हरिश्चंद्र – आम जिन्दगी का हीरो



आपकी आँखें पारखी हों तो आम जिन्दगी में हीरो नजर आ जाते हैं. च्यवनप्राश और नवरतन तेल बेचने वाले बौने लगते है. अदना सा मिस्त्री आपको बहुत सिखा सकता है. गीता का कर्म योग वास्तव के मंच पर घटित होता दीखता है.

आपकी आँखों मे परख हो, बस!

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भरतलाल की सगाई



भरतलाल शर्मा मेरा सरकारी भृत्य है. उसकी अस्थाई नौकरी लगते ही गांव-देस में उसकी इज्जत बढ गई. पांच हजार की पगार की स्लिप उसने गर्व से सबको दिखाई. सब परिजन-दुर्जन कर्जा मांगने में जुट गये. उसके भाई जो उससे बेगार कराते थे और उसकी सारी मजदूरी हड़प जाते थे, अब उससे हक से/बेहक से पैसा मांगने लगे. बिना मां-बाप का भरतलाल इतना अटेंशन पाकर कुप्पा होगया. लिहाजा बचत का बड़ा हिस्सा धर्मादे में जाने लगा. जो कर्जा उसने दिया उसे कोई चुकाने का नाम ही नही लेता.

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शेयर मार्केट धड़ाम



उधर चिदंबरम जी बजट भाषण की तैयारी कर रहे थे, इधर शेयर मार्केट दुबला हुआ जा रहा था. मुन्ना का कहना सही है – भैया, बहुत से दिन सांड़ों के होते हैं; कभी कभी तो भालुओं की भी चांदी कटनी चाहिये. मुन्ना धुर आशावादी है. मैं शेयर मार्केट के बारे में बात कर आशावाद का टानिक उससे लेता हूं. मेरा शेयर मार्केट में ज्यादा स्टेक नहीं है, सो थोडा बहुत तात्कालिक घाटा आशावाद के टानिक के लिये अच्छा है. मुन्ना से बात कर मैं अपने स्टॉक की नैसर्गिक मजबूती के बारे में आश्वस्त हो कर ’मस्त’ हो जाता हूं. बजट की चीर फाड़ की जहमत नहीं उठाता.Continue reading “शेयर मार्केट धड़ाम”

‘अहो रूपम – अहो ध्वनि’, चमगादड और हिन्दी के चिट्ठे



इंटरनेट की जाली पर कई अलग अलग समूहों मे अनेक प्रजातियों के चमगादड़ लटक रहे हैं. ये चमगादड़ तेजी से फल फूल रहे हैं. इनमें से एक प्रजाति हिंन्दी के चिट्ठाकारों की है. उनकी कालोनी का दर्शन मै पिछले दो दिनों से कर रहा हूं.

ये चमगादड़ बुद्धिमान टाइप के हैं. आपस में ‘अहो रूपम – अहो ध्वनि’ के आलाप के साथ अपनी, जो भी कमजोरियां हों, उनपर से ध्यान हटा रहे हैं. परस्पर प्रशंसा के साथ एक दूसरे की साइट पर क्लिक करने का खेल भी खेल रहे हैं. अपनी साइट कैसे चमकाई जाये कि वह ज्यादा क्लिक हो सके, उसके लिये एक दूसरे का माल चुरा कर अपने चिट्ठे पर चस्पां करने का रोग भी कुछ में है.

इंटरनेट पर दुकान जमाने में खर्चा नहीं लगता. ब्लॉग की फेसीलीटी ने सबको अवसर दे दिये हैं. बीएसएनल की मदद से ब्राडबेण्ड भी सस्ता हो गया है. सो हिन्दी के चिट्ठाकार चमगादडों की प्रजाति बागबाग हो कर फल फूल रही है. कल तक जो अखबार-पत्रिकाओं में छपास के लिये परेशान रहते थे, वे आज इंटरनेट पर फोकट में छप ले रहे हैं. अब छपास के स्थान पर रोग ‘पढ़ास’ का हो गया है. कितने लोग ब्लॉग पढ रहे हैं, यह नापने के लिये चिट्ठाकारों ने अपने ब्लॉग पर काउंटर भी चिपका रखे हैं.

ज्यादातर इस प्रजाति में फुटकर लेखन वाले ही हैं. ज्ञान-विज्ञान के एक हिन्दी ब्लॉग पर लेटेस्ट एंट्री 2005 की है. अर्थशास्त्र पर कोई गम्भीर चिट्ठा नहीं है हिन्दी में. हिन्दी जानने वाले के पास अगर अर्थशास्त्र की समझ है तो वह स्टाक मार्केट में पैसा बनायेगा या हिन्दी के यूनीकोड से जूझेगा? विषेशज्ञों के ब्लॉग हिन्दी में आने में शायद समय लगेगा. अभी तो ‘जनसत्ता’ के पतन के बाद ‘अजदक’ छाप अच्छे लेखन से वंचित लोगों को सहूलियत मिल गई है हिन्दी के चिट्ठों से. मजा आता है उसे पढने में.

गेदुरा (चमगादड) के मेहमान आये तो ज्यादा से ज्यादा वे भी एक डाल पकड कर लटक जायेंगे. आप भी एक ब्लॉग बनाइये और घुस जाइये गेदुरा की प्रजाति में. अपन तो गेस्ट आर्टिस्ट है. यदा कदा चिपकाते रहेंगे अपना चिट्ठा…


दीनदयाल बिरद संभारी


अवसाद से ग्रस्त होना, न पहले बडी बात थी, न अब है। हर आदमी कभी न कभी इस दुनिया के पचडे में फंस कर अपनी नींद और चैन खोता है। फिर अपने अखबार उसकी मदद को आते हैं। रोज छपने वाली – ‘गला रेत कर/स्ल्फास की मदद से/फांसी लगा कर मौतों की खबरें’ उसे प्रेरणा देती हैं। वह जीवन को खतम कर आवसाद से बचने का शॉर्ट कट बुनने लगता है।

ऐसे में मंत्र काम कर सकते हैं। मन्त्र जाप का अलग विज्ञान है। मैं विज्ञान शब्द का प्रयोग एक देसी बात को वजन देने के लिये नहीं कर रहा हूं। मंत्र आटो-सजेशन का काम करते हैं. जाप किसी बात या आइडिया को अंतस्थ करने में सहायक है।

अर्जुन विषादयोग का समाधान ‘मामेकं शरणमं व्रज:’ में है। अर्जुन के सामने कृष्ण उपस्थित थे। कृष्ण उसके आटो-सजेशन/रिपीटीशन को प्रोपेल कर रहे थे। हमारे पास वह सुविधा नहीं है। हमारे पास मंत्र जाप की सुविधा है। और मंत्र कोई संस्कृत का टंग-ट्विस्टर हो, यह कतई जरूरी नहीं। तुलसी बाबा का निम्न पद बहुत अच्छा काम कर सकता है :

दीन दयाल बिरद संभारी. हरहु नाथ मम संकट भारी.


अपडेट (फरवरी 4’ 2019) – यह पोस्ट 12 साल बाद देख रहा हूं। तेईस फरवरी 2007 की पोस्ट। ब्लॉग की पहली पोस्ट अवसाद से प्रारम्भ हो रही है। … यह प्रवचन नहीं था। आत्मकथ्य था। मैं स्वयम् तलाश कर रहा था अवसाद से उबरने के तरीके। एक दिनेश जी मिले थे नारायण आश्रम में। रिटायरमेण्ट के बाद उनकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। वे आश्रम में रहने और उसका अस्पताल मैनेज करने लगे थे। उन्होने मुझसे तुलसी बाबा की इस चौपाई की बात की थी।

चौपाई का प्रयोग, बतौर ऑटो सजेशन, मैने कुछ समय तक किया था। करीब दो साल तक रहा वह अवसाद का समय। और उससे उबारने में ब्लॉग के नियमित लेखन ने बहुत सहायता की।


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