बाड़ी से बिनेका


14 अक्तूबर 21, रात्रि –

आज डिजिटल यात्रा का सस्पेंस का दिन था। शुरुआत में यह नहीं मालुम था कि वास्तविक कांवर यात्री किस रास्ते किस मुकाम पर जा रहा है। लोकेशन शेयरिंग से कुछ देर में रास्ता तो स्पष्ट हो गया; उसके बाद प्रेम सागर जी द्वारा बताये मुकाम “विनयका” से मिलते जुलते छोटे स्थानों – गांवों, कस्बों आदि की तलाश रास्ते के आसपास की। प्रेमसागर जी ने दूरी 30 किलोमीटर बताई थी, उसके समीप बहुत बारीकी से तलाशा पर कोई स्थान वैसा नहीं था। अंतत: 40 किमी दूरी पर बिनेका (Bineka) नामका स्थान मिला। मुझे लगा कि यही हो सकता है। और अंत में वही निकला भी।

इतना स्पष्ट हुआ कि डिजिटल यात्रा के लिये आवश्यक है कि प्रेमसागर अपनी लोकेशन निरंतर आधार पर शेयर कर सकें और अपनी यात्रा का अगला पड़ाव अग्रिम रूप से खुद जानें और शेयर कर सकें। मेरे लिये जानने और लिखने की सामग्री की विविधता उनकी यात्रा के दौरान के उनके अनुभव से आती है पर उसका बेस इस मूल जानकारी से बनती है – जो नक्शे और नेट/पुस्तकों में बिखरी सूचनाओं में निहित होती है। खैर, जो आज शुरुआत में मेरा फ्रस्ट्रेशन था, वह धीरे धीरे दूर हुआ। अन्यथा एकबारगी तो लगा था कि लम्बी अवधि तक इस तरह का सूचनाहीनता की दशा में साथ साथ मानसिक यात्रा नहीं की जा सकती और उसका लेखन तो करना रसहीन, स्वादहीन होगा।

आज रास्ते में जल, पहाड़ियां, घाटियां और हरियाली थी। जहां भी खेत बन सकते थे, वहां धान की खेती हो रही थी। शुरुआत की आधी दूरी तो बरना जलाशय के इर्दगिर्द वाले इलाके में चलते गुजरी। कहीं नहर मिली तो कहीं नदी। दो नदियां – कम से कम – प्रेमसागर ने पार कीं। उनमें से एक तो बरना रही होंगी जो बरना जलाशय की मुख्य नदी हैं। वे जलाशय में आ कर मिलती भी हैं और आगे जलाशय से निकलती भी हैं। अंतत: उनका गंतव्य नर्मदा ही हैं। टेढ़े मेढ़े घूमते वे उतनी दूरी तय करती हैं, जितनी प्रेमसागर करीब तीन दिनों में तय करते हैं। पर उनके किनारे किनारे चलना हो तो शायद एक पखवाड़ा लगे। उनके किनारे किनारे गांव भी कम ही होंगे और मार्ग तो होंगे ही नहीं। बरना; जो पुराणों में शायद वरुणा-नर्मदा हैं; के किनारे चलने की कोई परम्परा तो है नहीं। शायद कोई चला भी न हो। बहरहाल, चित्र में नदी सुंदर लगती हैं।

बरना में एक डो‌गी चलते दिखी

रास्ते की ऊंचाई नीचाई का अहसास तो आसपास के पहाड़ों से लग जाता है जिन्हें काट संवार कर सड़क बनाई गयी होगी। चालीस किलोमीटर से ऊपर की यात्रा में शुरुआती दौर में पहाड़ियां ज्यादा थीं, पर वे लगभग पूरी यात्रा में उपस्थित रहीं। नक्शे में देखने पर लगता है कि इस इलाके की धरती जैसे किसी भौगोलिक कारण से ठेल कर या दोनो ओर से सिकोड़ कर ऊंचे नीची कर दी हो। इस इलाके में भी सड़कें चौड़ी की जा रही हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की कहानी इस विरल आबादी वाले रायसेन जिले में भी दिखाई देती है। पांच साल बाद कोई पदयात्री यहां से गुजरेगा तो उसे दृश्य बदला हुआ नजर आयेगा।

कल मैंने यूं ही प्रेमसागर से पूछ लिया था कि यात्रा में शिव-तत्व कहां कहां उन्हे नजर आये या उनकी उपस्थिति का आभास हुआ। कल की यात्रा की दो बातें उन्होने बताई थीं, थोड़ा सोच कर। पर आज वे खुद ही तैयार थे।

बोले रास्ते में वे चले जा रहे थे। सड़क के दूसरी ओर एक महिला अपनी दुकान में बैठी थी। अपने चार साल के बालक को प्रेमसागर की ओर दौड़ाया। बच्चा सड़क पार कर प्रेमसागर से बोला “बाबा, रास्ता में कोई गांव नहीं मिलेगा। आप रुक कर पानी पी लीजिये।” और वह प्रेमसागर का हाथ पकड़ कर अपने मां के पास ले गया। उन्हें पानी पिलाया और आठ अमरूद दिये खाने के लिये। प्रेमसागर ने उसके बारे में टेलीग्राम पर संदेश भी लिखा –

“भईया उस बच्चे में महादेव नजर आये मुझे। और वह मां भी धन्य हैं जो बच्चे को यह संस्कार दे रही हैं।”

रास्ता मैं यह बालक
हमको दूर से आते देखा तो दौड़ कर
आकर हमको रोका और पानी पिलाया। और 8 अमरूद लाया
और बोला कि बाबा रास्ता में कोई गांव नहीं मिलेगा आप खा लीजिएगा।
महादेव जी उस बालक को लंबी उमर,
विद्या और बुद्धि दे। यही आशीर्वाद बच्चा को दिए हैं हम।
हर हर महादेव!

“भईया उस बच्चे में महादेव नजर आये मुझे। और वह मां भी धन्य हैं जो बच्चे को यह संस्कार दे रही हैं।”

इस जगह के आगे, ‘मोटा-मोटी’ चार पांच किलोमीटर आगे एक आदमी मिले। सत्तर साल के आसपास उम्र रही होगी। सड़क के उसपार थे। हाथ जोड़े गाड़ी वालों की ओर देख रहे थे पर कोई गाड़ी वाला देख ही नहीं रहा था। पैण्ट और कुरता पहने थे और जटा बढ़ी हुई थी। कोई भिखारी नहीं लग रहे थे और मानसिक रूप से विक्षिप्त भी नहीं थे। प्रेमसागर उनकी ओर सड़क पार कर पंहुचे तो वे हाथ जोड़ कर बोले – बाबा, तीन दिन से कुछ खाये नहीं हैं।

“मेरे पास खुल्ले चालीस पचास रुपये थे। वे मैंने उन्हें दे दिये। आगे चलने पर, कोई दो किलोमीटर बाद याद आया याद आया कि उनका फोटो तो मैं ले सकता था। आप फोटो के बारे में पूछते हैं। पर उस समय ध्यान ही नहीं आया फोटो लेने का। शायद गर्मी लग रही थी या वैसे ही दिमाग में नहीं आया।” – प्रेमसागर ने कहा। यह भी जोड़ा कि “उनमें शंकर जी नजर आये मुझे।”

“आपके कपड़े तो गंदे हो जाते हैं। साबुन का प्रयोग तो करते नहीं। साफ कैसे करते हैं?” – शाम के समय यात्रा विवरण लेते समय मैंने प्रेमसागर से पूछा।

“पानी से ही धोता हूं। ज्यादा गंदे होते हैं तो पैरों से रगड़ देता हूं। उससे पैरों की मालिश भी हो जाती है और कपड़े भी साफ हो जाते हैं। बार बार धोने से कपड़े जल्दी पुराने पड़ते हैं। पुराने किसी जरूरतमंद को दे देता हूं। इस यात्रा में तीन धोती, एक कुरता और दो गमछा इस तरह दे चुका हूं। एक धोती तो एक सज्जन ने सेवा की थी और निशानी के रूप में मांगी थी। छाता भी अमरकण्टक से चलने के बाद जंगल में उस महिला को दे दिया था।”

“चलने पर पैर थकते हैं। उनके लिये क्या करते हैं?”

प्रेमसागर ने मुझे उत्तर दिया – जब दर्द होने लगता है तो दो नींबू खरीदता हूं। उन्हें काट कर तलवे पर ऊपर नीचे रगड़ता हूं। आराम मिलता है। एक नींबू आधा ग्लास पानी में निचोड़ कर बिना नमक डाले पी लेता हूं। उससे भी दर्द मिट जाता है। निचोड़े नीबू को भी तालू में रगड़ता हूं।”

बिनेका में रेंजर साहब – तुलाराम कुलस्ते जी ने उन्हें अपने घर पर ही रखा। कुलस्ते जी के परिवार और मिश्रा जी, जो कुलस्ते जी के बाबू हैं, के चित्र प्रेमसागर ने भेजे हैं। कुलस्ते जी ने बताया कि कल प्रेमसागर जी को भोजपुर पंहुचना है। भोजपुर बिनेका से 31 किलोमीटर पर है। प्रेम सागर की दैनिक यात्रा में वह छोटे आकार की यात्रा ही होगी।

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
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बरेली से बाड़ी, हिंगलाज माता और रामदरबार


बरेली से बाड़ी की ओर चलने का अर्थ है नर्मदेय क्षेत्र से पहाड़ की गोदी की ओर चलना। नर्मदा का मैदान उतना विस्तृत नहीं है जितना गंगा का। दस किलोमीटर उत्तर दक्षिण चलते ही नर्मदा की घाटी अपनी रंगत बदलने लगती है। घाटी से हम विंध्य या सतपुड़ा की ऊंचाईयों में चढ़ने लगते हैं। यह मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव से कम, नक्शे को बार बार ध्यान से देखने के आधार पर ज्यादा कह रहा हूं। व्यक्तिगत अनुभव तो मध्य प्रदेश की गिनीचुनी ट्रेन यात्राओं का ही है जो उत्तर से दक्षिण जाते हुये की हैं।

अब जब प्रेमसागर बरेली से बाड़ी की ओर चले तो मुझे वही याद आया। यात्रा शुरू करते समय ही मैंने एक घण्टे बाद उनसे पूछा – ऊंचाई नीचाई आ रही है सड़क में? आसपास खेत हैं या पहड़ियां। प्रेम सागर ने उत्तर दिया कि जगह ऊंची नीची है। एक ओर खेत हैं पर दूसरी ओर तो जमीन ऊंची-नीची है। आबादी है, पर वह ज्यादातर बरेली के आसपास ही थी। उसके आगे एक नदी पड़ी, जिसका नाम वे नहीं जान पाये। नक्शे में देखने पर पता चलता है कि वह बरना नदी है जो बाड़ी के पास बरना जलाशय से निकलती है और आगे जा कर घूमते घामते नर्मदा में समा जाती है। बरना जलाशय बड़ा है और विंध्य की गोद में है। बरना नाम शायद वरुणा का अपभ्रंश है। नदी है वरुणा-नर्मदा। वैसे ही जैसे वरुणा वाराणसी में गंगा से मिलती हैं, ये वरुणा-नर्मदा, नर्मदा में मिलती हैं। बरना जलशय में कई नदियां आ कर मिलती हैं (बरना भी उनमें से एक है) और फिर बरना उसमें से निकलती है। उस जलाशय के आसपास घूमना रोचक अनुभव होगा। पर वह लेने तो प्रेमसागर निकले नहीं हैं। वे तो आज बाड़ी में रुक कर आगे बढ़ लेंगे – शायद भोपाल की ओर।

गिरजाघर में प्रतिमा

आज की प्रेमसागार की यात्रा छोटी है। कुल बीस किलोमीटर की। कुछ डी-टूर भी जोड़ लिया जाये तो 21-22 किलोमीटर होगी। वे अपना रीयल टाइम लोकेशन शेयर करने लगे हैं तो बीच बीच में मैं मैप पर झांक लेता हूं कि सीधे सपाट चल रहे हैं या नीचे उतर रहे हैं/ऊपर चढ़ रहे हैं। एक स्थान पर मुझे लगता है कि वे एक गिरजाघर के पास से गुजरने वाले हैं। मैं उन्हे आगाह करता हूं फोन पर कि वे चर्च का चित्र लेने का प्रयास करें। वे चर्च का चित्र तो नहीं भेज पाये पर वर्जिन मेरी और जीसस की मूर्ति का चित्र जरूर भेजा। एक बगीचा भी था। जिसे देख कर लगता है कि यह स्थान परित्यक्त नहीं हो गया है। गिरजा जीवंत है। रविवार को परिवार वहां जुटते होंगे। अंग्रेज चले गये बहुत जमाने पहले पर थोड़ी बहुत ईसाई आबादी आसपास बच रही होगी। या बढ़ भी रही हो?! क्या पता!

गिरजाघर का परिसर

प्रेम सागर को आगे एक नब्बे साल से अधिक उम्र के सज्जन मिले। वे पूरी तरह फिट थे। स्वतंत्रता सेनानी थे, गुजरात के रहने वाले पर यहीं बस गये हैं – शायद यहीं कोई जॉब करते रहे हों। सड़क किनारे वे चाय के लिये एक होटल पर आये थे, वहीं पर मिले। बताया कि उनकी पैदाइश 1927 की है। उन्होने एक गरीब आदमी को पैंतीस हजार दे कर मदद की थी चाय आदि की दुकान खोलने में। उसे मिल कर आश्वासन भी दे रहे थे कि भविष्य में भी कोई जरूरत हो तो उनसे बेझिझक मांग सकता है।

नब्बे प्लस के स्वतंत्रता सेनानी जी के साथ प्रेमसागर।

मैंने प्रेमसागर से आज पूछा कि उन्हें दिन भर की यात्रा में कब कब लगा कि महादेव की उपस्थिति थी यात्रा के दौरान? आखिर कहा जाता है न कि कंकर में शंकर हैं तो चलते चले जाने की सार्थकता तो इसी में है कि कभी कभी उनकी अनुभूति होती रहे। प्रेम सागर ने कहा कि आज दो बार ऐसा लगा। उनमें से पहली बार तो इन स्वतंत्रता सेनानी जी के मिलते समय लगा था। इतनी उम्र में भी वे निस्वार्थ लोक कल्याण में लगे थे।

वहीं कुछ दूर पर एक महिला – नाम बताया मनीषा बैरागी – जी ने प्रेमसागर को कांवर लिये जाते देख रोक लिया और जलेबी-फलहारी चिवड़ा और चाय का नाश्ता कराया।

रास्ते में प्रेमसागर तो एक ओर खेत और दूसरी ओर पेड़ और ऊंची नीची जमीन दिखी। एक स्थान पर कोई पॉलीटेकनिक संस्थान था और एक गौशाला। वे सब दूर से चलते चलते ही देखे उन्होने। उनके चित्र यहां लगा देता हूं जिससे भविष्य में यात्रा करने वालों को स्थान की प्रकृति का कुछ अहसास रहे।

बाड़ी पंहुच गये होंगे हमारे पदयात्री जी साढ़े तीन बजे तक। शाम छ बजे वे मंदिरों के दर्शन को निकलने वाले थे। मैं अगर बीस किलोमीटर चलूं तो दो दिन पांव की मालिश करवाऊंं! गजब की जीजीविषा है प्रेमसागर में चलने और घूमने की। मेरी पत्नी जी कहती हैं – यह उनका और अपना तुलना राग तो छेड़ा ही मत किया करो। तुम्हारी और उनकी यू.एस.पी. अलग अलग विधाओंंमें है। तुम लिखते नहीं तो क्या करते? प्रेमसागर चलते नहीं तो क्या करते? यह जरूर है कि प्रेमसागर के बारे में नहीं लिखते तो कुछ और लिखते।” वे शायद वेगड़ जी कथन से प्रभावित हैं। उन्होने कहा है कि मैं नर्मदा की यात्रा नहीं करता तो क्या करता? मेरा जन्म ही उसके लिये हुआ है।

वन विभाग के रेस्ट हाउस के पास ही है हिंगलाज मंदिर। मूल शक्तिपीठ तो हिंगलाज माता का बलूचिस्तान में है। पर रायसेन जिले का यह मंदिर भी प्राचीन है। किसी साधक को माताजी ने सपने में प्रेरणा दी थी और (कथाओं के अनुसार) कालान्तर में वे बलूचिस्तान के मंदिर से ज्योति ले कर भी आये थे। “उसके बाद माता जी स्वयम यहां प्रकट हो गयी थीं।” नेट पर उपलब्ध सामग्री में इस मंदिर के विलुप्त होने और पुन: जीर्णोद्धार की बात भी है। प्रेमसागर ने बताया कि एक छतरी नुमा इमारत में औरंगजेब की प्रसाद बांटने की शरारत (?) और उनके द्वारा भेजे मांसाहारी भोज के मिठाई में बदल जाने के चमत्कार की कथा भी है। पर मुझे लगता है कि मामला इतिहास के नहीं, आस्था और श्रद्धा के डोमेन में है। इस मंदिर की बहुत मान्यता है। शक्तिपीठ ही माना जाता है इस पीठ को।

मंदिर में वहां के पुजारी जी और माँ हिंगलाज संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य पण्डित देवनारायण त्रिपाठी जी से भेंट हुई प्रेमसागर की। आज की यात्रा के शिव-तत्व-दर्शन में दूसरी घटना प्रेम सागर त्रिपाठी जी से मिलना बताते हैं। त्रिपाठी जी ने उन्हें दो चुनरी, श्रीफल, सेब और केले और दुर्गा सप्तशती की एक पुस्तक उपहार में दी और ढेर सारा आशीर्वाद दिया यात्रा के लिये। प्रेमसागर ने कहा – “वे प्रसाद (भोजन) ग्रहण करने का भी जोर दे रहे थे; भईया, पर रेस्ट हाउस में मेरा भोजन बन रहा था; इसलिये उन्हें मना किया। अन्यथा वहीं प्रसाद ग्रहण करता। कल यहां से निकलते समय यदि हो सका तो उनके पास कुछ देर रुकूंगा। उनकी तरफ से आज नवरात्रि की अष्टमी को जो उपहार मिला, उससे मैं अपने को धन्य मानता हूं। फल तो मैं खा जाऊंगा, पर बाकी उपहार तो मेरे साथ बना रहेगा।”

राम दरबार

पास में ही राम जानकी मंदिर है। रात में रामदरबार के जो चित्र प्रेमसागर ने भेजे वे इतने स्पष्ट नहीं हैं, पर सुंदर पेण्टिंग से लगते हैं। चित्र में पूरे राम परिवार की मूर्तियां सिंगार के साथ हैं।

रेस्ट हाउस में व्यवस्था चंद्रकांत त्यागी जी कर रहे हैं। उन्होने ही बताया है कि कल विनायका (?) के लिये रवाना होंगे प्रेमसागर। वे भोपाल के लिये रवाना होंगे। रास्ते में भोजपुर पड़ेगा जहां विशालकाय शिवलिंग है। अगला मुकाम – विनायका मुझे नक्शे में दिखता ही नहीं। अगला मुकाम नक्शे में देख कर उसकी दूरी ज्ञात करना प्रेमसागर की पदयात्रा अनुशासन में नहीं है। वे रास्ते में लोगों से पूछने, फोन पर मार्ग के बारे में बात कर जानकारी लेने आदि पर ज्यादा यकीन करते हैं। वे जैसे जैसे चलते जायेंगे, वैसे वैसे मार्ग मुझे स्पष्ट होगा।

चंद्रकांत त्यागी

मैं सोचता था कि प्रेमसागर ॐकारेश्वर के लिये होशंगाबाद की ओर निकलेंगे, पर अगर वे भोपाल की ओर निकलते हैं तो पहले उज्जैन जाना होगा – महाकाल दूसरे ज्योतिर्लिंग होंगे उनकी पदयात्रा के। पर पता नहीं उनकी यात्रा की योजना कौन बना रहा है? प्रेमसागर खुद तो बना नहीं रहे। शायद प्रवीण दुबे जी बना रहे हों; या शायद महादेव ही बना रहे हों। उनकी यात्रा का हर दिन, हर मुकाम मेरे लिये अप्रत्याशित ही होता है।

और इस प्रकार की लबड़-धबड़ यात्रा मेरी प्रकृति से फिट नहीं बैठती। पर तुम कर ही क्या सकते हो जीडी? दिनेश कुमार शुक्ल जी मुझसे कहते हैं – “प्रेमसागर को लिखो महराज, पर अपने आसपास का जो देखते-लिखते-बुनते हो, जो इप्रेशनिष्ट कथ्य उसमें निकल कर आता है, उसे कमतर मत आंको।” प्रेमसागर के अगले मुकाम के बारे में अस्पष्टता को ले कर मुझे दिनेश जी की बात याद हो आयी है। प्रेमसागर के चक्कर में कोलाहलपुर की सुंदर मूर्ति बनाने वाले के पास जाना और मिलना रह ही गया। अब नवरात्रि भी बीतने को आयी। आसपास भी देखो, जीडी!

हर हर महादेव!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

उदयपुरा से बरेली और नागा बाबा से मिला सत्कार


12 अक्तूबर 21 रात्रि –

आज सवेरे उदयपुरा से निकलने के एक घण्टे बाद ही प्रेमसागर को एक छोटी नदी का बड़ा पुल मिला। नर्मदा के उत्तर में यह नदी है तो और उत्तर में विंध्य की किसी पहाड़ी-जंगल से निकलती होगी। सवेरे के गोल्डन ऑवर की रोशनी में चित्र अच्छा आया है। नक्शे में खूब छानने पर भी दिखी नहीं। ऐसी अनेक नदियों का मकड़जाल बिछा है नर्मदेय क्षेत्र में। यह सब नर्मदा का सौंदर्य बढ़ाता है। क्या उपमा देंगे? ये नर्मदा की घनी केश राशि की एक एक लटें हैं?

उदयपुरा और बरेली – दोनो मध्यप्रदेश में हैं; राजस्थान और उत्तरप्रदेश में नहीं। प्रेमसागर को आज उदयपुरा से आगे बढ़ना है होशंगाबाद की ओर। नर्मदा से उत्तर में है यह मार्ग। करीब 8-10 किलोमीटर नर्मदा तट से दूर। किनारे किनारे चलने वाले परकम्मावासी यह मार्ग नहीं चुनते होंगे। पर नक्शे में मैं देखता हूं तो ढेरों मंदिर पड़ते हैं रास्ते में। मुख्य हनुमान जी और माता जी के हैं। कुछ बाबा लोग भी हैं – हरदौल बाबा, मेणे वाले बाबा, पटेल बाबा, मंदारी बाबा आदि। ये बाबा लोकल देवता होंगे। या शिवजी ही ग्लोकल हो कर बाबाओं में रूपांतरित हुये हों। कहीं कहीं मंदिरों में हनुमान जी के साथ शिवजी का ड्यूयेट भी दिखता है नक्शे में। यह जरूर है कि राम-जानकी-कृष्ण बड़े मार्जिन से हनुमान जी से पापुलर वोट हारते दीखते हैं। “राम से अधिक राम कर दासा” वाली बात सिद्ध है!

दिन में एक नदी और एक नहर और मिली रास्ते में। नाम पता नहीं चला। रास्ते में कोई आदमी आसपास नहीं था, जिससे प्रेमसागर पूछते। कुल मिला कर जल की कमी नहीं इस इलाके में। मईया का प्रताप है कि जो भी फसल लेना चाहो, हो जाती है। सांवां, कोदों, तिन्नी – सब होता है मोटे अनाज के रूप में। अरहर और धान के खेत भी दिखे प्रेमसागर को। एक जगह चने की बुआई भी हो रही थी। ग्रामीण सड़क से थोड़ा दूर था, वहां तक जा नहीं पाये।

ग्यास और प्रीतम। इन दो बच्चों ने प्रेमसागर को राह चलते रोका और मंदिर में बिठा कर साबूदाने की खीर खिलाई।
माता जी का मंदिर

सवेरे साढ़े नौ बजे एक मंदिर पर समय गुजारने के चित्र भेजे हैं चलते चलते प्रेम सागर ने। माता के दरबार के नाम से जानी जाती है यह जगह। वहां दो बच्चों ने प्रेमसागर को राह चलते रोका और मंदिर में बिठा कर साबूदाने की खीर खिलाई। नवरात्रि का समय है सो साबूदाने की ‘फलहारी’ खीर थी जो व्रत करने वाले भी खा सकें। बच्चों के नाम भी लिखे हैं प्रेमसागर ने। ग्यास और प्रीतम।

चार घण्टे से ज्यादा चल चुके थे माता जी के मंदिर तक प्रेमसागर। साबूदाने की खीर खा कर वहीं विश्राम करने लगे। बारह बजे तक वहीं आराम किया। अपनी आगे की यात्रा का समय-आकलन उन्होने कर लिया होगा अन्यथा आराम के लिये रुकने की बात तो साढ़े नौ बजे नहीं एक डेढ़ घण्टे बाद उठती है जब धूप और तेज हो जाती है। बाद में प्रेमसागर ने बरेली पंहुचते पंहुचते फोन पर बताया कि वहीं पर एक नागा बाबा थे, जूना अखाड़े के। चलते समय वे प्रेमसागर की बिदाई करने लगे। बिदाई की विधिवत परम्परा निर्वहन के साथ उन्हें पांच सौ एक रुपये भी दे रहे थे। प्रेम सागर ने मना किया और मात्र एक रुपया लेने की बात की। “भईया जूना अखाड़ा के नागा बाबा लोगों में इस तरह बिदाई करने और मान सम्मान करने का चलन है।”

“अरे यह क्या बात हुई आपको पांच सौ एक रख लेना चाहिये था!”

“नहीं भईया, नागा लोगों का दिया धन पचाना आसान बात नहीं है। मेरे मना करने पर भी पचास रुपया और दिये नागा बाबा। नाम पूछने पर बताये कि जब सन्यासी बन गये तो नाम का क्या। कपड़ा-लंगोट कुछ नहीं पहने थे। बस एक गमछा लपेट लिये थे लोगों के सामने आने के समय।”

जूना अखाड़े के नागा बाबा

मेरी पत्नी जी से सुना तो टिप्पणी की – “बकलोल हैं प्रेम सागर। जो मिल रहा था, रख लेना था। इन अखाड़ा-वखाड़ा वाले बाबा लोगों के पास खूब सम्पदा है। खूब पैसा है। उनसे जो मिले ले लेना चाहिये!” :lol:

फिर जोड़ा – “पर शायद ठीक किया; उस लकड़हारे की तरह जिसने देवता से सोने, चांदी की कुल्हाड़ियां लेने से मना कर दिया था यह कह कर कि उसकी कुल्हाड़ी तो लोहे की है। और देवता ने उसे तीनो कुल्हाड़ियां दे दी थीं। हो सकता है अंतत: प्रेमसागर के साथ महादेव कुछ वैसा ही करें। परीक्षा बहुत लेते हैं ये महादेव!”

रास्ते में चलते हुये लोगों ने प्रेमसागर को हाईवे पर चलने की बजाय खेत की मेड़ पकड़ कर तिरछे निकलने का एक रास्ता बताया। उसपर चल दिये प्रेमसागर। जब सड़क से दूर हो गये तो लोकेशन बताने वाला एप्प भ्रमित हो कर अण्टशण्ट लोकेशन बताने लगा। अंतत: उन्हें एक छिंद धाम के इन्टीरियर मंदिर परिसर में दिखाया। छिंद धाम में मध्यप्रदेश भर के लोग मनौती के लिये आते हैं। मंत्री भी आते हैं और संत्री भी। वहां हनुमान जी का मंदिर है और राम जानकी भी हैं। मनौती वाले देव शायद हनुमान जी हैं और पीपल के दो विशालकाय वृक्ष।

वहां से सिंगल लेन वाली सड़क बरेली आती है। पता चला कि खेतों की मेड़ लांघते प्रेमसागर छिंद धाम पंहुचे थे। कीचड़ में पैर भी धंसे पर पांच किलोमीटर बचाने की चहक उनकी आवाज में थी। …. मैंने दोनो मार्गों का तुलनात्मक अध्ययन किया नक्शे पर। पूरी तरह परखने पर उन्होने कुछ खास नहीं बचाया था चलने में। पर खेतों में धंस कर आने का एडवेंचर तो मिला ही होगा। समय उन्हें उतना ही लगा। या शायद कुछ ज्यादा ही। पैर भी कीचड़ में सने होंगे जो उन्होने छिन्द धाम के सरोवर में धोये होंगे। पर उनकी जगह अगर मैं होता तो मैं भी यह “छोटे रास्ते पर चलने” का एडवेंचर ही करता! गांव के टेढ़े-घुमाव वाले रास्तों पर चलने का अपना ही आनंद है!

प्रेमसागार और महेंद्र सिंह राजपूत

उदयपुरा से बरेली नक्शे में 35 किमी दूर है। महेंद्र सिंह राजपूत, जिनके यहां उदयपुरा में आतिथ्य पाये थे प्रेमसागर; उनकी ससुराल है बरेली में। उन्होने सत्कार उदयपुरा में किया तो बरेली में उनके ससुराल वालों की बारी थी पुण्य लूटने की। प्रेमसागर पदयात्रा करते वहां पंहुचे तो महेंद्र सिंह और उनका परिवार के अन्य लोग पीछे से आये। उनका आने का ध्येय “महराज” जी को ससुराल वालों से परिचित कराना था। नवरात्रि का समय है तो वे लोग रुके नहीं। रात में नौ-दस बजे के बीच वापस उदयपुरा लौट गये।

पैंतीस किलोमीटर चल कर बरेली आने और लौटने का यह कार्य केवल महराज रूपी अतिथि को हैण्ड-ओवर करना भर था। आतिथ्य की परम्परा का यह डायमेंशन “नर्मदे हर” के क्षेत्र में ही हो सकता है जहां परकम्मा करने वालों का सत्कार उनकी संस्कृति का अंग बन गया है! स्लाइड-शो में देखा जा सकता है कि प्रेमसागर जी के लिये कितने लोग थे। इतने लोग प्रेमसागर के निमित्त इकठ्ठा हुये तो सेलिब्रिटी बन ही गये हैं वे!

रात आठ बजे ही मुकाम पर पंहुचे प्रेमसागर। आज पैर में तकलीफ वाली बात नहीं की उन्होने और मैं पूछ भी नहीं पाया। पंहुचने पर ठकुराइन के मायके वालों के आदर सत्कार में ही डूब गये होंगे वे। उसके बाद न उनका फोन आया और न कोई मैसेज ही। अगले दिन सवेरे उन्होने बताया कि भोजन शानदार बना था और मीठा में खीर और रसमलाई दोनो थी। कांवर यात्रा में पैर की ऐसीतैसी तो होती है पर भाव भी खूब छक रहे हैंं प्रेमसागर। यह मैंने कहा तो तुरंत उन्होने जोड़ा – भईया आपका आशीर्वाद है।

आशीर्वाद मेरा है और भोजन का आनंद वे ले रहे हैं! :lol:

आगे वन विभाग के एसडीओ साहेब तरुण जी ने प्रेमसागर के लिये इंतजाम कर रखा है। बरेली से बारी अगले दिन उन्हें पंहुचना है जो मात्र बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर है।

13 अक्तूबर की यात्रा छोटी है – बरेली से बारी

उसकी चर्चा अगली पोस्ट में होगी!

हर हर महादेव! नर्मदे हर! जय हो!

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

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