भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
मैं साइकिल चलाते हुये राह चलते लोगों का चित्र लेता हूं। कभी कभी (या बहुधा) सिर पर घास का गट्ठर रखे चलती महिलायें होती हैं। गांवदेहात में यही चित्र आम होते हैं। नोकिया के दो मेगापिक्सल वाले फीचर फोन से खींचे और फिर किसी तरह उभारे चित्र।
सवेरे का समय होता है तो बहुधा सूरज की गोल्डन ऑवर की रोशनी का लाभ मिलता है। पर मैं रोशनी और एंगल आदि की बहुत फिक्र नहीं करता।
मैं लिख लेता हूं। किरीट चित्र/स्केच बना लेते हैं। लिखने में कम शब्दों का प्रयोग कर लिखना मेरी मजबूरी है जो अब शायद खासियत बन गयी है। किरीट जी के स्केचों में कुछ ही रेखाओं के प्रयोग से जीवंत दृश्य उभर आते हैं।
मैं शब्दों में किफायत करता हूं; वे स्केच की रेखाओं में। दोनो मिल कर काम करें तो शायद कुछ उत्कृष्ट ब्लॉग लेखन बन सके। किरीट जी ने साइकिल पर चलते हुये चित्र लेते व्यक्ति का एक स्केच बनाया है –
काले या किसी अन्य गहरे रंग के पट्ट पर उकेरी हुई केवल कुछ रंगीन लाइनों से क्या जानदार चित्र उभरते हैं उनके स्केचों में। और वे बताते हैं कि अधिकांश स्केच उन्होने मोबाइल पर उंगलियों के प्रयोग से बनाये हैं! वण्डरफुल! :-)
मेरी पत्नीजी मेरे ब्लॉग की को-ऑथर हैं। वैसा ही कुछ किरीट जी के साथ हो सकता है। अगर उनके स्केच पर लेखन हो तो पोस्ट उनकी, गायन उनका, लेखन तब तबले का रोल अदा करे जुगलबंदी में।
और जब लेखन और/या मेरे चित्रों के साथ किरीट जी के स्केच हों तो पोस्ट मेरी तबले की जुगलबंदी के रूप में स्केच उनके!
ब्लॉग-जुगलबंदी मुझे शुरुआती दिनों से आकर्षित करती रही है। सबसे उत्कृष्ट उदाहरण बेकर पोस्नर ब्लॉग था। वह दिसम्बर 2004 से मई 2014 तक नियमित चला। गैरी बेकर की मृत्यु पर वह बंद हो गया। गैरी बेकर अर्थशास्त्री थे और नोबल पुरस्कार विजेता थे। रिचर्ड पोस्नर अमेरिका के प्रसिद्ध न्यायविद हैं और फेडरल जज भी रह चुके हैं।
मैं उस ब्लॉग को सबस्क्राइब किया करता था। इसलिये नहीं कि मुझे उनका कहा समझ आता या अपील करता था; वरन दो अलग अलग सशक्त लोगों के एक ही विषय पर विचार पता चलते थे।
किरीट जी के साथ सप्ताह में एक दिन वैसी जुगलबंदी (उस प्रकार से नहीं, ज्वाइण्ट पोस्ट के रूप में) हो सकती है। मैं सामान्यत: रेलवे के विषय पर लिखना नहीं चाहता। पर अगर उनके रेल विषयक स्केच हों तो शायद की-बोर्ड पर कुछ गतिविधि हो! :-)
गांव का आदमी जब शहराती बनता है तो उसका गांव खोने लगता है। यह समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय हो सकता है कि कितनी पीढ़ियाँ लगती हैं गांव को पूरी तरह भुलाने में। शायद दो पीढ़ियां। पर कुछ समुदाय ऐसे हैं, जो कई कई पीढ़ियोँ बाद भी अपनी जमीन से जुड़े हैं। शेखावाटी-मारवाड़ के कई परिवार अब भी अपने पर्व-संस्कारों के लिये अपने गांव की यात्रा करते हैं। पूर्वांचल के इस इलाके में भी कई परिवार आजीविका के लिये कलकत्ता, बम्बई आदि जगह गये। आज भी उनको यदा कदा इकठ्ठा होते मैं देखता हूं।
आज वही देखना हुआ सवेरे की साइकिल सैर के दौरान।
श्री रमाशंकर पाण्डेय; जो कलकत्ता में रहते हैं; ने प्रेमसागर की शक्तिपीठ यात्रा के कलकत्ता के आसपास के पीठों के दर्शन/पदयात्रा को सुलभ बनाया था। अपने घर पर एक सप्ताह प्रेमसागर को रखा भी था। आर्थिक सहायता भी की थी। वे आजकल गांव आये हुये हैं। विवाह शादी आदि के प्रयोजन हैं। व्यस्त रहते हैं उसमें। उनसे मिलना नहीं हो पाता। पर आज सवेरे वे लोग अपने घर के बाहर मिले। सवेरे की बैठकी चल रही थी पेड़ की छाया में।
सवेरे श्री रमाशंकर पाण्डेय जी के घर के बाहर की बैठकी
वे सभी, या उनमें से अधिकांश, गांव में घर वाले हैं। एक या दो पीढ़ी से वे गांव के होने के साथ साथ महानगरीय भी हो गये हैं।
साइबेरियाई पक्षी, मसलन घेंटी यहां आते हैं तो उन्हें प्रवासी पक्षी कहा जाता है। उनका मूल साइबेरिया का है और वे सर्दियों के मौसम में यहां आते हैं। पर साइबेरिया में उन्हें क्या कहते होंगे? उनका तो होम एड्रेस वहीं का है। उसी तरह ये लोग भी यहां के हैं। कलकत्ता या बम्बई उनका व्यवसायिक प्रवास है।
मेरे लिये चाय आती है। लिप्टन की ग्रीन चाय। अच्छा स्वाद है। हमारे घर की टेटली वाली चाय से बेहतर है स्वाद। ग्रीन चाय महानगर और गांव के बीच एक लिंक सा लगती है। घर जा कर लिप्टन वाली खरीदने की सोचूंगा, यह विचार मन में आता है। पर यह भी सम्भव है कि इतने सारे लोग आपका सवेरे सवेरे स्वागत करें तो चाय का स्वाद अपने आप अच्छा हो जाता है।
रमाशंकर जी अपनी बहन, बिटिया और अपने जीजा जी से परिचय कराते हैं। बिटिया मेरा लिखा नियमित पढ़ती हैं। शायद इसी माध्यम से गांवदेहात से जुड़ना होता हो। बिटिया की मेरे लिखे की प्रशंसा मुझे वैसे ही अच्छी लगती है जैसे लिप्टन की हरी चाय। जब भी कोई लेखन की प्रशंसा करता है, तो एकबारगी अच्छा लगता है; पर फिर लिखने में बेहतर कण्टेण्ट परोसने का दबाव तो बनता ही है। पता नहीं, लोग प्रशंसा करके भूल जाते हों, पर अपनी प्रशंसा अपने को पछियाती रहती है। … ज्यादा मत फूलो, जीडी! :-)
राधेश्याम दुबे, गांव का नाम झगड़ू (किसी भी कोण से झगड़ालू नहीं लगते, गांव में निक-नेम रखने का तरीका बहुत सही नहीं है); से मैं करीब छ साल बाद मिल रहा हूं। अब उनके लड़के भी बम्बई-सूरत में काम पर लग गये हैं। रवींद्रनाथ जी तो अब भी गांव या बम्बई में कहां अपना रिटायर्ड जीवन गुजारें – यह तय नहीं कर पाये हैं। वे कभी यहां दिखते हैं, कभी बम्बई से फोन आता है उनका।
रिटायरमेण्ट के बाद कौन जगह रहने के लिये बेहतर है? मैं इस सवाल पर बहुधा सोचता हूं। अगर आप सुविधा के आदी हो गये हैं तो गांव में उसे खोजना-बनाना-जारी रखना कठिन काम है। पर अगर आपको नोश्टॉल्जिया सताता है तो आपके लिये गांव ही उचित है। लेकिन यहां भी नलिनीदलगतजलमतितरलम – कमल के पत्ते पर पानी की बूंद की तरह ही रहें। यहां की छुद्र राजनीति, छद्म दैन्य और कुछ लोगों की सामांती ऐंठ से पूर्णत: असम्पृक्त।
दांये से – रवींद्रनाथ, रमाशंकर, उनके जीजा जी, राधेश्याम। सवेरे की चाय पेड़ की छाया में उनके साथ हुई।
पर वैसे रहा जा सकता है क्या? हर एक के पास अपने अपने विचार होंगे और अपने अपने तर्क। सब शायद निर्भर करता है कि किस वैचारिक स्तर पर आप जीना चाहते हैं। … मैं उन लोगों के पास चाय पी कर और हल्की-फुल्की बात कर प्रसन्नमन वापस आते हुये यह सब सोचता हूं।
आज जिनसे मिला, उन सबकी प्रसन्नता और उसके पीछे कर्मक्षेत्र की जद्दोजहद; शहर और गांव की जिंदगी में कुशल बाजीगर की तरह तालमेल साधने की कला और उनके जीवन की ऊर्जा के स्रोतों के बारे में मुझे और जानकारी पानी चाहिये।
मिलने-जुलने पर एक जानदार तुकबंदी/पहेली बताई, दोहराई रवींद्रनाथ जी और रमाशंकर जी ने – चार मिले, चौंसठ खिले, बीस रहे कर जोरि (दो व्यक्ति मिले तो उनकी चार आंखें 2-4 हुईं। प्रसन्नता से दोनो की बत्तीसी खिल उठी (चौंसठ)। उसके बाद अनायास हाथ की उंगलियां नमन की मुद्रा में जुड़ गयीं (20 उंगलियां)। … कवित्त का समापन होता है “बिंहसे सात करोड़ (शरीर के रोम रोम आल्हादित होने से तात्पर्य)” से।
चार मिले चौंसठ खिले, बीस रहे कर जोड़। प्रेमी सज्जन दो मिले, बिंहसे सात करोड़॥
दो लोगों के मैत्री भाव से अनंत (एक व्यक्ति में साढ़े तीन करोड़ रोमावलियों का अंदाज लिया है) रोमावलियां प्रसन्न हो जाती हैं! कुछ क्षणों के लिये मिलना, बोलना, बतियना बहुत मायने रखता है। सारी समाज संरचना मिलने पर ही आर्धारित है!
बात में आया यह कवित्त तो मैं भूल ही गया था। पोस्ट लिखने के बाद रमाशंकर जी ने याद दिलाया!
लोगों से और मिलो, उनके पास बैठो, और कुछ नहीं तो फोन पर बतियाओ; जीडी!
लोगों से और मिलो, उनके पास बैठो, और कुछ नहीं तो फोन पर बतियाओ; जीडी! सवेरे की बैठकी का चित्र।
रेलवे के तीन दशकों से भी ज्यादा के गहन और थकाऊ अनुभव के बाद अब रेल से मेरा जुड़ाव मेरे घर के पास के एक रेलवे लेवल क्रॉसिंग तक ही सिमट गया है। इसकी दशा-दुर्दशा से कष्ट होता रहा है। उसके निवारण के लिये मैं मण्डल रेल प्रबंधक महोदय से मिला था।
समपार फाटक पर रेल लाइन और सड़क का रखरखाव उम्दा होना चाहिये। रेल और सड़क मार्ग का मिलान यहीं होता है और दुर्घटनायें भी यहीं ज्यादा होती हैं। रोज वहां से गुजरने के कारण मुझे अपनी ही फिक्र होती है कि कहीं मेरी साइकिल डगमगा कर गिरे और इस उम्र में मुझे किसी फ्रेक्चर का सामना करना पड़े।
वे हेक्सागोनल ब्लॉक समस्या का समाधान कम, उससे बड़ी समस्या बने हुये थे। चित्र अगस्त 2022 का है।
उसके पास की सड़क बहुत खराब है। पटरियों की चेक रेल के बीच तथा फाटक सीमा में आसपास की सड़क पर रखरखाव की दिक्कत के कारण वहां हेक्सागोनल ब्लॉक लगाये गये थे। पर उन मोटे सीमेण्ट-कॉन्क्रीट के टुकड़ों को एक अनुशासन के साथ जमाया जाता है। वह कुशलता कर्मियों में नहीं थी। वे हेक्सागोनल ब्लॉक समस्या का समाधान कम, उससे बड़ी समस्या बने हुये थे।
मण्डल रेल प्रबंधक जी के आदेश से कर्मचारियों ने वे षटकोणीय पाषाण एक बार निकाल कर पुन: बिछाये जरूर, पर कुशलता की कमी के कारण कुछ महीनों में वे जस के तस हो गये। सड़क का रखरखाव तो खैर हुआ नहीं। शायद वह आरवीएनएल को करना हो।
सारे ब्लॉक्स निकाल कर किनारे फैंक दिये हैं। फाटक के बीच और चेक रेल के बीच भी गिट्टी बिछा दी गयी है। शायद सड़क का डामरीकरण किया जायेगा।
कुछ दिन पहले मैंने देखा कि शायद रेलवे के इंजीनियरिंग विभाग को लग गया है कि हेक्सागोनल ब्लॉक बिछाना और उसका रखरखाव (अच्छे से बिछाया जाये तो यह बहुत कम रखरखाव मांगता है) टेढ़ा काम है। उन्होने सारे ब्लॉक्स निकाल कर किनारे फैंक दिये हैं। फाटक के बीच और चेक रेल के बीच भी गिट्टी बिछा दी गयी है। शायद सड़क का डामरीकरण किया जायेगा। अलकतरा वाली सड़क बनाई जायेगी।
किनारे फेंके हेक्सागोनल ब्लॉक्स को देख कर मेरी पत्नीजी को लालच होता है। “पीडब्ल्यूआई साहब इन ब्लॉक्स का क्या करेंगे? लोग एक एक कर उठा ही ले जायेंगे। मुझे दस ब्लॉक्स क्यों नहीं दे देते? तुम एसएस साहब को बोलो न! इन ब्लॉक्स के ऊपर मेरे गमले अच्छे से रखे जा सकेंगे।” – जब भी वहां से हमारा वाहन गुजरता है, मेम साहब लालच से उन ब्लॉक्स को देखती हैं। मैं उन्हें अनदेखा करता हूं।
किनारे फेंके हेक्सागोनल ब्लॉक्स को देख कर मेरी पत्नीजी को लालच होता है। “पीडब्ल्यूआई साहब इन ब्लॉक्स का क्या करेंगे? लोग एक एक कर उठा ही ले जायेंगे। मुझे दस ब्लॉक्स क्यों नहीं दे देते?
रिटायरमेण्ट के बाद किसी को कोई अनुरोध करने का मन नहीं होता। और किसी चीज को मांगने का तो बिल्कुल नहीं। मेरा मन अनासक्त हो गया है पर पत्नीजी की आसक्ति अपने बगीचे को संवारने में है। वे बार बार कहती हैं – “आखिर ये ब्लॉक्स उनके किसी काम की चीज तो होंगे नहीं!”
मैं कोई अनुरोध किसी से नहीं करता। बहुत बदल गया हूं सेवानिवृत्ति के बाद। जिस विभाग में आदेश चलते रहे हों, वहां अनुरोध क्या करना व्यक्तिगत रूप से!
गांव के लोग और मेरे पुराने रेलवे के इंस्पेक्टर लोग बताते हैं कि मेरे निरीक्षण नोट के आधार पर ही यह लेवल क्रॉसिंग अपग्रेड हो कर गेट मैन युक्त बना था। दो दशक पहले की बात होगी वह। अब उसी लेवल क्रॉसिंग पर गुजरते हुये अंदेशा रहता है कि कहीं मेरी साइकिल का बैलेंस न बिगड़ जाये। :-(
समय का चक्र है – कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर। सैलून से साइकिल तक का समय चक्र! :-)