बुढ़िया चपरासी



बुढिया चपरासी
गलियारे में धूप सेंकती बुढ़िया चपरासी

वह जब भी गलियारे में मुझे मिलती है, हाथ जोड़ कर नमस्ते करती है। उसका नाम मैं नहीं जानता। मैने बात करने का कभी यत्न नहीं किया – उसके अभिवादन का उत्तर भर दे देता हूं।

उसे देख कर मुझे अपनी आजी की याद हो आती है। इतने छोटे कद की थीं वे (तनिक भी और छोटी होने पर बौनी मानी जाती)। ऐसे ही सीधे पल्लू की धोती पहनती थीं। ऐसी ही उम्र हो गयी थी उनकी। अंतर यही है कि वे ब्लाउज भी नहीं पहनती थीं, यह स्त्री ब्लाउज पहनती है। अन्यथा यह भी ठेठ मेरे गांव की लगती है।Continue reading “बुढ़िया चपरासी”

आप एक बार लिखकर कितनी बार मिटाते या उसे सुधारते हैं?



altबात वर्ष १९९७ की है जब मैं भीतरकनिका अभ्यारण्य के एक प्रोजेक्ट में शोध सहायक का साक्षात्कार देने के लिए कटक गया था| कम उम्र में इतनी अधिक अकादमिक उपलब्धी को देखकर चयनकर्ता अभिभूत थे| वे हां कहने ही वाले थे कि एक वरिष्ठ चयनकर्ता ने यह प्रश्न दागा|

“एक बार भी नहीं| जो भी लिखता हूँ उसे अंतिम मानकर लिखता हूँ| सुधार की कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ता|” मेरे उत्तर से स्तब्धता छा गयी|

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मेरा प्राइमरी स्कूल



मेरा गांव है शुक्लपुर। टप्पा चौरासी। तहसील मेजा। जिला इलाहाबाद। शुक्लपुर और शम्भूपुर की सीमा पर वह प्राइमरी स्कूल है जहां मैने कालिख लगी तख्ती, दुद्धी (चाक या खड़िया पानी में घुलाने पर बना रसायन) की दावात, सरकण्डे की कलम और बालपोथी के साथ पहली तथा दूसरी कक्षा की शिक्षा पाई। सन 1959 से 1961 तक। पांच दशक हो गये उसको, पर यादें धूमिल नहीं हुई हैं उस समय की।

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