रीपोस्ट : कछार की पहली तेज बारिश के बाद


यह पूरे दस साल पहले की पोस्ट है। जून की 9वीं तारीख। साल 2013। आज जून की 9 तारीख है और साल 2023।

दस साल पहले मैं इलाहाबाद (अब प्रयाग राज) के शिवकुटी इलाके में रहता था। गंगा नदी से 250 कदम दूर। उस साल इस दिन पहली तेज बारिश हुई थी। इस साल तेज गर्मी पड़ रही है। मानसून अभी केरल को ही छुआ है। केरल भी पूरी तरह भिगो पाया है या नहीं, वह खबर अभी पढ़ने में नहीं आई। अब लगता है बीस जून को ही हल्की फुल्की बारिश होगी इस इलाके में। मानसून या प्री मानसून बारिश आसपास है ही नहीं।

उस समय मैं गंगाजी के कछार में जाया करता था सवेरे सैर करने को। और वहां रेत तथा गंगा जी एक पानी में सूर्योदय के समय बहुत कुछ दीखता था। वैसा तिलस्म भरा अनुभव यहां गांव की गंगा किनारे नहीं होता।

दस साल पहले की याद आ रही है। उस समय की पोस्ट पुन: प्रस्तुत है –


09 जून 2013

रात में बारिश बहुत हुई। सवेरे आसमान में बादल थे, पर पानी नहीं बरस रहा था। घूमने निकल गया। निकला जा सकता था, यद्यपि घर से गंगा घाट तक जाने कितने नर्क और अनेक वैतरणियाँ उभर आये थे रात भर में। पानी और कीचड़ से पैर बचा कर चलना था।

घाट की सीढ़ियों के पास मलेरिया कुण्ड है। सीवर का पानी वहां इकठ्ठा है और करोड़ों मच्छर थे वहां। पर बारिश के बाद आज एक भी नहीं दिखा। पंख भीग गये होंगे शायद उनके। मच्छरों की जगह अनेक मेढ़क अपनी अपनी बिलों से निकल आये थे और कुण्ड के आस पास की घास में समवेत वेदपाठ कर रहे थे। पीले, मुठ्ठी के आकार के मेढ़क। वे जब अपने गलफड़े खोलते थे तो बहुत बड़ा श्यामल गुब्बारा बन जाता था।

मलेरिया कुण्ड के किनारे पीले मेढ़क दिख रहे हैं - वेदपाठ करते।
मलेरिया कुण्ड के किनारे पीले मेढ़क दिख रहे हैं – वेदपाठ करते।

गड्डी गुरू ने कहा कि कोई बंगाली होता तो इन सभी को पकड़ ले जाता। अचार बनता है इनका। बड़े मेढ़क का बड़ा टर, छोटे का छोटा टर! … जीव जीवस्य भोजनम!

बरसात के रात में कछार में मिट्टी बही थी। रेत और मिट्टी से सनी जमीन पर चलते हुये वह सैण्डल के तल्ले में चिपक गयी। भारी तल्ले से चलने में कठिनाई होने लगी। उसे हटाने के लिये आठ दस बार पैर पटका, पर सफलता आंशिक ही मिली।

बदसूरत सांवला ऊंट कल दिखा था कछार में। वह स्वस्थ भी नहीं लगता और उसकी त्वचा भी बहुत रुक्ष है। आज सवेरे भी गंगाकिनारे दिखा। परित्यक्त सब्जी के खेतों की वनस्पति खा रहा था। उससे सावधानी वाली दूरी बनाते हुये उसके चित्र लिये। पूर्व में बादलों के कारण सूर्योदय नहीं हुआ था, पर रोशनी थी। उसमें ऊंट का चलता हुआ मुंह दिख रहा था साफ साफ। मैने मोबाइल के कैमरे को इस तरह से क्लिक करना चाहा कि उसका खुला मुंह दिखे। इसके लिये दो-तीन ट्रायल करने पड़े।

ऊंट, छुट्टा चरता हुआ।
ऊंट, छुट्टा चरता हुआ।

[मैंने आज 9जून 2023 को बिंग फोटो जेनरेटर को कछार में ऊंट का चित्र बनाने को कहा। उसने यह बनाया।

खराब नहीं है। आगे पोस्टों में एआई को पिक्चर जेनरेट करने को कहा जा सकता है! इस पोस्ट का हेडर भी बिंग फोटो जेनरेटर का ही बना है। पता नहीं इसपर बिंग का स्वामित्व है या नहीं। मैंने अपना वाटरमार्क लगा दिया है। आखिर चित्र की रूपरेखा मैंने बताई और इसे बनाया भी एक मशीन ने है, किसी आदमी ने नहीं! :-)]

सूरज उग नहीं पा रहे थे बादलों के कारण। यद्यपि उनकी लालिमा दिख रही थी। अचानक वे बादलों की ओट से झांके और लगभग दो मिनट में पूरी तरह उदित हो गये।

सूरज बादलों की ओट से झांकने का प्रथम प्रयास करते हुये।
सूरज बादलों की ओट से झांकने का प्रथम प्रयास करते हुये।

गंगाजी में पीछे कहीं की बारिश से पानी दो-तीन दिन से बढ़ रहा है। आज भी कुछ और बढ़ा था। चार दिन पहले घुटने भर पानी में हिल कर टापुओं पर जाया जा सकता था और स्नान करने वाले टापुओं पर जा कर गंगा की मुख्य धारा में नहाते थे। कल बढ़े पानी के कारण लोग ठिठक रहे थे। आज देखा कि पास वाली धारा में हिल कर जाना सम्भव नहीं था। लोगों ने अपना घाट बदल कर यहीं पास में कर लिया था। एक व्यक्ति फिर भी हिम्मत कर टापू पर जाने के लिये पानी में हिला। आधी दूरी पानी में चलने के बाद पानी उसके सीने तक आ गया। उसे जो हो रहा हो, पता नहीं, मुझे बेचैनी होने लगी। मन हुआ कि बोलूं वापस आ जाओ! पर वह चलते हुये धारा पार कर टापू पर पंहुच गया।

गंगा किनारे फैंकी गयी वस्तुयें – फूल, डलिया, पूजा सामग्री के रैपर आदि गीले हो गये थे बारिश में। एक विषम जोड़ी जूतों की भी पड़ी थी। अगर गंगा ऐसे बढ़ती रहीं तो एक दो दिन में ये जूते जल में बह कर पवित्र हो जायेंगे! जय गंगामाई! जूते का भी उद्धार हो जायेगा! पर जिस आदमी ने फैंके, उनका तो कदापि उद्धार न हो माई!

गंगा को प्रदूषित करने वालों की ऐसी तैसी होनी ही चाहिये!

ये ऑड पेयर के जूते एक दो दिन में बढ़ती गंगा में समा जायेंगे! :-(

वापसी में देखा – पण्डा अपनी गठरी छतरी लिये चले आ रहे थे। बारिश के कारण आज देरी से थे। कोटेश्वर महादेव पर खुले में बैठने वाली मालिन गीले फर्श और ऊपर पीपल से झरती पानी की बून्दों के कारण हवन वाली जगह पर टीन की छत के नीचे अपनी दुकान लगाये थी।

हवा ठण्डी थी। लोग प्रफुल्ल लग रहे थे। रामकृष्ण ओझा भी देर से आ रहे थे स्नान को। जोर जोर से बोलते हुये – “बोल धड़ाधड़ राधे राधे, बोल ब्रिन्दाबन बिहारीधाम की जै!”

एक अच्छा दिन ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिये…


आज का आत्मबोध


सवेरे गुन्नीलाल पांड़े और राजन भाई दुबे आये। चाय पिलाई गयी। साथ में दो वेराईटी की नमकीन और बिस्कुट। मिठाई एक दिन पहले खतम हो गयी थी तो उसका मलाल रहा मेम साहब को। उनके भाई लोग आयें और सत्कार में मिठाई न हो – कितनी खराब बात है।

ससुरारी में घर बनाया है तो बनाते समय यह ख्याल था कि मेम साहब के आधा दर्जन सगे या चचेरे भाईयों का सपोर्ट सिस्टम रहेगा। रिटायर्ड जिंदगी में सपोर्ट सिस्टम बहुत जरूरी है। पर यह नहीं मालुम था कि मेम साहब, उनके भाई भौजाई, मायका एक तरफ और निरीह हम एक तरफ होंगे। वैसे भी उम्र बढ़ने के साथ जीजा और फूफा निहायत दोयम दर्जे के नागरिक माने जाने लगे हैं भारतवर्ष में। और उस जगह रहना जहां अस्सी फीसदी आबादी जीजा-फूफा बुलाती हो – वहां तो हम पर्सोना-नॉन-ग्राटा (persona non grata, हिंदी तर्जुमा – अस्वीकार्य व्यक्ति) से थोड़े ही बेहतर बचे हैं। :lol:

सवेरे गुन्नीलाल पांड़े और राजन भाई दुबे आये। चाय पिलाई गयी।

लोग ससुरारी में घर बना कर रहने से यह कयास लगाते हैं कि नेवासा पर जमीन पाये होंगे। नेवासा का जमीन यानी मुफ्त का माल। सब लोगों को धीरे से मुझे बताना होता है – भईया, अपने पैसे से जमीन खरीदी और मकान बनाया है। कहीं से किसी भी प्रकार का दान-दहेज-दक्षिणा नहीं लिया है। पर जैसे किसी थानेदार को कभी कोई ईमानदार आदमी नहीं मानता, किसी का ससुरारी में मकान बना कर रहने को कोई फ्री-फण्ड की जायजाद पर काबिज होना ही मानता है।

मेरे ससुराल वाले रसूखदार लोग हैं। जमींदार रहे हैं। मेरे श्वसुर जी ब्लॉक प्रमुख थे। साले साहब भाजपा के दम खम वाले नेता हैं। ऐसे में मुझ जैसे नेकर पहन कर साइकिल से चलते रिटायर्ड नौकरशाह को देख लोग यह कहते पाये गये हैं कि मैं अपने श्वसुर जी के नाम पर धब्बा लगा रहा हूं।… यहां हर व्यक्ति मुझे तोलता और उम्मीद से कमतर पाया समझता है।

वह तो भला हो कि ब्लॉग और सोशल मीडिया पर; आप कितना भी साधारण लिखें, लोग प्रशंसा कर देते हैं। थोड़ी बहुत ईगो मसाज हो जाता है। अन्यथा, गांवदेहात में, ससुराल में घर बना कर रहना वैसा ही है मानो बत्तीस दांतों के बीच फंसी निरीह जीभ होना।

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी। :lol:


मटकी पुर के अंजनी दुबे और चैटजीपीटी


दो बिल्कुल अलग अलग बातें कैसे एक दूसरे से जुड़ जाती हैं। पहली है वाशिंगटन पोस्ट की खबर। एक महिला की नौकरी स्टोरी राइटिंग की थी। काम ठीक चल रहा था। तब पिछली साल नवम्बर में चैट जीपीटी आया। एक बारगी उसे लगा कि कहीं उसका काम चैट जीपीटी को तो नहीं मिल जायेगा। पर उसे कम्पनी में एश्योरेंस मिला कि ऐसी कोई बात नहीं है। लेकिन स्थितियां (तेजी से) बदलती गयीं। उसके सहकर्मी दबी जुबान में मजाक करने लगे। उसके नाम के आगे #ChatGPT लगाने लगे। छ महीने में ही उसे नौकरी से हाथ धोना पड़ा। अब वह कुत्ता घुमाने की नौकरी कर रही है।

पहली है वाशिंगटन पोस्ट की खबर

कितनी तेजी से बदलाव हो रहे हैं। छ महीने में स्टोरी राइटर की नौकरी चैटजीपीटी ले गिरा। ऐसी कितनी नौकरियां गयी होंगी या जाने वाली होंगी? यह तो वाशिंगटन पोस्ट की खबर थी जिसे लाइवमिण्ट मेरे पास तक ले आया। और भी तो होंगी?!

आज अखबार में एक और खबर है। माइक्रोसॉफ्ट का एक कर्मचारी जिसकी छंटनी हो गयी थी, ने 1000 जगहों पर अप्लाई किया। मार्च से अभी तक उसे कोई नौकरी नहीं मिली है।

आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस का दबाव नौकरियों पर दिखने लगा है। यह जरूर है कि नयी तकनीक मास्टर करने पर नये तरह के जॉब बनेंगे। शायद ज्यादा ही नौकरियां या बेहतर नौकरियां मिलें; पर यह सम्भावना तो बन ही गयी है कि आगे बिना नौकरी के अर्थव्यवस्था बढ़ने वाली है।

मैंने अपने आसपास देखना चालू किया। कौन कौन काम बदलेगा? कौन नौकरी या काम खतरे में है? मुझे लगा कि गांवदेहात में, जहां आदमी अपने श्रम से जीवन यापन करता है, कोई असर पड़ेगा नहीं इस नयी तकनीक का।


अंजनी दुबे, गांव मटकी पुर : दिन भर लग जाता है गाय-गोरू के साथ। और कुछ सोचने को समय ही नहीं है।

मैं आठ – साढ़े आठ तक जाता हूं सवेरे, मडैयाँ डेयरी के कलेक्शन सेण्टर पर। अजय पटेल जी के यहां पांच सात लोग होते हैं। वे गाय और भैंस का दूध ले कर आये होते हैं बेचने के लिये। मुझे वहां से एक डेढ़ लीटर दूध चाहिये होता है। वहां बतकही चलती रहती है। उनकी देशज अवधी-भोजपुरी ज्यादा समझ नहीं आती, पर अभिप्राय तो पल्ले पड़ ही जाता है। उन लोगों की दुनियां गाय गोरू, खेती किसानी, चूनी-चोकर-सानी आदि के इर्दगिर्द है। स्मार्टफोन और सुरती – दोनो उनके बराबर के काम की चीजें हैं। चैटजीपीटी का नाम सुने भी होंगे तो ज्यादा पल्ले नहीं पड़ा होगा।

मडैयाँ डेयरी का कलेक्शन सेण्टर

पर हैं वे स्मार्ट लोग। किसी भी बदलाव के साथ अपने को बदलने की क्षमता रखते हैं। यह डेयरी अच्छा रेट दे रही है तो पांच दस किमी चल कर यहां आते हैं और अपना दूध बेच कर पैसा जेब में रख लौटते हैं। जिस दिन उन्हें लगा कि चैटजीपीटी उनकी जिंदगी में असर डाल सकता है, वे पूरी मेहनत कर उसका गोरखधंधा समझने में जुट जायेंगे।

बातचीत में सबसे जानदार दिखते हैं अंजनी दुबे। तिलक लगा रखा है। इकहरा शरीर। गले के गड्ढ़े में भी चंदन का गोल बिंदु लगा है।

वहां बातचीत में सबसे जानदार दिखते हैं अंजनी दुबे। तिलक लगा रखा है। इकहरा शरीर। गले के गड्ढ़े में भी चंदन का गोल बिंदु लगा है। बोलने में ऐसे कि सभी का ध्यान उनकी ओर चला जाये। बता रहे हैं कि चार गोरू में सवेरे चार बजे से दिन शुरू हो जाता है। गोरू के साथ गोरू की जिंदगी। जिंदगी के लिये जो शब्द उनके मुंह से निकलते हैं उनमें “लत्ता, भूसा” जैसे ही हैं। अर्थात जिंदगी में श्रम है और उसके अलावा कुछ देखने सोचने को है ही नहीं। निश्चय ही, गांव देहात की उस आबादी का हिस्सा हैं अंजनी कुमार दुबे जो मेहनत करती है। उसके फल से लगभग संतुष्ट है पर दिन भर जो पिराई होती है, उसे ले कर यह भाव तो है कि अमीरी होती, ठाठ होता, काम न करना होता तो क्या आनंद रहता।

मेरे ख्याल से अंजनी कुमार जैसे लोग जो बाई डीफाल्ट मेहनती हैं, बिना काम मौज की जिंदगी की कहते भले हों, बिना काम के रह नहीं सकते।

अंजनी के मुंह में का पान मसाला शायद खत्म हो गया है। मुंह खाली है तो प्रगल्भता बढ़ गयी है। उसे काम पर लगाने के लिये वे मनोयोग से सुरती मल रहे हैं। पर मल्टी टास्किंग में माहिर हैं। बतकही में लीड रोल भी अदा कर रहे हैं, और सुरती भी तैयार कर रहे हैं। मेरा मन होता है कि इस नौजवान को सुरती न खाने के लिये टोकूं। पर क्या फायदा? कौन सुनने जा रहा है?

अंजनी कुमार बताते हैं कि उनका गांव मटकी पुर है। यहां से चार पांच किमी दूर। दूध सेण्टर पर देने के साथ हाल-चाल-बतकही में पंद्रह बीस मिनट गुजारते हैं। परिवार धार्मिक है। एक दिन लघुशंका के समय जनेऊ कान पर नहीं चढ़ाया तो वह अशुद्ध हो गया। “ओके निकारि क पोआरि दिहा।” पर नया जनेऊ मिला नहीं। नहाते समय बाबू जी ने उघार बदन बिना जनेऊ के देख लिया तो काफी सुनना पड़ गया।

“नाम अंजनी कुमार है तो हनुमान जी के भक्त हो?” मैंने यूं ही पूछा। “कौनो देवी देवता हों, सब को पूज लेते हैं। हनुमान जी को भी।” – अंजनी ने उत्तर दिया।

मैं इस नौजवान के बारे में सोचने लगा। मेहनत करता है तो चैटजीपीटी या और कोई आर्टीफीशियल इण्टेलिजेंस क्या कर लेगा। गोरू को सानी देने और दुहने के लिये रोबोट तो आयेंगे नहीं। और आ भी जायेंगे तो अपने को अपग्रेड करने की कूवत तो अंजनी में होगी ही। खेती किसानी, पशुपालन, सब्जी उगाने-बेचने में एआई फेसीलीटेटर ही बनेगा। काम छीन नहीं पायेगा। वह जिंदगी “लत्ता-भूसा” से अपग्रेड कर देगा।

अंजनी अगर नयी तकनीक का स्वागत करेंगे तो उनकी जेब में ज्यादा पैसे आयेंगे। वे अपने परिवार की, अपने बाबूजी की ज्यादा अच्छे से देखभाल कर पायेंगे।

ग्रामीण जीवन को – अगर लोग मेहनती हैं – एआई बेहतर ही बनायेगा। उनके काम को अपग्रेड करेगा और शहराती लोगों से कहीं बेहतर तरीके से वे जी सकेंगे। अंजनी कुमार का भविष्य बेहतर ही होगा। हां, यहां निकम्मा-नकारा नौजवानों की फौज जो दिन भर मोबाइल में वीडियो और गेम देखती-खेलती है; उसकी दुर्गति निश्चित है।

मैं अंजनी से ज्यादा नहीं मिला। पर वह नौजवान, बावजूद इसके कि सुरती खाता है, मुझे पसंद आया। भविष्य में उससे मैत्री करना चाहूंगा। यह भी जानना चाहूंगा कि मेरी आज की सोच उसे ले कर सही साबित होती है या नहीं।

अंजनी कुमार को मुझे सही साबित करने के लिये मेहनत करनी चाहिये। :lol:

“कुमति निवारि सुमति के संगी” बजरंगबली की जय हो!

अंजनी कुमार

Design a site like this with WordPress.com
Get started