भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
सर्दी एकबारगी कम हो कर पल्टा मार गयी। शुक्र-सनीचर को सब ओर बारिश हुई। कहीं कहीं ओले भी पड़े। ट्विटर पर रघुनाथ जी ट्वीट कर रहे थे कि दिल्ली में ओले भी पड़े। बनारस से अद्दू नाना ने फोन पर बताया कि देसी मटर पर पाला पड़ गया है। ओले पड़े थे, उसके बाद फसल खराब हो गयी। इधर मेरे इन्स्पेक्टर श्री एस.पी. सिंह ने बताया कि बारिश हल्की हुई है उनके गांव जमुनीपुर कोटवां में (गंगापार झूंसी में); पर कछार में लगाई सरसों-गेहूं के लिये बहुत फायदेमन्द है यह बारिश।
मौसम – कहीं फायदेमन्द, कहीं नुक्सानदायक!
आज रविवार को सवेरे दस बजे समय निकाल कर शिवकुटी में गंगा किनारे गया। घटा हुआ है गंगा का पानी। अब शायद पौष पूर्णिमा या मौनी अमावस तक पानी छोड़ा जाये। अभी तो बहुत रेत है और बीच बीच में टापू उभर आये हैं गंगाजी में। अलबत्ता, पानी पहले से कुछ साफ जरूर है।
गंगाजी में जल कम ही है।
चिरंजीलाल दिखे। नेकर-कमीज पहने। मूड़े पर गमछा लपेटे थे। अपनी क्यारी में सरपत की बाड़ लगा रहे थे।
सरपत की बाड़ लगाते चिरंजीलाल।
इस बार आधे मन से खेती की है कछार में चिल्ला-सलोरी वालों ने सब्जियों की। पहले आशंकाग्रस्त थे कि कुम्भ का मेला क्षेत्र शिवकुटी तक न घोषित हो जाये और उनकी मेहनत बरबाद हो जाये। वह तो नहीं हुआ, पर यह आशंका बरकरार है कि अगर पानी काफी छोड़ा गया मुख्य स्नान पर तो कोंहड़ा-ककड़ी की फसल डूब सकती है। फिर भी पहले की अपेक्षा आधे से कुछ कम खेती तो की ही है इस साल भी।
सरपत की बाड़।
चिरंजीलाल से मैने पूछा – सरपत कहां से लाते हैं? उन्होने बताया कि एक पूला (गठ्ठर) सरपत चालीस रुपये का आता है। मानिकपुर (इलाहाबाद-सतना मार्ग पर बीच में पड़ने वाली जगह) से मंगाते हैं यह सरपत। कुल मिला कर सरपत की बाड़ सस्ती नहीं पड़ती। पर खेती अप्रेल में खत्म कर बाड़ की सरपत सहेज कर वापस ले जाते भी देखा है इन लोगों को। उसके बाद मड़ई छाने या ईंधन के रूप में भी प्रयोग करते होंगे इसका।
कोंहड़ा का पौधा।
धूप अच्छी थी, ठण्डी हवा सनन् सनन् चल रही थी। किनारे पर कुछ लोग स्नान कर कपड़े बदल रहे थे और अपने गीले कपड़े सरपत की बाड़ पर ही सुखा रहे थे। कोंहड़ा के पौधे स्वस्थ थे और हवा का आनन्द ले रहे थे। ऐसे मौसम में एक दो मड़ई बन जाती थीं खेत के किनारे। इस साल एक भी मड़ई नहीं दिखी।
रेत एक दो दिन पहले हुई बारिश से गीली थी। कम ही लोग चले थे उसपर। काले रंग की चिड़ियां, जो गंगाजी के पानी की सतह के समीप उड़ते हुये जल में से छोटे छोटे जीव बीनती हैं, रेत में स्नान कर रही थीं – लोग गंगा नहाते हैं, वे रेत में नहा रही थीं।
रेत में नहाती काली चिड़ियां।
शिवकुटी घाट के पास रास्ते में बल्लियां गाड़ कर बिजली के बल्ब टांगे गये हैं – सी.एफ़.एल. रोशनी की व्यवस्था। यह इस कुम्भ के दौरान मुख्य स्नानों पर भोर में नहाने वाले धार्मिक लोगों की सुविधा के लिये हैं। इस व्यवस्था के अलावा और कोई इन्तजाम नजर नहीं आता शिवकुटी के घाट पर कुम्भ को ले कर।
मेला में की गई बिजली की व्यवस्था।
सरपत की बाड़ एक बार फिर निहारता मैं घर वापस चला आया।
सरपत की बाड़ पर लोगों ने नहाने के बाद गीले कपड़े सुखाने डाल रखे थे।
अनूप शुक्ला जब भी बतियाते हैं (आजकल कम ही बतियाते हैं, सुना है बड़े अफसर जो हो गये हैं) तो कहते हैं नरमदामाई के साइकल-वेगड़ बनना चाहते हैं। अमृतलाल वेगड़ जी ने नर्मदा की पैदल परिक्रमा कर तीन अनूठी पुस्तकें – सौन्दर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा और तीरे तीरे नर्मदा लिखी हैं। साइकल-वेगड़ जी भी (नर्मदा की साइकल परिक्रमा कर) ट्रेवलॉग की ट्रिलॉजी लिखें, शुभकामना।
अभी यहां अस्पताल में, जब हाथ में इण्ट्रावेनस इन्जेक्शन की ड्रिप्स लग रही हैं और एण्टीबायोटिक अन्दर घुसाये जा रहे हैं; मैं यात्रा की सोच रहा हूं। यही होता है – जब शरीर बन्धन में होता है तो मन उन्मुक्तता की सोचता है।
मैं रेल की नौकरी वाला, ट्रेने चलवाना जिसका पेशा हो और जिसे और किसी चीज से खास लेना देना न हो, उसके लिये यात्रा – ट्रेवल ही सब कुछ होना चाहिये। पर मेरे पास ट्रेवल ही नहीं है। या ट्रेवल के नाम पर शिवकुटी का गंगाजी का फाफामऊ के पुल से निषादघाट तक का वह क्षेत्र है, जहां से कच्ची शराब का बनना सेफ दूरी से देखा जा सके। मेरे कथन को एक ट्रेवलर का कथन नहीं माना जा सकता।
इस लिये, जब मैं यह अपनी स्कैपबुक में दर्ज करता हूं – एक औसत से कुछ अधिक बुद्धि का इन्सान, जिसे लोगों से द्वेष न हो, जो आत्मकेन्द्रित न हो, जो सामान्य तरीके से मानवता की भलाई की सोचता हो, जो यात्रा कर देखता, परखता, लोगों से इण्टरेक्ट करता और अपनी ऑब्जर्वेशन रिकॉर्ड करता हो; वह मानव इतिहास में आसानी से जगह पा सकता है – तो मैं अपनी सोच ईमानदारी से प्रस्तुत करता हूं। पर उस सोच की सत्यता के बारे में बहुत आश्वस्त नहीं होता। ऐसे बहुत से लोग हैं जो इस सोच के अनुसार हैं – गुरु नानक, जीसस क्राइस्ट या बुद्ध जैसे भी।
पर मैं साइकल-वेगड़ या रेल-वेगड़ बन कर भी आत्म संतुष्ट हो जाऊंगा।
शैलेश पाण्डेय ने पूर्वोत्तर की यात्रा ज्वाइन करने का न्योता दिया है – मोटर साइकल पर। सुकुल ने साइकल पर नर्मदा यात्रा का। मुझे मालुम है इनमें से दोनों पर मैं नहीं निकलने वाला। … पर ये न्योते, ये सोच और ये आग्रह यह बताते हैं कि एक आध ठीक ठाक ट्रेवलॉग अपने हिस्से भी भगवान ने लकीरों में लिख रखा है। निकलना चाहिये।
उठो; चलो भाई!
(यह पोस्ट कल १२ जनवरी को पब्लिश होगी। तब तक शायद डाक्टर विनीत अग्रवाल, यहां रेलवे के मुख्य फीजीशियन मुझे अस्पताल से छुट्टी देने का निर्णय कर लें।)
[टेंगर, और यह कि सोंइस (मीठे जल की डॉल्फिन) रोज दिखती है यहां।]
लल्लन, बायें और राकेश खड़ा हुआ, दायें।
एक नाव पर वे दो थे – बाद में पता चला नाम था लल्लन और राकेश। लल्लन के हाथ में पतवार थी और राकेश जाल डाल रहा था गंगा नदी में।
हम – मैं और मेरी पत्नीजी – गंगा किनारे खड़े देख रहे थे उनकी गतिविधियां। उनकी नाव कभी बीच धारा में चली जाती और कभी किनारे आने लगती। इस पार पानी काफी उथला था, सो पूरी तरह किनारे पर नहीं आती थी। नाव के कुछ चित्र भी लिये मैने। एक बार जब किनारे से लगभग बीत पच्चीस गज की दूरी पर होगी, मैने उनसे बात करने की गर्ज से चिल्ला कर कहा – कितनी मिल रही हैं मछलियां?
उनमें से जवान, जो मछलियां पकड़ रहा था, ने कहा – मिल रही हैं। फिर बातचीत होने लगी। वे सवेरे आठ बजे से यह काम कर रहे थे और दोपहर दो बजे तक करेंगे। लगभग तीन किलो भर मिल जायेंगी मछलियां उन्हे।
मैने पूछा हमे उस पार तक नाव में ले चलोगे? सहर्ष वे तैयार हो गये। लगभग आधा पौना घण्टा हम नाव पर रहेंगे। सौ रुपये में। वे नाव किनारे ले आये। हम दोनों नाव में सवार हो गये। कुछ ही पल में नाव धारा में थी।
पतवार चलाता लल्लन।
लल्लन अधेड़ था। नाव की पतवार चला रहा था। आस पास उपलब्ध सामग्री से लगता था खैनी भी खा रहा था। बहुत कम बोलने वाला। बड़ी मुश्किल से नाम बताया अपना। उसको यह भी अच्छा नहीं लग रहा था कि नाव में हम अपनी चप्पलें पहने बैठ गये थे और उससे कुछ कीचड़ लग गयी थी। हमने अपनी चप्पलें उतार दीं। मैने चप्पल उल्टी कर रख दी, जिससे उसका कीचड़ वाला पेंदा सूख जाये। … लल्लन का पतवार चलाना बहुत सहज और प्रयास हीन था। चूंकि वह बहुत बोल नहीं रहा था, इस लिये मैने प्रशंसा नहीं की। अन्यथा बात चलाने के लिये कहता – आप नाव बहुत दक्षता से खे रहे हैं।
हमारे प्रश्नों के उत्तर राकेश ने दिये। पच्चीस-तीस की उम्र का सांवला नौजवान। वह समझ गया कि हममें नदी, मछली पकड़ने और उन लोगों की जिन्दगी के बारे में कौतूहल है। अत: उसके उत्तर विस्तृत थे और अपनी ओर से भी जानकारी हमें देने का प्रयास किया राकेश ने।
डांड हाथ में लिये राकेश।
वे साल में हर मौसम में, हर दिन मछली पकड़ने का काम करते हैं। गंगा नदी उन्हे हर दिन मछलियां देती हैं। मैने जोर दे कर पूछा कि वर्षा के महीनों में भी पकड़ते हैं? राकेश ने बताया – हां।
मेरे मन में था कि मछलियों के प्रजनन का कोई समय होता होगा और उन महीनों में शायद मछेरे छोड़ देते हों मछलियां पकड़ना। पर राकेश की बात से लगा कि ऐसा कुछ भी न था। उसने बताया कि रोज तीन चार किलो मछली पकड़ लेते हैं वे और अस्सी से सौ रुपये किलो तक बिक जाती है। मछली पकड़ने के अलावा वे सब्जियां बोने का भी काम करते हैं कछार में। पर मुझे लगा कि शायद राकेश के परिवार के अन्य लोग सब्जियां बोते हों, वह मछली पकड़ने के काम में ही रहता है।
यहीं घर है? पूछने पर राकेश ने बताया कि वह रसूलाबाद का है और इसी क्षेत्र में मछली पकड़ता है। मैने जानना चाहा कि कभी नाव पर चलना हो तो उससे सम्पर्क करने के लिये कोई फोन है? इस पर राकेश ने कहा कि उसके पास तो नहीं है। घर में है जिसे उसकी बहन लोग इस्तेमाल करते हैं। नम्बर उसे नहीं मालुम था, सो बता नहीं पाया। यही कहा कि हम यहीं रहते हैं, जब चाहेंगे मिल जायेंगे!
उसने मुझे जाल नदी में डाल कर दिखाया – लगभग पचास मीटर लम्बा। वह डाल रहा था कि एक मछली फंस कर पानी के बाहर उछली। आप फोटो लीजिये – राकेश बोला। एक बार उछलने को कैमरे में नहीं समेटा जा सकता था। एक मछली और फंसी। लगभग आठ दस मिनट में जब वापस जाल उसने समेटा तो दो मछलियां जाल में थीं। एक लगभग एक फुट की थी और दूसरी उससे थोड़ी बड़ी।
यह टेंगर है। और पहले जो मैने पकड़ रखी है, वो चेल्हा हैं। दोनो टेंगर नाव पर पड़ी तड़फ रहीं थीं। इस समय हमें नदी की मछेरा-गाथा जानने का कौतूहल जकड़े था, सो मछलियों के प्रति करुणा का भाव हम पर हावी न हो पाया। मैं निस्पृह भाव से टेंगर का मुंह खोलना, बन्द करना और उसके शरीर का ऐंठना देखता रहा।
टेंगर
इस तरफ कभी सोंइस दिखीं?
हां बहुत दिखती हैं। राकेश का यह बताना हमारे लिये बड़ी जानकारी थी। मैने पूछा, कितनी बार दिखी? महीने में दिख जाती है? कहां दिखी?
यहीं आसपास दिखती है। पैंतीस चालीस किलो की। लगभग रोज ही दिख जाती है।
मुझे लगा कि कहीं गलत न समझ रहा हो, पर जो भी विवरण उसने दिया, वह सोंइस (मीठे पानी की डॉल्फिन) का ही था। सोंइस विलुप्तप्राय जीव है। उसका शिकार नहीं होना चाहिये। राकेश के कहने से लगा भी नहीं कि वह कभी सोंइस पकड़ता हो। पर मैने साफ साफ तहकीकात भी नहीं की। अगली बार मिला तो पूछूंगा कि कोई सोंइस पकड़ता तो नहीं है।
खैर, सौ रुपये में गंगा जी का नौका भ्रमण और यह जानकारी की सोंइस है, और प्राय रोज दिखती है, बड़ी उपलब्धि थी।
किनारे से लगता था कि गंगाजी का पानी कम हो रहा है। पर जब उनकी चौड़ाई पार की तो अहसास हुआ कि गंगाजी पानी के मटमैला होने और बीच बीच में कहीं कहीं उथली हो जाने के बावजूद एक बड़ी नदी हैं। इतनी बड़ीं कि सुन्दर भी हो, गहराई का भय भी हो और श्रद्धा भी। राकेश जब जाल नहीं डाल रहा था, तब डांड चला रहा था। उसकी डांड़ के डूबने से अन्दाज लगता था गंगाजी की गहराई का। एक दो जगह वे पर्याप्त गहरी थीं। एक जगह इतनी उथली थीं कि एक मछेरा पैदल चलते जाल डाल रहा था।
कई अन्य मछेरे भी जाल डाल रहे थे। राकेश से पूछने पर कि आपस में कोई झगड़ा नहीं होता जाल डालने को ले कर; वह हंसा। हंसी से लगा कि यहां नदी सब को पर्याप्त दे रही हैं – हर मछेरे को पर्याप्त मछली है और हर मछली को पर्याप्त भोजन।
गंगा नदी को आदमी अपने कुकर्मों से भले ही मार रहा हो, वे अभी भी सब को मुक्त भाव से जीविका लुटा रही हैं।
एक छोटी सी नाव, जो इस समय लगभग पंद्रह हजार में बन जाती है (राकेश नें बताया कि साखू की लकड़ी की तो मंहगी होगी – तीस हजार की; पर सफेदा या आम की लकड़ी की पंद्रह हजार में बन जाती है और पांच साल अच्छे से चलती है) और एक जाल की बदौलत साल के बारहों महीने की आजीविका बेरोक टोक! और कहां मिलेगी?!
हमें किनारे उतारा राकेश ने। मैने उससे हाथ मिलाया और एक बार फिर उसकी नाव का चित्र लिया कैमरे में। एक बार फिर नाव पर पड़ी टेंगर तड़फी-उछली!
कुछ ही समय की मेहमान टेंगर। तुम्हारी आत्मा को शान्ति मिले टेंगर। भगवान अगला जन्म किसी बेहतर योनि में दें तुम्हें और गंगाजी का सानिध्य किसी और प्रकार से मिले तुम्हे।