अनाधिकृत निर्माण बचाने के लिये मंदिर और राज कर रही पार्टी का ध्वज बहुत काम के हैं। आप में इस प्रकार के काम करने की ढ़िठाई पहली शर्त है। आप जरा नीचे चित्र मेयह इमारत देखें। दो मंजिला और बरसाती की निर्माण की अनुमति के स्थान पर यहां चार मंजिलें और बरसाती खड़ी हैं।
निर्माण तो हो गया, पर वह स्थायी रहे – इसके लिये कगूरे पर एक मंदिर बना दिया गया है। जिससे कोई अगर अवैध निर्माण तोड़े तो पहले मन्दिर तोड़ना पड़े और धार्मिक मामला बन जाये। कोई सरकार इस पचड़े में पड़ना नहीं चाहेगी। दूसरे उसपर राज कर रहे दल का झण्डा भी फहरा दिया जाये – जिससे निर्माण पोलिटिकली करेक्ट दिखाई दे।
मैं यहां जिस इमारत का चित्र दे रहा हूं वह तो चिर्कुट स्तर का अनाधिकृत निर्माण है। पर यही हथकण्डे और यही मानसिकता हाई-फाई स्तर के अवैध निर्माण और जमीन दाब अभियानों में काम में लाये जाते हैं। बस आपमें अव्वल दर्जे की ढ़िठाई के साथ साथ खुला खेल खेलने के लिये पारंगत होना, लोकल स्तर की अच्छी पोलिटिकल नेटवर्किंग और (ऑफकोर्स) दृढ़ इच्छा शक्ति होनी चाहिये।
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| अवैध मंजिलों के साथ मकान निर्माण |
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| अवैध निर्माण को बचाने के लिये लाल वृत्त में मंदिर और नीले वृत्त में राज कर रहे दल का झण्डा |
मेरे “जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले…” के सस्वर पाठ को सुन कर भरतलाल का मेरी मां से सन्दर्भ पुष्टिकरण संवाद – “ई उहई अहइ न दादी? जब सीरियलवा में रमणवा कैलास उठावत रहा। सिवजी अंगुठवा से चाप देहेन। रमणवा जब ओमे चपाइग त मारि लट्ट-पट्ट-कपट-झपट्ट गावइ लाग?” (दादी यह वही है न? जब टीवी सीरियल में रावण कैलाश पर्वत उठा रहा था। शिवजी ने उसे रोकने के लिये अपने अंगूठे से दबा दिया। जब रावण उसमें दब गया तब खूब लट्ट-पट्ट-कपट-झपट्ट गाने लगा?) उल्लेखनीय है कि यह रावण विरचित शिव ताण्डव स्तोत्र है। किसी सीरियल में भरतलाल ने रावण को यह स्तोत्र गाते देखा होगा कभी। वह संदर्भ बताने का यह विशुद्ध भरतलाली अन्दाज था।



आपके इस पोस्ट से मुझे अपने एक पोस्ट का मसाला मिल गया है जो इस पोस्ट पर मैं टिप्पणी के रूप में लिख रहा था.. मेरे जीवन का वो मजेदार घटना आप मेरे ब्लौग पर 1-2 रोज में पढ लिजीयेगा.. :)
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एक तरीका और है। बिल्डिंग पर लिखवा दें, बमबम टाइम्स मुख्य कार्यालय प्रेस। प्रेस को भी आम तौर पर नहीं छेड़ा जाता। वरना इल्लीगल तो छोड़िये लीगल निर्माण भी नहीं हो सकता। राष्ट्र निर्माण इसे ही तो कहते हैं। पालिटिकिल पार्टी, मंदिर और प्रेस ये अवैध निर्माण के तीन खास खंभे हैं। वैसे मुझे तो सबसे बड़ा अवैध निर्माण नेता लगते हैं। पर क्या किया जा सकता है।
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दृढ़ इच्छा शक्ति -बस इतना ही काफी है फिर नेटवर्किंग तो खुद ब खुद हो जायेगी. सब लाईन लगाये चले आयेंगे. :)
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बधाई हो जी लगे हाथो आप ने मकान बना ही लिया बताने के लिये धन्यवाद,हम भी ट्राई मारते है..पर हमे काग्रेस का झंडा लगाना पडेगा..नीले वाले पर तो यहा नीव भी खुद जायेगी..:)
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अनाधिकृत निर्माण को स्थाई बनाने का सबसे आसान और सरल तरीका है ।
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@ दिनेश राय द्विवेदी >ये जोहो राइटर ऑफ लाइन काम नहीं करता क्या?अगर आपके कम्प्यूटर पर गूगल गीयर इन्स्टॉल है तो आप बेसिक काम जैसे फोटो लोड करने का ऑनलाइन और अन्य सारा काम ऑफलाइन कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त writer.zoho.com से अपनी पोस्ट कहीं से भी देख एडिट कर सकते हैं।
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यानि कि सारी पार्टियों के झंडे लेकर रख लो, जिसका डंका बज रहा हैं उसका झंडा चेप दो छत पर फिर गाओ झंडा ऊंचा रहे हमारा। क्या कमाल है :(
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दिल्ल में यदि अनधिकृत निर्माण की इच्छा हो तो क्या उपाय है। कृपया मार्ग दर्शन करने का कष्ट करें।
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कोटा में तो यह खूब होता है। देखते देखते मन्दिरों की संख्या बेतरतीब बढ़ गई है। ये जोहो राइटर ऑफ लाइन काम नहीं करता क्या?
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पार्टी और पार्टियों के झंडों के ही भरोसे तो आधी मुंबई झुग्गी बनी हुई है। औ जब झुग्गी हटती है तो फ्लैट मिल जाता है। अगली जगह झुग्गी बन जाती है।
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