गड़ौली धाम: 80+ के रोज गंगा नहाने वाले लोग आये


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

गड़ौली धाम में बीस से बाईस फरवरी तक गहमागहमी रही। पूरे भारत भर से लोग आये। दक्खिन से – तमिळनाडु से और पुदुच्चेरी से भी लोग थे। बाईस फरवरी को बड़ा भारी यज्ञ हुआ। इग्यारह वेदियों में सिंक्रोनाइज्ड-सम्पादित यज्ञ। ढेरों जजमान। इतना बड़ा परिसर और उसमें इतने सारे लोग देख कर मेरे पर्सोना का इण्ट्रोवर्ट तो और सिकुड़ गया। मैं तो टेण्ट के पीछे एक कुर्सी ले कर शैलेश पांड़े की बगल में बैठा पूरा दृश्य देखता भर रहा। शैलेश की टीम के लोग – कमल, पवन और अन्य तीन चार लोग अपने अपने मोबाइल से लाइव वीडियो स्ट्रीम फीड कर रहे थे जो सभी सोशल मीडिया पर तीन घण्टे तक लोगों के पास जाती रही। ये तो जुनूनी लोगों की टीम थी जो बिना धेला खर्च किये यह काम कर रही थी। वर्ना इतनी लाइव स्ट्रीमिंग के लिये जाने कितना खर्च बैठता।

समारोह का पीक प्वाइण्ट था रमेश भाई ओझा का समारोह में आना और उनका प्रवचन।

मुझ जैसे किनारे बैठ देखने वाले के लिये यह बड़ा अनुभव था। भूलूंगा नहीं।

समारोह का पीक प्वाइण्ट था रमेश भाई ओझा का समारोह में आना

उसी दिन शाम के समय मुझे घर पर शैलेश और कमल घर पर आ कर सुनील ओझा जी की ओर से सभी आगंतुकों को दिया जाने वाला उपहार का थैला दे कर दिल्ली लौटे। बहुत सुरुचिपूर्ण उपहार था वह। उसे देख कर लगा कि पूरे समारोह की हर गतिविधि की योजना बहुत बारीकी से हुई थी। बारीकी से बनी योजना और उत्साह से क्रियान्वयन – उससे पूरा आयोजन अविस्मरणीय बन गया!

अगले दिन बिहान से सवेरे मैं वहां पंहुचा तो इक्का दुक्का लोग थे। बिजली वाले अपना सामान समेट रहे थे।

अगले दिन बिहान से सवेरे मैं वहां पंहुचा तो इक्का दुक्का लोग थे। बिजली वाले अपना सामान समेट रहे थे। संतरी मुस्तैद थे। गायें दुही जा चुकी थीं। सतीश ने मुझे शुद्ध दूध की चाय पिलाई। भदई यादव ने बताया कि साठ लीटर दूध निकला होगा। गौशाला का एक चक्कर लगाने पर मुझे लगा कि खुद भी पालनी चाहिये दो तीन गायें। पर मेरी पत्नीजी का कहना है – “खुद तो कुछ करोगे नहीं; गाय की फोटो ले ले कर ब्लॉग पर लिखने के सिवाय। गायों की सेवा कौन करेगा।” … पत्नीजी गाय तो क्या एक पिल्ला तक पालने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है – “तुम्हें पाल रही हूं, वही बहुत है!” :lol:


गंगा किनारे यज्ञशाला के आसपास एक सिक्यूरिटी वाला जवान था, और कोई नहीं। सिक्यूरिटी वाले को देख कर मैं तनावग्रस्त हो जाता हूं। कोई व्यक्ति कुछ भी जवाब-तलब करे; वह शांति में खलल जैसा लगता है। पर वैसा कुछ हुआ नहीं। वह जवान मुझसे दूर दूर ही घूमता रहा।

नीरवता भंग करने वहां कोई नहीं था। यज्ञशाला के पास, गंगा किनारे महादेव, नंदी और उनके पीछे कूर्मावतार विष्णु (?) शांत बैठे थे। कूर्मेश्वर को देख मुझे याद आया – जैसे कछुआ अपनी वृत्तियां सिकोड़ लेता है, वैसे ही हमें अपनी संज्ञायें ध्यानस्थ करनी चाहियें।

यदा संहरते चायम् कूर्मोंगानीव सर्वश:। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ (गीता, 2.58)

यज्ञशाला के पास महादेव, नंदी और उनके पीछे कूर्मावतार विष्णु (?) शांत बैठे थे।

पता नहीं कछुआ किस लिये स्थापित किया गया है वहां। भगवान विष्णु का प्रतीक हो सकता है या ध्यान साधना का कोई प्रतीक है? कभी किसी विद्वान से पूछूंगा। फिलहाल उनक चित्र लिया।

इन दोनो और इन जैसे कुछ और लोगों को मैं जानता हूं जो नित्य गंगा स्नान करने वाले हैं। जब यहां गड़ौलीधाम में महादेव की प्राण प्रतिष्ठा हो गयी है तो गंगा किनारे थोड़ा व्यवस्थित घाट बना कर वहां इन सज्जनों जैसी विभूतियों को अपने यहां नित्य आने के लिये आकर्षित करना चाहिये। धाम उन्ही जैसों से जीवंत होगा!

वापसी में गड़ौली धाम के गेट पर देखा, दो सज्जन – पण्डित केदारनाथ चौबे और मुराहू पण्डित गेट के बाहर खड़े झांक रहे थे। उनके मन में कौतूहल था जानने का कि इस स्थान पर क्या हो रहा है। मैंने मुराहू पण्डित (मुराहू उपाध्याय) और केदारनाथ जी को चरण स्पर्श किया। सिक्यूरिटी वाले भी समझ गये होंगे। उन्होने गेट ऊंचा किया तो दोनो अंदर आ गये।

बांये से – सर्वश्री केदारनाथ चौबे और मुराहू उपाध्याय

मुराहू उपाध्याय 88 वर्ष के हैं और केदारनाथ चौबे जी 82-83 के होंगे। दोनो व्यक्ति नित्य गंगा स्नान करते हैं – दशकों से। दोनो ही दीर्घजीवन के सूत्र जानने समझने के लिये आदर्श हैं। इतनी उम्र में भी 15-16 किमी रोज साइकिल चलाते हैं गंगा तट पर आने के लिये। गड़ौली धाम के आयुर्वेदशाला के लिये वे स्वस्थ वृद्ध के आईकॉन बन सकते हैं। मुराहू पण्डित जी के बारे में तो मैं जानता हूं – वे सवेरे तीन घण्टा अपने घर में गायों की सेवा कर गंगास्नान को निकलते हैं और रास्ते में लोगों का हाल लेते, उनको आयुर्वेदिक दवा बताते चलते हैं। वे आयुर्वेदाचार्य भी हैं।

इन दोनो और इन जैसे कुछ और लोगों को मैं जानता हूं जो नित्य गंगा स्नान करने वाले हैं। जब यहां गड़ौलीधाम में महादेव की प्राण प्रतिष्ठा हो गयी है तो गंगा किनारे थोड़ा व्यवस्थित घाट बना कर वहां इन सज्जनों जैसी विभूतियों को अपने यहां नित्य आने के लिये आकर्षित करना चाहिये। धाम उन्ही जैसों से जीवंत होगा!

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Gadauli Dham गड़ौली धाम

बगल के योगेश्वरानंद आश्रम में गंगा तट पर पगडण्डी भर है। वहां घाट भी यूं ही है, बस। पर वहां मैंने करीब दो दर्जन लोगों को नित्य आते, स्नान करते और शिवजी को जल चढ़ाते देखा है। योगेश्वरानंद आश्रम की जीवंतता उन नित्य स्नानार्थियों से है। वैसा ही कुछ, या उससे कहीं व्यापक स्तर पर, गड़ौली धाम में होना चाहिये। गांवदेहात के ऐसे सरल, धार्मिक और अनुशासित जीवन जीने वाले महानुभावों का स्वागत धाम का गौरव ही बढ़ायेगा।

मेरी पत्नीजी तो एक कदम आगे जाने को कहती हैं। उनके अनुसार मुख्य नहान के दिनों के स्नानार्थियों को खिचड़ी आदि परोसने का प्रावधान होना चाहिये। माघ के महीने में, कार्तिक पूर्णिमा के दिन या ऐसे अन्य दिनों में यह आयोजन हो सकता है। उसके लिये एक ठीक ठाक पक्का घाट और वहां तक जाने की सीढियां या रैम्प जरूरी है। वहां स्त्रियों के वस्त्र बदलने के लिये छोटा सा शेड जैसा हो तो और भी अच्छा।

महादेव मंदिर का वर्तमान में स्थान। लगता है यह स्थान अप्रेल-मई तक बन जायेगा। लोग बगल में गंगा स्नान कर नित्य शंकर जी को जल चढ़ा सकेंगे।

केदारनाथ द्वारिकापुर घाट पर यदा कदा भाग्वत कथा भी कहते हैं। मुझे नहीं लगता कि बहुत कमाई उनका ध्येय होता होगा। मुख्य ध्येय तो पुण्य लाभ ही है। … मुझे इन अस्सी पार कर चुके महानुभावों के स्वास्थ्य और सरलता से ईर्ष्या होती है और बहुत मन करता है उनकी सरलता, धर्मपरायणता को अपनाने का। पर कहां हो पाता है! मन की राजसिक वृत्तियां और चंचलता आड़े आती है।

मुराहू पण्डित पर पोस्टें –
1. मुराहू पंडित से दीर्घ जीवन के सूत्रों पर चर्चा
2. अंशु दुबे की ब्लॉग पोस्ट – मुराहू पण्डित का गंगा स्नान
केदारनाथ चौबे पर पोस्टें –
1. केदारनाथ चौबे का नित्य गंगा स्नान
2. केदारनाथ चौबे, परमार्थ, प्रसन्नता, दीर्घायु और जीवन की दूसरी पारी
मुराहू पण्डित और केदारनाथ जी पर पुरानी ब्लॉग पोस्टें।

खैर, इन सज्जनों से प्रभावित हो कर पहले भी कई बार लिख चुका हूं ब्लॉग पर और अब तो गड़ौली धाम के संदर्भ में लिख रहा हूं। नित्य गंगा स्नानार्थियों को गड़ौली धाम से जोड़ने का काम एक सार्थक पहल होगी ऐसा मेरा सोचना है। और ऐसे पचीस पचास लोग तो निकल ही आयेंगे आसपास के 8-10 किमी की परिधि में। वे अगर जुड़ते हैं तो बहुत पावरफुल ओपीनियन मेकर होंगे गड़ौली धाम परियोजना के पक्ष में स्थानीय जनता के बीच। उनकी बात लोग – विशेषकर महिलायें – बहुत सुनते/मानते हैं।

हर हर हर हर महादेव! जय गंगा माई!


वर्डप्रेस मैसेज दे रहा है कि मेरी ब्लॉगिंग के 15 साल हो गये। सन 2007 में मैंने आज के दिन ब्लॉग बनाया था। उसके आसपास ही ब्लॉगर पर भी बनाया था। अंतत: यही चला। सारी पोस्टें वर्डप्रेस पर ही शिफ्ट कीं।

तब मुझे हिंदी में लिखना नहीं आता था। सोचना अंग्रेजी में होता था। वही कारण है कि आज भी मेरी वाक्य रचना हिंदी पट्टी के लोगों से कुछ अलग ही होती है। अटपटी। पर वही अंतत: मेरी यू.एस.पी. बन गयी।

बहुत समय बीत गया ब्लॉगिंग में। डेढ़ दशक! :-)


प्रमोद शुक्ल और गड़ौली धाम की गायें


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

शैलेश ने मुझे फोन पर बताया – “भईया, गड़ौली धाम में समर्पित चरित्र खोज रहे हैं आप तो जरा गायों के शेड के आसपास लम्बे शरीर के थोड़े भूरे बालों वाले व्यक्ति को खोजिये। वे प्रमोद शुक्ल हैं। गौशाला वही संभालने वाले हैं और उनका कमिटमेण्ट तो टोटल है। शत प्रतिशत।”

ज्यादा दिक्कत नहीं हुई उन्हें देखने चीन्हने में। गायों के शेड के आसपास ही पुआल का कटा हुआ चारा उतारा जा रहा था। पतले दुबले लम्बे कद के वे सज्जन कह रहे थे – “यह पुआल इन गायों को तो मैं कभी नहीं परोसूंगा। जिसने भी मंगाया है, उससे ही जा कर बात करो। पुआल उतारने की जरूरत नहीं है। मैं समझौता नहीं कर सकता।”

प्रमोद शुक्ल

उनसे मौका देख कर मैंने इधर उधर के दो चार सवाल किये। उन्होने उत्तर तो दिये पर अपरिचय में प्रश्नों को फेस करते वे कुछ असहज लगे। मैंने अपना परिचय दिया। उन्हें यह भी कहा कि गौशाला जिस प्रकार से अपना आकार लेगी, उसके बारे में मैं लिखना चाहूंगा। सतत। परिचय देने के बाद हम लोगों की आत्मीयता की केमिस्ट्री बनने लगी।

प्रमोद जी गौ पालन के बारे में गहन जानकारी रखते हैं। ऐसा मुझे लगा। उनके पास गौ पालन के आधार पर आर्थिक रूप से सक्षम ग्रामीण जीवन की परिकल्पना भी है और उसपर वे पूरी तरह यकीन करते दिखे। वे गौ पालन में किसी तरह के शॉर्ट-कट के पक्ष में नहीं नजर आये। “गांव वाला आदमी चारे में कॉम्प्रोमाइज कर दस रुपया बचाता है पर उससे वह 100 रुपया खो देता है। मैं वैसा काम कत्तई नहीं करूंगा।” – प्रमोद शुक्ल ने कहा।

धूप सेंकते नये बछड़े-बछिया।

प्रमोद चारे की क्वालिटी की बात कर रहे थे। सुनील ओझा जी ने मुझे पहले पहल मिलने पर बताया था कि गाय की चरनी चारे से सदा भरी रहे। तभी गौ माता तृप्त हो कर आशीर्वाद देगी। प्रमोद शुक्ल और सुनील ओझा की सिनर्जी – चारे की क्वालिटी और क्वांटिटी – दोनो भरपूर हो तो उसमें खर्च भले ही ज्यादा हो, आर्थिक लाभ भी कई गुना ज्यादा होगा।

प्रमोद प्रेक्टिकल आदमी हैं। वे कहते हैं कि गांव का आदमी अगर देसी गाय पालेगा, उसकी माता की तरह सेवा करेगा तो वह एक तरफा श्रद्धाभाव से नहीं हो सकता। गाय की सेवा; अगर उस किसान के अपने बच्चे भूखे रहते हैं; तो कहां चल पायेगी? गौ पालन का ठोस आर्थिक आधार नहीं होगा तो यह प्रयोग सफल नहीं होगा।

गड़ौली धाम में गायें।

पर क्या व्यापक तौर पर यह प्रयोग सफल हो सकता है? मैं यह सवाल प्रमोद जी से करता हूं। यही सवाल मैं गांवदेहात के बहुत से लोगों से कर चुका हूं। गांवदेहात के लोग अंदाज से पक्ष या विपक्ष में तर्क देते हैं। उनकी सोच में गौ माता की सेवा या मिलने वाले दूध की शुद्धता भर का तर्क रहता है। वे यह भी कहते हैं कि गौ सेवा से स्वास्थ्य ठीक रहता है। पर देसी गाय आर्धारित पूर्णत: आर्थिक समृद्धि की बात वे नहीं करते। गाय बाकी जीवन का ऐड-ऑन ही है लोगों के लिये।

यही सवाल दो महीने पहले मैने कृषि वैज्ञानिक डा. जय पी राय जी से भी किया था। दोनो सज्जन – प्रमोद शुक्ल और डा. राय; जो विषय की गहन जानकारी रखते हैं; मानते हैं कि मार्जिनल किसान की गौ आर्धारित आर्थिक समृद्धि सम्भव है।

साधन की कमी वाले मार्जिनल-खेतिहर किसान की गौ आर्धारित अर्थव्यवस्था के लिये जरूरी है कि किसान इकॉनॉमी के मूलभूत तत्व समझें, गाय के लिये सूखे और हरे चारे का प्रबंधन आपसी तालमेल-सामुदायिक सोच के साथ करें। वे देसी गौ वंश के टाइप 2 प्रोटीन वाले दूध की गुणवत्ता का आर्थिक महत्व समझें और उस दूध के लिये सही बाजार विकसित हो। उपभोक्ताओं की जानकारी बढ़े कि देसी गाय का दूध उनके लिये अनेक आधुनिक जीवन की बीमारियों (मसलन अल्झाइमर और डिमेंशिया) आदि के बचाव का साधन है। जानकारी का प्रसार, लोगों में सहयोग की भावना का विकास और देसी दूध के बाजार के लिये बहुत काम किया जाना मूलभूत आवश्यकता है। … यह बहुत बड़ा काम है और कई समर्पित लोगों की जरूरत होगी उसके लिये। प्रमोद शुक्ल जी सम्भवत: एक स्तम्भ हों उसके लिये। पर एक दर्जन लोग और होने चाहियें। भाजपा के टिकटार्थियों से बिल्कुल अलग प्रकार के लोग! :smile:

मैं प्रमोद जी से फोन कर कहता हूं कि जब वे गड़ौली धाम में हों तो मुझे खबर कर दें। उनसे मिल कर आगे बहुत कुछ समझना है। हो सकता है कि मैं स्वयम भी इतना चार्ज हो जाऊं कि दो-चार गायों को पालने के प्रयोग की सोचूं। यह भी हो सकता है कि मैं लेखन सामग्री भर ही जुटाऊं। ऑफ्टर ऑल, जीडी एक आम बाभन की तरह आलसी जीव है! :lol:


दस गायें हैं अभी गड़ौली धाम की कुंदन गौशाला में। दो उनके साथ आये व्यक्ति हैं – भदई और ददन यादव। उस दिन भदई एक कनस्तर में गुड़ फेंट रहे थे। गरम भी कर रहे थे। यह गुड़ गायों को खिलाना है। ताजा व्याई गायें हैं। उन्हे पौष्टिकता मिले और दूध में बढ़ोतरी हो, उसके लिये उपाय है। भदई और ददन आरा जिला के हैं। गौ पालन में दक्ष। यहां के तीन लोग तैयार हो रहे हैं। दो तीन दिन में गायों की देखभाल सौंप कर दोनो लौट जायेंगे।

भदई यादव

भदई बताते हैं कि साहीवाल अच्छी गाय है। और भी कई अच्छी देसी गायें हैं। भदई प्रमोद जी को कहते हैं – दो चार तारफार मंगवाइये। तारफार राजस्थान की देसी गाय है। साहीवाल से भी ऊंचे कद वाली और बहुत सीधी – भदई मुझे बताते हैं। भदई और भी गायों की प्रजातियों के नाम मुझे बताते हैं – कांगरेट, राठी, मुलतानी, गंगातीरी आदि। गुजरात की काठियावाड़ी गाय तो है ही।

इन गौ वंशों की 100 गायें अगर कुंदन गौशाला में आयी तो साल भर में ही उतनी ही उनकी नयी जेनरेशन की गायें तैयार हो जायेंगी। आसपास के दस बीस गांवों में कई परिवार देसी गाय पालने वाले हो जायेंगे। मैं त्वरित कल्पना करने लगता हूं (और त्वरित सपने देखने में मेरी महारत है :-) ) कि चार पांच साल में आसपास में गौ आर्धारित अर्थव्यवस्था का एक प्रोटोटाइप मॉडल तैयार हो जायेगा। … Ifeel buoyant – मैं उत्फुल्लता और सनसनी महसूस करता हूं।

आने वाले दिनों में गौशाला और गौ आर्धारित गांवदेहात की जिंदगी पर और भी जानकारी मिलेगी। और भी लिखा जायेगा!

मैं अपने बगल के बाढ़ू से पूछता हूं – क्या केवल देसी गाय पाल कर घर पल सकता है? बाढ़ू के पास दो-चार गाय-गोरू हैं। एक जोड़ी हल बैल भी हैं। एक आध बीघा जमीन। कुछ सोच कर बाढ़ू जवाब देता है – “काहे न होये। होई जाये।” पर बाढ़ू के कहने में मजबूती कम ही लगती है। आगे आने वाले समय में शायद मजबूती आये।

तुम ज्यादा ही उत्साहित हो जाते हो जीडी! थोड़ा शांति से देखो कि प्रमोद शुक्ल जी की गौशाला कैसे पनपती है।

प्रमोद और शैलेश

साकार होता गड़ौली धाम


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

मेरे घर से 7-8 किमी दूर है वह जगह। गड़ौली ग्राम पंचायत के कमहरिया और अगियाबीर गांवों के बीच गंगा तट का वह क्षेत्र जहां पिछले चार दशक से खेती नहीं होती थी और जहां कुशा, कासा या सरपत जैसी जिद्दी घास ने अपना साम्राज्य बना लिया था। ब्लॉग की पिछली कुछ पोस्टों में उस जगह को मैंने “गौ गंगा गौरीशंकर” परियोजना के नाम से लिखा था। अब उस जगह को नाम दिया गया है – गड़ौली धाम। उसी नाम के अनुसार साइन बोर्ड भी लग गये हैं। “गड़ौली धाम” नाम बातचीत का शब्द बन रहा है।

मेरे आकलन से गड़ौली धाम का काम साल भर में पर्याप्त सार्थक जड़ पकड़ लेगा और उसके सामाजिक-आर्थिक परिणाम भी दिखने लगेंगे।

वहां जो कुछ बनेगा; वह पूर्वांचल के पर्यटन, संस्कृति, धर्म, स्वास्थ्य और आर्थिक विकास के विभिन्न पहलुओं से महत्वपूर्ण स्थान होगा ही; मेरे लिये व्यक्तिगत रूप से गांव-देहात से सार्थक जुड़ाव का निमित्त भी बनेगा। मैं स्वयं इसे बड़ी आशा से देखता हूं। और यह भी चाहता हूं कि परियोजना जिस प्रकार से विकसित हो, उसके बारे में सतत लिख कर एक महत्वपूर्ण मेमॉयर बना सकूं।

मेरे आकलन से गड़ौली धाम का काम साल भर में पर्याप्त सार्थक जड़ पकड़ लेगा और उसके सामाजिक-आर्थिक परिणाम भी दिखने लगेंगे। बाकी; भविष्य की अनिश्चितता के बारे में कौन क्या कह सकता है?!

कुछ दिन पहले मुझे सुनील ओझा जी का एक संदेश मिला कि मुझे 20-21-22 फरवरी को गड़ौली धाम के कार्यक्रम के कर्यक्रम में बतौर एक यज्ञ-यजमान के रूप में सपत्नीक जुड़ना है। यह मेरे लिये गौरव की बात थी – यद्यपि अपनी ऑस्टियो-अर्थराइटिस के कारण पद्मासन या सुखासन या साधारण पालथी मार कर जमीन पर बैठना सम्भव नहीं था, और यज्ञ-अनुष्ठान में जजमान के रूप में जुड़ना-बैठना नहीं हो पाता; पर मुझ साधारण व्यक्ति को ओझा जी ने यज्ञ-यजमानों की सूची में जोड़ कर जो सम्मान दिया, वह मुझे और मेरी पत्नीजी को अभिभूत करने वाला था।

सुनील ओझा और स्वामी अक्षयानंद सरस्वती। नेपथ्य में नंदी की प्रतिमा लिये ट्रक है।

इक्कीस तारीख को सुनील ओझा जी मुझे गड़ौली धाम परिसर में घूमते मिल गये। उन्होने कहा कि मेरे लिये वहां कोई भूमिका होनी चाहिये। वहां आने और घूम कर चित्र खींचने भर में इति नहीं होनी चाहिये। मैंने उन्हें अपने योगदान की बात कही – कि मैं ब्लॉग लेखन के माध्यम से गड़ौली धाम की गतिविधियों को लिखने में अपना योगदान दे सकता हूं। मुझे प्रसन्नता हुई कि ओझा जी ने इसे महत्वहीन कार्य समझ कर खारिज नहीं किया। तो अगामी समय में गड़ौली धाम के साकार होने की प्रक्रिया को ब्लॉग पर प्रस्तुत करूंगा।

अगले साल भर मुझे नित्य 2-3 घण्टे गड़ौली धाम की गतिविधियां देखने, उसके बारे में अतिरिक्त जानकारी जुटाने और लिखने के लिये अपने विचारों को व्यवस्थित करने में मेहनत करनी पड़ेगी। अभी हाल ही में मैने एक कांवर पदयात्री की यात्रा का वृत्तांत लिखने में जो जुनून से लगाव महसूस किया; उससे गड़ौली धाम के बारे में लेखन कम मेहनत लेगा – वैसा मुझे लगता नहीं है। यह भी एक परियोजना के साकार होने का यात्रा वृतांत ही होगा!

अब देखता हूं कि मैं क्या कर पाता हूं! :smile:


शैलेश पाण्डेय ने मुझे गड़ौली धाम की जानकारी के बारे में जारी एक पुस्तिका की पीडीएफ प्रति दी। छप्पन पेज की यह पुस्तिका प्रॉजेक्ट की मूल अवधारणा प्रस्तुत करती है। मैं उस पुस्तिका/ब्रोशर को नीचे प्रस्तुत कर रहा हूं। एक एक पेज में चित्र हैं और कुछ लेखन। वह गड़ौली धाम से पहला परिचय देने के लिये बहुत सटीक है।

(गड़ौली धाम, काशी क्षेत्र की ई-पुस्तिका/ब्रोशर अगर ब्राउजर में स्क्रॉल करने के लिये न दिख रही हो तो कृपया डाउनलोड बटन क्लिक कर डाउनलोड करें। अधिकांश मोबाइल/टैब पीडीफ डॉक्यूमेण्ट Embedded नहीं दिखाते।)

पुस्तिका के प्रारम्भ में सुनील ओझा जी का कथन है। उनके शब्द हैंं- “आत्मीय जनों; सेना के एक टेण्ट से, प्रथम नवरात्रि को प्रारम्भ परिकल्पना को मूर्त रूप लेते देख रहा हूं, तो यह मुझे किसी दिव्य दैवीय योजना की परिणति का आभास कराती है। गौ, गंगा, गौरीशंकर का पावन आह्वान, माँ विंध्यवासिनी और माँ गंगा का सानिध्य गड़ौली धाम को एक अलौकिक आभा प्रदान करता है, जहां आध्यात्म, विज्ञान, मौलिक चिंतन, परम्पराओं और पद्धातियोंं का अद्भुत क्रियान्वयन हम देख और आत्मसात कर पाते हैं। इस दिव्यता में तथा इस विस्तृत परिवार में मैं आपका हृदय से स्वागत करता हूं।”

“अलौकिक आभा”, “आध्यात्म, विज्ञान, मौलिक चिंतन, परम्पराओं और पद्धातियोंं का अद्भुत क्रियान्वयन” – यह सब मैं पिछले कुछ महीनों में सवेरे की उस स्थान की साइकिल से सैर में धीरे धीरे पनपते देखता रहा हूं। सवेरे सात आठ बजे वहां “सेना का टेण्ट” उसमें आरती करते सतीश, निर्बाध विचरते नीलगाय, कुछ काम करते लोग/मजदूर भर हुआ करते थे। धीरे धीरे गतिविधियां बढ़ीं। एक दिन सतीश ने बताया कि बापू जी (सुनील ओझा जी) ने शाम गंगा आरती प्रारम्भ करने को कहा है। सतीश ही वह करने लगे। भयंकर शीत में भी गंगा आरती होती रही। एक परम्परा बनी।

मैंने आसपास के गांवों के लोगों को जोड़ने की चेष्ठा भी देखी। आसपास गांवों घूमते हुये लोगों से बातचीत में उनकी अपेक्षायें, आशंकायें और (सहज) ईर्ष्या, परनिंदा और छुद्र कुटिलता के भी दर्शन हुये। पर सभी यह जरूर समझ रहे थे कि कुछ अनूठा होने जा रहा है, जो इस अलसाये ग्रामीण परिवेश में अत्यधिक बदलाव लायेगा।

शीत बढ़ा तो मेरा वहां जाना कम हो गया। फिर लगभग महीने भर तो जाना हुआ ही नहीं। अचानक 18 फरवरी को सतीश सिन्ह का फोन आया – बाबूजी, दस गायें आ गयी हैं। आप जरा आइये।

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Gadauli Dham गड़ौली धाम

उस दिन शैलेश पाण्डेय के साथ शाम के समय गड़ौली धाम पंहुचा। साहीवाल गायें – भूरी रंग की वहां आ गयी थीं। उनके साथ उनके बछड़े-बछियां भी थे। एक गाय तो वहां आने के बाद ही बच्चा जनी। आश्चर्य और आनंद का वातावरण था। बहुत शुभ माना जा रहा था यह।

इस गाय ने इसी परिसर में आगमन के दिन ही बच्चा जना।

गायों के साथ आये दो कर्मी उनकी देखभाल कर रहे थे। गायों के लिये शेड तैयार हो रहा था। गाय के साथ बंसी बजाते कृष्ण भगवान की भव्य प्रतिमा ट्रक से अनलोड हो रही थी। उसी ट्रक में बड़े आकार के नन्दी की प्रतिमा आयी थी। अगले तीन दिन के समारोह की पूर्व तैयारी चल रही थी।

ढलते संझा के सूरज की रोशनी में वह सब बहुत मोहक था!

एक सज्जन मधुकर चित्रांश जी की शादी की सालगिरह थी। उन सज्जन और उनकी पत्नी को गंगा तट पर जा कर एक लोटा आयी हुई गायों का दूध गंगाजी को चढ़ाने के लिये कहा सुनील ओझा जी ने। उसके बाद अंगरेजी तरीके से उन दोनो ने केक भी काटा। आश्रम से जुड़े स्वामी जी – स्वामी अक्षयानंद सरस्वती जी ने संस्कृत में उनको आशीर्वाद भी दिया। ऐसी अनूठी सालगिरह को मधुकर दम्पति कभी भूल नहीं पायेंगे। गड़ौली धाम के साथ उनका जुड़ाव भी सम्भवत: स्थाई रहे।

मधुकर दम्पति की सालगिरह मनी।

गायों का आगमन, लोगों की उपस्थिति, श्रीकृष्ण की प्रतिमा का लगाया जाना और नंदी प्रतिमा का परिसर में आना – यह सब कल्पना से मूर्त रूप में साकार होते हुये देखने के हम साक्षी बन रहे थे। आगे जो भी कुछ होता है, मां सरस्वती की प्रेरणा से जो भी सृजन होता है; उसे भी नियमित देख कर लिखने और प्रस्तुत करने की चेष्ठा रहेगी मेरी। वैसे पहले ही Gadauli Dham वर्ग में सात पोस्टें ब्लॉग पर जा चुकी हैं जो यहां से पहले के जुड़ाव को दर्शाती हैं। आगे यह संख्या जल्दी बढ़ने लगेगी।

गौ गंगा गौरीशंकर की जय! जय श्रीकृष्ण। हर हर महादेव!

गड़ौली धाम की महुआरी में गायें, लोग और श्रीकृष्ण की प्रतिमा लगाने का प्लेटफार्म। नेपथ्य में यज्ञशाला की कुटी दिख रही है जहां यज्ञ कर महादेव की प्रतिमा स्थापित की गयी थी।

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