मच्छरों से बचाव में प्रभावी वनस्पतियां



आज की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट में श्री पंकज अवधिया मच्छरों से बचाव के लिये अनेक जैविक विकल्पों की चर्चा कर रहे हैं। ये जैविक विकल्प बहुत आकर्षक लगते हैं। मुझे अपनी ओर से कुछ जोड़ना हो तो बस यही कि आदमी सफाई पसन्द बने तथा पानी को आस-पास सड़ने न दे। बाकी आप अवधिया जी का लेख पढ़ें।   


mosquito_bitingखून चूसती मादा मच्छर

डाँ. प्रवीण चोपडा जी ने कुछ समय पहले लिखी आपनी पोस्ट मे मच्छरों के विषय मे जिक्र किया था कि सुबह-सुबह पोस्ट लिखने के समय ये बहुत परेशान करते हैं और मुझसे कुछ वनस्पतियो के विषय मे जानकारी चाही थी। मैने उन्हे कुकरौन्दा का नाम सुझाया था। पता नहीं उन्होने इसका उपयोग किया या नहीं पर आज मै इस पोस्ट में मच्छरो पर प्रभावी वनस्पतियों के विषय मे लिखूंगा।

कुकरौन्दा का वैज्ञानिक नाम ब्लूमिया लेसेरा है और छत्तीसगढ में इसे कुकुरमुत्ता कहा जाता है। (आप इसे मशरुम न समझें। मशरुम को हमारे यहाँ फुटु कहा जाता है।) ब्लूमिया पूरे देश में खरपतवार की तरह उगता है। आप अपने आस-पास इसे आसानी से देख सकते हैं। इसकी पत्तियाँ तम्बाखू की पत्तियों की तरह होती हैं और इनसे तेज गन्ध आती है – कुछ-कुछ कपूर से मिलती-जुलती। यह तेज गन्ध इसमे उपस्थित तेल के कारण आती है। आमतौर पर पत्तियों को जलाकर धुँआ करने से मच्छर भाग जाते हैं पर अधिक प्रभाव के लिये इसके तेल का उपयोग होता है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों मे इस वनस्पति को सम्माननीय स्थान प्राप्त है। श्वाँस रोगों के लिये इसका प्रयोग होता है। इसे हर्बल सिगरेट में भी डाला जाता है।

आमतौर पर हम जो क्वाइल्स का इस्तमाल करते है या लिक्विड जलाते हैं उसमे एलीथ्रीन होता है जो कि एक रासायनिक कीटनाशी है। इसका धुँआ हमे नुकसान करता है पर विकल्प न होने के कारण देश भर में इसका उपयोग होता है। ब्लूमिया का धुँआ स्वास्थ्य के लिये लाभदायक है। यह आस-पास बेकार पौधे की तरह उगता है इसलिये लागत बच जाती है। इससे सस्ते मे मच्छरनाशक बनाया जा सकता है। कुछ वर्षो पहले दिल्ली के व्यापारियों ने इसमे रुचि दिखायी थी। उन्होने मेरे मार्गदर्शन मे यह उत्पाद बनाया और फिर बाजार मे सेम्पल उतारे। ग्राहकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक रही। पर स्थापित ब्राण्डों के कुशल बाजार प्रबन्धन के चलते जल्दी ही उन्हे हाथ खींचना पड़ा।

mosquito_crazy आप तो जानते है कि मच्छर किसी भी उत्पाद के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं कुछ समय में। इसलिये ब्लूमिया के कई नये रुप भी बनाये गये थे। एक बार बरसात के दिनो मे जंगल मे ही रात गुजारनी पड़ी। कीड़ों से बचने के लिये साथ चल रहे स्थानीय लोगों ने भिरहा नामक पेड़ की पत्तियों को जलाया। उसका प्रभाव गजब का था। उन्होने बताया कि घर में इसे जलाने से छोटे बच्चे इसके धुँये की कडवाहट के कारण रोने लगते हैं। मैने इस पत्ती को आजमाया ब्लूमिया के साथ और सफलता मिली। नीम को तो आजमाया ही गया। मच्छरों के अलावा मख्खियों को भी भगाने के लिये इसमे बच नामक वनस्पति को मिलाया गया। आपने पहले पढा है कि बच में वातावरण को साफ रखने की क्षमता होती है।

इन वनस्पतियो को मिलाकर जो उत्पाद बना उसके बहुत से उपयोग थे। बीमार व्यक्ति के कमरे में इसे जलाने से लेकर मख्खियों और मच्छरों को भगाने तक में इसकी उपयोगिता थी। इसमे चाक मिलाकर चीटीयों के लिये उपयोग किया जा सकता था। इस उत्पाद में केन्द्रीय भूमिका ब्लूमिया की ही थी।

होली मे हर बार अखबारों के माध्यम से मै ब्लूमिया को व्यापक पैमाने पर जलाने की अपील करता हूँ। यह धुँआ हवा को शुद्ध तो करेगा ही साथ ही मच्छरों से भी आधुनिक शहरों को मुक्ति दिलवायेगा। आज ग्रामीण बेरोजगारों की बडी आबादी हमारे गाँवो में है। यदि स्वयमसेवी संस्थाएं पहल करें तो ऐसे उत्पादो को उनके माध्यम से बनवाकर अच्छा बाजार उपलब्ध करवा कर उनकी सहायता की जा सकती है।

ब्लूमिया के चित्र और लेख १ 

ब्लूमिया के चित्र और लेख २

बच के चित्र और लेख १

बच के चित्र और लेख २

भिरहा के चित्र और लेख १

भिरहा के चित्र और लेख २

भिरहा के चित्र और लेख ३

पंकज अवधिया

© लेख पर सर्वाधिकार श्री पंकज अवधिया का है।


आलोक ९-२-११, फटी बिवाई और फॉयरफॉक्स ३-बीटा



फॉयरफॉक्स पर आलोक ९-२-११ ने फरवरी में लिखी अपनी स्पेशल कबीरपन्थी स्टाइल (यानी जिसे समझने के लिये बराबार का साधक होना अनिवार्य है) में पोस्ट। अपनी समझ में नहीं आयी सो उसपर टिपेरे भी नहीं। यह जरूर याद आता है कि पढ़ी थी और उससे फॉयरफॉक्स के उस पन्ने पर भी गये थे जहां से फॉयरफॉक्स ३ बीटा को डाउनलोड करना था। उस पन्ने पर भी डेवलेपर टेस्टिंग जैसे हाई-टेक शब्द थे और डाउनलोड 7MB का था। लिहाजा हम दबे पांव वापस हो लिये थे।

अब आलोक जी ने हमारी ट्रैक्टर वाली पोस्ट में टिप्पणी में कहा है कि फॉयरफॉक्स ३ से फुल्ली जस्टीफाइड टेक्स्ट का फटा फटा नजर आना खतम हो जाता है। यानी फॉयरफॉक्स ३ हिन्दी नेट ब्राउजिंग के लिये इचगार्ड/रिंगकटर/जालिमलोशन या ऐसा कोई मलहम हो गया जो फटी बिवाई ठीक करता है।

हमने दोपहर की नींद, जो बुद्ध पूर्णिमा की छुट्टी से नसीब हुई थी, काट कर पहला काम फॉयरफॉक्स ३ बीटा को इन्स्टॉल करने का किया। और जो सामने आया वह सूपर मस्त था। आप फॉयरफॉक्स ३ बीटा के पहले फटी बिवाई वाला और उसके बाद चमकदार अक्षरों वाला वही पेज फॉयरफॉक्स में देखें। यह एक नये ब्लॉग – पोयम कलेक्शन श्रेय तिवारी का पेज है।

फटी बिवाई वाला पुराने फॉयरफॉक्स में पेज

Before

फॉयरफॉक्स ३ बीटा में स्पष्ट चमकदार दिखता पेज

After

आलोक ९-२-११ की जै। आप लगे हाथ फॉयरफॉक्स ३ बीटा इन्स्टॉल कर लें, अगर पहले ही न किया हो! हां, यह आपके कई ऐड-ऑन गायब कर देता है और उसमें गूगल सर्च भी है!

अब हम होते हैं नौ दो ग्यारह!


ट्रैक्टर ट्रॉली का जू-जू



ट्रैक्टर और ट्रॉली का युग्म मुझे हाथी की तरह एक विचित्र जीव नजर आता है। हाथी में हर अंग अलग-अलग प्रकार का नजर आता है – एक लटकती सूंड़, दो तरह के दांत, भीमकाय शरीर और टुन्नी सी आंखें, जरा सी पूंछ। वैसे ही ट्रैक्टर-ट्रॉली में सब कुछ अलग-अलग सा नजर आता है। मानो फॉयरफॉक्स में फुल्ली जस्टीफाइड हिन्दी का लेखन पढ़ रहे हों।@ सारे अक्षर बिखरे बिखरे से।

रेलवे, लेवल क्रॉसिंग के प्रयोग को ले कर जनजागरण के लिये विज्ञापन पर बहुत खर्च करती है। पर आये दिन दुर्घटनाओं, बाल बाल बचने या बंद रेलवे क्रॉसिंग के बूम तोड़ कर ट्रैक्टर भगा ले जाने की घटनायें होती हैं। लगता है ढ़ेरों फिदायीन चल रहे हों ट्रैक्टरों पर।

JUGADजुगाड़ का एक जीवन्त चित्र श्री नरेन्द्र सिंह तोमर द्वारा

शहर और गांव में दौड़ती ट्रेक्टर ट्रॉलियां मुझे बहुत खतरनाक नजर आती हैं। कब बैलेन्स बिगड़े और कब पलट जायें – कह नहीं सकते। रेलवे के समपार फाटकों पर तो ये नाइटमेयर हैं – दुस्वप्न। बहुत अनस्टेबल वाहन। ईट या गन्ने से लदे ये वाहन आये दिन अनमैन्ड रेलवे क्रॉसिन्ग पर ट्रेन से होड़ में दुर्घटना ग्रस्त होते रहते हैं। वहां इनके चालक सामान्यत ग्रामीण नौजवान होते हैं। उनके पास वाहन चलाने का लाइसेंस भी नहीं होता (वैसे लाइसेंस जैसे मिलता है, उस विधा को जान कर लाइसेंस होने का कोई विशेष अर्थ भी नहीं है) और वे चलाने में सावधानी की बजाय उतावली पर ज्यादा यकीन करते प्रतीत होते हैं। इसके अलावा, ट्रैक्टर और ट्रॉलियों का रखरखाव भी स्तर का नहीं होता। कई वाहन तो किसी कम्पनी के बने नहीं होते। वे विशुद्ध जुगाड़ ब्राण्ड के होते हैं। यह कम्पनी (आंकड़े नहीं हैं सिद्ध करने को, अन्यथा) भारत में सर्वाधिक ट्रैक्टर बनाती होगी!

मुझे एक रेल दुर्घटना की एक उच्चस्तरीय जांच याद है – ट्रैक्टर ट्रॉली का मालिक जांच में बुलाया गया था। याकूब नाम का वह आदमी डरा हुआ भी था और दुखी भी। ट्रैक्टर चालक और ४-५ मजदूर मर गये थे। कुछ ही समय पहले लोन ले कर उसने वह ट्रैक्टर खरीदा था। जांच में अगर ट्रैक्टर चालक की गलती प्रमाणित होती तो उसके पैसे डूबने वाले थे और पुलीस केस अलग से बनने वाला था। पर याकूब जैसा भय व्यापक तौर पर नहीं दीखता। रेलवे, लेवल क्रॉसिंग के प्रयोग को ले कर जनजागरण के लिये विज्ञापन पर बहुत खर्च करती है। पर आये दिन दुर्घटनाओं, बाल बाल बचने या बंद रेलवे क्रॉसिंग के बूम तोड़ कर ट्रैक्टर भगा ले जाने की घटनायें होती हैं। लगता है ढ़ेरों फिदायीन चल रहे हों ट्रैक्टरों पर।tractor01

ट्रैक्टर ट्रॉली की ग्रामीण अथव्यवस्था में महत भूमिका है। और किसान की समृद्धि में वे महत्वपूर्ण इनग्रेडियेण्ट हैं। पर भारत में सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी को हलाल कर सब अण्डे एक साथ निकाल लेने का टेम्प्टेशन बहुत है। ट्रैक्टर – ट्रॉली के रखरखाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता। जुगाड़ का न केवल ग्रामीण खेती और माल वहन में योगदान है, वरन यात्री वाहन के रूप में बहुपयोगी है। बहुत सी शादियां जुगाड़ परम्परा में जुगाड़ और ट्रॉली के प्रयोग से होती हैं।

मैं यह अन्दाज नहीं लगा पा रहा हूं कि डीजल और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की बढ़ती कीमतों के चलते ट्रेक्टर-ट्रॉली-जुगाड़ सीनारियो में कुछ बदलाव आयेगा या इनका जू-जू कायम रहेगा।


@ आजकल हर रोज डबल डिजिट में नये ब्लॉग उत्पन्न हो रहे हैं और उनमें से बहुत से फुल्ली जस्टीफाइड तरीके से अपनी पोस्ट भर रहे हैं। फॉयरफॉक्स में आप उनपर क्लिक करने के बाद दबे पांव वापस चले आते हैं। वर्ड वेरीफिकेशन तो बहुतों ने ऑन कर रखे हैं। नयी कली सुनिश्चित करती है कि वह कांटों से घिरी रहे! कोई उसे पढ़ने-टिप्पणी करने की जहमत न उठाये!



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