जसदाण से मोटा दड़वा


3 दिसम्बर 21, रात्रि –

राजकोट के अंचल से गुजर रहे हैं प्रेमसागर। सवेरे मुझे बताया कि एक नदी मिली। जिसपर जगह जगह बांध बने हुये थे। पानी रोका गया था सिंचाई के लिये। बहुत से ऐसे बांध – चेक डैम – थे। मैंने नक्शे में चेक किया तो गोण्डल के लिये सीधे रास्ते में कोई नदी पड़नी नहीं चाहिये थे। शायद किसी के कहने पर एक अन्य मार्ग चुना था जिसपर भादर नदी दो बार पार करनी होती है। वह डी-टूर आगे जा कर सीधे रास्ते में मिल जाता है।

सीधे रास्ते से मोटा दड़वा – स्थान जहां रात्रि विश्राम के लिये प्रेमसागर के रुकने का प्रबंध था; सत्रह किलोमीटर पड़ता है। पर प्रेम सागर डी-टूर वाले रास्ते से 21-प्लस किलोमीटर चले होंगे। चार किलोमीटर ज्यादा। खैर, चलना प्रेमसागर को है, मुझे क्या?

भादर के चेक डैम उसके सिंचाई के लिये दोहन की कथा बताते हैं। वर्षा द्वारा सिंचित इस इलाके में इन चेक डैमों की खासी भूमिका होगी किसान की खुशहाली में।

भादर नदी प्रेमसागर के रास्ते के समांतर चलती रही है धंधुका से राजकोट जिले की ओर उनकी यात्रा में। उन्हें कभी नजर नहीं आयी। आज उस नदी के साथ 2-3 किलोमीटर के क्षेत्र में चले। भादर के चेक डैम उसके सिंचाई के लिये दोहन की कथा बताते हैं। वर्षा द्वारा सिंचित इस इलाके में इन चेक डैमों की खासी भूमिका होगी किसान की खुशहाली में। वैसे पर्यावरण विद, जो कॉण्ट्रेरियन चलते-सोचते हैं; उनके पास चेक डैमों के माध्यम से नदी को बांधने के खिलाफ तर्क होंगे ही। उन्हें यह खराब लगता होगा कि नदी को सैकड़ों तालाबों में तब्दील कर दिया गया है। पर पानी अरब सागर में जाये, उससे अच्छा वह खेती के काम आये; यह प्राइमा-फेसाई (prima facie प्रथम दृष्ट्या) मुझे खराब नहीं लगता। भादर उस इलाके से गुजरती है जिसमें जल की एक एक बूंद कीमती है।

भादर नदी

एक झऊआ भर चित्र ठेल रहे हैं प्रेमसागर। चित्र भेजते समय वे चुन कर नहीं भेजते। जो भी उनके मोबाइल कैमरे में आता है, वह टेलीग्राम एप्प के माध्यम से मेरे कम्प्यूटर और मोबाइल में सरक जाता है। मेरा लैपटॉप जो छ साल पुराना है, चित्रों की मेगा बाइट्स से कराह रहा है। उसका की-बोर्ड काम नहीं करता तो एक यूएसबी से जोड़ कर एक्सटर्नल की बोर्ड से काम चला रहा हूं। नया लैपटॉप खरीदना है पर उसमें दो अड़चन हैं – पहला पैसे की भरमार नहीं है, वित्त मंत्रालय (पत्नीजी) की अनुमति कठिन है; दूसरे अभी वाले में इतना मसाला है, उसे नये लैपटॉप पर स्थानांतरित करना कठिन काम है। लगता नहीं कि उस समय तक जब यह पूरी तरह बैठ न जाये, कोई विकल्प बनेगा।

प्रेमसागर के कई चित्र’ जूम कर लेने के कारण’ धुंधले होते हैं। उनको इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। पर उनका भी एक ध्येय होता है। कम से कम मुझे तो उनके यात्रा मार्ग में मिलने वाले जगहों, चीजों की जानकारी हो जाती है। उनको सीधे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता पर उनके द्वारा सोचा जा सकता है और शब्द गढ़े जा सकते हैं। उनके कई चित्र कैमरे पर कोई उंगली या हथेली आने के कारण काम लायक नहीं होते। पर वे सब भी, बिना चयन के, एन-ब्लॉक प्रेमसागार मेरे पास ठेल देते हैं। उनकी यात्रा में सबसे निरीह, सबसे त्रस्त व्यक्ति मैं ही हूं! :lol:

आज प्रेमसागर को एक जगह लोग भोजन बना कर औरों को खिलाते नजर आये। वे लोग यह धर्म कार्य महीने में एक दो बार करते हैं। रामदेव बाबा पीर के भक्त लोग हैं ये। स्त्रियां भोजन बना रही थीं। चित्र लेते समय प्रेमसागर ने उनको बाध्य कर दिया घूंघट काढ़ने के लिये। गुजराती महिलाओं को मैं अपेक्षाकृत फारवर्ड मानता हूं; पर लगता है अंचलों में अभी भी पर्दा प्रथा (आंशिक रूप में ही सही) विद्यमान है। प्रेमसागर को भी यहां भोजन कराया उन लोगों ने।

एक जगह एक मिनी ट्रेक्टर-टिलर पर बैठ कर फोटो खिंचाया प्रेमसागर ने।

एक जगह एक मिनी ट्रेक्टर-टिलर पर बैठ कर फोटो खिंचाया प्रेमसागर ने। उस टिलर से चने या अन्य फसल की कतारों के बीच दो फिट का फासला होना समझ आ गया। लोग फसल बोने के बाद जब पौधे बड़े हो जाते हैं तो बीच की जगह पर इस टिलर से खेत की गुड़ाई कर देते हैं। उससे पौधों को ज्यादा उर्वरा मिलती होगी और बीच की खरपतवार भी खत्म हो जाती होगी। इस मशीन से निराई का काम सरल हो जाता होगा। यह तो मेरी अटकल है, सही सही उपयोग तो किसान ही बता सकते हैं।

रास्ते में एक पुराना दरवाजा नजर आता है सड़क पर। यह किसी रियासत वाले राजा ने बनवाया होगा।

एक पुराना दरवाजा नजर आता है सड़क पर, प्रेमसागर को चलते हुये। यह किसी रियासत वाले राजा ने बनवाया होगा। सौराष्ट्र में ढेरों राजे थे। अश्विन पण्ड्या जी मुझे खांची भर राजे-रियासतों का होना समझाते हैंं। भारत के अन्य भागों में किसी भी राज्य में राजा के मरने के बाद बड़ा लड़का राजा बनता था। बाकी सभी अंगूठा चूसते थे। या वे बगावत कर मार-काट करते थे। सोरठ/काठियावाड़ में ऐसा नहीं था। राज्य के हिस्से कर सभी बेटे अपना अपना राज्य बना लेते थे। इस तरह जैसे अन्य भागों में पुश्तैनी किसानी की जोत कम होती गयी है, उसी तरह सौराष्ट्र में रियासतें छोटी छोटी हो गयी थीं और ढेरों थीं।

पता नहीं इन राजा लोगों का आज क्या हाल होगा? आज कोई कोई राजा तो मध्य वर्गीय या निम्न मध्यवर्गीय जीवन यापन भी कर रहा होगा! शायद!

रास्ते में कोई हनुमान मंदिर मिला। वहां, बकौल प्रेमसागर हनुमान जी जमीन से प्रकट हुये। शुरू में थोड़ी सी प्रतिमा थी, एक फुट की; पर बाद में वह पांच छ फुट के हो गये। वहां के नागा बाबा को प्रेमसागर की रुद्राक्ष की बड़ी माला पसंद आ गयी। उन्होने मांग ली तो प्रेमसागर ने वह मंदिर के दत्तात्रेय भगवान की मूर्ति को पहना दी। अब प्रेमसागर को नयी खरीदनी होगी। एक द्वादश ज्योतिर्लिंग के कांवरिया की कुछ तो झांकी होनी चाहिये। रुद्राक्ष उसमें सही गेट-अप देता है। यह थोड़े ही कि आप फलालेन या नाईलोन की होजियरी वाली बोल बम लिखी टी-शर्ट और घुटन्ना पहन कर छिछोरे लफाड़ियों की तरह कांवर ले कर चलेंं- जो यहां सावन के महीने में सैंकड़ों, हजारों दिखते हैं। वह सब मुझे भदेस हिंदुत्व लगता है। और प्रेमसागार तो उनके विपरीत छोर के तप करते जीव लगते हैं। एक बढ़िया रुद्राक्ष की माला तो उनके पास होनी ही चाहिये; भले ही कुरता-धोती मुड़ा-तुड़ा हो।

[सुदेश भाई के घर के चित्र]

मोटा दड़वा में प्रेमसागर सुदेश भाई के घर रुके हैं। मोटा दड़वा नाम के अनुरूप बड़ा गांव है; शायद कोई दड़वा या नाना (छोटा) दड़वा गांव भी हो। सुदेश भाई सम्पन्न गांव वाले हैं। उनका ड्राइंग रूम मुझे अपने यहां के तथाकथित सम्पन्न लोगों के यहां से कहीं बेहतर नजर आता है। सुदेश भाई की मां, पत्नी और बच्चे भी सलीकेदार दिखते हैं। उत्तरप्रदेश के गांव के लोगों और घरों से तुलना करना ही बेमानी है। और मोता दड़वा राजकोट का आंचलिक गांव है। कोई सबर्बिया या रूरर्बिया नहीं। वहां सुदेश भाई और अन्य पुरुष पैण्ट कमीज में हैं। काठियावाड़ गांव के पग्गड़ धारी, सदरी पहने किसान की मन में छवि उनकी ईमेज से उलट है। वह छवि जो मंथन फिल्म में दिखती है। शायद आगे कहीं वैसा किसान प्रेमसागार को दिखे।

बहरहाल सुदेश भाई का घर और परिवेश मुझे प्रभावित करता है। उनके बच्चे प्यारे से हैं! सुदेश भाई किसानी करते हैं और उनका डेयरी भी है। दो दर्जन गाय-भैंस हैं उनके पास। वे ठाकुर हैं। उनका व्यक्तिव प्रभावी है पर किसान के हिसाब से सुदेश भाई का वजन ज्यादा दिखता है। उनके पेट पर समृद्धि ज्यादा है। वह सेहत के लिये वे कम कर लें तो बहुत हैण्डसम लगें। :-)

प्रेमसागर ने बताया कि सवेरे जब वे निकले तो बादल थे, दिन में गर्मी हो गयी। सामान्य रहा दिन। इक्कीस-बाईस किलोमीटर चलने में दिक्कत नहीं हुई। यद्यपि रात में वे चित्र में इनर पहने नजर आते हैं। दिन गर्म और रात ठण्डी होती होगी उस इलाके में।

आज लिखना कुछ ज्यादा ही हो गया। मेरी सामान्य पोस्टों से दुगना। बस आज इसी पर विराम दिया जाये।

जय सोमनाथ। हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

श्री मंगल आश्रम से जसदाण और आगे


मंगल आश्रम में रात बिना कम्बल के जैसे तैसे गुजारी प्रेमसागर ने। सवेरे आठ बजे जब बात की तो उनकी आवाज में उत्फुल्लता पहले जैसी थी। अपनी ओर से रात की ठण्ड या कम्बल न मिलने का कोई जिक्र नहीं किया था। इस बात का जिक्र भी नहीं कि अब बिना सर्दी का इंतजाम किये बिना चल नहीं पायेगा। वे इस बात को बहुत सामान्य तरह से ले कर चल रहे थे और मैं उसे बहुत बड़ा यात्रा तैयारी का छिद्र मान कर चल रहा था। हम दोनो की सोच में यह एक मूलभूत अंतर है। उनकी खराब अनुभवों को याद रखने की आदत है ही नहीं। झटक कर आगे चलने की है। पर मैं उसे याद ही नहीं रखता, वह याद मुझे बराबर सालती रहती है – अपने को कोसती रहती है। अभी भी एकाकी होने पर पुराने वे प्रकरण याद आते हैं जिनके बारे में मुझे लगता है कि यह नहीं यह किया होता तो कहीं बेहतर होता। शायद जिंदगी की धारा बदल गयी होती। … और लगता है प्रेमसागार इस मामले में मुझसे कहीं बेहतर हैं – तभी वे यह भागीरथ प्रयत्न वाली यात्रा कर पा रहे हैं और मैं घर पर बैठा हूं।

आज उनकी यात्रा छोटी ही है। जसदाण के आगे एक मंदिर में रुकना है। उसके पहले जसदाण में संजय भाई गिरधर व्यास जी ने उनकी अगवानी की। संजय भाई को अश्विन पण्ड्या जी ने सूचना दी थी। व्यास जी ने दिन में और संध्या को अपने घर पर भोजन कराया। उसके बाद वे रवाना हुये तीन किलोमीटर दूर मंदिर में रात में रुकने के लिये। प्रेमसागर ने बताया कि कोई हनुमान जी का मंदिर है। दिन में जसदाण में व्यास जी के साथ उन्होने अपने गर्म कपड़े खरीदे। कम्बल नहें लिया। व्यास जी ने अपने घर से ही गर्म मोटी ऊनी चद्दर उन्हे दे दी। “यह चद्दर कम्बल से बेहतर है भईया। इससे मेरा काम अच्छे से चल जायेगा। इसका वजन भी कम्बल से कम है। ले कर चलने में बोझा भी कम रहेगा।” – प्रेमसागर ने कहा।

जसदाण में एक पुरानी इमारत। बंगला या दफ्तर(?)

जासदाण राजकोट जिले की एक नगरपालिका है। पुरानी रियासत जिसे सरदार वल्लभ भाई पटेल ने 15 फरवरी 1948 के दिन भारत में मिलाया। विकीपेडिया के अनुसार यह रियासत 1665 में बनी। यहां हीरे के तराशने, हस्त शिल्प और कृषि यन्त्रों के उद्योग हैं। आसपास के ग्रामीण अंचल के लिये बाजार भी यह है। घेला जसदाण के भेजे चित्रों में एक पुराने समय का बंगला भी दिखता है। परित्यक्त पर अतीत की समृद्धि की कहानी कहता हुआ। बाजार और इमारतों के चित्र में भी पुरातन अधिक आधुनिकता कम दिखती है। प्रेमसागर को शायद अंदाज है कि पुरातन में मेरी दिलचस्पी ज्यादा है। इसलिये वे खोज कर उन्हीं के चित्र लेते और भेजते हैं। या शायद परिवेश वैसा ही हो।

सुरेश भाई व्यास जी का परिवार। लगता है प्रेमसागर जी का खूब सत्कार किया उन्होने। पूरे धर्म-श्रद्धा भाव से।

सुरेश व्यास जी का घर परिवार भी सामान्य लगता है – मेरे अपने परिवार की तरह। घर में या परिवार में – पत्नी और एक छोटे बच्चे में – कोई दिखावा नजर नहीं आता। वैसा परिवार जिनके पास मैं भी असहज महसूस नहीं करूंगा।

जसदाण मार्केट में गये प्रेमसागर। सरदार पटेल जी की चौराहे पर प्रतिमा के नीचे चित्र खिंचाया।

सुरेश जी ने आज का ही नहीं कल किसी गांव में प्रेमसागर के रहने-रुकने का भी इंतजाम कर दिया है। अब उन्होने और अश्विन भाई पण्ड्या जी ने प्रेमसागर का रास्ता बदल दिया है। अभी वे सासनगीर इलाके से गुजरते हुये सोमनाथ जाने के हिसाब से चल रहे थे। इस रास्ते में उन्हें सोमनाथ लगभग 190 किमी पड़ता। अब वे गोण्डल के माध्यम से जामनगर होते हुये वेरावल/सोमनाथ पंहुचेंगे। उसमें उन्हें पंद्रह किमी ज्यादा चलना होगा, पर इससे वे सासनगीर की उस जंगली पट्टी से बच जायेंगे जिसमें शेर निर्भय विचरण करते हैं। यद्यपि उस गिर पर्वत-जंगल की पट्टी से पार कराने के लिये अश्विन जी ने फॉरेस्ट विभाग के अपने एक मित्र से बात कर भी ली थी; पर फिर उन्हे लगा कि गोण्डल हो कर जाना बेहतर रहेगा। … जाहि बिधि चाले राम, ताही बिधि चलिये! वैसे भी प्रेमसागर अपने शुभचिंतकों के दिखाये-सुझाये मार्ग का ही पालन करते चल रहे हैं। इसमें भी महादेव का विधान है। खुद मार्ग तय करते तो मेरी तरह घर के बाहर कदम भी न रखते।

सवेरे श्री मंगल अश्रम से निकलने के बाद हमेशा की तरह उन्होने पहली चाय की दुकान का चित्र भेजा है। उसके बाद खेती का चित्र। “यहां पौध की एक की कतार से दूसरी के बीच दो फुट की दूरी है भईया। यह नये तरह की खेती दिखी मुझे। पौधे तो गेंहू, चने जैसे ही लग रहे हैं। दूर हैं इसलिये पास जा कर देख नहीं पाया। पर ऐसे खेत मैने उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश में नहीं देखे।”

खाली बची जमीन पर या पहाड़ी ऊंचाई जगह पर पवन चक्किया हैं। बहुत सी पवन चक्कियां प्रेमसागार को रास्ते में मिलीं। उनके लिये उनके पास इमारते भी बनी हैं। “शायद कोई कण्ट्रोल रूम होंगे भईया। उनपर कुछ अंग्रेजी में लिखा भी है।”

गुजरात में नहरों का जाल ही नहीं बिछा; प्राकृतिक ऊर्जा दोहन के बारे में भी सार्थक प्रयस हो रहे हैं। सौराष्ट्र के इलाके में समुद्र पास होने के कारण हवायें भी चलती होंगी। उनका प्रयोग विद्युत उत्पादन में हो रहा है।

पिछले दो तीन दिनों में प्रेमसागार के द्वारा दिये गये यात्रा विवरण से प्रेमसागर के बारे में मेरी सोच में अंतर आ रहा है। वे मुझे अधिक प्रिय लगने लगे हैं। मैं उनकी बहुत सहायता नहीं कर सकता। एक बंधी बंधाई छोटी सी – टोकन – मासिक रकम के अलावा कुछ नहीं। पर मेरे हाथ में उनके बारे में लिखना भर है। शायद यह देख कर कुछ लोग उनकी सहायता करें। और यद्यपि मैंने प्रेमसागर से पता नहीं किया; पर गंध लग जाती है कि लोग कर रहे हैं। उसके अलावा यात्रा के दौरान एक से दूसरे को बता कर उनकी सहायता की जो शृन्खला बन रही है – वह अभूतपूर्व है। अन्यथा वित्तहीन, साधनहीन व्यक्ति इतने सहज तरीके से इतनी बड़ी यात्रा कर गुजरा है और आगे भी करेगा; यह मेरे लिये कल्पनातीत है।

प्रेमसागर के प्रति यह प्रेम कब खीझ, खुंदक या क्रोध में तब्दील होगा, मैं नहीं कह सकता। वह उनकी यात्रा के दौरान कई बार हो चुका है। पर फिर भी वे चल रहे हैं और उनका साथ मैं दिये जा रहा हूं। यह मेरी मूल प्रवृत्ति के अनुसार नहीं है। और यही शायद महादेव की कलाकारी है। कठपुतली की तरह नाच रहे हो पण्डित ज्ञानदत्त! :lol:

हर हर महादेव!

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प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
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सरवा से हिंगोळगढ़ अभयारण्य के आगे


1 दिसम्बर 21, रात्रि –

सरवा के रामदेवबाबा पीर मंदिर में गोण्डल जाने वाले पदयात्री जत्थे ने प्रेमसागार के पांव से कांटा निकालने में बहुत मदद की। उनमें से सुरेश जी ने तो कांटा निकाल कर रात में तीन बार उठ कर पैर की गरम तेल से सिंकाई भी की। सवेरे तक प्रेमसागर ठीक हो गये थे। पैर में दर्द भी नहीं था। उस जत्थे के साथ निकलना हुआ तो कुछ देर हो गयी। उसके अलावा देर से निकलने का एक और भी कारण था कि सवेरे बारिश हो रही थी। उसके रुकने के बाद ही निकलना हुआ।

उन गोण्डल जाने वाले लोगों ने सवेरे चाय पिलाई, फिर रवाना हुये। उन्होने ऑफर दिया कि उनके साथ जसदाण तक चलें और साथ वहां रात्रि विश्राम करें। पर जसदाण 40 किमी दूर था और प्रेमसागर को उतना चलने पर थकने की पूरी सम्भावना थी। उन्होने उनसे विदा ले कर अपने पेस पर बीस किलोमीटर का मुकाम बेहतर समझा। वर्ना, एक दिन सहयात्री होने पर मोह तो हो ही जाता है। वह भी सहयात्रा के सुखद अनुभव के बाद।

निकलने के कुछ ही देर बाद एक चाय वाले सज्जन ने उन्हें खुद बुला कर चाय पिलाई।

निकलने के कुछ ही देर बाद एक चाय वाले सज्जन ने उन्हें खुद बुला कर चाय पिलाई। यह छोटे छोटे सत्कार भाव के नमूने सौराष्ट्र के आतिथ्य सत्कार की आदिकालीन परम्परा पर विश्वास पुष्ट करते हैं। प्रेमसागर ने उन सज्जन का चित्र भी लिया। साधारण से आदमी। सवेरे सर्दी से बचने के लिये स्वेटर, जैकेट, टोपी पहने हुये थे। बाद में शाम के प्रेमसागर के अनुभव से मुझे पता चला कि प्रेमसागार से खुद अपने लिये सर्दी से बचाव का मुकम्मल इंतजाम नहीं किया है।

एक और जगह राजा भाई की चाय की दुकान पर चाय पी। राजा भाई पक्षी प्रेमी लगे। पूरी द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा में अनूठे व्यक्ति। उन्होने अपने चाय के दुकान की टीन की छत पर दर्जन भर गौरय्या के घोंसले बना कर टांग रखे हैं। वे खुद ही ये चिड़ियागृह बनाते हैं। बीच में उन्होने गौरय्या को दाना देने के लिये एक दाना पात्र भी टांग रखा है। “बहुत अनूठा लगा भईया यह मुझे। तुरंत आपको यह जानकारी देना जरूरी समझा।” – प्रेमसागर ने दुकान पर बैठे बैठे मुझे फोन किया।

अरहर की खेती भी नजर आयी

रास्ते में सौराष्ट्र की पथरीली बबूल से भरी जमीन दिखी। कहीं कहीं खेती। अरहर की खेती भी नजर आयी। बाजरा भी दिखा जो कटने के लिये तैयार था। एक जगह पानी भी दिखा। शायद किसी बरसाती नदी के बचे पानी का अवशेष हो।

आगे उन्हें ठहरने के लिये मुकम्मल जगह नहीं मिली और फिर प्रारम्भ हो गया हिंगोळगढ़ प्राकृतिक अभयारण्य। उसको देख कर प्रेमसागर ने कहा – भईया लगता है फिर से मध्यप्रदेश में घुस गये हैं हम। दूर एक किला दिखता है। उसका फोटो जूम से लेने पर बढ़िया नहीं आ रहा है। सड़क घुमाव दार है और पथरीली घाटी है। पेड़ में ज्यादा बबूल हैं। खैर भी है और नीम भी। कहीं कहीं तार वाली बाड़ के साथ मेंहदी भी है। कंटीली तार की बाड़ है तो जंगली जानवर भी होंगे।”

दूर से दिखता हिगोळगढ़ किला/महल

रवि भाई से बात चीत हुई तो वे हिंगोळगढ़ के बारे में तो नहीं बता सके पर यह जरूर बताया कि पूरे इलाके में कहीं कहीं पहाड़ियांं हैं। आगे गिरनार में तो ज्यादा ही दिखेंगी। वहां वन्य जीव भी बहुत होंगे। शेर कभी कभी दिख जाते हैं। भारत में जितनी रियासतें थीं जिनका सरदार पटेल ने भारत में विलय किया, उनमें से अधिकांश तो सौराष्ट्र में ही थीं। छोटी छोटी पंद्रह बीस गांवों की रियासतें। हर रियासत ने अपने महल या किले बना रखे थे; जो अब खण्डहर बन रहे होंगे। हिण्डोळगढ़ भी वैसी ही रियासत रहा होगा।

हिंगोळगढ़ का मार्ग

गुजरात टूरिज्म की साइट से पता चला कि हिंगोळगढ़ प्राकृतिक शिक्षण अभयारण्य वर्षा से सिंचित शुष्क भूमि से घिरा है। इस अभयारण्य में चिंकारा, नीलगाय, भेड़िया, लकड़बग्घा और लोमड़ी जैसे वन्य जीव हैं। यह राजकोट जिले में आता है और कुल इलाका 6.5 वर्ग किलोमीटर का ही है।

सड़क किनारे यह टॉवर दिखा। पुराना स्ट्रक्चर।

हिंगोळगढ़ की घाटी से गुजरते हुये रास्ते में एक नौजवान दम्पति ने अपनी कार रोक कर प्रेमसागार से बात की। उनका नाम है ऋषि और मोना। इटावा जिले के जसवंतनगर के रहने वाले हैं। अहमदाबाद में ऋषि नौकरी में हैं। वे लोग सोमनाथ जा रहे थे। उन्होने प्रेमसागर को मिठाई खिलाई और पानी पिलाया। “वो तो मुझे पूरा मिठाई का डिब्बा ही दे रहे थे, पर भईया हम कहे कि इतना मिठाई का हम क्या करेंगे?”

ऋषि और मोना के साथ प्रेमसागर।

उन लोगों ने प्रेमसागर की यात्रा का प्रयोजन पूछा। यह भी पूछा कि बारह ज्योतिर्लिंग कौन कौन से हैं। जान कर उन्हें आश्चर्य हुआ यात्रा की विशालता और विकटता पर। उन लोगों ने “Gyandutt Pandey” सर्च कर ट्विटर और ब्लॉग अकाउण्ट भी देखा। फोटो खींचा अपने सोशल मीडिया पर डालने के लिये। प्रेमसागर का फोन नम्बर भी लिया। जाने क्या समझ रहे होंगे वे नौजवान इस यात्रा के बारे में। अच्छा ही समझ रहे होंगे! उन्होने चलते चलते दो-तीन सौ रुपये प्रेमसागर की जेब में डाल दिये।

हिंगोळगढ़ अभयारण्य के बाद तीन किलोमीटर आगे प्रेमसागर को रात गुजारने के लिये जगह मिली – श्री मंगल आश्रम में। वहां हॉल में तख्त है। पर कोई गद्दा या कम्बल नहीं मिल पाया। प्रेमसागर के पास भी सर्दी के हिसाब से अपना इंतजाम नहीं है। उन्होने सर्दी का समय किसी “पीपल के नीचे या मंदिर में” बिना सुविधा के गुजारने का ड्राई रन नहीं किया है – ऐसा लगता है। अब वे तय कर रहे हैं कि एक भेड़ियहवा कम्बल और इनर-लोअर खरीदेंगे। बारिश हो गयी है। सर्दी बढ़ेगी ही। किसी तरह यह रात उन्हे अपनी चादर आदि के साथ गुजारनी है।

इसके बाद प्रेमसागर अपने जुगाड़ में लग गये। शाम सात बजे के बाद उनसे बातचीत नहीं हुई। गुजर ही गयी होगी रात। यहां भदोही की बजाय वहां सर्दी तो कम ही होती होगी। काम चल ही गया होगा। पर आकस्मिक समस्या के लिये तैयारी में कमी तो उजागर हो गयी प्रेमसागर की। वे न केवल भौगोलिक जानकारी की घोर कमी के साथ यात्रा कर रहे हैं, वरन अकेले यात्रा करने के दौरान की प्लानिंग में भी गैप नजर आ गये। खैर, कल परसों तक वे इंतजाम कर ही लेंगे। यह सम्भव है कि इंतजाम की जरूरत आगे न पड़े और सुविधा मिलती जाये। पर यात्रा के दौरान स्वावलम्बी बनने का जो ड्रिल होना चाहिये, वह तो पूरा होना ही चाहिये।

आज 25 किलोमीटर से ज्यादा ही चले होंगे प्रेम सागर।

हर हर महादेव। जय सोमनाथ!

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प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
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प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
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