विष्णु मल्लाह – बैकर मछरी पकड़े बा!

किसान की तरह मल्लाह भी मार्केट की चाल से मात खाता है। यहां यह जरूर था कि तुरत-फुरत उसे रोकड़ा मिल जा रहा था। किसानी में वह भी नहीं होता।


द्वारिकापुर टीले पर बटोही (साइकिल) खड़ी कर ताला लगाया तो दूर लोग दिखे – एक डोंगी और कुछ लोग। कयास लगाया – जरूर मछली खरीदने वाले होंगे। मैं अपने गठियाग्रस्त पैरों से धीरे धीरे चलता वहां पंहुचा। एक व्यक्ति, जाल से मछलियां निकाल रहा था। मुझे देख बोला – आवअ साहेब। आज एकर फोटो खींचअ। बैकर मछरी पकड़े बा। (आओ साहेब, इसकी फोटो खींचो। आज बैकर मछलियां पकड़ी हैं इसने।)।

दृष्य समझ आया। एक किशोर वय मल्लाह ने जाल बिछा कर मछलियां पकड़ी हैं। खरीदने वाले तीन थे। दो उसकी सहायता कर रहे थे जाल से मछलियां निकालने में। एक किनारे बैठा इन्तजार कर रहा था। उसे मात्र एक किलो मछली चाहिये थी घर में खाने के लिये। बाकी दोनो दुकानदार थे। जितनी मिल जाये, उतनी खरीदने वाले।

मल्लाह किशोर, दायें और मछली के दो खरीददार जाल से मछलियां निकालते हुये।

लड़का रात चार बजे उठा था मछली मारने। पांच बजे जाल लगाया था। ठीक ठाक मात्रा में मछलियां मिली आज। अब बेच कर घर जा सोने की जल्दी थी उसे। इस लिये उसकी सहायता के लिये दोनो खरीददार जल्दी जल्दी मछलियां निकलवा रहे थे।

सफ़ेद कमीज वाला कह रहा था – तोहरे बदे त ट्रेन गाड़ी रुकी रहअ थ। (तुम्हारे लिये तो ट्रेन गाड़ी रुकी रहती है।)

जिस व्यक्ति ने मुझे फोटो खींचने का निमन्त्रण दिया था, वह मुझे जानता था – तोहरे बदे त ट्रेन गाड़ी रुकी रहअ थ। (तुम्हारे लिये तो ट्रेन गाड़ी रुकी रहती है।)। मैने उसे करेक्ट किया कि अब मैं रिटायर हो गया हूं। अब ऐसी कोई सम्भावना नहीं है। पर उसने स्वीकार नहीं किया – तबऊ जलवा होये! (तब भी जलवा होगा)।

मैने उसका प्रतिवाद नहीं किया। लड़के से मछली मारने के बारे में पूछने लगा। जेब से छोटी नोटबुक और कलम निकाल ली थी। इस बीच एक चौथा ग्राहक भी आकर लड़के की मदद करने लगा।

चौथा ग्राहक सीन में अवतरित हुआ। सब देख कर बोला – आप इतना पूछ रहे हैं। लिख भी रहे हैं। इस सब से तो इसकी ** फट रही है साहब। क्या पता किसी कानून में धर लिया जाये कि क्यों मछली मार रहा है।

लड़का मेरे प्रश्नों के जवाब देने से कतरा रहा था। चौथा ग्राहक बोला – आप इतना पूछ रहे हैं। लिख भी रहे हैं। इस सब से तो इसकी ** फट रही है साहब। क्या पता किसी कानून में धर लिया जाये कि क्यों मछली मार रहा है।

कुछ देर मुझसे बात करने के बाद लड़का कुछ आश्वस्त दिखा। आपस में उन सब की चुहुल बाजी चल रही थी। लड़के ने बताया कि उसका नाम विष्णु है। गंगा उस पार सिंनहर गांव में रहता है। मछली मारने में मेहनत तो बहुत है। इस पर पहले ग्राहक ने जोड़ा – हां साहेब, मेहनत इसकी है, बेचने में पसीना हमारा है। हम दोनों मिल कर यह काम करते हैं। इसको फिक्र ज्यादा से ज्यादा मछली पकड़ने की है। हमें खरीदने और दुकान में बेचने की जुगत करनी होती है।

चौथे ग्राहक ने कहा – इसकी बात पर मत जाइये साहब। यह गिद्धराज है। पसीना वसीना नहीं बहाता यह। 🙂

लड़का मेरे प्रश्नों के जवाब देने से कतरा रहा था। चौथा ग्राहक बोला – आप इतना पूछ रहे हैं। लिख भी रहे हैं। इस सब से तो इसकी ** फट रही है साहब। क्या पता किसी कानून में धर लिया जाये कि क्यों मछली मार रहा है।

लड़का अपने जाल के बारे में बता रहा था – “यह नया जाल है। जाल तो साढ़े तीन सौ का भी आता है और हजार का भी। कोई जाल महीना भर चलता है, कोई साल भर भी चल जाता है। कोई गलत मछली आ जाये तो एक ही दिन में चीर देती है।… अलग अलग मछली के लिये अलग अलग जाल लगाना होता है। दोपहर में वह टेंगर मछली पकड़ेगा। उसके लिये अलग जाल ले कर आयेगा। जाल भी सीधे खरीद कर इस्तेमाल नहीं किया जाता। उसे अपनी जरूरत के मुताबिक तैयार करना होता है। जाल तैयार करना, मछली पकड़ना भर ही काम है उसका। बाकी, जितनी पकड़लेगा; वह सब बिक जायेगी। खरीदने वाले ये सब हैं ही।”

मछलियां जाल से लगभग निकोली जा चुकीं।

मैने देखा कि यद्यपि वह खुश है अपनी सभी मछलियां बेच कर; पर उसे वाजिब दाम तो नहीं ही मिलता। सभी मछलियां निकालने के बाद खरीददार खरीद रहे थे पर जितना रेट के हिसाब से कीमत बनती थी, उससे दस पांच कम ही दे रहे थे और एक आध मछली ज्यादा ही ले जा रहे थे। फिश-मार्केट की बार्गेनिंग का दृष्य था और लड़का इसमें बुरी तरह मात खा रहा था। पर उसे बहुत दुख नहीं हो रहा था इस बात का।

किसान की तरह मल्लाह भी मार्केट की चाल से मात खाता है। यहां यह जरूर था कि तुरत-फुरत उसे रोकड़ा मिल जा रहा था। किसानी में वह भी नहीं होता।

सभी मछलियां तुल गयीं। झिक झिक के बाद जो पैसे मिलने थे, मिल गये लड़के को। आज मछलियां काफ़ी थीं, इसलिये ग्राहकों में भी बटंवारा आसानी से हो गया।

लड़के के हाथ में एक मछली का कांटा चुभ गया है। उसे ले कर वह कुछ व्यग्र है, पर अधिक नहीं। ग्राहक मछली खरीद कर चले गये। वह खुश है आज का काम खतम कर। अब गंगा उसपार घर जा कर सोयेगा।

जब वह अपनी पतवार संभालने लगा तो मैने कहा – आज तो नहीं, गंगा उस पार तक कभी घुमा लाओगे मुझे?

पर वह तुरंत उस पार घुमाने को तैयार था। मैं नाव से उस पार गया। … उसका विवरण एक और पोस्ट में।


यह फेसबुक नोट्स से ब्लॉग पर सहेजी पोस्ट है। फेसबुक ने अपने नोट्स को फेज आउट कर दिया, इसलिये पोस्ट्स वहां से हटा कर यहांं रखनी पड़ीं। नोट्स में यह पोस्ट नवम्बर 2017 की है।


कसवारू गोंण का मछली मारने का जुनून

75+ साल (देखने में 55-65 के बीच), 35 किमी मॉपेड चला कर बंसीं से मछली पकड़ने के लिये गंगा किनारे आना! और एक दिन नहीं; नित्यप्रति! अत्यन्त विस्मयादिबोधक! केवल तुम ही नहीं हो उलट खोपड़ी के जीव पण्डित ज्ञानदत्त!


नदी किनारे मिले कसवारू गोंण। किसी नाव पर नहीं थे। मॉपेड से आये थे। मुझे लगा कि सवेरे सवेरे मल्लाहों से मछली खरीदने वाले होंगे, जो यहां से मछली खरीद कर चौरी/महराजगंज बाजार में बेचते हैं।

पर कसवारू ने जो बताया वह आश्चर्य में डालने वाला था। वे धौकलगंज (यहां से करीब 35 किलोमीटर दूर) से आये हैं। मछली पकड़ने। सवेरे का समय था। साढ़े पांच बजे।


(जून 10. 2017 को फेसबुक-नोट्स पर पब्लिश की गयी पोस्ट)



दूर से कसवारू गोंण और उनकी मॉपेड का चित्र

इस जगह पर नदी (गंगा माई) के समीप मैं आता हूं। पांच बजे भोर में घर से निकल लेता हूं। नदी की बहती धारा देखने और कुछ चित्र लेने का मोह सवेरे उठाता है और बटोही/राजन भाई के साथ इस जगह के लिये रवाना कर देता है। मैं 3.5 किलोमीटर दूर से आ रहा हूं पर यह बन्दा 35 किलोमीटर दूर से आ रहा है। कुछ मछलियां पकड़ने।

मुझसे दस गुना जुनूनी निकले कसवारू गोंण।

राजन भाई ने पूछा – “कितनी उम्र होगी? पचपन?”

देखने में वह व्यक्ति 60 के आसपास लगते थे।

कसवारू का उत्तर फिर आश्चर्य में डालने वाला था – छिहत्तर चलत बा हमार। सन बयालीस क पैदाईस बा। (छिहत्तर। सन 1942 की पैदाइश है मेरी।)।

मछली पकड़ते कसवारू गोंण

75+ साल (देखने में 55-65 के बीच), 35 किमी मॉपेड चला कर बंसीं से मछली पकड़ने के लिये गंगा किनारे आना! और एक दिन नहीं; नित्यप्रति! अत्यन्त विस्मयादिबोधक! जुनूनी होने के लिये किसी बड़ी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई या 6 अंकों की सेलरी वाली नौकरी करना जरूरी नहीं जीडी! केवल तुम ही नहीं हो उलट खोपड़ी के जीव पण्डित ज्ञानदत्त!

कसवारू गोंण ने बताया कि सवेरे जब पहली अजान होती है मस्जिद में, तब वे निकल लेते हैं। किसी दिन 2 किलो, किसी-किसी दिन 15-20 किलो तक मिल जाती है मछली। आजकल ठीक ठाक मिल जा रही है। अभी दो दिन पहले सात किलो की पहिना पकड़ी थी।

“पहिना क्या?”

मछरी। कतउं बरारी कहत हयें ओके। (मछली। कहीं कहीं बरारी भी कहते हैं उसे। )

कसवारू जिस तरह से बात कर रहे थे, वह प्रभावित करने वाला था। शरीर में भी कहीं बुढ़ापे की लाचारी नहीं थी। छरहरा कसा शरीर। वैसी ही आवाज और वैसा ही आत्मविश्वास। साफ कपड़े और सिर पर सुगढ़ता से बांधी पगड़ी। क्लीन शेव और अपने गंवई वेश में भी टिप-टॉप!

बिना समय गंवाये कसवारू अपनी जगह तलाशने और कांटा लगाने में जुट गये। अपनी धोती भगई की तरह बांध ली थी उन्होने। काम के लिये तैयार।

हमारे पास आज समय कम था। सो लौट चले। वर्ना उनसे और बातचीत करने का मन था। वापसी में कसवारू की तंदुरुस्ती के राज पर कयास लगाया – रोज मछली खाता है, शायद इस कारण से!

देखें, फिर कभी मिलते हैं कसवारू या नहीं!

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गोंण जाति के बारे में राजन भाई ने बताया कि कंहार होते हैं वे। खानदानी पेशा कुंये से पानी भरने और पालकी ले कर चलने का था। जमींदारों के भृत्य। अब तो अनेकानेक काम करते हैं।