लॉकडाउन काल में सवेरे का साइकिल व्यायाम

वृद्धावस्था जैसे जैसे हावी होगी, वैसे वैसे साइकिल पर घूमना, देखना, लिखना शायद संकुचित होता जाये। जब तक यह एक्रोबैटिक्स चल रही है, तब तक चलाने का पूरा मन है। जीवन का रस कस कर निचोड़ना है, जीडी!


घर में बैठे बैठे/लेटे लेटे शरीर अकड़ रहा है। ऑस्टियोअर्थराइटिस है, इसलिये चहलकदमी सीमित है। घर के परिसर में उसके बढ़ाये जाने की सम्भावना नहीं बनती। लॉकडाउन को दस दिन हो चुके हैं। भोजन में यद्यपि अति नहीं है, रक्तचाप और डायबिटीज पूर्णत: नियंत्रित है; पर अनिद्रा की समस्या उभर रही है। पहले सवेरे लगभग 12 किलोमीटर साइकिल भ्रमण हुआ करता था। अब वह नहीं हो रहा।

इसलिये लगा कि सामाजिक आदान-प्रदान की सम्भावनाओं को नकारते हुये आसपास की ग्रामीण सड़कों और पगडण्डियों पर जाया जा सकता है। एहतियात के लिये यह तय किया कि अपने हाथ से अपना मुँह पूरी साइकिल सैर के दौरान टच न किया जाये और आपात व्यवस्था के लिये पास में सेनीटाइजर की शीशी रखी जाये।

यह विचार कर आज सवेरे निकला। यात्रा का खाका मन में बना लिया था कि गांवों की बस्तियों से दूर रहा जाये। ग्रामीण सड़कों पर अगर लोग नजर आयें तो उनसे कगरिया कर निकला जाये, बिना रुके। अगर रुकने की नौबत भी आये तो कम से कम 10 फिट की दूरी बना कर रखी जाये।

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गाँव देहात और गंगा तट का एकांत

सुबह शाम सूरज की किरणें, गंगा नदी का बहाव, बबूल के झुरमुट और उनके झाड़ों पर उखमज (पतिंगे) वैसे ही हैं, जैसे थे। किसी आयरस-वायरस का कोई प्रभाव नहीं।


सामाजिक दूरी में प्रकृति से दूरी बनाना शामिल नहीं है। शहरों में सड़कें वीरान हैं तो वन्य जीव उनपर विचरने चले आ रहे हैं – ऐसी खबरें आये दिन आ रही हैं। सामाजिक अलगाव जो रिक्तता उपजाता है, प्रकृति उसे भरने के लिये पंहुच जाती है।

यहाँ, गांवदेहात में, कोविड19 के कारण लोग सतर्क हैं, पर अपना कामधाम किये जा रहे हैं। अर्थव्यवस्था के रुक जाने का हाहाकार शहर में ज्यादा है। गांव में तो लोग सरसों की कटाई-दंवाई कर चुके। अरहर कट रही है। गेंहूं की फसल तैयार है और कहीं कहीं किसान ने कटाई शुरू भी कर दी है।

अरहर की खेप ले जाने को सड़क पर खड़ा ठेला (सगड़ी)।

भेड़-बकरी चराने वाले उसी तरह चरा रहे हैं, जैसे पहले चराते थे। गांव का किराने के सामान वाला वैसे ही दुकान खोलता है, जैसे पहले खोलता था। पाही पर चाय बनाने और समोसा तलने वाला भी अपनी गुमटी पर बैठता है। डण्डा फटकारने वाली पुलीस का यहां कोई हस्तक्षेप नहीं।

एक गेंहू के खेत में मुझे आवाज से लगा कि वहां फसल कटाई चल रही है। पर ध्यान से देखने पर पता चला कि एक नीलगाय का झुण्ड खेत में है और खड़ी फसल चर रहा है। मेरे पास कैमरा नहीं था और मोबाइल के कैमरे से मात्र अहसास सा ही दर्ज हुआ उस झुण्ड के कद्दावर पुरुष-नीलगाय का।

खेत में बायें जो धब्बा दिख रहा है, वह कद्दावर नीलगाय है। मुझसे उसकी दूरी 15 मीटर रही होगी।

बच्चों पर सोशल अलगाव का ज्यादा असर नहीं पड़ा है। वे खाली पड़े खेतों और सड़कों पर आइस पाइस, कबड्डी या क्रिकेट खेलते दिख जाते हैं। सुबह भी और शाम को भी।

बाकी, सुबह शाम सूरज की किरणें, गंगा नदी का बहाव, बबूल के झुरमुट और उनके झाड़ों पर उखमज (पतिंगे) वैसे ही हैं, जैसे थे। किसी आयरस-वायरस का कोई प्रभाव नहीं।

केवल कुछ वयस्क लोग दिखते हैं मुँह ढंके।

(पोस्ट के चित्र लेने की कवायद में किसी व्यक्ति के पास आने का न प्रयास किया गया और न कोई आसपास आया। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हुआ।)


कोविड19 का सामाजिक अलगाव, गांव और गंगा तट

गांव सामान्य सा दिखता है। पर गमछा मुंह पर बांधे है और सहमा हुआ है। आसपास के इलाके में अभी किसी के बीमार होने या मरने की खबर नहीं है, वह होने पर शायद गांव भी घरों में दुबक जाये।



मुझे लगा कि कोरोना (मुख्यतः) शहरी आपदा है। गांव अगर उससे प्रभावित है तो उस सीमा तक, जिस सीमा तक दिल्ली बंबई में रहने वाले गांव लौट कर गांव को खतरे में डाल रहे हैं।

लोग गांव लौट क्यों रहे हैं? बंबई से कूद फांद कर, एक चार चक्का किराये पर ले उसमें ठूंस कर भरे लोग, सरकारी अमले को धता बताते गांव लौट रहे हैं। और मेहनत मजदूरी करने वाले ही नहीं, मध्य वर्ग के लोग – जिनका गांव से थोड़ा भी कनेक्शन बाकी है – वे भी सपरिवार गांव आ कर पसर गए हैं। आगे भी आयेंगे, यह निर्भर करेगा कि सरकार कितनी कड़ाई से लॉकडाउन का पालन करा सकती है।

शहर जब तक नौकरी देता है, जीवन यापन के साधन देता है, जब तक घूमने और परस्पर मिलने तथा मनोरंजन की सुविधाएं देता है, जब तक लोग वहां टिकते हैं। अन्यथा अन्य ऑप्शन तलाशते हैं। अन्य ऑप्शन में गांव प्रमुखता से आता है।

केवल भारत में ही नहीं है। आज मैने न्यूयॉर्क टाइम्स में पढ़ा कि न्यूयॉर्क के शहरी अन्य स्थानों में पलायन का यत्न कर रहे हैं। मुख्यत: धनी लोग। और जहां जाना चाहते हैं, वहां के लोग उसका विरोध कर रहे हैं।

New York Times की खबर

भारत में वैसा नहीं है। यहां गांव अपने बंधुबांधवों को बाहें खोल कर स्वीकार कर रहा है। यह जरूर है कि जो आये हैं, अपने घर में दुबके हुये हैं। घर वाले भी उनकी सेहत की दशा मॉनीटर कर रहे हैं। पर कोई यह नहीं कह रहा कि “सरऊ काहे आइ गये (साले, क्यूँ आ गए)”?

तनाव है। पुलीस की गाड़ी नजर आती है तो लोग सन्न हो जा रहे हैं। चाय की चट्टी बंद करा दी है। बंद कराने में पुलीस ने मां-बहन का आवाह्न किया है, ऐसा सुनने में आया। पर गांव की अपनी गतिविधियां (कुछ सिकुड़ कर) चल रही हैं। वैसा माहौल नहीं दिखता जैसा टेलीवीजन दिखाता है।

खेत से फसल (सरसों) ले लौटते लोग

शाम के समय देखा तो लोग अपने खेतों में निराई कर रहे थे – इक्का दुक्का नहीं, लगभग उतने ही लोग जितने सामान्य समय में किया करते थे। बच्चे और औरतें शाम होने के कारण अपनी बकरियां और गाय भैंस चरा कर वापस ला रही थीं। ठेले पर मेदिनीपुर में गोलगप्पा और समोसा बेचने वाला भी दिखा। उसके आसपास पांच सात लोग थे। कोलाहलपुर में सड़क पर कुछ अधेड़ औरतें वैसे ही गोल बना कर बैठी आपस में बतियाती नजर आयीं, जैसे हमेशा करती आयी हैं। सड़क के किनारे पाही पर लोग वैसे ही दिखे जैसे सामान्य तौर पर दिखते हैं। हां, लगभग आधे लोग – या कुछ ज्यादा ही, मुँह पर रुमाल या गमछा बांधे थे।

लोगों की उपथिति का घनत्व गांव होने के कारण वैसे भी (शहर की अपेक्षा) कम था, पर वैसा ही था, जैसा सामान्य तौर पर होता है।

सड़क पर वाहन नहीं थे। सामान्यत: मिट्टी ढोने वाले ट्रेक्टर और इक्कदुक्का चार पहिया वाहन दिखते थे, अब वे नहीं दिखे। एक भी नहीं। हां, दूर एक ईंट भट्ठे की चिमनी से धुआँ निकलता नजर जरूर आया। गांव के स्तर पर तो वही उद्योग-धंधा है। और वह बंद नहीं हुआ लगता। भट्ठे में गतिविधि का मतलब वहां ईंट ढालने और ढोने वाले मजदूर तो काम कर ही रहे होंगे।

दूर ईंट भट्ठे की चिमनी से धुंआ निकल रहा था

सोशल डिस्टेन्सिंग की आचार संहिता का पालन करते हुये मैं किसी से बिना मिले, बोले – बतियाये साइकिल चलाते सीधे चलता चला गया। ध्येय था अपनी चार पांच किलोमीटर साइकिल चलाने का व्यायाम पूरा करना। वह बिना किसी बाधा के पूरा कर लिया। आंखों से आसपास की गतिविधियां निहारता भर गया। एक दो जगह चलती साइकिल से या रुक कर चित्र जरूर लिये। बस।

गंगा किनारे सूर्यास्त और बटोही (साइकिल)

गंगा किनारे सूरज डूबने को था। सूर्यास्त के चित्र अच्छे आये। एक कौवा दिखा। करार की ऊंचाई से देखा तो तीन आदमी/बच्चे नदी किनारे अपने हाथ पैर धो रहे थे। शायद पास के गांव कोलाहलपुर से शाम के निपटान के लिये आये होंगे।

गंगा किनारे

वापसी में एक महिला का एक आदमी को कहता शब्द सुनाई पड़ा – खोंखत मरि जाबे, एकर कौनो दवाई नाहीं बा (खांसते मर जाओगे, इसकी कोई दवाई नहीं है)। निश्चय ही वह कोरोनावायरस के बारे में कह रही थी।

गांव सामान्य सा दिखता है। पर गमछा मुंह पर बांधे है और सहमा हुआ है। यह मीडिया का असर है। आसपास के इलाके में अभी किसी के बीमार होने या मरने की खबर नहीं है, वह होने पर शायद गांव भी घरों में दुबक जाये।

पर अभी तो अपनी गतिविधियां, कमोबेश जारी रखे हुये है। शायद इसी लिये लोग गांव की ओर पलायन कर रहे हैं।