भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
सवेरे उठने पर पहला काम होता है अखबार डाउनलोड करने का। सबसे पहले बिजनेस स्टेण्डर्ड का नया अंक आता है। अंगरेजी और हिंदी दोनो का। उसके आसपास ही फाइनेंशियल एक्सप्रेस। फिर आते हैं अन्य अखबार – इण्डियन एक्स्प्रेस, टाइम्स ऑफ इण्डिया, गार्डियन, जनसत्ता, जागरण आदि और भी।
पत्रिकाओं में लगभग दो दर्जन मिल जाती हैं। दस इंच की टैब स्क्रीन में पढ़ना लगभग वैसा ही अनुभव है, जैसा पेपर वाली का पढ़ना। हंस और स्वराज्य Magzter पर उपलब्ध नहीं हैं। सो वे अलग सब्स्क्राइब कर रखी हैं। उनका पीडीएफ टैब पर पढ़ना पेपर संस्करण पढ़ने जैसा ही है। दस इंच का पुराना टैब – नत्तू पांड़े का पुराना वाला – बड़े काम का है। एप्पल का है पर 2013-14 मॉडल का। धीरे चलता है। पर पत्र-पत्रिका और पीडीएफ पुस्तक पढ़ने के लिये बहुत सही है।
Magzter पर समाचार पत्र पत्रिकायें
पठन सामग्री के लिये बहुत पैसे खर्च करने की जरूरत नहीं। मेग्जटर का वार्षिक सब्स्क्रिप्शन 1 हजार का है। उसमें करीब चालीस पत्र पत्रिकायें रीयल टाइम मिल जाती हैं। उन सब को खरीदा जाता तो पूरी पेन्शन स्वाहा हो जाती।
डिजिटल युग आपको बिना खर्चा किये बहुत धनी बना देता है। नये युग के बहुत अभिशाप हैं; पर जो लाभ हैं, वे भी कम नहीं। आपकी जैसी वृत्ति है उसके हिसाब से आपको साधन उपलब्ध हैं। पोर्नोग्राफी से ले कर दर्शन शास्त्र तक।
अप्रेल शुरू हो गया। आज ज्यादा ही दिखे बच्चे महुआ बीनते। महुआ टपकना तो सप्ताह भर पहले शुरू हो गया था; अब तेजी आ गयी है। पहले इक्का दुक्का बच्चे दिखते थे महुआ बीनने में लिप्त। अब झुण्ड के झुण्ड सवेरे सवेरे काम पर लग जाते हैं।
जब सर्दी थी, स्कूल कोरोना के नाम पर बंद थे तो बच्चे दिन भर एक एक बोरी थामे सूखी पत्तियाँ और टहनियां बीनते थे। फिर स्कूल खुल गये तो सभी यूनिफार्म पहन कर स्कूल जाने लगे। यूनीफार्म का पैसा तो अभिभावकों के अकाउण्ट में सीधे आया होगा; सो यूनिफार्म तो खरीदी नहीं गयी होगी। एक साल पहले वाली ही पहन रहे होंगे बच्चे। अब महुआ का सीजन आने के साथ साथ स्कूल जाना फिर रुक गया। बच्चे अब महुआ बीनने में व्यस्त हो गये हैं।
स्कूल की रंगाई पुताई और फर्नीचर आदि सुविधाओं का हार्डवेयर अपग्रेड हो गया है। पर पढ़ाई के स्तर का सॉफ्टवेयर तो ठस ही है।
स्कूल की अहमियत यूनीफार्म, जूते, मिड डे मील जैसी चीजों के लिये है। उसके साथ कुछ पढ़ना आ जाये तो वह बोनस। अन्यथा पढ़ाई में न बच्चे उत्सुक हैं, न अभिभावक और न स्कूल के अध्यापकगण। स्कूल की रंगाई पुताई और फर्नीचर आदि सुविधाओं का हार्डवेयर अपग्रेड हो गया है। पर पढ़ाई के स्तर का सॉफ्टवेयर तो ठस ही है।
… उस बच्चे का पिता मिस्त्री का काम करता है। बच्चा अपनी उम्र के हिसाब से छोटा है। उम्र के हिसाब से उसका वजन भी कम है और लम्बाई भी। बच्चा स्कूल नहीं जाना चाहता। अपने पिता के साथ जाना चाहता है। पिता मिस्त्री का काम करता है तो वह उसके साथ लेबराना करना चाहता है। “ईंट तो उठा ही सकता हूं। लेबराना (मिस्त्री का हेल्पर) करूंगा, तभी तो मिस्त्री बनूंगा।” – बच्चे को अपनी लाइन, अपना भविष्य बड़ा स्पष्ट है। वह लेबराना सीख कर जल्दी से जल्दी मिस्त्रियाने में दक्ष होना चाहता है। स्कूल जाना उसमें एक अड़चन के सिवाय कुछ नहीं। और यह दशा 1970-72 की नहीं, सन 2020-22 की है।
खैर, अब महीने भर महुआ बीना जायेगा। सवेरे साइकिल सैर में उसके चित्र लेना हर साल की तरह इस साल भी आनंद देगा। घूमते हुये मैं गुनगुनाऊंगा – महुआ चुअत सारी रैन हो रामा, चईत महीनवाँ!
जी हां महुआरी से गुजरते हुये महुआ की मदहोश करने वाली गंध आने लगी है। बच्चों की टोली, हर हाथ में एक दो प्लास्टिक की पन्नियाँ लिये एक एक महुआ के फूल को बीनने की होड़ में व्यस्त हैं।
बच्चों की टोली, हर हाथ में एक दो प्लास्टिक की पन्नियाँ लिये एक एक महुआ के फूल को बीनने की होड़ में व्यस्त हैं।
बहुत नीक लगता है महुआ का टपकना और उसका बीनना देखना। अभी बच्चे ही बीन रहे हैं। कुछ दिन में बड़े लोग भी इस काम में लग जायेंगे। महुआ के पेड़ के नीचे पुरानी साड़ियाँ-धोतियाँ रात में बिछ जायेंगी जिससे महुआ आसानी से चुना जा सके।
एक दो बार तो और लौटूंगा ही महुआ के विषय पर इस ब्लॉग में, इस सीजन में।
वह अपरिचित नौजवान मुझे घर के गेट पर मिल गये। मैं शाम के समय साइकिल ले कर निकलने ही वाला था कि उस व्यक्ति ने मेरे बारे में पूछा। कौन हैं, किस लिये मिलना चाहते हैं, यह पूछ्ने पर बड़ा आश्चर्यजनक (और सुखद) उत्तर था कि वे सलोरी, प्रयागराज में रह कर पीसीएस की परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। ट्विटर पर मुझे फॉलो करते हैं और मेरे ब्लॉग के नियमित पाठक हैं।
कोई अपरिचित मुझे ढूंढता हुआ गांव में आ कर मिले – यह तो सेलिब्रटित्व टाइप भाव हो गया! मुझे बरबस याद हो आयी उन सज्जन की जो मुझे बरेली रेलवे स्टेशन पर पीछे से लगभग दौड़ते मेरे पास तक आये थे और अपना परिचय दिया था कि वे मुझे ब्लॉग पर नियमित पढ़ते हैं।
इस प्रकार के लोगों से मिलना लम्बे अर्से तक याद रहता है। लगभग 50-60 लोग इस प्रकार के मिले होंगे अब तक। और कई अन्य हैं जो मेरा लिखा (लगभग नियमित) पढ़ते हैं या किसी न किसी दौर में पढ़ते रहे हैं। लोग मेरे लिखे पर जिज्ञासा भी व्यक्त करते हैं, प्रश्न भी पूछते हैं और सुझाव भी देते हैं। और यह तब है जब मैंने सेल्फ-प्रोमोशन के हथकण्डे (सयास) इस्तेमाल नहीं किये। :-D
नौजवान ने नाम बताया – रामेश्वर मिश्र। सिर पर छोटे बाल। शायद पीछे सवर्ण का प्रतीक चोटी भी थी। वेश से गंवई-शहरी का मिलाजुला रूप। गोल और प्रसन्न दिखने वाला बालसुलभ चेहरा।
नौजवान ने नाम बताया – रामेश्वर मिश्र। सिर पर छोटे बाल। शायद पीछे सवर्ण का प्रतीक चोटी भी थी। वेश से गंवई-शहरी का मिलाजुला रूप। गोल और प्रसन्न दिखने वाला बालसुलभ चेहरा। पसंद आये रामेश्वर मुझे पहली नजर में। साइकिल मैंने बैक कर ली। रामेश्वर जी के साथ एक कप चाय पर आधा घण्टा व्यतीत किया।
रामेश्वर ने अपना गांव बताया अभोली। अभोली सुरियांवा के पास है। यहां (कटका रेलवे स्टेशन) से करीब 40-44 किमी दूर। आसपास किसी काम से आये थे वे और मेरे यहां आने का मन था तो ढूंढते हुये आ गये। छोटे स्तर पर ही सही, घुमक्कड़ी की वृत्ति तो दिखा ही दी उन्होने।
मैंने उनसे दूसरी ही बात की। उन्हें यह कहा कि जब तक उनके पास अवसर हैं, तब तक मन लगा कर वे परीक्षा की तैयारी करें और सफल होने का प्रयास करें। पर साथ ही यह मान कर न चलें कि परीक्षा पास कर नौकरी करना ही एकमात्र विकल्प है। वे अपनी किसी व्यवसाय के बारे में योग्यता बनाने बढ़ाने की भी सोचते रहें।
चौबीस साल की उम्र बताई पर उनका बालसुलभ चेहरा देख उससे कम का ही आकलन होता है। अभी शादी नहीं हुई। उनके बड़े भाई की शादी 22 साल की उम्र में हो गयी थी। तब घर वालों और समाज का दबाव था। रामेश्वर ने बताया कि गांवसमाज में भी धीरे धीरे शादी कराने का दबाव कम होता जा रहा है। माता पिता अब ज्यादा जोर इसपर देते हैं कि लड़का कामकाजी हो जाये। उनके पिताजी बम्बई में व्यवसाय करते थे। अब वे घर पर ही रहते हैं – अभोली में। शायद कोरोना संक्रमण काल का विस्थापन रहा होगा उनके पिताजी का।
इधर उधर की बातों में रामेश्वर ने मुझसे अपनी पीसीएस परीक्षा की तैयारी के बारे में सलाह-सुझाव मांगा। उन्हें लगा होगा कि भूतपूर्व नौकरशाह के रूप में मुझे परीक्षा क्रैक करने के बारे में गुर बताने का जज्बा होगा। पर मैंने उनसे दूसरी ही बात की। उन्हें यह कहा कि जब तक उनके पास अवसर हैं, तब तक मन लगा कर वे परीक्षा की तैयारी करें और सफल होने का प्रयास करें। पर साथ ही यह मान कर न चलें कि परीक्षा पास कर नौकरी करना ही एकमात्र विकल्प है। वे अपनी किसी व्यवसाय के बारे में योग्यता बनाने बढ़ाने की भी सोचते रहें। नौकरी, वह भी सरकारी नौकरी का पिरामिड चढ़ कर शिखर छूना बहुत खड़ी चढ़ाई का उपक्रम है। अपनी क्षमता और अपने विकल्प सतत तोलते रहने चाहियें।
“चार पांच साल परीक्षा की तैयारी कर वैसा बनना कि आप किसी और काम लायक बचें ही नहीं; कोई अच्छी स्ट्रेटेजी नहीं कही जा सकती।” – मैंने इसी सोच पर जोर दिया। रामेश्वर जी ने सिर हिला कर मेरी बात समझने स्वीकारने की हामी भरी; पर मैं नहीं जानता कि वे अपनी वैकल्पिक योग्यताओं के बारे में कितनी गम्भीरता रखते हैं। सामान्यत: इस इलाके में मैंने युवाओं को परीक्षा की तैयारी में कई साल लगाने के बाद किसी कामलायक न बचने की त्रासदी झेलते पाया है। आशा करता हूं कि रामेश्वर जी के साथ वैसा नहीं होगा।
शाम होने को थी। मुझे आधा घण्टा साइकिल चला कर अंधेरा होने से पहले घर लौटना था। रामेश्वर मिश्र जी को भी कटका स्टेशन जा कर साढ़े छ बजे की डेमू पैसेंजर पकड़नी थी प्रयागराज जाने के लिये। हम दोनो ने एक दूसरे से विदा ली।
अभोली के हैं रामेश्वर तो भविष्य में उनसे मिलना होते रहना चाहिये। अगर वे अपरिचित के रूप में इधर उधर पूछताछ कर मेरे यहां आ सकते हैं तो मित्र के रूप में तो उनका स्वागत है ही। रामेश्वर को उज्वल भविष्य की शुभकामनायें। भगवान करें, पीसीएस बन ही जायें। :-)