पिछले छ्ह साल में मेरे घर में पक्षी और जीव बढ़े हैं। उनमें बुलबुल भी है। शुरुआती साल में तो बुलबुल दिखती ही न थी। अब तो उसका गाना सुनना नित्य होता है। कई बार बुलबुल दम्पति अपने छोटे शिशुओं को, घोंसला छोड़ने के बाद भी, साथ ले कर उड़ते और चारा (कीड़े) खिलाते दिखते हैं। साल में दो बार तो प्रजनन काल होता ही है बुलबुल का। सो घर के कई घने वृक्षों और झाड़ियों में उनके घोंसले तलाशे जा सकते हैं।
घोंसला बनाने की एक जगह पोर्टिको के सामने तुलसी का झाड़ है। पिछले साल बुलबुल ने वहां घोंसला बनाया था और तीन बच्चे सकुशल उड़ा कर ले गयी थी। इस साल भी वही क्रिया पुन: हो रही है; उसी झाड़ में। हम लोग पोर्टिको में सवेरे बैठ कर चाय पीते हैं और बुलबुल का गायन सुनते हुये उसकी तुलसी की झाड़ी में जाने आने की सतर्क गतिविधियों के साक्षी होते हैं।

पहले बुलबुल दम्पति तिनके और टहनियाँ ले कर आते थे और इधर उधर ताक कर फुर्र से झाड़ में घुस जाते थे। वह घोंसला निर्माण का पक्ष था। वह काम पूरा करने के बाद गतिविधियाँ शांत रहीं। अब सप्ताह भर बाद बुलबुल पति पत्नी चोंच में कीड़े पकड़े आने लगे हैं।
कल रविवार था। माली (रामसेवक) जी के आने का दिन। उनसे मेम साहब ने कहा कि तुलसी की मंजरी छांट दें जिससे तुलसी के पत्ते और घने हो सकें। रामसेवक जी ने मंजरी तो छांटी पर सावधानी से बुलबुल का घोंसला भी देखा। तब हमें बताया – “बधाई हो दीदी, आपके यहां तीन बच्चे दिये हैं बुलबुल ने।”

हमने भी देखा – सावधानी से – तीन बच्चे थे बुलबुल के हथेली भर के घोंसले में। हल्की आहट पर तीनो अपनी चोंच खोल कर प्रतीक्षा करते थे कि उनके लिये खाना आ रहा होगा। तीनों मांस के लोथड़े जैसे हैं। उनके पंख अभी ठीक से जमे नहीं हैं। पंखों की जगह थोड़े रोयें से दिखते हैं। मुंह खोलते हैं तो ध्यान से सुनने पर हल्की चींचीं की आवाज निकलती सुनाई देती है उनके कण्ठ से। जब हम घोंसला देखने और चित्र लेने का उपक्रम कर रहे थे तो पास की नीम पर बैठी बुलबुल तेज आवाज में बोल रही थी। अनिष्ट की भय-आशंका ग्रस्त आवाज। हम न समझें तो वह भी बुलबुल का गायन ही था पर थोड़ा तीखा।
बच्चे की बरही – बारह दिन जन्म के बाद – पर उत्सव मनाया जाता है। यह तय हुआ कि उस दिन नवरात्रि का व्रत सम्पन्न होगा और हलवा-पूरी बना कर बुलबुल-प्रॉजेक्ट से जुड़े सभी लोगों को खिलाया जायेगा। घर में काम करने वाली कुसुम ने कहा – फुआ, छठ्ठी को तो काजल लगाया जाता है नवजात को। मुझे कुछ नेग दो तो इन बच्चों को काजल लगा दूं? :-D
तुलसी की मजरी छांटने पर लगा कि ऐसा न हो घोंसले को ज्यादा धूप लगे। इतने नाजुक और मुलायम थे बच्चे कि रामसेवक और गुलाब चंद्र (मेरे वाहन चालक) ने मिल कर एक हरा पर्दा टेण्ट की तरह तान दिया झाड़ के ऊपर जिससे सूरज की सीधी तपन से उनका बचाव हो सके। उनके यह सब करते समय बुलबुल दम्पति आसपास ही रहे। शायद उन्हें भी अहसास हुआ हो कि ये लोग उनके और उनके बच्चों के लिये कोई अनिष्ट करने वाले नहीं हैं। उल्टे सहायक ही हैं।

रामसेवक जी ने आकलन कर बताया कि बुलबुल के प्रजनन प्रॉजेक्ट को करीब छ दिन हो गया है। आगे जब नवरात्रि का अंतिम दिन होगा – रामनवमी होगी – तब उन ‘बुलबुलों’ की बरही होगी।
बच्चे की बरही – बारह दिन जन्म के बाद – पर उत्सव मनाया जाता है। यह तय हुआ कि उस दिन नवरात्रि का व्रत सम्पन्न होगा और हलवा-पूरी बना कर बुलबुल-प्रॉजेक्ट से जुड़े सभी लोगों को खिलाया जायेगा। घर में काम करने वाली कुसुम ने कहा – फुआ, छठ्ठी को तो काजल लगाया जाता है नवजात को। मुझे कुछ नेग दो तो इन बच्चों को काजल लगा दूं? :-D
यह तय हुआ कि काजल भले न लगाया जाये, कुसुम को कुछ ‘नेग’ दे ही दिया जायेगा। … कुल मिलाकर बुलबुल के घोंसले और उसके नवजात बच्चों ने पूरे घर को उत्सवमय कर दिया। रविवार का दिन आनंदमय हो गया!







