बुलबुलान बनाम बाभनपट्टी


जनसंख्या की दौड़; ज्यादा बच्चे पैदा करना और अपना घेट्टो बनाना ब्राह्मणत्व का निदान नहीं है! एक कोने में दाना डालो तो बुलबुल आती है। धीरे, झिझकती हुई। दो-चार दाने उठाती है और उड़ जाती है। टिक नहीं पाती वहां।  उससे पहले कौआ आ जाता है। फिर चर्खियाँ। शोर, झपट्टा, कब्ज़ा जमा लेते हैं वे।Continue reading “बुलबुलान बनाम बाभनपट्टी”

खसरा से जूझती माँएँ


एक जगह बीमारी देवी से बात करती है, एक जगह सिस्टम से, और एक जगह सिर्फ़ माँ से। मैं दलित बस्ती के समीप रहता हूं। वहां कई बच्चों को माता निकली हैं। माता अर्थात खसरा या मीजल्स। वहां जिंदगी फिर भी चल रही है।  खसरा कोई नई बीमारी नहीं है पर  समाज के लिए खसराContinue reading “खसरा से जूझती माँएँ”

किंडलियों की दुनिया


उनकी किताबों की अलमारी दिखती नहीं—क्योंकि होती ही नहीं। सोशल मीडिया पर एक अलग ही किस्म का साहित्यिक उत्सव चलता रहता है। कोई किताबों के मेले की तस्वीर डालता है, कोई लिटरेरी फेस्टिवल के मंच की, कोई अपनी हाल ही में खरीदी गई हार्डबाउंड किताबों की करीने से सजी हुई फोटो। लगता है— किताबें अक्सरContinue reading “किंडलियों की दुनिया”

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