भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
कटका पड़ाव के पास नेशनल हाईवे से सटे फुटपाथ पर थी वह मड़ई। दूसरी ओर गेंहूं का खेत। गेंहू लगभग तैयार। मड़ई का सम्बंध खेत से था या सड़क से – मैं अंदाज नहीं लगा पाया। उसके अंदर एक खाट थी और खाट पर गुनरी बिछी थी। गुनरी पुआल की चटाई जैसी होती है। गद्दे का काम करती है सर्दियों में। बिछाने पर गर्माहट रहती है।
बिस्तर पर मसहरी भी लगी थी, X शेप बनाती बांस की डण्डियों के सहारे। पर वह ऊपर उठा दी गयी थी। कोई था नहीं वहां। अपना बिस्तर – लेवा, कथरी, कम्बल आदि मोड़ कर कहीं जा चुका था वह।
ऐसी मड़ई में खटिया और खटिया पर पुआल की गुनरी – यह मोहक था दृश्य। सवेरे की सुनहरी सूरज की किरणों में सब कुछ चमक भी रहा था।
खाट का दृश्य मैंने कई तरह से लिया। पूरी मड़ई का, खाट का, गुनरी का। थोड़ी देर मैंने इंतजार भी की कि जिसकी मड़ई है वह आ जाये तो कुछ बात हो और उसका इस मड़ई में सोने का ध्येय पता चल सके। पर कोई मिला नहीं।
किसी और दिन आधा घण्टा पहले गुजरूंगा वहां से। मड़ई और गुनरी पर टैग लगा लिया है। कोई कहानी, कोई ब्लॉग पोस्ट तो निकलनी चाहिये उससे। आदमी कौन है, क्या करता है? सर्दी तो नहीं लगती वहां सोने में? कभी कुकुर सियार या नीलगाय तो नहीं आते? कई सवाल हो सकते हैं।
बिस्तर पर बिछी पुआल की बुनी गुनरी। बिस्तर पर मसहरी भी लगी थी, पर ऊपर कर दी गयी थी। कोई था नहीं वहां। अपना बिस्तर – लेवा, कथरी, कम्बल आदि मोड़ कर कहीं जा चुका था वह।
पर मड़ई और गुनरी अपने आप में सुंदर हैं। कौन बनाता होगा गुनरी? एक दो मुझे भी बनवानी हैं अगली सर्दियों के लिये।
कितनी साधारण जिंदगी है। कितने कम कार्बन फुटप्रिण्ट्स होंगे इस जिंदगी में?!
सवेरे उजानी के शक्तिपीठ से आगे रवाना होने में देर हुई। मंदिर का मुख्य दरवाजा बंद था। पुजारी जी सो रहे थे। उन्हें उठाया और तब दरवाजा खुला। सवेरे पांच बजे प्रेमसागर निकल लेते पर एक घण्टा देरी से निकल सके। “भईया, यह हमें समझ नहीं आया। शक्तिपीठ के पुजारी हो कर भी सवेरे ब्रह्म मुहूर्त में नहीं उठते। सवेरे भोर का समय ही तो पूजा-आराधना का होता है।” – रास्ते में चाय के लिये रुके प्रेमसागर ने मुझे सवेरे चलने और तब तक की उनकी प्रगति के बारे में बताया।
अगला शक्तिपीठ – श्री योगोद्या शक्तिपीठ उजानी से ज्यादा दूर नहीं है। बीस किलोमीटर से कम ही होगा। दोपहर बारह बजे तक प्रेमसागर वहां थे। जगह अच्छी लगी उन्हें। योगोद्या मंदिर ताल के भीतर है। इसके अलावा वहां माता का दूसरा स्थान भी है। गांव में बीचोबीच माता की बाड़ी (घर) है। माता की बाड़ी पुराना मंदिर है। कहा जाता है कि यह 11वीं सदी का है। पर इस मंदिर में देवी का विग्रह नहीं है। इस मंदिर को काला पहाड़ (इस्लाम स्वीकार करने से पहले राजीबलोचन राय) ने नष्ट किया था। सन 1760 में कीर्तिचंद्र के जमाने में इसे पुन: बनाया गया।
योगोद्या मंदिर, क्षीरसागर।
नया मंदिर सफेद संगमरमर का है और इसे सन 2005 में क्षीरसिद्धि जलाशय में बनाया गया। एक और प्रतिमा क्षीरसिद्धि जलाशय की सफाई में मिली और उसे भी लाल पत्थर का मंदिर बना कर सन 2011 में स्थापित किया गया।
क्षीरसिद्धि जलाशय बड़ा – करीब 13 एकड़ का है। इसमें मछलियांं बड़ी बड़ी हैं। मछलियों का शिकार नहीं किया जाता। श्रद्धालु उन्हें दाना भी देते हैं। प्रेमसागर ने उनकी गतिविधि दिखाने के लिये मुझे एक वीडियो बना कर भी भेजा।
योगद्या शक्तिपीठ – गांव के दृश्य
योगोद्या शक्तिपीठ से रवाना हो कर 10-15 किलोमीटर चले। उन्हें रात्रि गुजारने के लिये कोई स्थान नहीं मिला। दो दिन से वे इस उहापोह में थे कि क्या नवद्वीप/मायापुर जा कर चैतन्य महाप्रभु के जन्मस्थान का दर्शन करें या अपनी शक्तिपीठ यात्रा पर चलते रहें। मैंने उन्हें नक्शे में देख कर बता दिया था कि मायापुर जाने में कम से कम पैंतीस किलोमीटर अधिक की यात्रा करनी होगी। आज शाम के समय रुकने के लिये उचित स्थान न मिलने के कारण उन्होने बस पकड़ कर नवद्वीप जाने का निर्णय किया।
“भईया, यहां मंदिर बहुत हैं, पर उनमें रुका नहीं जा सकता। वे रात में बंद हो जाते हैं। बाहरी व्यक्ति को किसी लॉज या होटल में ही रुकना होता है।” – प्रेमसागर ने अन्य प्रांतों और बंगाल के मंदिरों की व्यवस्था का अंतर बताया।
नवद्वीप/मायापुर उनकी शक्तिपीठ यात्रा से इतर यात्रा है। इसलिये उन्होने बस का प्रयोग किया। शाम साढ़े छ बजे वे नवद्वीप में थे। एक लॉज में जगह मिल गयी थी। कल वे हुगली नदी पार कर उसपार मायापुर जायेंगे। अगर फेरी सर्विस मिल गयी थो मायापुर गंगा/हुगली के दूसरे तट पर है। वर्ना सड़क मार्ग से तो दस किलोमीटर की दूरी है।
लॉज के बारे में प्रेमसागर बहुत उत्साहित नहीं लगे बताने में। “भईया, रात भर ही गुजारनी है। जगह साफ सुथरी है पर फर्नीचर और सुविधायें तो लगता है बहुत पुरानी हैं।”
शक्ति और शिव को देखते निहारते अचानक कल वे राधा-कृष्ण के अवतार माने जाने वाले गौरांग चैतन्य महाप्रभु से सम्बंधित स्थलों को देखेंगे। वहां इस्कॉन वालों ने भव्य मंदिर बनाया है और अन्य व्यवस्था भी उनकी ओर से विश्व स्तर की है। शक्ति पीठ यात्रा से इतर एक दिन इस प्रकार का भी सही। आखिर इतनी पास आ कर वहां न जाने से भविष्य में कभी उस जगह को देखने का योग बनेगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता। जब मन में इच्छा है और योग बैठ रहा है तो शैव से वैष्णव भाव में रूपांतरित होने में कोई हर्जा नहीं।
हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:। राधाकृष्ण की जय हो।
प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें। ***** प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103 कुल किलोमीटर – 3121 मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।
“कछु हेरान बा का? का हेरत हयअ? (कुछ खो गया है क्या? क्या ढूंढ रहे हो?)”
द्वारिकापुर के गंगा तट पर मैं इधर उधर घूमता नाव, झाड़ी, पौधे, नदी, पीपल के चित्र ले रहा था। गांव से गंगा स्नान के लिये आती उस महिला ने मुझे देखा होगा। घाट पर जो लोग थे, उनसे अलग लग रहा होऊंगा। उसे लगा होगा कि मेरा कुछ खो गया है और मैं उसे इधर उधर तलाश रहा हूं!
सही कह रही थी वह। कुछ खो तो गया है। कुछ तलाश तो हो रही है। पर क्या खो गया है और क्या तलाश है, वह मेरे लिये भी सवाल हैं! उम्र खो गयी है? सौंदर्यबोध खो गया है? जो दीख रहा है, उसे अभिव्यक्त करने के शब्द गड्डमड्ड हो गये हैं? कुछ तो हो गया है। मैं बहुत अर्से बाद गंगा तट पर आया हूं।
द्वारिकापुर में गंगा किनारे के चित्र।
मैंने उस महिला को कहा – नहीं, कुछ खोया नहीं है। ऐसे ही देख रहा हूं।
काफी कुछ बदला है वहां। बबूल के पेड़ काट दिये हैं किसी ने। उनके झुरमुट से गंगा दीखती नहीं थीं, अब दूर से ही उनकी जलराशि दीखती है। नये पौधे लगाये हैं किसी ने – बबूल नहीं, शायद पीपल। आंधी आयी होगी, पीपल के बड़े वृक्ष पर एक सरपत या कुशा का सूखा बड़ा पौधा ऊपर की डाल पर अटका है। आंधी में उड़ कर गया होगा।
पीपल में अभी नये पत्ते पूरी तरह नहीं आये हैं। उदास उदास सा लगता है पीपल। मौसम की मार उसपर भी पड़ी है।
एक नाव पिछले तीन साल से तट पर पड़ी थी, अब उसे कोने पर सरका दिया गया है। शायद अपनी काम की जिंदगी गुजार चुकी है वह। अब उसका कबाड़ भर बिकना हो। घाट पर नावें नहीं हैं। बालू का (अवैध) उत्खनन और लदान शायद बंद है। लोग भी कम हैं। घाट पर भागवत कथा कहने वाले चौबे जी नहीं दीख रहे। आजकल शायद न आते हों। कुछ अन्य रेगुलरहे स्नानार्थी पहचान में आ रहे हैं। एक दो तो रास्ते में भी मिले स्नान कर जाते हुये।
हां, एक विचित्र बात रही। अमूमन घाट के आसपास करार और नाले की जमीन पर आधा-एक दर्जन मोर दीखा करते थे। आज एक भी नहीं दिखा। कहां चले गये वे?
रास्ते में आते नीलगाय तो दिख गये। बड़े कद्दावर नहीं, छोटे शायद बच्चे या किशोर थे। उनके चित्र भी पास से ले पाया मैं। इतनी पास से बहुत कम बार लिये होंगे उनके चित्र।
किशोर नीलगाय।
मुझे लगता है सप्ताह में दो या तीन दिन तो वहां आना चाहिये। थोड़ा जल्दी, जब सूरज की सुनहरी किरणें हों और गोल्डन ऑवर का लाभ लेते हुये कुछ बेहतर चित्र लिये जा सकें।
महिला का सवाल, जिसका उत्तर नकारात्मक में भले दिया हो मैंने, पर कुछ खो जरूर गया है। उसे जल्दी ही पा लेना है।
एक विघ्नेश्वर जी ने मेरी फेसबुक पोस्ट पर टिप्पणी की। पोस्ट मौसम की अनिश्चितता, आंधी-पानी आदि पर थी। सज्जन ने कहा – घर में रह बुड्ढ़े, ऐसे मौसम में निकलेगा तो जल्दी मर जायेगा।
उनकी टिप्पणी का प्रभाव यह हुआ कि उनको ब्लॉक तो किया पर साइकिल ले कर निकलना प्रारम्भ कर दिया। दस किलोमीटर से ज्यादा ही चल रही है साइकिल।
सेहत पर काला टीका लगा दिया है उन सज्जन ने। सौ साल जिया जायेगा बंधुवर। ज्यादा ही!
सेल्फी चित्र गंगा किनारे का है। साइकिल सात किलोमीटर चल चुकी है। अभी इतनी ही और चलेगी दिन भर में। सोशल मीडिया पर लोग बहुत शुभेच्छु हैं।