भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
सही मौसम है शॉल की फेरीवालों का। गोरखपुर में तिब्बत बाजार और कलकत्ता बाजार में सामान मिलता है सर्दियों के लिये। स्वेटर, जैकेट, गाउन, शॉल आदि। नेपाली या तिब्बती अपने मोन्गोलॉइड चेहरों का ट्रेडमार्क लिये फ़ेरी लगा कर भी बेचते हैं गर्म कपड़े। आज मैने रिक्शा पर कश्मीरी जवान लोगों को भी शॉल बेचते देखा।
रविवार के दिन एक पुस्तक ले कर बैठा था बाहर धूप में। बीच बीच में साइकल भी चला ले रहा था। सड़क पर ये दो दिखे। एक रिक्शा चला रहा था और ’पश्मिन् शॉल वाले’ की आवाज भी लगा रहा था। रिक्शे में शॉल के गठ्ठर लदे थे। दूसरा रिक्शे के पीछे चल रहा था। फ़ेरी लगाने का एक उत्कृष्ट मॉडल। रिक्शा उन्होने किराये पर लिया था। खुद चला रहे थे। पीछे चलता फ़ेरीवाला यह निगाह भी रख रहा था कि कोई गठ्ठर खिसका न ले। उनमें से एक रेलवे के बंगलों में गेट खोल कर जा कर लोगों को आकर्षित कर रहा था और दूसरा बाहर रिक्शे पर लदे सामान के साथ रहता था।
सामान दिखाने और दाम बताने में आपसी छद्म लड़ाई का प्रहसन भी वे बखूबी कर रहे थे। उन्होने आर्ट आफ नेगोशियेशन्स की किताब नहीं पढ़ी होगी हर्ब कोहन की। पर उन्हें पढ़ने की जरूरत भी नहीं लगती थी।
साइकल चलाते हुये मैने कहा कि हमें खरीदना नहीं है। पर ’मेम सा’ब को पांच मिनट दिखाने के नाम पर उनमे से एक अन्दर आया और मेरी पत्नीजी ने अनमने पन से कहा कि चलो, दिखाओ। वे गेट खोल कर रिक्शा अन्दर ले आये। रिक्शे पर गठ्ठर देख मुझे लगा कि मोल भाव तो मैं नहीं कर सकता, पर चित्र अवश्य खींच सकता हूं। मैने साइकल चलाना छोड़ मोबाइल फोन का कैमरा संभाल लिया।
बहुत से शॉल दिखाये। देखनें में बहुत मंहगे नहीं थे। पर दाम बताये 3-4 हजार। पश्मीना बताया। मेरी पत्नीजी ने कहा कि ये सब लुधियाना के हैं। उन्होने बताया कि लद्दाखी उन लोगों को ऊन बेचते हैं और वे (अपना निवास बताया अनन्तनाग) ये शॉल बुनते थे। … उसी तर्ज पर बात जैसे भदोहिया फेरी वाले हमें रतलाम में सुनाया करते थे। … फलां ऊन, फलां डाई, फलाना टपटेल…
अनन्तनाग के नाम पर मैने कहा कि तुमारे यहां चुनाव चल रहे हैं और तुम यहां घूम रहे हो। उनको यह जानकारी थी कि वहां चुनाव हो रहे हैं। पर उस बारें में बहुत ज्यादा बात करनेकी बजाय शॉल बेचना उन्हे ज्यादा रुचिकर लग रहा था। वे कुछ ही दिन पहले गोरखपुर आये हैं। उनमें से बड़े वाले ने बताया कि वह यहीं आ रहा है सर्दियों में। पिछले छ साल से। तीन साढ़े तीन महीने यहां रह कर अपना सामान बेचते हैं वे लोग।
सौदा पटा नहीं। उन्होने भी प्रहसन किया और मेरी पत्नीजी-घर में काम करने वाली बुढ़िया की युगल टीम ने भी। एक सस्ता शॉल जो वे आठ सौ का कह रहे थे, तीन सौ में दे कर गये। पर दोनो पक्ष असंतुष्ट दिखे। पार्टिंग शॉट्स थे –
“बहुत टाइम खोटी हुआ।”
“मैने तो तुम लोगों को बुलाया नहीं था।”
“हम तो कस्टमर बनाना चाहते थे। इस साल आपने एक लिया तो अगले साल हमसे दस खरीदेंगे। यहीं, इसी जगह पर।”
“आप समझते हो, हम परदेसी हैं तो जो भाव बोलोगे उसी पर दे कर जायेंगे। पर इससे कम में तो कीमत ही नहीं निकलेगी।”
खैर, चुंकि फेरीवाले खुश नहीं थे; मैं उनके बारे में उनसे बहुत नहीं पूछ पाया। अगली बार इसी जगह वे हमें दस शॉल बेचने की बात कह कर गये। पर उन्हे क्या मालुम कि साल भर बाद हम कहीं और होंगे! शायद गंगा किनारे एक “कुटिया” बना कर वहां रहते होंगे।
डोमिनगढ़ के पास ककरा नदी पर पॉण्टून पुल। दांयी ओर रेल पुल है।
किसी स्थान के बारे में मैं अगर सोचूं कि अनूठे कोण से लिख सकता हूं, तो वह गंगा के कछार के अलावा सम्भव नहीं। वहां मेरे साथ कोई सरकारी अमला नहीं होता था। ज्यादातर मैं कुरता पायजामा में होता था। या फ़िर जींस का पैण्ट। वहां के केवट, सब्जी उगाने वाले, मछेरे, ऊंट वाले या नित्य के स्नानार्थी मुझे निरीह जीव मानते थे। कुछ सिरफिरा जो अटपटे सवाल करता या कुछ फोटो खींचता था। कुछ को मैने यह बताया भी था कि उनसे बातचीत कर मैं क्या और कैसे उसे नेट पर प्रस्तुत करता हूं। कुल मिला कर गंगाजी के कछार में मैं घुल मिल सा गया था। अवैध शराब बनाने वालों की गतिविधियों पर ताक झांक करने का अपना एक खतरा था। पर उन लोगों से कोई सीधा टकराव नहीं हुआ। शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व!
लेकिन वैसा यहां गोरखपुर में नहीं है। यहां ऑस्टियो अर्थराइटिस पता चलने के कारण बहुत लम्बा पैदल नहीं चल पाता। वाहन से जाने पर कम से कम सरकारी एम्बेसडर कार और उसका सरकाई ड्राइवर मुझे रेलवे के लोगों से अलग थलग तो करता ही है, आम जनता में भी घुलने मिलने में सहायक नहीं है। यह मुख्य कारण है कि मेरी ब्लॉग पर गतिविधि कम हो गयी है। निकलना हो नहीं रहा है और निकलना जो हो भी रहा है वह रेलवे का प्रोटेक्टिव आवरण साथ होने के कारण इन्स्युलर है।
फिर भी जब कल डोमिनगढ़ (गोरखपुर से पश्चिम की ओर पहला स्टेशन) गया तो यह भाव ले कर गया कि पटरियों और सिगनल/स्टेशन के अलावा भी कुछ देखने का यत्न करूंगा। उस भाव की रक्षा हुयी – कुछ सीमा तक।
रेलवे स्टेशन पर यह वेटिंग हॉल जाने कब से बन रहा है।
मेरे साथ मेरे यातायात नियोजन के सहकर्मी मनीश, लखनऊ मण्डल के गोरखपुर में पदस्थ यातायात निरीक्षक श्री डीके श्रीवास्तव और मेरे वाहन चालक देवीप्रसाद साथ थे। गोरखपुर की संकरी सड़कों के बाजार से गुजरते हुये हम डोमिनगढ़ स्टेशन के लेवल क्रॉसिंग पर पंहुचे। यह लेवल क्रॉसिंग उत्तर की ओर संकरा हो गया है। इस समपार फ़ाटक के स्थान पर रोड ओवर ब्रिज बनाने का काम कई साल पहले प्रारम्भ हुआ होगा। उसके लिये सड़क के बीचोबीच खम्भे बन गये। फिर काम रुक गया। अब न रोड ओवर ब्रिज बन रहा है, न लेवल क्रॉसिंग गेट ठीक से काम कर पा रहा है। काम न करने की कीमत लोग नित्य असुविधा के रूप में भुगत रहे हैं। स्टेशन से पहले सूर्यकुण्ड पड़ा। मिथक है कि राम अयोध्या वापस लौटते समय यहां रुके थे। यह तो जनकपुर के रास्ते में पड़ता होगा; लंका के रास्ते में नहीं। अत: शायद राम ससुराल से लौटते यहां आये हों। कोई बहुत आकर्षक नहीं था कि मैं वहां रुकता। किसी बड़े गांव के पोखरा जैसा था।
स्टेशन से नदी के रास्ते यह कचरा-अम्बार। वाहन का शीशा नहीं खोला वहां से गुजरते।
स्टेशन देखने के बाद मैने नदी देखने की इच्छा जताई। श्रीवास्तव जी ने मुझे बताया कि पास में ही है नदी। पर बहुत गन्दगी है। रास्ता भी संकरा है। मैने फिर भी वहां जाना चाहा। गया भी।
तीन नदियां हैं – ककरा, रोहिणी और राप्ती – ऐसा श्रीवास्तव जी ने बताया। यह पास वाली नदी ककरा है। दोनो नदियां आगे जा कर राप्ती में मिल जाती है।
डोमिनगढ़ स्टेशन ऊंचाई पर बना है पर उसके साथ की जमीन कछारी है। रिहायशी इलाकों को बचाने के लिये बन्ध बना है। अन्यथा नीचे के इलाकों में हर साल बाढ़ आ जाये। निचले इलाकों में अभी भी हर साल पानी भर जाता है।
इस क्षेत्र में प्रॉजेक्ट निर्माण की दशा –
टिपिकल यूपोरियन कंस्ट्रक्शन सिण्ड्रॉम। आधा तीहा काम होता है। तब तक पैसा चरित्रहीनता का असुर लील जाता है। उसके बाद वर्षॉं इंतजार होता है प्रॉजेक्ट के पूरा होने का। तब तक जो बना है, वह भी उपेक्षा में क्षरित होने लगता है।
योजनायें पूरा होने में अधिक समय। खर्चों की अधिकता। व्यापक इंफ्रास्ट्रक्चर की अभावग्रस्तता। अराजक दशा का भाव। छुटभैयों-माफिया की रंगदारी का माहौल… यह सब दीखता है।
ककरा नदी तक जाने वाली सड़क पर गिट्टी बिछी थी। डामरीकरण नहीं था। सो बहुत धूल थी। आते जाते ट्रक कूड़े से लदे थे। वे सड़क के किनारे कछारी इलाके में कूड़ा डम्प कर रहे थे। यह क्षेत्र गोरखपुर के कूड़े का लैण्डफिल था। आते जाते 5-6 ट्रक/ट्रॉली देखे मैने। कचरा/लैण्डफिल और गन्दगी – बीमारियों का उत्तमोत्तम स्थान। पास में जो घर थे, वे भी बहुत सम्पन्न लोगों के नहीं थे। कौन धनी ऐसी जगह रहेगा भला?!
नदी किनारे धोबीघाट। कई धोबी घाट हैं यहां।धोबीघाट पर सूखने को टंगे कपड़े।
नदी से पहले कई उथले जगहों में पानी के तालाब थे। ऐसे ही एक तालाब के किनारे, सड़क से सटा धोबी घाट था। पक्की इमारत। करीब पन्द्रह बीस रजक वहां कपड़े धोते दिखे। कपड़ों में वस्त्र तो नहीं थे – ज्यादा तर होटलों, टेण्ट हाउस वालों के कपड़े दिखे। रुका हुआ, लैण्डफिल के पास का दूषित जल। उसमें धुलते यह कपड़े। भगवान ही बता सकते हैं कि उनका प्रयोग करने वाले कितना रिस्क लेते होंगे चर्म और अन्य रोगों का। घरों में अब वाशिंग मशीने हैं सो इस प्रकार के सार्वजनिक वस्त्र-प्रक्षालन से मुक्ति मिल गयी है।
नदी में जल अधिक नहीं था (मैं मन ही मन गंगा नदी से तुलना कर रहा हूं); पर जल में बहाव अच्छा था। सड़क एक पाण्टून पुल से गुजरती है उस पार जाने के लिये। उस पार एकाध मन्दिर, उनकी ध्वजायें और झोंपड़ियां/ पक्के मकान थे करार पर। बायीं ओर रेल पुल था – दोहरी लाइन का। उनकी बगल में एक संकरा पुल था – शायद पैदल के लिये।
एक बड़ा पुल दायीं ओर निर्माणग्रस्त था – वैसे ही जैसे स्टेशन पर रोड-ओवर-ब्रिज था। पुल के पिलर बन चुके थे पर पुल बनने का काम वर्षों से रुका पड़ा था।
कंकरा नदी पर निर्माणग्रस्त सड़क पुल।
अधबना रुका पुल। टिपिकल यूपोरियन कंस्ट्रक्शन सिण्ड्रॉम। आधा तीहा काम होता है। तब तक पैसा चरित्रहीनता का असुर लील जाता है। उसके बाद वर्षॉं इंतजार होता है प्रॉजेक्ट के पूरा होने का। तब तक जो बना है, वह भी उपेक्षा में क्षरित होने लगता है। ऐसा ही मुझे डोमिनगढ़ रेलवे स्टेशन पर भी दिखा था। वहां एक वेटिंग हाल जाने कब से बन रहा था और नीव पूरी होने पर काम छोड़ दिया गया था। पिलर के सरिया भर दिख रहे थे – स्टील का एकाबेना बनाते। … मुझे मायूसी होने लगी।
बाबू। ‘एकाध किलो मछली पकड़ लेते हैं रोज’
दूर चिता जल रही थी। श्मशान भी है यहां। तभी तो शायद नाम है – डोमिनगढ़।
मैं अपना ध्यान बंटा रेल पुल के नीचे मछली पकड़ने वालों को निहारने लगा। एक लम्बी कंटिया/लग्गी लिये जवान आता दिखा। पूछा तो नाम बताया बाबू। यहीं घण्टाघर में काम करते हैं। काम से छूट कर ककरा नदी में मछली पकड़ते हैं। “काम भर को मिल जाती है – एकाध किलो। भाग्य अच्छा हुआ तो किसी दिन बड़ी मछली भी हाथ लग जाती है।” बाबू के पास समय की कमी हो, ऐसा नहीं लगता था। पर वह अपने को बहुत व्यस्त दिखा रहा था। खैर फोटो तो खिंचा ही लिया!
हम ककरा नदी किनारे से वापस हो लिये। कभी मौका मिला तो रोहिणी और राप्ती किनारे भी चक्कर लगेगा। … ये सभी नदियाँ अंतत: मिलती तो गंगा में ही हैं।
नदियाँ चरित्र का प्रवाह हैं। नदियां स्वस्थ हैं तो चरित्र स्वस्थ है।
वे कुछ समय पहले तक रेलवे मेँ अतिरिक्त सदस्य (वाणिज्य) थे। अब रेलवे से सेवा निवृति ले कर यहां गोरखपुर में रेल दावा ट्रिब्यूनल में सदस्य (तकनीकी) बने हैं।
कल वे मेरे चेम्बर में पधारे।
उनकी ख्याति जितनी रेलवे में है, उससे कहीं ज्यादा फिल्म संगीत के अध्ययन के क्षेत्र में है। इसके अलावा उन्होने हिन्दी साहित्य में भी प्रयोग किये हैं। उनकी कई पुस्तकें कविता, सटायर और लघु कथा के विषय में हैं।
हिन्दी फिल्में, फिल्म संगीत, हिन्दी साहित्य – कविता, सटायर और लघु कथायें – ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें मेरी जानकारी न के बराबर है। अत: उनसे मैं अपनी ओर से बहुत कुछ नहीं पूछ पाया। श्री पाण्डेय ने जो बताया, वह ब्लॉगर-धर्मिता के साथ प्रस्तुत कर रहा हूं।
श्री कन्हैयालाल पाण्डेय के पास डेढ़ लाख से अधिक गीतों के ऑडियो/वीडियो और 2-2 हजार हिन्दी-अंग्रेजी फिल्मों का संकलन है। “यह रखने के लिये बड़ा घर चाहिये। तभी मैं बड़े घर की इच्छा करता हूं। अन्यथा व्यक्तिगत आवश्यकता अधिक नहीं है।” – श्री पाण्डेय ने बताया।
स्कूली शिक्षा में संगीत उनका एक विषय था। अत: बीज तो वहीं से पड़ा था संगीत के बारे में। शास्त्रीय संगीत का गहन ज्ञान कालान्तर में उन्होने स्व. ठाकुर सुकदेव बहादुर सिंह जी से अर्जित किया। गीतों के संकलन का चस्का लगा तो उनके पीछे रागों की मैलोडी (माधुर्य?) जानने की भी जिज्ञासा बनी। बड़ोदा में बतौर मण्डल-रेल-प्रबन्धक और उसके बाद जबलपुर में पशिम-मध्य रेलवे के मुख्य परिचालन प्रबन्धक होने के समय फिल्मी गीतों के अध्ययन की उनकी इच्छा बलवती हो गयी।
अपने पास लाख से अधिक गीतों के कलेक्शन में उन्होने हिन्दी फिल्मों के 65 हजार गाने पाये जो सबसे पहले की फिल्म आलम आरा (सन1931) से ले कर आधुनिक समय की हैदर (सन 2014) फिल्म तक में हैं। इन 65 हजार गीतों में से वैविध्य के आधार पर उन्होने 4600 फिल्मों के 15 हजार चुने। जबलपुर में उन्होने संगीत में पारंगत लोगों की एक टीम बनाई। वह रोज शाम दो घण्टे पहले इन चुने गीतों को बजाती थी, उनके बीच चर्चा करती थी कि उसमें कौन राग का प्रारम्भ है और गाने के दौरान वही राग रहता है या अन्य राग भी उसमें आते हैं। इस चर्चा के आधार पर विस्तृत नोट्स बनाये गये।
स्क्रीन में प्रकाशित श्री पाण्डेय की गतिविधियों पर एक लेख।
लगभग 5000 रागों (तथ्यानुसार 4840) में से मैलोडी के आधार पर लगभग 500 राग उन्होने चुने थे, जिनके अवयव उन्होने फिल्मी गीतों में तलाशे। लगभग 170 रागों की उपस्थिति उन्होने गीतों में दर्ज की। यह पाया कि आरम्भिक दौर (30 से 60 के दशकों की फिल्मों में) उन्हे एक राग पर आर्धारित गीत बहुतायत में मिले। कालान्तर में रागों का मिश्रण होने लगा। गीत एक राग से प्रारम्भ होता और उसके प्रवाह में अन्य राग मिलते। आजकल के गीतों में तो राग बड़े जिग-जैग चलते हैं। उनके अध्ययन में यह बात पूरी तथ्यात्मकता से सामने आयी है।
यह अध्ययन उन्होने लगभग 3600 पृष्ठों में द्विभाषी रूप में (अंग्रेजी और हिन्दी में ) समेटा है। इसको सात खण्डों में “हिन्दी सिने-संगीत रागोपीडिया” के रूप में स्टार पब्लिकेशंस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है।
अध्ययन से –
पन्द्रह हजार गीतों के अध्ययन के अनुसार हिन्दी फिल्मों में सबसे लोकप्रिय राग हैं – पहाड़ी ( 3710 गीतों में पाया गया), खमाज (2970), नट भैरवी (2210), काफी (2100), भैरवी (1670), पीलू (900), मांझ खमाज (818), यमन+यमन कल्याण (174 + 305),किरवानी (783), बिलावल (672), झिंझोटी(606), चारुकेशी (402), 9 विभिन्न प्रकार के मल्हार (236), 5 विभिन्न प्रकार के सारंग (337), भैरव, असावरी, गावती, कलावती, बागीश्री, मालगुंजी, गारा, धानी, भीमपलासी, बिहाग, मारू बिहाग, दरबारी, मालकौंस, शिवरंजिनी इत्यादि।
श्री कन्हैयालाल पाण्डेय को उनके इस अध्ययन के आधार पर विभिन्न शास्त्रीय संगीत से सम्बद्ध विश्वविद्यालयों में प्रेजेण्टेशन के लिये बुलाया जा रहा है। अब तक वे 28-29 प्रेजेण्टेशन कर चुके हैं। सात शोधार्थी इस सामग्री के आधार पर पी.एच.डी. करने के लिये विभिन्न विश्वविद्यालयों में एनरोल भी हो चुके हैं। श्री पाण्डेय को पुणे में (नाना पाटेकर द्वारा) और बेलगाम में सम्मानित भी किया जा चुका है। इस शोध के माध्यम से उनकी फिल्मी संगीत की हस्तियों – रवि, आनन्द जी और खय्याम आदि से निकटता भी बनी है उनकी और इन फिल्मी संगीत की हस्तियों से गहन चचायें भी हुई हैं संगीत के अध्ययन पर।
श्री कन्हैयालाल पाण्डेय को मिला एक सम्मान-पत्र
जैसा मैने कहा – न मैं विस्तृत कुछ पूछ पाया और न उसे विधिवत नोट कर पाया। पर जितना श्री पाण्डेय को सुना, उससे यह विचार घर कर गया कि अपने में रेलवे के कार्य के इतर हुनर अवश्य निखारना चाहिये। उससे यश प्राप्ति तो होती ही है; रेलवे के काम के अतिरिक्त पहचान भी बनती है और नौकरी के बाद समय काटने का वैक्यूम नहीं झेलना पडता।
लगभग पौना घण्टे की उनसे मुलाकात में बहुत प्रभावित हुआ मै। वे गोरखपुर में रहेंगे – अत: श्री कन्हैयालाल पाण्डेय जी से आगे मिलना तो होता ही रहेगा। उनके सानिध्य में शायद कभी मुझमें भी संगीत के प्रति रुचि बने।