इम्फाल — आर्मचेयर ट्रेवलॉग की सम्भावनाएँ


हरि प्रकाश मिश्र और उनकी पत्नी आकांक्षा अपने बेटे के साथ इम्फाल में हैं। आकांक्षा, मेरी बहन की बड़ी बिटिया है, और मेरी पत्नीजी के साथ वहाँ के अनुभव साझा करती रहती है। तस्वीरों में देखता हूँ—उनका बेटा अब बड़ा हो रहा है। छोटी साइकिल चलाता है, हाथ में किताब लिये घूमता है।

मैं कल्पना करता हूँ—एक दिन वही साइकिल लेकर दुनिया देखेगा, और पढ़ाकू-लिखाकू भी होगा। शायद लेखक बने, पत्रकार बने, या जो कुछ भी बने—किताबी कीड़ा तो है ही।

हरि प्रकाश भी वीडियो कॉल में मुझे ‘मामाजी’ कहता है। वह मेरे भाई-सरीखे मित्र ओम प्रकाश जी का बेटा है। हम दोनों रेलवे में बैचमेट थे—वह स्थापना विभाग के प्रमुख बने और मैं यातायात का। जीवन-दिशाएँ लगभग समान रहीं। इस नाते हरि मुझे चाचाजी या ताऊजी भी कह सकता था, पर सम्बोधन तब स्थिर होगा जब आत्मीयता और गहरी होगी। और मुझे लगता है कि वह समय बहुत दूर नहीं।

हरि प्रकाश अभी भारत की ऑडिट एंड अकाउंट्स सेवा में वरिष्ठ पद पर है और फिलहाल मणिपुर में तैनात है। सोचता हूँ—अगर हरि और आकांक्षा पूर्वोत्तर के अनुभव थोड़ा-बहुत साझा कर सकें, तो मैं कटका स्टेशन पर बैठे-बैठे ही पूर्वोत्तर का आर्मचेयर ट्रेवल कर लूँ। और शायद लिख भी डालूँ—आर्मचेयर ट्रेवलॉग!

GD Imphal Collage
अगर हरि और आकांक्षा पूर्वोत्तर के अनुभव थोड़ा-बहुत साझा कर सकें, तो मैं कटका स्टेशन पर बैठे-बैठे ही पूर्वोत्तर का आर्मचेयर ट्रेवल कर लूँ। और शायद लिख भी डालूँ—आर्मचेयर ट्रेवलॉग!

इम्फाल मेरे गाँव से चिकन-नेक होते हुए लगभग 1500 किलोमीटर दूर है। लेकिन आर्मचेयर ट्रेवल का मेरा अनुभव भी कोई कम नहीं। मैं प्रेमसागर—द्वादश ज्योतिर्लिंग के पदयात्री—के साथ बैठे-बैठे द्वारिका से गौहाटी और नासिक से केदारनाथ तक घूम आया हूँ। अब मणिपुर-त्रिपुरा-मेघालय की बारी है—क्या पता हरि-आकांक्षा के माध्यम से यह भी हो जाए!

लेकिन पत्नीजी का तर्क भी सही है—
“कौन तुम्हारे सैकड़ों सवालों का जवाब देगा? कौन तुम्हें मनमाफिक एंगल से फोटो भेजेगा? सब लोग व्यस्त हैं; सब तुम्हारी तरह खलिहर थोड़े बैठे हैं!”

मणिपुर को समझने के लिए मेरे पास फिलहाल एक किताब है—जेम्स जॉनस्टोन की My Experiences in Manipur and the Naga Hills (1896)। किंडल पर मुफ़्त मिल जाती है। लेखक बताते हैं कि उनकी पत्नी भारत के अनुभवों को लेकर बहुत उत्साहित रहती थीं और अपनी डायरी में रोजमर्रा की बातें लिखती थीं। जॉनस्टोन ने लिखा—
“मैं उसे कहता था कि इन अनुभवों से एक किताब लिखे; पर ईश्वर की मर्जी—उन अनुभवों के आधार पर किताब मुझे लिखनी पड़ी!”

यह 150 साल पुरानी किताब आज भी उपयोगी है—भले ही इसमें अंग्रेज़ी औपनिवेशिक दृष्टि झलकती हो।

एक और किताब नजर आई मुझे, यद्यपि अमेजन पर फिलहाल यह उपलब्ध नहीं है। यह है – My Tryst With Manipur: A Memoir. यह जरनैल सिंह जी की मेमॉयर्स हैं। वे मणिपुर के मुख्य सचिव रह चुके हैं।
मैने चैट जीपीटी को इस पुस्तक का सार देने को कहा। उसने बताया – लेखक ने मीतेई और पहाड़ी समुदायों के साथ अपने अनुभव को बहुत सहज व दिलचस्प अंदाज़ में लिखा है — जैसे किसी मित्र से बात हो। इसमें व्यक्तिगत घटनाएँ, सच्ची भावनाएँ, और प्रशासनिक निर्णयों के पीछे की सोच सामने आती है — जो आम सरकारी रिपोर्ट में नहीं मिलता।

मणिपुर किसी भी भारतीय के लिये एक महत्वपूर्ण अनुभव है। उसका गौरवशाली अतीत, उसकी वैष्णव परम्परा, उसकी तीन मुख्य परतें – नगा, कुकी और मैतेई – जानना किसी के लिये भी शानदार पठन होगा।

आज, भारतीय कोण से हरि-आकांक्षा चाहें तो ऐसा काम कर सकते हैं। मणिपुर और उसके आसपास की भूमि पर बहुत कुछ है जिसे वे दर्ज कर सकते हैं। वहाँ उन्हें साल-दो साल गुज़ारने हैं; उनके अनुभव पूर्वोत्तर को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन सकते हैं।

आकांक्षा ने कुछ तस्वीरें भेजी थीं—
एक में हरिप्रकाश अपने बेटे को गोद में लिए हैं (वह वीडियो का स्क्रीनशॉट है),
एक में 1846 का बना कृष्ण मंदिर—जो शायद महाराजा नरसिंह के काल का है। उसका स्थापत्य न बर्मी, न बंगाल-नवाबी—बल्कि विशुद्ध मणिपुरी वैष्णव शैली।
एक अन्य तस्वीर कांगला फोर्ट की मोट (moat) की है, जिसमें शांत जल भरा है।

Hari Prakash Imphal Collage
हरि प्रकाश अपने बालक के साथ – इम्फाल का कोलाज – चैट जीपीटी का बनाया

मैंने वे तीनों चित्र चैटजीपीटी को कोलाज बनाने के लिए दिए। और जो बना—वह सचमुच सुंदर है। वही इस पोस्ट के साथ लगा है।

मुझे भी कोई ठोस उम्मीद नहीं कि मैं मणिपुर का आर्मचेयर ट्रेवल कर ही लूँगा—यह बहुत अनुशासन और तालमेल माँगेगा।
पर कल्पना करने में कोई रोक थोड़े ही है!

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जोखन: एक साइकिल मेकैनिक और गांव के मौन इतिहास का वाहक


कटका स्टेशन की पगडंडी पर चलते हुए मैं अक्सर लोगों के चेहरे देखता हूँ — कुछ जल्दी में, कुछ यूँ ही चलते हुए, कुछ अपनी-अपनी मुश्किलों में खोये हुए। पर इस बार जो चेहरा रुका, वह था जोखन।
एक साधारण-सा आदमी।
या पहली नज़र में साधारण-सा दिखता आदमी।

धूप में थोड़ा सिकुड़ा चेहरा। सफेद होती दाढ़ी। ग्रीस से दागदार हाथ। पीछे उसकी छोटी-सी दुकान — टीन का शेड, ईंट की कच्ची दीवार, दीवार पर टंगे घिसे-पिटे औज़ार और ऊपर से लटके ट्यूब-टायरों के गोल चक्र। स्टेशन के पास ऐसी दुकानें होती हैं जिन पर समय चिपका रहता है। जोखन की दुकान भी वैसी ही है।

जोखन कंहार जाति का है। कभी उसके पुरखे ज़मींदारों के लिये इनारा (कुआं) से पानी भरते थे। पालकी उठाते थे। यह काम उस समय रोज़गार ही नहीं, पहचान भी था। पर इनारा का स्थान चांपाकल या ट्यूब वेल ने ले लिया। योजनाएँ बदल गयीं, पानी नलों में आने लगा अब; और पालकी की जगह कारें आ गईं।
जिन पेशों ने पीढ़ियाँ चलाई थीं, वे काम खत्म हो गये।

जोखन के पिता ने इस बदलाव को समझा। कटका स्टेशन पर साइकिल रिपेयर की दुकान शुरू कर दी। यह वह समय था जब मीटर-गेज की ट्रेनें चलती थीं और भाप इंजनों की सीटी गांव-गिरांव तक सुनी जाती थी।
जोखन बताता है कि उसके पिता सन 2005 में मेरी बिटिया की शादी में बनारस भी गये थे। इतने साल पुरानी बात भी वह बड़ी गर्मजोशी से सुनाता है, जैसे रिश्ते का कोई पुराना धागा अब भी चल रहा हो। वह मुझे सम्बोधन में भी साहेब या गुरूजी नहीं कहता – जीजा बुलाता है।

जोखन ने मिडिल तक पढ़ाई की। 1989 में दुकान पर आ बैठा। मां लंबे समय से बीमार थीं, और 1991 में चल बसीं। उसके बाद पढ़ाई की कोई संभावना रही ही नहीं।
उसकी बातों में एक वाक्य बार-बार आता है —
“बहुत गरीबी रही… बहुत कठिन समय रहा वह।”

जब कोई आदमी एक ही वाक्य दोहराता है, तो समझ में आता है कि वह घटना उसके भीतर कितनी गहराई तक गड़ी होगी। जोखन उस गरीबी का विस्तार नहीं करता, वह बस उसे याद करता है — एक पुराने घाव की तरह जिसे अब दर्द तो नहीं होता, पर उसका निशान साफ दिखता है।

जोखन के दो बेटे हैं। दोनों बम्बई में हैं।
छोटा एसी कम्पनी में नौकरी करता है। बड़ा बिजली की मरम्मत और वायरिंग करता है।
दोनों वहीं जोखन के छोटे भाई के साथ रहते हैं। अभी शादी किसी की नहीं हुई।
जोखन मुस्कराते हुए कहता है —
“देखे में लगा हई शादी के लिहे…”

दुकान के भीतर छाया और बाहर धूप का एक पुराना-सा विरोध है। साइकिलों के ट्यूब हवा में कभी कभी झूलते हैं — जैसे समय के गोल चक्र। नीचे औज़ार रखे हैं जिन पर पसीने और ग्रीस का वर्षों का इतिहास जमा है।
मुझे अपनी साइकिल में ताला लगवाना था। उसने सौ रुपये लिये। एक चक्के की छुछी का ढक्कन गायब था, वह फ्री में लगा दिया। बिना कुछ कुनमुनाये।

काम करते-करते बात आगे बढ़ी और जोखन धीरे-धीरे अपने बीते सालों की गठरी खोलने लगा। भाप इंजन की आवाज़, स्टेशन की चहल-पहल, दुकान की शुरुआत, मां की बीमारी… और फिर दुकान स्टेशन से हट कर हाइवे पर खोलने का प्रकरण।
और फिर अचानक कहा —
“आप सुनने लगे… तब बताये। वर्ना का फायदा बताय के?”

जोखन के चित्रों के आधार पर एआई का बनाया कोलाज
जोखन के चित्रों के आधार पर एआई का बनाया कोलाज

यही वाक्य मुझे सबसे ज़्यादा अटका।
गांव में बहुत-सी कहानियाँ बोलने के इंतज़ार में रहती हैं।
लोगों के भीतर दबी होती हैं।
पर लोग तभी बोलते हैं, जब सामने वाला सुनने के लिये तैयार हो।

जोखन के बारे में सोचते हुए मुझे समझ आया कि साधारण दिखने वाला आदमी असल में कितना जटिल होता है। इसमें तीन परतें साफ दिखती हैं।

पहली परत — जीवन की अनवरत यात्रा।
पेशे का खत्म होना, नया काम पकड़ना, मां का अचानक चले जाना, पढ़ाई का छूट जाना, गरीबी का लम्बा दौर… और फिर भी जीवन को बिना शिकायत ढोते रहना। जोखन की कहानी में कोई नाटकीयता नहीं है, पर स्थिरता है — और वही स्थिरता दुर्लभ है।

दूसरी परत — मौन गरिमा।
वह यह नहीं कहता कि उसने त्याग किये। वह यह भी नहीं कहता कि उसने संघर्ष किया।
वह बस याद करता है — सधे हुए स्वर में।
उसमें “दिखावे का दुःख” नहीं है।
यह जो मौन गरिमा है, वह साधारण आदमी की सबसे महत्वपूर्ण पूँजी होती है।

तीसरी परत — उसकी सामाजिक भूमिका।
एक साइकिल मेकैनिक गांव में सिर्फ़ मेकैनिक नहीं होता।
वह अनौपचारिक इतिहास का संरक्षक होता है।
स्टेशन पर आने-जाने वालों की कहानियाँ, किसके यहाँ कौन बीमार है, कौन बम्बई गया, किसने नया घर बनवाया — सब वही जानता है।
जोखन की दुकान गांव का संचार-केंद्र है, बिना मोबाइल, बिना अखबार। लोग आते हैं, साइकिल पम्प मांगते हैं हवा भरने को और एक दो बात आदान प्रदान कर जाते हैं हवा भरते भरते।

ऐसे पात्र साहित्य या पत्रकारिता में अक्सर अनदेखे रह जाते हैं, पर जब उन्हें जगह मिलती है, तो वे कहानी को असली धरातल दे देते हैं।
जोखन में वह “साइलेंट स्ट्रेंथ” है जो सिर्फ़ ग्रामीण भारत में मिलती है — कच्ची दीवारों में टिकी हुई, धूप और धूल से गुज़री हुई।

मैं सोचता हूँ, क्या जोखन साधारण पात्र है?
या हम साधारण में छिपे असाधारण को देखना ही भूल गये हैं?

मेरे लिये जोखन “एक साइकिल मेकैनिक” नहीं,
बल्कि वह सामूहिक कहानी है जिसे देश के गांवों ने पिछले पचास वर्षों में जिया है —
पेशों का लोप, शहर की ओर पलायन, घरेलू विघटन, और फिर भी काम में डटे रहना।

मैं फिर जाऊँगा उसकी दुकान पर।
कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
और मुझे यकीन है — जब दूसरा आदमी बोलने के लिये तैयार होता है, तो उसका इतिहास खुद-ब-खुद बाहर आता है।

जोखन

शायद अगली बार जोखन कुछ और पन्ने खोलेगा।
और मैं फिर उन्हें लिख लूँगा — जैसे हज़ारों गांवों की छोटी-छोटी आवाज़ें किसी डायरी में सुरक्षित हो गयी हों।

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बिना शब्दों के मेरी बिजली की साइकिल का प्रशंसक


सवेरे के पौने नौ बजे थे। द्वारिकापुर गंगा-घाट से लौटते समय धूप कुछ उनींदी-सी थी। जनवरी की सुबहें वैसी ही होती हैं—आधी जागी, आधी सपनीली। बिजली की साइकिल पर चलते हुए मुझे हमेशा लगता है कि खेतों की हवा खुद रास्ता बनाती है, और हम बस उसके साथ बहते हैं। मकर-संक्रांति की गंवई भीड़, गंगा का मंथर बहाव, स्नानार्थियों और मेले की आवाजें—सब पीछे छूटते जा रहे थे। आगे सिर्फ सन्नाटा और सरसों-गेंहू के खेत थे।

इसी शांति में, पतली सड़क पर, अचानक एक आकृति दिखी—एक युवक, पतला-सा, धूप की तरफ आंखें तिरछी करके चलता हुआ। सिर पर सफेद गमछा लिपटा हुआ, जैसे गांव का ताज हो। शरीर पर पुरानी धारियों वाली स्वेटर। हाथ में उसकी साइकिल—वही सदाबहार भारतीय साइकिल, जो जितनी पुरानी होती है उतनी ही विश्वसनीय लगती है।

बिना शब्दों के मेरी साइकिल का प्रशंसक
द्वारिकापुर का मूक-बधिर साइकिल प्रसंशक

वह मुझे देख रहा था—पर एक साधारण नजर की तरह नहीं। उसकी आंखों में ऐसी चमक थी, जैसे कोई बच्चा पहली बार किसी खिलौने में बिजली की चिनगारी देख ले। जब मैं पास पहुंचा, तो उसने “एSS एSS” जैसी ध्वनि निकाली—एक अनगढ़, लेकिन बेहद सच्ची पुकार। यही वह क्षण था जब समझ में आया कि वह मूक-बधिर है, और अपनी दुनिया की भाषा में मुझसे बातें करना चाहता है।

मैंने धीरे से साइकिल की रफ्तार कम की। वह अपनी साइकिल को लगभग दौड़ाते हुए मेरे पीछे आने लगा। उसकी आवाजें उस खुले मैदान में गूंज नहीं रहीं थीं, पर मेरे भीतर जरूर असर डाल रही थीं। उसकी आंखों में एक सीधी, साफ, बिना किसी हिचकिचाहट वाली उत्सुकता थी—एक ऐसा भाव जो आजकल लोगों के चेहरों पर कम ही दिखता है।

मैंने साइकिल रोक दी। वह भी पास आकर खड़ा हो गया। हवा में हल्की ठंडक थी, लेकिन उस पल के आसपास एक अजीब गर्माहट पैदा हो गई थी—मानो धूप की एक किरण हमारे बीच उतर आई हो। इशारे से वह मेरी साइकिल के बारे में कौतूहल जता रहा था।

मैंने हाथ से साइकिल की बैटरी की तरफ इशारा किया। फिर पीछे झुककर मोटर दिखाई। उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक उजाला फैलता गया, जैसे किसी ने भीतर से बल्ब जला दिया हो। उसने तुरंत अपनी उंगलियों से थ्रॉटल की मुद्रा बनाई—क्या यह ऐसा चलता है? मैंने सिर हिलाया। वह मुस्कुराया—बिना आवाज के, लेकिन इतनी चौड़ी मुस्कान कि लगा जैसे पूरा खेत उसके साथ मुस्कुरा रहा है।

मूक बधिर और मैं
उसकी खुशी बिल्कुल कच्चे गन्ने के रस जैसी थी—सीधी, मीठी और बिना किसी मिलावट के। चित्र एआई का बनाया हुअ।

फिर उसने थम्ब्स-अप दिखाया। उसकी उंगलियां गोल होकर हवा में एक छोटा-सा चक्र बना गयीं—“बहुत बढ़िया”, “टॉप क्लास”, “कमाल की चीज”—इन तीनों का मिला-जुला अर्थ उसमें था। उसकी खुशी बिल्कुल कच्चे गन्ने के रस जैसी थी—सीधी, मीठी और बिना किसी मिलावट के।

मैंने हल्का-सा थ्रॉटल घुमाकर साइकिल को कुछ मीटर आगे ले गया—थोड़ा तेज, ताकि उसे दिखे कि बिजली वाली साइकिल चलना सिर्फ चलना नहीं, एक अलग-सी उड़ान है। पीछे मुड़कर देखा, तो वह अब भी वहीं खड़ा था—हवा में थम्ब्स-अप दिखाते हुए। उसकी आंखों में इतने सहज भाव थे कि वह दृश्य सीधे दिल में उतर गया।

मैं आगे बढ़ता गया, पर मन बार-बार पीछे ही लौटता रहा। रास्ता वही था, सूरज वही, हवा वही—लेकिन मैं जैसे किसी गहरी सीख के साथ लौट रहा था। मन में शब्द घुमड़ रहे थे – क्या लिखूंगा इस अनकही बातचीत के बारे में?

उस छोटी-सी मुलाकात ने पहली बार यह महसूस कराया कि संवाद सिर्फ शब्दों से नहीं होता। कभी-कभी वह आंखों में होता है, उंगलियों की हलचल में, चेहरे की एक मुस्कान में, या किसी साधारण-सी “एSS एSS” ध्वनि में। दुनिया में आवाजें बहुत हैं, पर अनुभव ने बताया कि सबसे सच्चा संवाद चुप्पियों की भाषा में होता है।

मुझे लगा—हमें मूक-बधिर लोगों की भाषा, उनके संकेत, उनकी दुनिया की बुनावट—थोड़ी-बहुत जरूर सीखनी चाहिए। ताकि अगली बार ऐसा कोई युवक सड़क पर मिले, तो हम सिर्फ मुस्कुरा कर न निकल जाएं, बल्कि उसके साथ दो कदम चल सकें, उसकी खुशी में शामिल हो सकें।

द्वारिकापुर घाट की भीड़, संक्रांति का सूरज, खेतों की हरियाली—सब उस मुलाकात की गर्माहट में कुछ और ही रंग ले बैठे। और उस युवक की चमकती आंखें—वह तो अब भी मेरे भीतर कहीं बैठी हैं, जैसे कोई छोटा-सा दीपक, जो बताता रहता है कि इंसानियत आवाजों पर नहीं, संवेदनाओं पर चलती है।

पता नहीं उस नौजवान का नाम क्या था? अगर मैं उसका नाम पूछता भी तो कैसे, और वह बताता भी तो कैसे?


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