अंगद दास त्यागी, लम्बी जटाओं वाला साधू #गांवकाचिठ्ठा #ग्रामचरित

साइकिल पर चलता अपनी लम्बाई से ज्यादा लम्बे केश वाला जटाजूट धारी साधू। यह देश विचित्रताओं से भरा है। और वे विचित्रतायें कहीं दूर दराज जंगल-झाड़ी-खोह में नहीं हैं। हमारे आसपास हैं।


जून 01, 20, विक्रमपुर भदोही।

उस लम्बी जटाओं वाले साधू के विषय में जिज्ञासा बनी हुई थी। अगले दिन सवेरेे मैं गंगा किनारे कुछ जल्दी ही चला गया था। द्वारिकापुर तट पर चहलकदमी कर रहा था कि वह साधू दूर से आता दिखा। जिस स्थान पर वह जा रहा था – पहले दिन की स्नान वाली जगह – उसी ओर मैं चल पड़ा। साधू चित्र खींचने का मेरा ध्येय समझ गया। घाट पर उसकी सामान्य गतिविधियां जारी रहीं पर मेरे विषय में भी वह सजग रहा।

दूर से देखा मैंने उस साधू को आते हुये।

गंगा तट पर उसके तीन चार चित्र लिये। वह अपना कमण्डल मांजने लगा था। चित्र लेते लेते मैंने पूछा – ये बाल कितने साल से बढ़ा रखे हैं आपने ?

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गाँव के संदर्भ में लॉकडाउन क्या है?

लॉकडाउन तो तब कहा जाये जब घर ऐसा हो, जिसपर लॉक हो/लग सकता हो। गांव में वैसे घर गिनती के हैं।



लॉकडाउन से लोग समझ रहे हैँ अपने फ्लैट में टेलीवीजन के सामने, किचन में नये व्यंजन का प्रयोग करते, मेडिटेशन करते या किताब पढ़ते बंद लोग। फ्लैट का एक दरवाजा होता है। वह दरवाजा बंद यानी लॉकडाउन।

गांव का दृष्य : घर और बाहर की सीमायें कहां हैं?

गांव में वह दरवाजा कहां है? यहां प्रधानमंत्री आवास योजना में बने एक या दो कमरे हैं। उनसे अलग बना शौचालय। वहीं बाहर कहीं हैण्डपम्प। कमरे के बाहर गाय-बकरी – यहां तक कि घोड़ा भी बंधे हैं। उसके साथ जाती है गांव की सड़क। जिसपर अगर डामर बिछा है,या खडंजा है तो औरतें उसी पर कपड़े भी कचारती हैं। उसी किनारे उपले पाथती हैं। उपडऊर भी वहीं बना होता है मानो उपलों का शिवलिंग हो। यही नहीं, घर के आसपास खेत, जिसमें वह परिवार स्वामित्व के आधार पर या अधियरे के रूप में, खेती करता है, वह भी घर का ही एक्स्टेंशन होता है। और वह एक्स्टेंशन दूसरों के घर/एक्स्टेंशन से गुत्थमगुत्था हुआ होता है।

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रवींद्रनाथ दुबे – एन.आर.वी. और शहर-गांव का द्वंद्व

रवींद्रनाथ जी अपने गांव से हर समय किसी न किसी प्रकार जुड़े रहे हैं। वे मेरी तरह “बाहरी” नहीं हैं।


अगर एन.आर.आई. होते हैं – नॉन रेजिडेण्ट इण्डियन तो वे लोग जो गांव छोड़ कर लम्बे अर्से से मेट्रो शहरों में रहने लग गये हों और जिनकी अगली पीढ़ी वहीं पली-बढ़ी हो; वहीं के सपने देखती हो; वहीं के आचार-विचार-व्यवहार जीती हो; उन लोगों को एन.आर.वी. – नॉन रेजिडेण्ट विलेजर (Non Resident Villager) कहा जा सकता है। इस गांव के श्री रवींद्रनाथ दुबे जी को उस श्रेणी में रखा जा सकता है।

श्री रवींद्रनाथ (सुभाष) दुबे जी

आज रवींद्रनाथ जी गांव (विक्रमपुर) से लसमणा की प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क पर सवेरे की सैर करते मिल गये। मैँ साइकिल से वापस लौट रहा था और वे आगे जा रहे थे। बोले कि बड़े डरते डरते घर से निकले हैं। हाइवे पर उन्हे आशंका थी कि कोरोनावायरस सम्बंधी लॉकडाउन में कहीं कोई पुलीस वाला न मिले और अपनी लाठी के जोर पर अभद्रता न कर बैठे। उनके पास एक बढ़िया चमकती बेंत वाली छड़ी थी। पैण्ट और बंडी पहने थे। साफ और सुरुचिपूर्ण वेश। उनका चेहरा सवेरे की सूरज की रोशनी में चमक रहा था। वे अत्यंत शरीफ और सरल लगते हैं। बहुत ही प्रिय और मोहक व्यक्तित्व है उनका।

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अतिवृष्टि और गांव की क्राइसिस

गांव में आधा दर्जन लोग प्रधानी का चुनाव लड़ने का ताल ठोंक रहे हैं. पर इस क्राइसिस के अवसर पर उनकी आवाज सुनने में नहीं आती.



आज अस्पताल से एक घंटे के लिए अपने घर जा कर आया. गांव में रहता हूं और अतिवृष्टि के कारण गांव बड़ी विपत्ति में है. फसलें (धान के अलावा) नष्ट हो गई हैं. रास्ता झील बन गया है. नयी रेल पटरी के फार्मेशन के ऊपर से घर पंहुचा. और बारिश हुई तो यह लिंक भी कट जाएगा.

पानी बरसना रुक ही नहीं रहा. रास्ते बंद हो गए हैं और गांव कट गए हैं. चित्र पुराना है. पर आज सप्ताह भर बाद हालत और भी खराब हुई है.

गांव में आधा दर्जन लोग प्रधानी का चुनाव लड़ने का ताल ठोंक रहे हैं. आए दिन लोगों को दाल बाटी खिलाते हैं. पर इस क्राइसिस के अवसर पर उनकी आवाज सुनने में नहीं आती. रास्ता खोलने के लिए कोई युक्ति, कोई पहल लेने वाला नहीं है.

आधी शताब्दी पहले गांव वाले खुद खड़े होते थे. कहीं मिट्टी काट कर पानी के लिए रास्ता बनाते थे और कहीं मिट्टी पत्थर अड़ा कर बंधा बना पानी रोकते थे. उपमन्यु भारत में ही पैदा हुआ था. पर अब सब सरकार को कोसने का खेल खेलते हैं… और सरकार पहले भी निकम्मी थी, अब भी है.

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अतिवृष्टि की सुबह, अस्पताल में

क्वार महीने का आधा खतम हो रहा है. कल अमावस्या है. कल श्राद्ध पक्ष समाप्त हो जाएगा. परसों नवरात्र प्रारंभ होगा. पर इस समय इतनी तेज बारिश पहले किसी साल हुई हो, याद नहीं पड़ता….



आज रात भर बारिश होती रही. अस्पताल के कमरे में जब भी रात में नींद खुली, और साठ की उम्र पार करने के बाद ब्लैडर की क्षमता कम हो जाने के कारण ज्यादा ही खुलती है, तेज बारिश की आवाज और खिड़की से यदा कदा बिजली की चमक का एहसास होता रहा.

सवेरे उठने के बाद चाय का बहुत इंतजार करना पड़ा. घर में हमारे ड्राइवर साहब नहीं आए थे. घर से वही चाय ले कर आते हैं.

हमारा घर वहां ब्राह्मणों की बस्ती से अलग चमरौटी और पसियान के बीचों-बीच है. अशोक, ड्राइवर साहब ब्राह्मण बस्ती में रहते हैं. बारिश इतनी हो रही थी कि मेरे घर तक आने का साहस और मन ही न बना पाए वे.

बारिश में भीगता अस्पताल का गार्ड.

यहां सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल में ऊपर बरसाती में कैंटीन है. मेरी पत्नीजी वहां भी हो कर आयीं. पता चला कि वहां दूध नहीं आया है. सो चाय नहीं बन सकती. बारिश में अस्पताल के बाहर किसी चाय की दुकान पर भीगते हुए जाने का साहस हममें नहीं था.

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