कछार में कल्लू की खेती की प्लानिंग


कछार में कल्लू।
कछार में कल्लू।

आज रविवार को कछार में गंगा किनारे घूम रहा था। एक छोटा लड़का पास आ कर बोला – अंकल जी, वो बुला रहे हैं। देखा तो कल्लू था। रेत में थाला खोद रहा था। दूर से ही बोला – खेती शुरू कर दी है। थोड़ी देर से ही है, पर पूरी मेहनत से है।

कल्लू शो-ऑफ करना चाहता है कि वह गरीब है, वह अपनी कम्यूनिटी में लीडर है, वह बेहतर प्लानिंग से खेती करता है और मुझे तवज्जो देता है। यह सब सही है। शायद गरीबी वाला कोण सही न हो। मेहनत करता है वह और उसका परिवार। और शायद अच्छी कमाई हो जाती है उसको इस तरह के उद्यम से। अपने समाज में अच्छी स्टैण्डिंग है उसकी और उसके परिवार की।

उसने बताया कि इस बार देर हो गयी। मकान बनवा रहा था। दूर गंगा किनारे सफ़ेद रंग का मकान भी दिखाया उसने। “अब बन चुका है! उद्घाटन होना है 8-10 दिन में। आप आयेंगे न? गरीब के घर भी आ जाइये।”

मैने उसे कहा कि अगर सप्ताहान्त में करेगा समारोह तो अवश्य आऊंगा। अन्यथा दफ़्तर के कमिटमेण्ट के कारण आना कठिन है।

दूर था वह - कल्लू।
दूर था वह – कल्लू।

अपनी खेती के बारे में उसने बताया – उस ओर गेंहूं और चना बोया है। और इस ओर सब्जियां। कुछ बो दी हैं। कुछ तो पौधे अंकुरित हो गये हैं। बाकी बोये जा रहे हैं। लौकी के अंकुरित पौधे दिखाये उसने। सभी बोने हैं – लौकी, नेनुआ, कद्दू, मूली, पालक, टमाटर, करेला…

एक छोटा बच्चा खोदने लगा थाला।
एक छोटा बच्चा खोदने लगा थाला।

करीब तीन बीघा में गेंहू-चना बोया है और 4 बीघा में सब्जियां। घाट की पगडण्डी के दूसरी ओर भी हर साल बोता था वह सब्जियां, पर इस साल पार्षद मुरारी यादव ने कह दिया कि उस तरफ़ वह खेती करेगा। मैने छोड़ दिया। कौन लड़ाई करे। लेकिन देखिये, उसने कोई खेती नहीं की है। मैने देखा कि उस ओर कुछ भैंसे घूम रही थीं और लड़के क्रिकेट खेल रहे थे। मुरारी खेती नहीं कर रहा है। यह मात्र सप्पा-बसप्पा का स्थानीय टिर्र-पिर्र है। ये भैसें कभी सब्जी या गेहूं के खेत में हिल गयीं तो स्थानीय राजनैतिक झगड़े की भी सम्भावना बन जायेगी शायद। 🙂

कल्लू ने मुझे दूर नदी के उस पार भी दिखाया कि वहां भी कर रहा है वह खेती। नदी के बीच उग आये टापू पर भी। अगर मैं अनुमान लगाऊं तो कुल 20-25 बीघा में कल्लू का परिवार खेती कर रहा है कछार में।

उसके साथ दो बच्चे थे। उन्हे दिखा कर बोला कि ये खेलते रहते थे यहां। मैं उन्हे 20 रुपया रोज देता हूं। साथ में खुराकी। घूमने वाली बकरियां भगाते हैं। थोड़ी बहुत खेती भी करते हैं। किसी बड़े को रखूं तो गोरू भगाने को धीरे धीरे जायेगा। ये फ़ुर्ती से जाते हैं। पता नहीं बच्चे खुश हैं या अपने को शोषित मानते हैं। मुझे लगे तो वे प्रसन्न। लल्लू के साथ सवेरे आठ बजे से शाम छ बजे तक रहते हैं वे खेत पर।

कल्लू और दोनो बच्चे।
कल्लू और दोनो बच्चे।

रुकता तो कल्लू और बतियाता। मैने वापस लौटते हुये उससे हाथ मिलाया।

ब्लॉग के पढ़ने वाले रहे तो आगे भी पोस्टें होंगी कल्लू पर।

और क्लिक के आंकड़े तो बताते हैं कि पढ़ने वाले हैं पहले की तरह। सिर्फ टिप्पणी आदान-प्रदान सरक गया है फ़ेसबुक पर।

अम्कुरित हो गयी है लौकी।
अंकुरित हो गयी है लौकी।

कुछ (नये) लोग


सवेरे अपने डिब्बे से बाहर यह दृष्य दिखा।
सवेरे अपने डिब्बे से बाहर यह दृष्य दिखा।

कल शनिवार 14 दिसम्बर को मैं वाराणसी में था। सवेरे स्टेशन पर अपने डिब्बे के बाहर दृष्य साफ़ था। कोई कोहरा नहीं। सूरज निकल चुके थे। स्टेशन पर गतिविधियां सामान्य थीं। कबूतर दाना बीन रहे थे। अभी उनके लिये यहां बैठने घूमने का स्पेस था। दिन में ट्रेनों की आवाजाही और यात्रियों की अधिकता के बीच उनके लिये जगह ही न बची पायी मैने।

दिन में वाराणसी में जितना भी पैदल या वाहन से चला सड़कों पर; उसमें पाया कि अव्यवस्था पहले से ज्यादा है और लोग पहले से अधिक, पहले से ज्यादा बेतरतीब। बाबा विश्वनाथ की नगरी उनके त्रिशूल पर टिकी है और उन्ही के कानून कायदे से चल पा रही है। अर्बनाइजेशन के सारे सिद्धान्त यहां फ़ेल हैं। 🙂

वाराणसी जंक्शन स्टेशन।
वाराणसी जंक्शन स्टेशन।
निधि की बनायी स्पेशल बेक्ड पावभाजी की तरकारी। अभी इसका नामकरण नहीं हुआ।
निधि की बनायी स्पेशल बेक्ड पावभाजी की तरकारी। अभी इसका नामकरण नहीं हुआ।

सवेरे नाश्ते पर मेरे छोटे साले साहब – विकास दुबे ने आमन्त्रित किया था। उनकी पत्नी, निधि की रसोई में जादू है। मेरे ख्याल से मास्टर शेफ़-ओफ़ की प्रतियोगिता में वे बड़ी आसानी से मैदान मार सकती हैं। पता नहीं कि उस दिशा में उन्होने प्रयत्न किया या नहीं, पर एक कोशिश तो होनी ही चाहिये। उन्होने एक सामान्य नाश्ते के अनुष्ठान को इतनी ऊंचाई पर पंहुचा दिया मानो पांच सितारा होटेल में फाइव-कोर्स नाश्ता हो। … एक पाव-भाजी के साथ वाली सब्जी में भी बेक्ड वेजिटेबुल का अनूठा प्रयोग था। लाजवाब पोहा, गाजर का हलवा …

सिद्धार्थ (बायें) और बलबीर जी।
सिद्धार्थ (बायें) और बलबीर जी।

विकास के दो मित्र मिलने आये – सिद्धार्थ सिंह और बलबीर सिंह बग्गा। दोनो फेसबुक पर सक्रिय हैं। सिद्धार्थ जी तो मेरे स्टेटस और मेरी ब्लॉग पोस्टें रुचि से पढ़ते हैं, ऐसा उन्होने बताया। सही भी लगा – वे मेरे बारे में बहुत जानकारी रखते हैं – जो इण्टरनेट पर उपलब्ध है। सिद्धार्थ जी से मिल कर प्रसन्नता और आत्म संतोष की अनुभूति हुयी जो एक ब्लॉगर को आजकल की कम टिप्पणी के समय में यदा-कदा ही होती है। लगता है, ब्लॉग देखने पढ़ने वालों की संख्या और नियमित पढ़ने वालों की संख्या कम नहीं है। शायद बढ़ भी रही है। यह जरूर है कि इण्टरेक्शन फेसबुक/ट्विटर के माध्यम से अधिक है। बलबीर सिंह जी भी गर्मजोशी की ऊर्जा से भरपूर लगे। कभी कभी इस प्रकार से मिलना ताजगी दे जाता है। इसके लिये विकास, निधि, सिद्धार्थ और बग्गा जी को बहुत धन्यवाद।

शैलेश-रूपेश के लाये कीनू।
शैलेश-रूपेश के लाये कीनू।

दोपहर में शैलेश और रूपेश जी से मुलाकात हुई। दोनो सज्जन आजकल भाजपा की आई.टी. सेल का उत्तरप्रदेश का काम संभाल रहे हैं और उनसे बात कर लगा कि पारम्परिक राजनीति करने वाले पुरनिया छाप लोगों को छकाने के लिये खूब खुराफ़ात करते रहते हैं। मुझे फिक्र है कि ओल्ड-स्टाइल जिला-कस्बा स्तर का नेता कभी इन्हे अकेले में धुन न दे! 🙂

ये कीनू ले कर आये थे जिसमें से कई खाये गये (ज्यादा मैने खाये!)। दो मेरे घर तक भी पंहुच गये। इन्होने मुझे बाटी-चोखा समारोह में आने के लिये भी कहा – जो कभी न कभी होगा जरूर – वहीं वाराणसी/काशी/अस्सी के आसपास!

ऐसी मुलाकातें कुछ कुछ अन्तराल पर होती रहें!

नाश्ते के बाद निधि द्वारा फल का आग्रह।
नाश्ते के बाद निधि द्वारा फल का आग्रह।

हम लोगों से क्यों मिलते हैं?

कभी समय होता है और हम एकांत चाहते हैं। कभी समय होता है जब हम पुस्तकों का सानिध्य तलाशते हैं। कभी समय होता है, जब हम लोगों से मिलना चाहते हैं। 

पहले का याद नहीं आता। पर अब लगता है कि मैं स्थानों को देखना चाहता हूं, या लोगों से मिलना चाहता हूं; वह मुख्यत इस कारण से है कि मैं स्थानों या लोगों के बारे में लिख या कह सकूं। मजे की बात है कि कई बार लिखने या कहने में शब्दों की इनएडेक्वेसी भी नजर आती है मुझे। और तब मैं पुस्तकों/शब्दकोष/थेसॉरस का सानिध्य लेना चाहता हूं। ऐसे में ट्रेवलॉग्स बहुत काम के लगते हैं मुझे। सो पुस्तकों में भी ट्रेवलॉग्स का पठन बढ़ता गया है उत्तरोत्तर।

मैं देखना चाहता हूं, मैं मिलना चाहता हूं, मैं वर्णन करना चाहता हूं। मैं – एक आम आदमी। जिसके पास देखने की इनेएडेक्वेसी है। जिसका अटेंशन स्पान संकुचित है। जिसके पास रिटेण्टिविटी की इनएडेक्वेसी है – जिसको सही नोट्स लेना/संजोना नहीं आता। जिसके पास शब्दों की इनएडेक्वेसी है। जो भेडियाधसान शब्द तलाशता-बनाता है। … मजे की बात है कि वह भी ब्लॉग और सोशल मीडिया के युग में मिलने-देखने और एक्स्प्रेस करने की लग्ज़री ले पा रहा है! 

यह रोचक है। बहुत ही रोचक! 

मैं निधि दूबे के लंच और शैलेश पांड़े के बाटी-चोखा की सोचने लगता हूं। मैं लोगों से मिलना चाहता हूं।

शाम कामायनी एक्स्प्रेस से लौटानी में बनारस से निकलने पर दिखा सूर्यास्त का दृष्य।
शाम कामायनी एक्स्प्रेस से लौटानी में बनारस से निकलने पर दिखा सूर्यास्त का दृष्य।

ब्रॉडबैण्ड, बाटी-चोखा और चालू चाय


बीएसएनएल रीटेलर्स - फुटपाथ पर; लाइन से!
बीएसएनएल रीटेलर्स – फुटपाथ पर; लाइन से!

मैं अपने घर और अपने मोबाइल के लिये ब्रॉडबैण्ड/वाईफाई/इण्टरनेट की सुविधा की तलाश में बीएसएनएल दफ्तर के पास घूम रहा था। मेरे साथ थे मेरे सहकर्मी राजेश। सड़क के किनारे 2जी/3जी सिम बेचने वाले यूं बैठे थे, जैसे चना-चबैना बेचने वाले बैठे हों। यह सोच कर कि कहीं ये फर्जी नाम से सिम न टिका दें, हम बीएसएनएल के दफ्तर की ओर चले। वहां पता चला कि यह काम उन्होने आउटसोर्स कर दिया है। पड़ोस का दफ्तर वह डील करता है। पड़ोस का दफ्तर वाला दोपहर का खाना खा रहा था।

छोटू टी स्टाल
छोटू टी स्टाल

समय गुजारने के लिये सामने के ठेले वाले के पास चल दिये। ठेले पर लिखा था – छोटू टी स्टॉल। एक बार चाय पीजिये, जिन्दगी भर याद कीजिये। एक फोटो भी लगी थी किसी फिल्मी हीरोइन की उसके साइनबोर्ड की फ्लेक्सी-शीट पर। मुझे बताया गया कि वे कोई प्रियंका चोपड़ा जी हैं। पता नहीं, प्रियंका जी को मालुम होगा कि नहीं कि वे सिविल लाइंस, इलाहाबाद के छोटू के चाय के ठेले की ब्राण्ड अम्बासडर हैं!

दुकान वाले से पूछा – आपका नाम छोटू है? उसने कहा, नहीं नाम राजेन्द्र है। छोटू तो लिख दिया है।

कस कर उबलती चाय।
कस कर उबलती चाय।

चाय की कीमत लिखी थी – स्पेशल 5.00 रुपये; चालू 4.00 रुपये। इसपर भी छोटू बनाम राजेन्द्र ने स्पष्टीकरण दिया; एकही चाय मिलती है। लिखने को स्पेशल लिख दिया है। मिलती चार वाली ही है। खैर चार वाली भी पर्याप्त मात्रा में और अदरक डली स्पेशल ब्राण्ड ही थी। कस कर उबाली हुई। भट्टी पर बन रही थी। छोटू बनाम राजेन्द्र बारबार बर्तन को हिला भी रहा था जिससे कि अच्छी तरह उबल जाये। चाय बनाने के बाद उसने हम दोनों के लिये चाय छानी और अपनी सिस्टर-कंसर्न राजू बाटी चोखा वाले से एक बेंच भी ला कर दी हमेँ बैठने के लिये। वह इस बात से इम्प्रेस्ड था कि मैँ उसकी फोटो ले रहा था!

राजेन्द्र, चाय बनाता हुआ।
राजेन्द्र, चाय बनाता हुआ।

छोटू बनाम राजेन्द्र ने बताया कि वह सवेरे 9 बजे चालू करता है अपना ठेला। शाम 5 बजे बन्द कर देता है। भट्टी चलती रहती है अनवरत। बिक्री, मुझे लगा कि अच्छी होती है। पर राजेन्द्र ने अपनी बिक्री का अनुमान डाइवल्ज नहीं किया मुझे। उसके ठेले पर भट्टी के विकल्प के रूप में एक पम्प करने वाला स्टोव भी रखा था किरोसिन वाला। पर मुझे लगा कि स्टोव का प्रयोग कम ही होता होगा।

छोटू की सिस्टर कंसर्न का ठेला भी पास में था। “राजू बाटी-चोखा”। प्रो. सुरेश गुप्ता। एक गोरसी में बाटी लगाने का जुगाड़ था ठेले पर और उसके पास चोखा के स्टील के पतीले के ऊपर बाटियां रखी थीं। मिडिल साइज की थी बाटियां। प्रोफेसर (सॉरी, प्रोप्राइटर) साहब ने बताया कि बीस रुपये में चार बाटी, चोखा, मिर्च और मूली मिलती है। अगर मक्खन लगी बाटी लेनी हो तो 25 में चार। बाटी के आकार-प्रकार, चोखा की मात्रा और मूली/मिर्च के ऐड-ऑन को देखा जाये, बिसाइड्स 20-25 रुपये का रेट; तो राजबब्बर/राशिद मसूद साहेब हाईली प्रसन्न होंगे प्रो. सुरेश गुप्ता के इस ज्वाइण्ट से।Dec1300002

मैं भी हाईली प्रसन्न था प्रो. गुप्ता और राजेन्द्र के ठेलों का दर्शन-अवलोकन कर और राजेन्द्र की चालू-कम-स्पेशल-ज्यादा चाय पी कर!???????????????????????????????

एक शाम, न्यूरोलॉजिस्ट के साथ


डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन।
डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन।

तय हुआ था कि मैं न्यूरोसर्जन से छ बजे मिलूंगा और उन्हे ले कर अपने घर जाऊंगा अपनी अम्मा जी को दिखवाने। सवा छ बज रहे थे। मैं 15 मिनट से बाहर बैठा प्रतीक्षा कर रहा था कि डा. प्रकाश खेतान अपना कार्य खत्म कर उपलब्ध होंगे मेरे साथ चलने को। पर वहां बहुत से मरीजों की भीड़ लगी थी अपना नम्बर का इन्तजार करते हुये। बहुत से के हाथ में एम.आर.आई./सीटी स्कैन की रिपोर्ट थी। उनके हाथ में डाक्टर साहब की पर्चियां भी थीं – अर्थात कई पुराने मरीज से जो फिर से चेक-अप के लिये आये थे। मुझे लगा कि डाक्टर साहब जल्दी चल सकने की स्थिति में नहीं होंगे। मैने अपनी पॉकेट नोटबुक से एक पन्ना फाड़ कर अपना नाम लिखा और उनके पास भिजवाया। उसका परिणाम यह हुआ कि डाक्टर साहब ने अपने चेम्बर में बुला कर पास की कुर्सी पर बिठा लिया। मरीज एक एक कर उनके पास आते गये। सब को निपटाने में करीब सवा घण्टा लगा।

सवा घण्टे भर मैने न्यूरो सर्जन को अपने आउट-पेशेण्ट निपटाते देखा। यह भी अपने आप में एक अनुभव था, जो पहले कभी मुझे नहीं मिला।

एक मरीज के साथ तीन-चार लोग थे और सभी उत्तर देने को आतुर। सभी ग्रामीण लगते थे। बाहर से आये। डाक्टर साहब ने सीटी- स्कैन में दिखा कर कहा कि यह छोटी गांठ है दिमाग में। जो हो रहा है, उसी के कारण है। जो दवा वो लिख रहे हैं, वह सवा दो-ढ़ाई साल तक बिना नागा लेनी पड़ेगी। एक भी दिन छूटनी नहीं चाहिये। — पीठ की बीमारी जो वह बता रहे हैं, उसका इस गांठ से कोई लेना देना नहीं है। सिर की बीमारी 95% पूरी तरह ठीक हो जायेगी। अपना वजन कण्ट्रोल में रखें। आग, नदी तालाब, कुंये से दूर रहें। खाने में कुछ भी खायें पर हाथ धो कर। साइकल न चलायें। दवाई शुरू करें और दस दिन बाद दिखायें। — इसी प्रकार की नसीहत अधिकांश मरीजों को मिली।

एक महिला ने बताया खोपड़ी में झांय झांय होती है। कान में किर्र किर्र की आवाज आती है। हाथ पूरी तरह नहीं उठता। नींद ठीक से नहीं आती। डाक्टर साहब ने पूछा कि पेट साफ़ रहता है तो महिला के साथ आये आदमी ने कहा नहीं। डाक्टर साहब ने नियमानुसार दवाई लेने और भोजन के लिये कहा। हाथ की एक्सरसाइज के लिये कहा – चारा मशीन चलाने को कहा। यह भी कहा कि एक्सरसाइज और दवा से हाथ 70-80% ठीक हो जायेगा।

एक लड़के से इण्टरेक्शन – “कै क्लास पढ़े हो? — साइकल, गाड़ी, नदी, तालाब से दूर। कोई और सवाल हो तो पूछो। कोई भी सवाल”।


न्यूरोसर्जन के साथ बैठे मैने तरह तरह के मरीज देखे। स्ट्रोक के मरीज। मिरगी/एपिलेप्सी के मरीज। संक्रमण के मरीज। दुर्घटना के मरीज। शरीर में आवश्यक तत्वों की कमी के मरीज। भूलने की बीमारी वाले थे – यद्यपि उम्र के साथ होने वाली डिमेंशिया/एल्झाइमर के वृद्ध मरीज नहीं देखे वहां। लगभग हर मरीज न्यूरो-परीक्षण की रिपोर्ट ले कर आया था। समय के साथ लोगों में न्यूरो समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है। अन्यथा पहले न्यूरोफीजीशियन के बड़े कम्पीटीटर ओझाई करने वाले/प्रेतबाधा दूर करने वाले हुआ करते थे। सीटी/एम.आर.आई. की सुविधायें अब मेट्रो के अलावा छोटे शहरों में भी उपलब्ध होने से न्यूरोफीजीशियन बेहतर लैस हैं समस्याओं को समझने और निदान करने में। 

फिर भी न्यूरोचिकित्सकों की उपलब्धता आवश्यकता से कहीं कम है! 😦

अगले जन्म की मेरी विश-लिस्ट में न्यूरोलॉजिस्ट होना भी जुड़ गया है अब! 😆


अधिकांश मरीज ग्रामीण थे तो उन्हे उन्ही के परिवेश से को-रिलेट करती भाषा में बीमारी बताना और उन्ही के परिवेश की बातों से जोड़ती दवा-परहेज की बात करना; यह मैने दांत, त्वचा, जनरल फीजीशियन आदि को करते देखा था। पर एक कुशल न्यूरोसर्जन को भी सम्प्रेषण की बेहतर क्वालिटी के लिये उसी प्रकार से बोलना होता होगा; यह जानना मेरे लिये नया अनुभव था। और गंवई/सामान्य जन से पूर्ण संप्रेषणीयता के लिये मैं डाक्टर खेतान को पूरे नम्बर दूंगा। मरीज को उसके स्तर पर उतर कर समझाना, उसके सभी प्रश्नों को धैर्य से समझना, जवाब देना और उसके परिवेश से इलाज को जोड़ना – यह मुझे बहुत इम्प्रेस कर गया।

डाक्टर साहब ने एक ही बार “सिण्ड्रॉम” जैसे तकनीकी शब्द का प्रयोग किया। अन्यथा, अन्य सब मरीजों की बोलचाल की भाषा में ही समझाया था।

मरीजों के कई चेहरे मुझे याद हैं। ग्रामीण किशोर, मोटी, हिज़ाब पहने मुस्लिम लड़की और उसकी मां, शहरी परिवार जो अपनी स्कूल जाती लड़की को दिखाने आया था और जिसकी मां बार बार यह पूछे जा रही थी कि वह प्लेन में यात्रा कर सकती है या नहीं, नशे की आदत छोड़ता वह नौजवान — यह डाक्टर का चेम्बर था, पब्लिक प्लेस नहीं, अन्यथा मैं उनके चित्र ले लेता। आदतन।

अन्त में मैने डाक्टर साहब से कहा कि उनका एक चित्र ले लूं? और फिर एक नहीं, दो बार मोबाइल का कैमरा क्लिक कर दिया। 😀

डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन। दूसरा चित्र।
डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन। दूसरा चित्र।

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उसके बाद डाक्टर साहब के साथ उनके घर गया और वहां से अपने घर। अम्माजी को जब डाक्टर खेतान ने देख कर दवा का प्रिस्क्रिप्शन लिख दिया तो मानो दिन का मेरा मिशन पूरा हुआ। मेरे सहकर्मी श्री साहू डाक्टर साहब को उनके क्लीनिक छोड़ कर आये, जहां वे साढ़े नौ बजे के बाद दो ऑपरेशन करने वाले थे। इसके पहले कल वे इग्यारह घण्टा तक चले एक ऑपरेशन को कर चुके थे।

(मुझे यह अहसास हो गया कि डाक्टर खेतान मुझसे कहीं अधिक व्यस्त और कहीं अधिक दक्ष व्यक्ति हैं अपने कार्य में।)

डाक्टर खेतान के साथ तीन घण्टा व्यतीत करने के बाद मेरा मन बन रहा है कि किसी न्यूरोसर्जन की बायोग्राफी/ऑटोबायोग्राफी पढ़ी जाये। goodreads.com पर वह सर्च भी करने लगा हूं मैं!

विश्वनाथ दम्पति कैलीफोर्निया में अपने नाती के साथ


गोपालकृष्ण विश्वनाथ मेरे बिट्स, पिलानी के सीनियर हैं और मेरे ब्लॉग के अतिथि ब्लॉगर। पिछली बार मैने पोस्ट लिखी थी अक्तूबर 2012 में कि वे नाना बने हैं। अभी कुछ दिन पहले उनका ई-मेल आया कि वे इस समय कैलीफोर्निया में हैं। उनकी बेटी-दामाद दिन भर अपने काम से बाहर रहते हैं और उनकी पत्नी तथा वे घर पर रह कर घर का प्रबन्धन संभालते है और अपने नाती को भी।

नाती उनके बेटी-दामाद की शादी के 11 साल बाद हुआ था। वह बहुत प्यारा लगता है विश्वनाथ जी के भेजे चित्र में। उससे खिंचे विश्वनाथ दम्पति और उनके समधी लोग बारी बारी से कैलीफोर्निया प्रवास कर घर संभालने और बेबी-सिटिंग का काम करते हैं। इस समय इस कार्य पर विश्वनाथ दम्पति हैं। अब नाती 14 महीने का हो चुका है।

विश्वनाथ जी को हम उनकी बिजली वाली रेवा कार के लिये भी जानते हैं। पर लम्बे कैलीफोर्निया प्रवास के कारण उन्होने वह भरे मन से वह कार बेच दी है। दो लाख से ऊपर में बिकी वह। वे लिखते हैं – लम्बे समय तक प्रयोग न होने से वह कार बेकार हो जाती! 😦

आप उनके नाती और विश्वनाथ दम्पति का चित्र देखें। नाती का नाम? ई-मेल में उन्होने नाम बताया है ऋषि!

विश्वनाथ दम्पति और उनका नाती ऋषि। चित्र ऋषि के पहले जन्मदिन के अवसर का है। ऋषि 14 महीने का है।
विश्वनाथ दम्पति और उनका नाती ऋषि। चित्र ऋषि के पहले जन्मदिन के अवसर का है। ऋषि 14 महीने का है।

“बाबूजी, हम छोटे आदमी हैं, तो क्या?”


Phaphamau020फाफामऊ से चन्द्रशेखर आजाद सेतु को जाती सड़क के किनारे चार पांच झोंपड़ी नुमा दुकाने हैं। बांस, बल्ली, खपच्ची, टाट, तिरपाल, टीन के बेतरतीब पतरे, पुरानी साड़ी और सुतली से बनी झोंपड़ियां। उनके अन्दर लड़के बच्चे, पिलवा, टीवी, आलमारी, तख्त, माचा, बरतन, रसोई, अंगीठी और दुकान का सामान – सब होता है। लोग उनमें रहते हैं और गंगा किनारे जाने वाले तीर्थयात्रियों/मेलहरुओं पर निर्भर दुकान लगाने वाले उनमें रहते और दुकान लगाते हैं।

कल अपेक्षाकृत गर्म दिन था। सवेरे कोहरा न्यूनतम था। मैने उन झोंपड़ियों में चहलपहल समय से पहले होती देखी। सवेरे के सात बज रहे थे। एक दुकान का सामान लगाते एक दम्पति दिखे। जवान दम्पति थे – पच्चीस से तीस की उम्र के। आदमी सिर पर गमछा बांधे था। जींस और जैकेट पहने। औरत साड़ी में थी। ऊपर शॉल ओढ़े। दोनो मिल कर लाई, गट्टा, भुना चना, चिवड़ा की ढेरियां, बोरे और तसला-टब अन्दर से निकाल कर बाहर सजा रहे थे। आधे घण्टे में लगता था, बिजनेस शुरू हो जायेगा। ???????????????????????????????

अपने एम्बियेंस से वह व्यक्ति मुझे रुक्ष लगा। पर यह सोच कर कि दुकान लगा रहा है तो बात करेगा ही; मैने पूछा – चना क्या भाव?

आदमी बोला – ले लीजिये बाबूजी, पच्चीस रुपये पाव। दस रुपये का सौ ग्राम।

दस रुपये का दे दो।

???????????????????????????????आदमी ने औरत को तोलने को कहा – जरा बाहर वाला नहीं, अन्दर वाला निकाल कर दे दो। (बाहर वाला रखने पर नमी से सील गया हो सकता था)।

दो प्रकार का चिवड़ा था – पतला और मोटा। बात बढ़ाने को मैने पूछा – ये किस काम आते हैं?

चिवड़ा है बाबू जी। यह मोटा वाला पोहा है। पोहा आप समझते हैं? पतला वाला दूध/दही में मिला कर खाया जाता है। – वह आदमी मुझे बड़ा शहरी समझ रहा था, जिसे पोहा/चिवड़ा की एलीमेण्ट्ररी समझ न हो। मैने पोहे का भाव पूछा – पैंतीस रुपये किलो।

वहीं से मैने अपनी पत्नी जी को मोबाइल पर पूछा – पोहा ले लिया जाये? स्वीकृति मिलने पर मैने कहा कि एक किलो पोहा भी दे दो।

भुना चना और चिवड़ा लेने पर मेरा उनका ग्राहक-दुकानदार का सम्बन्ध बन गया। मैने पूछा – कहां के रहने वाले हैं आप लोग?

यहीं तेलियरगंज के बाबूजी। इसपार यह झोंपड़ी बना कर रहते हैं। रेलवे की जमीन है यह। पर फिर भी पुलीस वाला गाहे बगाहे डण्डा फटकारते चला आता है। कहता है जगह खाली करो।

अच्छा, फिर पैसा भी मांगता है?

हां। किसी से सौ, किसी से छ सौ। जैसा दबा ले और जितना लह जाये। पर मैं नहीं देता पैसा। ढाई साल से हैं हम यहां पर। हम छोटे आदमी हैं बाबूजी। पुलीस का काम है धमकाना, मारना। धमकाने से असर नहीं हम पर। मारना हो तो मार ले। पर हम धमकी में नहीं आते।

इस कहे में औरत तो नहीं बोली, पर जैसा लगता था, उसकी सहमति थी आदमी के साथ।

पोहा और चना पन्नी में बंध गया था, मैने कहा एक फोटो ले लूं मैं उनका। पहले औरत का फोटो लिया, फिर आदमी का। आदमी ने अपना फोटो खिंचाने के पहले अपना सिर पर बंधा गमछा उतारा। उसके बाद वह हैण्डसम लगने लगा। चित्र उन लोगों को दिखाये भी। चलते हुये आदमी का नाम भी पूछा – आनन्द कुमार गुप्ता।  आनन्द छरहरे बदन का जवान आदमी। लगता है जैसे जीवन की रुक्षता सहने-फेस करने को तत्पर हो और सक्षम भी।

आनन्द कुमार गुप्ता
आनन्द कुमार गुप्ता

इन लोगों से तादात्म्य स्थापित करने की तकनीक मुझमें शायद विकसित हो रही है। छोटा सौदा खरीदना, उनके बच्चों को प्यार से देखना, उनसे निरीह से सवाल कर उनकी मैत्री की नब्ज को टटोलना और उनमें अपना जेन्युइन इण्टरेस्ट दिखाना – यह सब काम करता है।


???????????????????????????????एक बात मुझे स्पष्ट हुयी। झोंपड़ी के प्रकार – जिसमें किसी भी दीवार या घातु का प्रयोग न होने से मुझे लगता था कि ये लोग बहुत विपन्न होंगे। पर वास्तव में विपन्न नहीं हैं। इनमें व्यवसाय करने की, जिन्दगी की रुक्षताओं का सामना करने की और सिवाय झोंपड़ी के, अन्य सुविधाओं में मध्यवर्ग से तुलनीय होने की आश्चर्यजनक क्षमता है। यह वर्ग (जैसा आनन्द कुमार गुप्ता ने कहा) व्यवस्था के आतंक से कहीं अधिक बेबाकी से लड़ सकता है, बनिस्पत मध्यवर्ग के। शायद इन लोगों के पास राशनकार्ड या वोटर कार्ड जैसी सहूलियतें पूरी न हों, और उसके कारण वे तथाकथित वोटबैंक का पार्ट न हो पाते हों, पर वे समाज के अच्छे वेल्थ क्रीयेटर हैं। अर्थव्यवस्था में उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। परसों इन्ही झोंपड़ी में रहते बच्चे (जो दूध पेरने – दूध से क्रीम निकालने – का काम करता है) की एवन क्रूजर साइकल देख कर मुझे भी ईर्ष्या होने लगी थी।


अब देखते हैं कब किस नये व्यक्ति से मुलाकात करते हैं ब्लॉगर जीडी! 😆