लॉक डाउन : महा भीर बैन्कन के द्वारे


तुलसी बाबा की चौपाई है – महा भीर भूपति के द्वारे, रज होई जाई पसान पोवारे। (राजा के द्वार पर भारी भीड़। शिलाखण्ड भी फैंका जाये तो भीड़ में पिस कर मिट्टी बन जाये)। आजकल बैंकों की ग्रामीण शाखाओं में वैसा ही माहौल है।

सरकार ने पैसा दिया है ग्रामीणों, गरीबों को। अपने मुड़े तुड़े बैंक के पासबुक लिये ग्रामीण बैंक के सामने लाइन लगा रहे हैं। हर एक ब्रांच के बाहर वही दृष्य है। कुछ दिन तो घोर अव्यवस्था/अराजकता थी। अब बैंक की सिक्यूरिटी वाले सोशल डिस्टटेंसिंग के नॉर्म के आधार पर गोले खींच कर उसमें बैठने के लिये अनुशासित कर रहे हैं लोगों को।

बैंक के बाहर दूरी बना कर अपने अपने गोले में खड़े लोग-लुगाई
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लॉकडाउन : रीता पाण्डेय के मानसिक थकान मिटाने के उपाय – भाग 2



हाल ही में पोस्ट लिखी थी – कोरोना की मानसिक थकान दूर करने के काम। वे काम आगे भी चलते चले जा रहे हैं। खड़ंजा बनाने के लिये खरीदा गया बालू और सीमेण्ट कम पड़ गया। असल में पत्नीजी से स्कोप ऑफ़ वर्क ही बढ़ा दिया। पन्द्रह बीस परसेण्ट नहीं, लगभग डबल कर दिया खड़ंजेे का एरिया।

वे कोरोना काल की नेगेटिव खबरों से उपजी मानसिक निस्सारता को मिटाने के लिये इतनी आतुर हैं कि मैने खर्च में कोई कतर ब्यौंत का साहस ही नहीं किया।

एक ट्रॉली बालू और मंगवाया। बालू गीला था। उसमें घर बनाना या उससे कोई मूर्ति बनाना बच्चों को बहुत रुचता है। घर में किसी खिलौने की बजाय अगर एक अखाड़ा बनाया जाये जिसमें बालू का ढेर हो तो बच्चे उसी में मगन रह सकते हैं। चीनी पांड़े (पद्मजा पाण्डेय) उसी में शिवलिंग बनाने में व्यस्त हो गयी – “दादी, रामचन्द्र जी ने रावन को हराने के लिये इसी तरह शंकर भगवान की पूजा की थी, न?”

“दादी, रामचन्द्र जी ने रावन को हराने के लिये इसी तरह शंकर भगवान की पूजा की थी, न?” – चिन्ना पांड़े
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नदी का जल सचमुच साफ हुआ है



नदी यानी गंगा नदी। मेरे घर से कौआ की उड़ान के हिसाब से 2 किलोमीटर दूर। बड़ा फ्रीक्वेण्ट आना जाना है द्वारिकापुर के गंगा तट पर। स्नान नहीं करता गंगा में, पर दिखता तो है ही कि जल कैसा है।

गंगाजल वास्तव में साफ कहा जा सकता है। निर्मल।

उत्तरोत्तर सरकारों ने बहुत पैसा खर्च किया। गंगा जी के नाम पर बहुत भ्रष्टाचार भी हुआ। पर अंततः कोरोना वायरस को लेकर मानव जाति के भय के कारण निर्मल हो पाया गंगाजल।

गंगा किनारे राजन भाई
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