सहस्त्रार्जुन की राजधानी माहिष्मती (माहेश्वर)


लम्बी चौड़ी योजना बनाने वाला (पढ़ें – मेरे जैसा व्यक्ति) यात्रा पर नहीं निकलता। यात्रा पर प्रेमसागर जैसा व्यक्ति निकलता है जो मन बनने पर निकल पड़ता है। सो, प्रेमसागर मन बनने के साथ ही आगे की लम्बी यात्रा पर निकल पड़ेंगे।

बडवाह से माहेश्वर


नवम्बर का महीना और नदी घाटी का इलाका; कुछ सर्दी तो हो ही गयी होगी। आसपास को देखते हुये प्रेमसागर ने बताया कि दोनो ओर उन्हें खेती नजर आती है। जंगल नहीं हैं। गांव और घर भी बहुत हैं। लोग भी दिखाई देते हैं। रास्ता वीरान नहीं है।

महाकालं, महाकालं, महाकालं नमोस्तुते!


त्रिपाठी जी और चौहान जी उन्हें साथ लेने आ चुके हैं। निकल ही लिये हैं प्रेमसागर महाकाल मंदिर के लिये। मैंने उन्हें शुभकामनायें दी। “हर हर महादेव भईया। ऐसे ही आशीर्वाद देते रहियेगा।” सुन कर मैं भी सेण्टीमेण्टल हो जाता हूं।

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