पक्षियों के बहाने बाभन की दशा — न लड़ सकते हैं, न आरक्षण है उनके लिये


इतिहास बताता है कि चुप वर्ग सबसे पहले टूटता है, और सबसे देर से सुना जाता है। हमारे घर में, हर सुबह आँगन में बिखरे फीके नमकीन पर जो दृश्य बनता है, वह प्रकृति का खेल नहीं लगता, एक छोटा-सा समाज लगता है। कौव्वे तेज़ी से आते हैं, तेज़ी से खाते हैं और ज़्यादा लेContinue reading “पक्षियों के बहाने बाभन की दशा — न लड़ सकते हैं, न आरक्षण है उनके लिये”

दिलीप चौरसिया से मुलाकात 


दिलीप से सवेरे बात होती है। वे महराजगंज में अपनी मेडिकल की दुकान पर हैं। उनका जो छोटा भाई मैडीकल दुकान चलाता है, बीमार हो गया है। अस्पताल में भर्ती है। उसका भी काम देखना होता है।  हाईवे पर ऊपरी मंजिल में उनकी साड़ी की दुकान है — वहां मिलना हुआ उनसे। मैडीकल दुकान सेContinue reading “दिलीप चौरसिया से मुलाकात “

सत्तर साल के जीडी को क्या करना चाहिए


इस उम्र में पहली समझ यह बनती है कि संख्या से लड़ना व्यर्थ है। “जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें,बंदों को गिना करते हैं, तोला नहीं करते।” — इकबाल की नज़्म का हिस्सा। भारत में अपीज़मेंट—तुष्टिकरण—की राजनीति है।कभी “ब्राह्मण भारत छोड़ो” जैसे नारे सुनाई देते हैं।जहाँ उम्मीद होनी चाहिए, वहाँ मायूसी है।शिक्षा लचर है; न्यायपालिकाContinue reading “सत्तर साल के जीडी को क्या करना चाहिए”

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