सत्तर साल के जीडी को क्या करना चाहिए


इस उम्र में पहली समझ यह बनती है कि संख्या से लड़ना व्यर्थ है। “जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें,बंदों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते।” — इकबाल की नज़्म का हिस्सा। भारत में अपीज़मेंट—तुष्टिकरण—की राजनीति है।कभी “ब्राह्मण भारत छोड़ो” जैसे नारे सुनाई देते हैं।जहाँ उम्मीद होनी चाहिए, वहाँ मायूसी है।शिक्षा लचर है; न्यायपालिकाContinue reading “सत्तर साल के जीडी को क्या करना चाहिए”

मध्यमता (मिडियॉक्रिटी) के युग में उत्कृष्टता की राजनीति


कोई भी व्यवस्था जो सर्वश्रेष्ठ को चुनने में असफल है, वह अंततः सबसे कमजोर को ही धोखा देती है। भारतीय लोकतंत्र पिछले कुछ दशकों से एक अजीब द्वंद्व में फँसा हुआ है। एक ओर अनुपातिक प्रतिनिधित्व की राजनीति है—जिसने ऐतिहासिक अन्यायों को दृश्यता दी, आवाज़ दी और एससी, एसटी, ओबीसी आदि के लिये सत्ता केContinue reading “मध्यमता (मिडियॉक्रिटी) के युग में उत्कृष्टता की राजनीति”

एक सूचना: अब मेरा लेखन Substack पर भी है


मैं वर्षों से यहाँ WordPress पर “मानसिक हलचल” लिखता आ रहा हूँ।यह जगह मेरे लेखन का संग्रह रही है—एक तरह की खुली डायरी। हाल ही में मैंने Substack पर भी लिखना शुरू किया है।वहाँ अब तक काफी पोस्टें आ चुकी हैं। Substack को मैंने इसलिए चुना क्योंकि वहाँ लेख सीधे ईमेल में पहुँचते हैं,पढ़ना अधिकContinue reading “एक सूचना: अब मेरा लेखन Substack पर भी है”

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