भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
घर में पेड़ों पर आम इस बार पर्याप्त लगा। उन्हें तोड़ने के लिये हमें खोंचा की जरूरत नहीं पड़ी। हमारे आम के पेड़ बहुत ऊंचे नहीं हैं। कलमी हैं और उनकी उम्र भी सात साल से ज्यादा नहीं। यहां गांव में बसने पर ही रोपे थे। उन पेड़ों पर आम हाथ बढ़ा कर या लग्गी से तोड़ा जा सकता है। तोड़ने के लिये भी किसी प्रोफेशनल आम-तोड़क को नहीं बुलाना पड़ा। हमारे ड्राइवर अशोक ने ही वह काम कर दिया। अशोक दुबला और लम्बा है। उसकी जद में, जब वह अपने हाथ ऊंचे करता है, कई आम वैसे ही आ जाते हैं। बाकी तोड़ने के लिये उसने छोटी बड़ी लग्गियाँ बनाई थीं। घर भर में देखता हूं तो चार लग्गियां दिख रही हैं।
अब आम तोड़ने का अनुष्ठान सम्पन्न हो गया। आम टोकरों में गांजे गये थे। वे भी लगभग खत्म हो रहे हैं। अंतिम खेप अब खाई जानी है। बांटने के बाद भी काफी आम खाने को मिले। हमने डाईबिटीज के विद्वानों की हॉरर स्टोरीज पर बिल्कुल भी कान नहीं दिया। आम खाये, फिर शुगर चेक किया। शुगर चेक किया और फिर आम खाये। आम तो फ्री के थे, पर शूगर चेक करने का खर्चा कम नहीं हुआ होगा। चूंकि हमारा ब्लड-शुगर नियंत्रण में रहा – बावजूद इसके कि मैंने और पत्नीजी ने 8-10 आम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति खाये या चूसे होंगे। सो, हम कह सकते हैं कि हमारे घर के आम मीठे भी हैं, रसीले भी और शुगर-फ्री भी!
लग्गी दिव्यांग हो गयी है।
आम ओरा गये हैंं तो मैं लग्गियों की बात की जाये। पानी के कण्डाल पर अटकाई आम के पेड़ के नीचे उपेक्षित पड़ी लग्गी का हुक बड़े मनोयोग से अशोक ने बांधा था। इतने आम तोड़े गये कि वह खींचने वाला कोना ही टूट गया है। लग्गी दिव्यांग हो गयी है। अगले सीजन तक तो रहेगी नहीं नयी बनानी होगी।
इसके अलावा एक लग्गी तो समूची पड़ी है। उसकी ऊंचाई बढ़ाने के लिये एक और बांस या लकड़ी को बीच में लोहे के तार से बांधा गया है। दुगनी ऊंचाई की लग्गी! अब एक साल भर तक इसका कोई उपयोग ही नहीं है। कोई उपयोग नहीं है तो कोई उठा कर भी नहीं ले जायेगा। हो सकता है सर्दियों में इसे तोड़ कर कऊड़ा जलाने में इस्तेमाल कर लिया जाये। अगले साल नये आम होंगे, अशोक नई लग्गियां बनायेगा। अभी तो ये सभी उपेक्षित हो गयी हैं। गौतमस्थान की अहिल्या की तरह। प्रतीक्षा करतीं कि कोई आम आयेंगे और उनका उद्धार करेंगे!
ऊंचाई बढ़ाने के लिये एक और बांस या लकड़ी को बीच में लोहे के तार से बांधा गया है। दुगनी ऊंचाई की लग्गी!
आम की खेप खत्म होने का अहसास डिप्रेस कर रहा है। आमेनिया हो रहा है हमें। और घर परिसर में घूम कर उपेक्षित हो चुकी लग्गियों को देख जीवन की अप्रासंगिकता-नश्वरता पर दार्शनिक विचार मन में आ रहे हैं। मैं यह तय नहीं कर पा रहा कि इस छोटी ब्लॉग पोस्ट को हास्य की श्रेणी में रखूं या जीवन दर्शन की श्रेणी में।
खैर, आशावादी हुआ जाये। युग बदलेगा। आम आयेंगे। लग्गी रूपी अहिल्या का उद्धार करेंगे। लग्गी खत्म भी हुई तो उसका पुनर्जन्म होगा। लग्गी हिंदू है – उसका पुनर्जन्म तय है। कयामत तक उसे आम की प्रतीक्षा थोड़े ही करनी है। बस साल भर की बात है!
अभी तो ये सभी उपेक्षित हो गयी हैं। गौतमस्थान की अहिल्या की तरह। प्रतीक्षा करतीं कि कोई आम आयेंगे और उनका उद्धार करेंगे!
गांव में आने के बाद हमने एक पौधा चीकू का लगाया था। उस समय घर खेत ही था। कोई पेड़ नहीं। सो बहुत से पेड़ों के पौध लगाये। सन 2016 में बारिश शुरू होने के साथ ही लगाये होंगे। खेत की जमीन उपजाऊ है तो लगभग सभी पौधे लग गये। चीकू को पानी भी दिया जाने लगा। वह पनप गया। लेकिन जमीन की नमी का लाभ एक शीशम के बीज ने उठा लिया। जाने कहां से वह उड़ कर आया और चीकू की बगल में ही उग गया। चीकू के मुकाबले बहुत तेजी से बढ़ने वाला पौधा होता है शीशम। दो साल में वह पेड़ बन गया और चीकू एक छोटी झाड़ी जैसा ही रहा। जमीन की सारी उर्वरा शक्ति शीशम खींच लेता था।
उस रोज रात में बारिश हो रही थी। चीकू का गाछ झूम रहा था। सारा ध्यान उसी पर जा रहा था।
शीशम और सागौन के कई वृक्ष पनप गये थे। तो यह निर्णय लिया गया कि शीशम को वहां से हटा कर चीकू को पनपने का अवसर दिया जाये। उसे काट दिया, पर रक्तबीज की तरह वह पुन: पनप गया और चीकू की बढ़त जस की तस रही। एक कुपोषित बच्चे की तरह – स्टंटेड (Stunted – उम्र के हिसाब से अवरोधित ऊंचाई का झाड़)! फिर रामसेवक जी ने खोद कर शीशम की जड़ समूल रूप से निकाली। जब शीशम परिदृष्य से गायब हुआ, तब चीकू बढ़ने लगा। इस साल तो उसमें फल भी लगे हैं। कम ही हैं – पंद्रह बीस फल। पर पूर्वांचल के इस हिस्से में चीकू के फल आना अपने आप में आनंददायक है।
हमने सारे फल तोड़ कर एक छोटे टब में पकने रख दिये।
उस रोज रात में बारिश हो रही थी। चीकू का गाछ झूम रहा था। सारा ध्यान उसी पर जा रहा था। अगले दिन यह सोच कर कि तेज हवा में उसके फल टूट कर बरबाद न हो जायें, हमने सारे फल तोड़ कर एक छोटे टब में पकने रख दिये। कल एक दो पके फल खाये। बहुत मीठे! फल बहुत बड़ी साइज के नहीं हैं। पर स्वाद में अच्छे हैं। सात साल बाद चीकू लगाना सार्थक हुआ।
चीकू पर नई कलियां सी फिर आ रही हैं।
आज मैं देख रहा हूं कि चीकू पर नई कलियां सी फिर आ रही हैं। झूमती डाल के साथ चित्र लेना कठिन लगा, पर मन भी चीकू के पेड़ के साथ झूमा।
घर परिसर में घूम कर देखा। दो व्यक्तियों के खाने लायक भिण्डी मिल गयी। नींबू में तो फल-फूल नहीं दिखे, पर उसी के मौसेरे भाई हजारा में फूल भी नजर आये और फल भी लग गये हैं। फल देख कर अच्छा लगा। हजारा भी मानसून की हवा में झूम रहा था। चित्र लेते समय मोबाइल के शीशे पर भी एक दो बूंदें गिरीं। मौसम तो नम है ही। नब्बे फीसदी आद्रता है और दिन में उतनी ही बारिश का अनुमान। मौसम शीतल है तो उमस नहीं लग रही। हजारा के पास ही एक बुलबुल थी। वह कुछ ट्यून सा बजा कर उड़ गयी।
हजारा में फूल भी नजर आये और फल भी लग गये हैं।
घर परिसर में सौ कदम चलना, पेड़-पौधों को निहारना और उनकी हरियाली आंखों से सोखना – मानसून के मौसम की नियामत है। घर से बाहर नहीं निकलना हो रहा। गांव में कीचड़ है और बारिश में भीगने का भी भय है। पर यहीं चहलकदमी करते चीकू, हजारा, बेला, भिण्डी और बुलबुल निहारना भी कम आनंद नहीं देता।
हर साल जून के महीने में मुझे अलेक्जेण्डर फ्राटर की ‘चेजिंग द मानसून’ की याद आती है। हर साल सोचता हूं कि उसे पढ़ूंगा और हर साल मानसून आने पर मन उसी में लग जाता था, किताब का नम्बर नहीं लगता था। पर इस साल लेट लतीफ रहा मानसून। अंतत: पच्चीस जून को रात में एक घण्टे बारिश से सूचना मिली की वह आ गया है। सूने और ठिठकते मानसून में यह पुस्तक पढ़नी प्रारम्भ कर दी।
लोग कहेंगे कि यह भी कोई बात हुई। मानसून की बात हो तो मेघ और मेघदूत की याद आनी चाहिये। कालिदास की पुस्तक उलटनी पलटनी चाहिये। पर मेघदूत रस की पुस्तक है। मेरी उम्र में वह बहुत आकर्षित नहीं करती।
अभी तीन चेप्टर पढ़े हैं चेजिंग द मानसून के। और अच्छी ही लग रही है किताब। पुस्तक में मानसून के साथ साथ भारत की यात्रा है 1990 के दशक में। तब शायद उपग्रहों का प्रयोग मॉनसून की ट्रेकिंग में कम, गुब्बारों का अधिक हुआ करता रहा होगा। हाइड्रोजन से भरे ये मौसमी गुब्बारे एक निश्चित ऊंचाई तक उड़ते थे और हवा के साथ साथ बहते थे। उनकी दशा देख कर मानसून का अनुमान लगाया जाता था। अब तो मेरे स्मार्टफोन में चार पांच एप्प हैं जो अलग अलग एजेंसियों के बादलों के चित्र और हवा के बहाव के ग्राफिक देते हैं। अब तो पांचवी कक्षा का बच्चा भी काफी आत्मविश्वास से मानसून के बारे में बातचीत कर सकता है।
चेजिंग द मानसून मानसून के साथ यात्रा का विवरण ही नहीं है, वह बदलते तीन चार दशकों में मौसम विज्ञान की तकनीक और मानसून के चरित्र को भी इंगित करता है।
29 जून 23
मानसून आ गया है। पर यह आना भी कोई आना है? नौकरानी आ कर खबर देती है – “झिलसी पड़त बा। (एक दो बूंदें पड़ रही हैं।)” मौसम का एप्प अठ्ठासी प्रतिशत बारिश बताता है। इस ‘झिलसी’ को भी वह बारिश में गिन लेता होगा? अभी वह अठ्ठासी प्रतिशत बारिश बताता है, फिर चुपके से उसे 25 प्रतिशत में बदल देता है। बारिश होती ही नहीं। सूरज की रोशनी कुछ मद्धम होती है। फिर जस का तस। उमस है पर वह भी कस कर नहीं है। ज्यादा उमस हो तो उम्मीद हो जाती है कि बारिश भी कस के होगी। वैसा कुछ नहीं होता। दो तीन दिन और चला तो लोगों ने धान की नर्सरियां बना रखी हैं, उनमें पानी ट्यूब वेल से देना पड़ेगा।
मैं बिंग इमेज क्रियेटर को गांव के मानसून के चित्र बनाने को कहता हूं तो वह छाता लिये गांव की महिलाओं को गांव के कच्चे रास्ते पर चलते दिखाता है।
मैं बिंग इमेज क्रियेटर को गांव के मानसून के चित्र बनाने को कहता हूं तो वह छाता लिये गांव की महिलाओं को गांव के कच्चे रास्ते पर चलते दिखाता है। उससे प्रभावित हो कर मैं घर में काम करने वाली महिलाओं और ड्राइवर के लिये इस मानसून के लिये छाते खरीद लेता हूं। छाते मंहगे हो गये हैं। तीन छाते पांच सौ दस रुपये के। हर साल उन्हें छाते दिये जाते हैं। वे छाते उनका पूरा परिवार इस्तेमाल करता है। मौसम गुजरते गुजरते वे नजर नहीं आते। हमारे अपने छाते तीन साल से चल रहे हैं पर उनके हर साल खत्म हो जाते हैं।
मानसून ठिठकता आ रहा है, पर कुछ गतिविधियां उसके अनुसार होने लगी हैं। अब सवेरे उपले पाथती महिलायें दिखनी कम हो गयी हैं। उसकी बजाय अपने ईंधन – लकड़ी, रंहठा, उपले आदि छत के नीचे रखने की कवायद हो रही है। कौन सी चीज घर के अंदर रखी जाये और कौन सी बाहर रह सकती है; इसका निर्णय कर रहे हैं लोग।
सुग्गी अगले तीन महीने उपले पाथने की बजाय हमारे घर के पिछवाड़े अपनी भैंस का गोबर ला कर जमा करने लगी है। वह गोबर तीन महीना सड़ कर खाद बनेगा। खाद हमारे बगीचे और उसके खेत में इस्तेमाल होगा। कोने में खपरैल के घर में रहने वाला करिया पासी परेशान था कि बारिश से बचाव के लिये छप्पर ठीक करने को कुम्हार अब नरिया-थपुआ बनाते ही नहीं। मन मार कर उसने ईंट का इंतजाम कर पक्का मकान बनाना शुरू कर दिया है। आधे से ज्यादा बन भी गया है।
टुन्नू पण्डित के अहाते में पानी भर गया है।
रात में आंधी पानी था, पर बहुत ज्यादा नहीं सवेरे बिजली कड़कने के साथ ठीकठाक बारिश हो गयी। पड़ोसी टुन्नू पण्डित के यहां मकान रिनोवेशन का काम चल रहा है। आज की बारिश के कारण काम करने वाले नहीं आये। बारिश के महीने में काम लगाया है। अवरोध तो आते ही रहेंगे। पर टुन्नू पण्डित प्रकृति के अवरोधों की बहुत परवाह नहीं करते। खेती किसानी में प्रकृति की सुनी जाती है। उसमें भी बहुत ज्यादा निर्भरता नहीं है। बारिश कम हो तो ट्यूब-वेल तो उनके पास है ही। अतिवृष्टि की दशा में कुछ फसलें – मसलन उड़द पर दुष्प्रभाव होता है। शेष सभी काम तो अपने संसाधनों की उपलब्धता और क्षमता से तय होते हैं।
आज ईद है। पर फिर भी बिजली चली गयी। आंधीपानी के बावजूद भी ईद के दिन तो बिजली आनी चाहिये थी। भाजपा की सरकार जो है! यही अखिलेश जी की होती तो मौसम की परवाह किये बिना सिर के बल खड़े हो कर घण्टाये चौबीस बिजली देते आज के दिन बिजली विभाग वाले।
रात में मरे पतंगों के पंख नजर आ रहे हैं। उनके शरीर तो हाई-प्रोटीन डाइट बने होंगे चिड़ियों के लिये।
आज चिड़ियां भी नहीं आयीं। कुछ तो पानी में परेशान होंगी और कुछ रात में मरे पतंगों के शरीर के हाई प्रोटीन का भोजन पा कर हमारे शाकाहारी रोटी-दाना-नमकीन में उनकी रुचि नहीं है। मेरी पत्नीजी ने प्रतीक्षा की उनकी पर उन्हें न पा कर उन्हें कोसती हुई अपने काम में लग गयीं। बारिश आ गयी है तो कई चीजें सहेजनी हैं। बहुत को बारिश से और बहुत सी चीजों को नमी से बचाना है। मानसून जीवन भी देता है पर बहुत कुछ बरबाद भी करता है।
छत पर पानी रुक गया है। पत्तियों ने नाली बंद कर दी है। उसे खोला गया तो वेग से पानी नीचे गिर रहा है। साल भर में जमीन पर भी पेड़ों की जड़ें बढ़ी हैं और उनसे पानी की निकासी का मार्ग भी बदला है। पिण्टू को बुला कर कुछ खड़ंजा ठीक कराना होगा। पानी के रुकने और बहने की दिशा बताती है कि कुछ काम कराना ही होगा। हमारा जीवन मात्र मानसून का आनंद लेने का नहीं है। काम भी बढ़ जाता है।
आज की बारिश के बाद सांप निकलेंगे। वैसे इतने सालों में यह तो पता चल गया है कि अधिकांशत: वे भले कोबरा जैसे दीखते हों पर हैं चूहे खाने वाले असाढ़िया सांप ही। फिर भी सावधान तो रहना ही होता है। घर के अंदर तो नहीं आते – पूरा घर जाली से पैक है – पर कभी कभी संपोले जरूर आ जाते हैं नाली के रास्ते। और गोजर तो दीखने लग गये हैं। आज बारिश के बाद इधर उधर इल्लियां भी घूमने लगी हैं।
मानसून ठिठकता आया है। लेट लतीफ, शरमाता हुआ। पर एकबारगी पसर तो गया है। आनंद भी दे रहा है और काम भी।
चेजिंग द मॉनसून का चौथा चेप्टर पढ़ना प्रारम्भ कर रहा हूं मैं। … वैसे आसपास ठिठकता मानसून जो कुछ दिखा रहा है; उसके आधार पर सीक्वेल लिखा जा सकता है – “अनमने मानसून में गांव”।
जाते अषाढ़ की बारिश में यह जर्जर तखत भी नहा लिया है।