सत्यम सफलता



मैं विफलता-सफलता की बात कर रहा था। सत्यम की वेब साइट, जो अब बड़ी कठिनाई से खुल रही थी (बहुत से झांकने का यत्न कर रहे होंगे), के मुख्य पन्ने पर बने विज्ञापन में एक छवि यूं है:

satyam success

सफलता लक्ष्य/परिणाम पर सतत निगाह रखने का मसला है।

काश सत्यम ने यह किया होता।

सत्यम छाप काम बहुत सी कम्पनियां कर रही होंगी। और आस पास देखें तो बहुत से लोग व्यक्तिगत स्तर पर उस प्रकार के छद्म में लिप्त हैं। अन्तर केवल डिग्री या इण्टेंसिटी का है। मिडिल लेवल इण्टेंसिटी वाले “सत्यमाइज” होते हैं। बड़े पापी मार्केट लीडर हो जाते हैं। छोटे छद्म वालों को कोई नोटिस नहीं करता।  

बाइबल की कथा अनुसार पतिता को पत्थर मारने को बहुत से तैयार हैं। पहला पत्थर वह मारे जो पाक-साफ हो!

सत्यम का शेयर ३९-४० रुपये पर बिक रहा है। खरीदने वाले तो हैं। सब पत्थर मार रहे हैं तो कौन खरीद रहा है?    


 अटल-अडवानी-शेखावत श्री भैरोंसिंह शेखावत भाजपा को बगलें झांकने को विवश कर रहे हैं। छियासी साल का शेर मैन ईटर हो गया है क्या? अब जाने कितने भाजपा के नेता भारत को करप्शन फ्री बनाने आगे आयेगे। अमेरिकन प्रेसिडेंशियल चुनाव की प्रीलिमनरी का मजा आने लगा है भारत में!
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और सोरेन गुरूजी गो-वेण्ट-गॉन?

विफलता का भय



विफलतायें अन्तत: सफलता में बदलती हैं। न बदलती होतीं तो लिंकन लिंकन न बन पाते। तब विफलताओं का भय क्यों लगता है?

(मैं अपनी कहूं तो) एक भय तो शायद यह है कि पहले असफल होने पर लगता था कि आगे बहुत समय है सफल होने का, पर अब लगता है विफलता चिपक जायेगी। उसके उलट यह भी है कि अब विफलताओं का परिणाम उतना भयावह नहीं होगा। कुल मिला कर अनिष्ट की आशंका समान होनी चाहिये। अंतर शायद यह है शरीर अब असफलता सहने की उतनी क्षमता नहीं रखता। या ज्यादा सही है कि शारिरिक अक्षमता को मनसिक रूप से गढ़ लिया है मैने?!

मेरी पत्नी मेरे आत्म-धिक्कार की मनोवृत्ति से बहुत खफा हैं। वे मेरी “इनीशियल एडवाण्टेज” न होने की फ्रेजॉलॉजी (phraseology – शब्दविन्यास) को निहायत घटिया सोच मानती हैं। इस पोस्ट की शुरुआत भी मैं उस “इनीशियल डिसएडवाण्टेज” की बात से कर रहा था – और उससे आत्मदया की भावना पर शायद कुछ सहानुभूति युक्त टिप्पणियां मिल जातीं; पर क्या बतायें, इतनी सुबुक-सुबुकवादी धांसूं शुरुआत की रेड़ मार दी रीता पाण्डेय ने! और मेरी हिम्मत नहीं है कि आत्मदया छाप कुछ ठेलने की!

होना यह चाहिये कि हर असफलता के बाद दोषारोपण का जो अनिवार्य खेल होता है, और आत्म-धिक्कार का सिलसिला चलता है, वह न हो। असल में कोई शिकार नहीं होता विफलता में। सब असफलता के वालण्टियर होते हैं। आप चुन सकते हैं कि आप वालण्टियर होंगे या विफलता से सीख कर सफलता का वरण करेंगे। सामान्यत: हम विफलता के वालण्टियर बनने की आदत पाल लेते हैं, जाने अनजाने में।

Picasso-Friendship विफलता का सही सबक लें तो लोगों की सही पहचान हो सकती है। विपदा में ही मित्र या शत्रु की सही पहचान होती है। फेयर वेदर मित्र तो सभी होते हैं। इन सही मित्रों का भविष्य की सफलता का भागीदार चुनना असफलता का बहुत बड़ा प्लस प्वॉइण्ट होता है।

विफलता का विश्लेषण एक जरूरी अंग है सफलता सुनिश्चित करने का। जैसे मैं यह पाता हूं कि रिजर्व नेचर (इण्ट्रोवर्ट होना) बहुत बार मेरी घबराहट/चिन्ता का संवर्धक होता है और मैं उचित समय पर उचित लोगों से संप्रेषण नहीं कर पाता। यह बदलने का सयास यत्न किया है, पर वह शायद काफी नहीं है। इसी प्रकार सभी लोग अपनी विफलता से सीखने का यत्न कर सकते हैं। और तब विफलता का भय खाने की बजाय उससे सकारात्मकता निर्मित हो सकती है।

(यह तो फुटकर सोच है। अन्यथा, विफलता का भय तो ऐसा विषय है जिसपर अनन्त लिख कर और कुछ न कर इत्मीनान से असफल हुआ जा सकता है!) 


कुहरे के बारे में पिछले दिनों बहुत कुछ झेला-सोचा-लिखा और सुना गया है मेरे रेलवे के परिवेश में। एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है कि जब कुछ दिखाई न दे रहा हो, तब ट्रेन चालक को पुख्ता जानकारी दिलाना कि वह कहां चल रहा है – एक महत्वपूर्ण सुरक्षा औजार है। इसी को ले कर एक कल एक कम्पनी वाले की ओर से पावरप्वाइण्ट प्रेजेण्टेशन था एक उपकरण के विषय में जो ग्लोबल-पोजिशनिंग सेटेलाइट्स का प्रयोग कर रेलगाड़ी के चालक को आगे कौन सा स्टेशन, पुल, लेवल क्रासिंग गेट या सिगनल आने वाला है, उसकी पूर्व सूचना प्राप्त कराता है। यह सूचना कोहरे के समय में बहुत महत्वपूर्ण है।  photo safeअभी हम यह जानने के लिये कि स्टेशन आने वाला है, एक खलासी को कोहरे के समय स्टेशन के बाहर भेजते हैं जो रेल पटरी पर पटाखे लगाता है और रेलगाड़ी के इन्जन के ऊपर से गुजरने पर पटाखे की आवाज से चालक को पता चलता है कि स्टेशन आने वाला है। यह बहुत बढ़िया सिस्टम नहीं है। बहुत कुछ पटाखे वाले की कार्यकुशलता पर निर्भर करता है कि उसने समय पर पटाखे लगाये या नहीं। जियो-स्टेशनरी सेटेलाइट्स से यह आसानी से पता चल सकेगा।

ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम का प्रयोग कर अनेकानेक प्रकार के बहुउपयोगी उपकरण सामने आयेंगे। यह फॉगसेफ उनमें से एक है। 


कुहासा



train-fog मौसम कुहासे का है। शाम होते कुहरा पसर जाता है। गलन बढ़ जाती है। ट्रेनों के चालक एक एक सिगनल देखने को धीमे होने लगते हैं। उनकी गति आधी या चौथाई रह जाती है।

हम लोग जो आकलन लगाये रहते हैं कि इतनी ट्रेनें पार होंगी या इतने एसेट्स (इंजन, डिब्बे, चालक आदि) से हम काम चला लेंगे, अचानक पाते हैं कि आवश्यकता से पच्चीस तीस प्रतिशत अधिक संसाधन से भी वह परिणाम नहीं ला पा रहे हैं। सारा आकलन – सारी प्लानिंग ठस हो जाती है।

सारी ब्लॉगिंग बन्द। सारा पठन – सारी टिप्पणियां बन्द। फायर फाइटिंग (या सही कहें तो कुहासा फाइटिंग) चालू। जब तक मौसम नहीं सुधरता, तब तक यह खिंचाव बना रहेगा।

मेरा कमरा, मेरे फोन, मेरा इण्ट्रानेट (जो मालगाड़ी परिचालन बताता है ऑनलाइन) और मेरे कागज – यही साथी हैं। खुद तो बाहर निकल कुहासा देख भी नहीं पा रहा।

चार घण्टे हो गये पहले के दिये निर्देशों को। चलें, देखें, कितनी बढ़ी गाड़ियां। कितना सुधरा या खराब हुआ ट्रेन परिचालन। (कल शाम को लिखा गया| यह रुटीन पिछले कई दिनों से चल रहा है। और शायद कई दिनों तक चलेगा।)


apj यह बड़ा ही अच्छा लगा कि डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम देश के अन्दर और बाहर के आतंकवादियों के ठिकानों को अटैक करने और उन्हें ध्वस्त करने की सलाह दे रहे हैं। इस्लामी और नक्सली/अन्य क्षेत्रीय आतंक के अड्डे देश में मौजूद हैं। उन्हें ध्वस्त करने की बात माननीय कलाम साहब कर रहे हैं।

इसके अतिरिक्त पड़ोस के देशों में भी यह अड्डे हैं जिनका सीधा सम्बन्ध भारत में आतंक फैलाना है। उन्हें ध्वत करने की संकल्प शक्ति देश में चाहिये। जनता का अगला मेण्डेट शायद इस फैक्टर को ध्यान दे। पर इसके लिये जनमत का व्यापक मोबलाइजेशन युवाशक्ति को करना होगा! पर युवा कौन है? डा. कलाम युवा हैं!


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