कर वापस पैदल लौटने का कृत्य किया होगा। फिर उस स्थान से पैदल वापस आ, सामान ले कर सात बजे लॉज से निकले। सवेरे की रोशनी में उन्होने कुछ चित्र जमानिया के भेजे हैं। कस्बे के पास कोई नहर जाती है। उसके बैकग्राउण्ड में सेल्फी। नहर की बगल से सड़क का दृश्य। सवेरे की चहल पहल और सड़क सफाई करते कर्मचारी।

जमानिया से गहमर कुल तीस किमी है, जो आज प्रेमसागर को चलना है। ये दोनों गंगा किनारे हैं और दोनो को जोड़ती सड़क धनुष की डोरी की तरह है।

कस्बा जाग गया है। जमानिया से गहमर कुल तीस किमी है, जो आज प्रेमसागर को चलना है। ये दोनों गंगा किनारे हैं। गंगा कमान की तरह हैं और दोनो को जोड़ती सड़क, जिसपर प्रेमसागर को चलना है, धनुष की डोरी की तरह है। धनुष की डोरी और गंगाजी की कमान दर्शाती है कि घुमक्कड़ी के कारण कुछ दूरी बचा लेने का लाभ मिला है।

गंगाजी सर्पिल आकार में आगे बढ़ती हैं। उनपर मौजूद अनेक पीपे के पुल हैं। पैदल यात्री उनका प्रयोग करता आगे बढ़े तो उसके कई लाभ हैं; जो मैंने पहले नहीं सोचे थे। हाईवे से इतर चलने पर पैदल चलने वाले को सड़क ज्यादा गर्म नहीं लगती। उत्तर प्रदेश में तो एक बस्ती से अगली बस्ती, गांव लगभग सटे हैं। लोग मिलते हैं और थकान कम महसूस होती है। यह मेरा नहीं, प्रेमसागर का अनुभव है। इसके अलावा पीपे के पुल अनेकानेक नये रास्ते खोलते हैं। घुमक्कड़ी और रोचक हो जाती है – यह मैंने महसूस किया नक्शे पर अपना माउस फेरते हुये।

जमानिया के चित्र

सवेरे पौने नौ बजे प्रेमसागर से बात हुई। उनकी आवाज में उत्फुल्लता थी। पहली चाय पी चुके थे। दुकान वाले लड़के (नाम बताया अनिल) ने उन्हें पैदल शक्तिपीठ यात्री जान कर चाय के साथ जलेबी भी खिलाई थी और पैसा भी नहीं लिया था। प्रेमसागर ने उन नौजवान का चित्र भी खींच लिया। साधारण सी दुकान और प्रसन्न दीखता नौजवान या किशोर। पिछली रात प्रेमसागर को भोजन नहीं मिला था तो आज नाश्ते में माई ने जलेबी का प्रबंध कर दिया! बालक अनिल जिंदाबाद!

मेरी पत्नीजी ने इस जलेबी खिलाने को सुना तो टिप्पणी की – प्रेमसागर तुम्हारी तरह घोंघा नहीं है। तुम तो अपना नाम-काम बताते भी लजाते हो। प्रेमसागर को अपनी बड़ी यात्रा के बारे में बताने और उसके द्वारा लोगों में श्रद्धा जगाने का गुण है। तुम तो लैपटॉप पर बैठे खीझ सकते हो। वह मजे से आगे बढ़ रहा है!

दुकान वाले लड़के (नाम बताया अनिल) ने उन्हें पैदल शक्तिपीठ यात्री जान कर चाय के साथ जलेबी भी खिलाई थी और पैसा भी नहीं लिया था। प्रेमसागर ने उन नौजवान का चित्र भी खींच लिया। साधारण सी दुकान और प्रसन्न दीखता नौजवान।

आज यात्रा ठीक ही रही होगी। गंगाजी का मैदानी इलाका है। आबादी भी ज्यादा है। गांव एक दूसरे में घुसे हुये हैं। और मुख्य बात यह कि आज यात्रा में अनिश्चितता या सरप्राइज के तत्व नहीं थे। मैंने रास्ते का नक्शा और प्रेमसागर की यात्रा प्रगति का अवलोकन किया। आज इण्टरनेट अपेक्षाकृत ठीक काम कर रहा था प्रेमसागर के छोर पर और सामान्यत: लोकेशन अपडेट मिलती जा रही थी।

दिलदार नगर के आगे मैंने नक्शे में स्थानों को ध्यान से देखा – पुलीस चौकी, मेडीकल स्टोर, रेलवे स्टेशन, मंदिर – सब तरह के स्थान। मंदिरों में शैव और शाक्त दोनों की बहुतायत थी। वैष्णव मंदिर इक्का-दुक्का दिखे। इन शैव और शाक्त मंदिरों में रात गुजारना कठिन नहीं होना चाहिये। पर कई शाक्त मंदिर अघोरपंथी हैं। एक आश्रम तो गुरु कीनाराम के नाम से था। इन जगहों पर जहां मांस-मदिरा का प्रयोग पूजा-अर्चना का अंग हो, वहां प्रेमसागर ठहरने से रहे।

गहमर रेलवे स्टेशन के आसपास

और अंतत: जो स्थान तलाशा; या यूं कहें माता ने सुझाया वह अत्यंत उत्तम था। गहमर में उन्हें पता चला कि कामाख्या मंदिर, जहां रहने की अच्छी व्यवस्था होती, वह पीछे छूट गया है। वहां वापस जाने की बजाय वे आगे चले। बारा की ओर। और बारा में एक शिव मंदिर में रहने को स्थान मिल गया। जमीन पर बिछाने के लिये तिरपाल और ओढने के लिये कम्बल का इंतजाम था। मंदिर के भईया जी ने कहा कि वे प्रेमसागर के लिये भोजन भी बना देंगे। चहकते प्रेमसागर ने बताया – “मेन बात भईया कि पीपा पुल, जिसे कल सवेरे पार करना है, वह बगल में ही है।”

ॐ मात्रे नम:! माता जी ने कल प्रेमसागर को हैरान परेशान कर परीक्षा ली। लॉज में किराये के पैसे भी खर्च हुये और रात का भोजन भी नहीं मिला। आज उन्होने योग बनाया और शिवालय में आसरा दिया; कम्बल भी और भोजन भी। घुमक्कड़ी में यह मूल तत्व है – जब आप हैरान परेशान होने लगें तो बादल छंटते हैं और रोशनी नजर आने लगती है। आगे बढ़ने का जोश आ जाता है।

बारा में एक शिव मंदिर में रहने को स्थान मिल गया। जमीन पर बिछाने के लिये तिरपाल और ओढने के लिये कम्बल का इंतजाम था।

शिवाला के उस डेरा में क्या मच्छर नहीं होंगे? मैंने प्रेमसागर से पूछा। “पता करता हूं भईया। अगर हों तो पास की किसी दुकान से मच्छर की अगरबत्ती खरीदने की कोशिश करूंगा। वैसे एक बार नींद आ जाये तो कोई पांच सात लाठी भी मारे, मेरी नींद नहीं खुलती। मच्छर क्या असर करेंगे?” – प्रेमसागर के कथ्य में इस पक्ष से बेफिक्री झलकती थी। पर शायद उन्हे अपनी पोटली में मॉस्कीटो क्वाइल या ओडोमॉस जैसी क्रीम रखनी चाहिये। डेंगू-मलेरिया से बच कर ही यात्रा करनी चाहिये।

कल प्रेमसागर को नोटबुक – कलम न रखने पर मैंने सुनाई थी। आज उन्होने खरीद कर चित्र भेजा। उसमें उन जगहों के नाम लिखे हैं, जहां से वे आज गुजरे। दिनांक डालने की आदत अभी नहीं पड़ी। अलबत्ता ‘श्री गणेशाय नम:’ लिख दिया है! :-)

प्रेमसागर को इस तरह की डायरी का अधिकाधिक प्रयोग करना सीखना चाहिये। यह उतनी ही जरूरी है (मेरे हिसाब से), जितना मोबाइल।

अगले दिन की यात्रा –

प्रेमसागर को पीपा का पुल पार कर गंगा किनारे चलते जाना है – बीरपुर से चाक छुटी तक करीब पांच-छ किमी। चाक छुटी में पुन: गंगा पार कर उत्तर प्रदेश से बिहार के बक्सर जिले में प्रवेश करना है। गंगा पार करने पर स्थान नक्शे में दीखता है मदनपुरा। मदनपुरा से बक्सर 8-9 किमी की दूरी पर है। बक्सर को प्रेमसागर “अपनी जान पहचान की जमीन” मानते हैं। :-)

गंगाजी को दो बार पांच किमी में पार कर U टर्न लेने से वे कर्मनासा नदी लांघने से बच जाएंगे. इस बीच कर्मनासा गंगाजी में मिल कर पवित्र हो चुकी होंगी.

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:।


(ॐ मात्रे नम: – माता का मंत्र है। यह कुछ वैसा ही है जैसे गायत्री मंत्र। तांत्रिक साधना का मंत्र नहीं।

श्री अरविंद आश्रम के संत हीरालाल माहेश्वरी जी को मैं जब भी पैर छूता था तो वे आशीर्वाद स्वरूप यही कहते थे – मात्रे नम:! माहेश्वरी जी अब नहीं हैं। पर उनकी याद यह मंत्र लिखते समय बरबस हो आती है।)

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

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