आत्माराम तिवारी की अस्पताल के एमरजेंसी वार्ड में उड़द और गाय की चिंता



कूल्हे की हड्डी टूट गई है आत्माराम तिवारी जी की. उम्र भी चौरासी साल. सूर्या ट्रॉमा सेंटर के एमरजेंसी वार्ड में बिस्तर पर पड़े हैं. मेरे पिताजी के बगल में.

उनके साथ आए लोग तो उनकी उम्र 95 – 96 बताते हैं. पर उम्र इन्फ्लेट कर बताना तो इस इलाके की परम्परा है. वर्ना, उन्होंने खुद ही बताया कि सन 1995 में स्कूल मास्टरी से साठ साल की उम्र में रिटायर हुए थे. यूं चौरासी की उम्र भी कम नहीं होती. पर जो झांकी नब्बे पार का बताने में बनती है, वह ज्यादा सुकून दायक होती है. महिला की उम्र कम और वृद्ध की ज्यादा बताने की परम्परा शायद भारतीय ही नहीं, वैश्विक है.

खैर, उम्र की बात छोड़ आत्माराम जी के वर्तमान की बात की जाए. उनकी कूल्हे की हड्डी टूटी है पर वे पूरी तरह चैतन्य हैं. स्कूल मास्टर रह चुके हैं तो बोलने में उनका हाथ खुला है. पर्याप्त. लगभग अनवरत बोलते हैं.

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24 सितंबर, पुष्य नक्षत्र, स्वर्ण प्राशन



हम यहाँ सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल में हैं, पिताजी के यहां भर्ती होने के कारण.

अंदर ही बंद रहता हूं तो अंदाज नहीं लगता कि मौसम कितना खराब है. गंगाजी की बाढ़ की खबरें मिलती रहती हैं. कल तक तो बाढ़ पर ही थीं. कल ही क्वार मास में पुष्य नक्षत्र का संयोग था. स्वर्ण प्राशन का दिन.

पुष्य नक्षत्र के दिन ही प्राचीन काल में राज वैद राज्य के बच्चों को स्वर्ण भस्म (घी में मिला कर) चटाया करते थे. यह कृत्य 24 बार किया जाता था 16 वर्ष या उससे कम उम्र के बच्चों के साथ. स्वर्ण प्राशन का लाभ होता था बच्चे की रोग प्रतिरोध क्षमता और मेधा के विकास में.

यह पुनः प्रारंभ किया है सूर्या चाइल्ड हॉस्पिटल के डाक्टर दंपति शर्मिला और संतोष तिवारी ने. और थोड़े ही समय में 1700 के आसपास बच्चों का इसके लिए पंजीकरण हो गया है.

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बुआ का इनारा का झोलाछाप गायनिक डाक्टर और बिगड़ा हुआ केस



डाक्टर साहब बताते हैं कि कि पास में कोई क्वैक (नीम हकीम) डाक्टर है जो प्रसव कराता (कराती) है. उसके दो तीन खराब किए केस यहां अस्पताल (सूर्या ट्रॉमा सेंटर) में आए हैं.

मेरे पिताजी के बगल वाले बिस्तर पर इमर्जेंसी वार्ड में है वह महिला. पतली दुबली. साँवली – शायद उसकी श्यामलता में तांबे का रंग मिला है. चेहरे की बनावट आकर्षक है. आंखे बहुत कातर. बछिया की आँखों जैसी. उसके बिस्तर के पास एक अधेड़ महिला खड़ी है. मैं अपनी पत्नी जी से कहता हूँ कि उस महिला से पूछें की कैसा केस है.

महिला बताती है कि वह मरीज की मां है. मरीज की डिलिवरी के लिए ससुराल वाले बुआ के इनारा (पास का कोई स्थान) पर एक डाक्टर के यहां ले गए थे. बच्चा तो हो गया पर दस मिनट में ही कोई नस दबने से उनकी बेटी दर्द से छटपटाने लगी. जब केस बिगड़ गया तो वह अपने घर बाबू सराय से आ कर यहां सूर्या ट्रॉमा सेंटर में ले कर आई है.

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