μ – पोस्ट!



अमित माइक्रो ब्लॉगिंग की बात करते हैं।

यह रही मेरी माइक्रो  ( Style Definitions */ p.MsoNormal, li.MsoNormal, div.MsoNormal {mso-style-parent:””; margin:0cm; margin-bottom:.0001pt; mso-pagination:widow-orphan; font-size:12.0pt; font-family:”Times New Roman”; mso-fareast-font-family:”Times New Roman”; mso-bidi-font-family:”Times New Roman”; mso-bidi-language:AR-SA;}@page Section1 {size:612.0pt 792.0pt; margin:72.0pt 90.0pt 72.0pt 90.0pt; mso-header-margin:36.0pt; mso-footer-margin:36.0pt; mso-paper-source:0;}div.Section1 {page:Section1;}–> μ) पोस्ट :
दिनकर जी की रश्मिरथी में कर्ण कृष्ण से पाला बदलने का अनुरोध नहीं मानता, पर अन्त में यह अनुरोध भी करता है कि उसके “जन्म का रहस्य युधिष्ठिर को न बता दिया जाये। अन्यथा युधिष्ठिर पाण्डवों का जीता राज्य मेरे कदमों में रख देंगे और मैं उसे दुर्योधन को दिये बिना न मानूंगा।”

कर्ण जटिल है, पर उसकी भावनायें किसकी तरफ हैं?


कुछ यादें



यह पोस्ट श्रीमती रीता पाण्डेय (मेरी पत्नी जी) की है| वर्तमान भारत की कमजोरियों के और आतंकवाद के मूल इस पोस्ट में चार दशक पहले की यादों में दीखते हैं –
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बात सन १९६२-६३ की है। चीन के साथ युद्ध हुआ था। मेरे नानाजी (पं. देवनाथ धर दुबे) को देवरिया भेजा गया था कि वे वहां अपने पुलीस कर्मियों के साथ खुफिया तंत्र स्थापित और विकसित करें। देवरिया पूर्वांचल का पिछड़ा इलाका था। न बिजली और न पानी। अस्पताल और स्कूल सब का अभाव था। इसलिये वहां कोई पुलीस कर्मी जल्दी पोस्टिंग पर जाना नहीं चाहता था। खुफिया तंत्र के अभाव में देवरिया में चीनी घुसपैठ नेपाल के रास्ते आसानी से हो रही थी। पास में कुशीनगर होने के कारण बौद्ध लामाओं के वेश में चीनी जासूस आ रहे थे और देवरिया में कुछ स्थानीय लोग प्रश्रय और सुरक्षा प्रदान कर रहे थे।

उस समय मैं तीन चार साल की थी। मेरी समझ बस इतनी थी कि हमें सिनेमा हॉल में खूब फिल्में देखने को मिलती थीं; हालांकि किसी फिल्म की कहानी या नाम मुझे याद नहीं है। जो सिपाही हमें ले कर जाते थे, वे बड़े चौकन्ने रहते थे। फिल्म देखना उनकी ड्यूटी का अंग था। उनके अनुसार फिल्म के अन्त में जब “जन गण मन” के साथ तिरंगा फहरता था तो सब लोग खड़े हो जाते थे, पर कुछ लोग बैठे रहते थे और कुछ लोग अपमानजनक तरीके से पैर आगे की सीट पर फैला देते थे। सिपाही जी की नजर उन चीनी मूल के लोगों पर भी थी, जो झण्डे की तरफ थूकने का प्रयास करते थे।

उस समय आतंकवाद तो नहीं था, पर साम्प्रदायिक भावना जरूर रही होगी। वोट बैंक की राजनीति इतने वीभत्स रूप में नहीं थी। तब की एक घटना मुझे और याद आती है। आजमगढ़ में हल्की-फुल्की मारपीट हुई थी। नानाजी वहां पदस्थ थे। पुलीस के लाठी चार्ज में कुछ लोग घायल हुये थे। पर स्थिति को काबू में कर लिया गया था। इस घटना की सूचना स्थानीय प्रशासन ने लखनऊ भेजना उपयुक्त नहीं समझा होगा। और दिल्ली को सूचित करना तो दूर की बात थी। पर दूसरे दिन तड़के ४-५ बजे पाकिस्तान रेडियो से समाचार प्रसारित हुआ – “भारत में, आजमगढ़ में दंगा हो गया है और मुसलमानों का कत्ले-आम हो रहा है। पुलीस हिन्दुओं के साथ है।”

साठ के दशक में पुलीस के पास बढ़िया वायरलेस सेट नहीं थे। संचार के साधन आदमयुग के थे। ऐसे में इतनी त्वरित गति से पाकिस्तान तक सूचना का जाना आश्चर्यजनक था। दिल्ली-लखनऊ वालों के कान शायद इस लिये खड़े हुये। कई अधिकारी निलम्बित हुये। छानबीन हुई। कुछ आपत्तिजनक सामान मिले। आगे की बातें मुझे ज्यादा याद नहीं हैं।

अब जब टीवी पर पैनल डिस्कशन सुनती हूं तो कई बातें याद आ जाती हैं जो नानाजी अपने रिटायरमेण्ट के बाद सुना दिया करते थे (वैसे वे बड़े घाघ किस्म के आदमी थे – जल्दी कुछ उगलते नहीं थे)।     


(नानाजी को दिवंगत हुये डेढ़ दशक हो गया। ऊपर का चित्र लगभग २२ वर्ष पहले का है।)


टेनी (डण्डी) मारने की कला



रविवार का दिन और सवेरे सवेरे रद्दी वाला रोका गया। घर की पिछले चार महीने की रद्दी बेचनी थी। पत्नीजी मुझे जाने कैसे इस बात में सक्षम मान रही थीं कि मैं उसके तोलने में टेनी मारने की जो हाथ की सफाई होती है, उसका तोड़ जानता हूं।

मैने भौतिक शास्त्र के मूल भूत नियमों के अनुसार वह तराजू की जिस भुजा में बाट रख कर रद्दीवाला तोल रहा था, उसमें आगे तोले जाने वाले अखबार रखने और बाट की जगह दूसरे भुजा में पहली बार तोले गये अखबार को बतौर बाट रखने को कहा।

यह आदेश सुन उस रद्दीवाले ने कहा – आप क्या कह रहे हैं? जैसा कहें वैसा तोल दूं। पर असली टेनी कैसे मारी जाती है, वह बताता हूं।

उसने हल्के से हाथ फिराऊ अन्दाज से एक भुजा दूसरे से छोटी कर दी। वह भुजा फ्री-मूविंग नहीं थी जो एक फलक्रम से नीचे लटक रही हो। उसने फिर कहा – अगर टेनी मारनी हो तो आप पकड़ न पायेंगे। पर आपने रेट पर मोल भाव नहीं किया है – सो मैं टेनी नहीं मारूंगा।

मैने उसे उसके अनुसार तोलने दिया। अन्तमें पुन: मैने पूछा – अच्छा बताओ कुछ टेनी मारी होगी या नहीं?

वह हंस कर बोला – नहीं। मारी भी होगी तो किलो में पचास-सौ ग्राम बराबर!

बन्दा मुझे पसन्द आया। नाम पूछा तो बोला – रामलाल। दिन भर में पच्चीस-तीस किलो रद्दी इकठ्ठी कर पाता है। उसने कहा कि एक किलो पर बारह आना/रुपया उसका बनता है। मैं यह मानता हूं कि यह बताने में भी उसने टेनी मारी होगी; पर फिर भी जो डाटा उसने बताया, उसे मॉडरेट भी कर लिया जाये तो भी बहुत ज्यादा नहीं कमाता होगा वह!


उद्धरण
थामस एल फ्रीडमेन ने (अमरीकी अर्थव्यवस्था की चर्चा में) कहा:

जॉर्ज डब्लू बुश ने कभी नहीं; एक बार भी नहीं; अमरीकी लोगों से कुछ मेहनत का काम करने को कहा। अगले राष्ट्रपति को यह लग्ज़री मिलने वाली नहीं। उन्हें हर आदमी को कुछ न कुछ कठिन करने को कहना ही होगा। 


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