सिक्यूरिटी वाले और चेक पोस्ट


मेरे व्यक्तित्व में कुछ है जिसे किसी बैरियर पर चेक किया जाना अच्छा नहीं लगता। रेलवे का आदमी हूं और कभी न कभी टिकेट चेकर्स मेरे कर्मचारी हुआ करते थे। पर खुद मुझे टिकेट चेक कराना बहुत खराब लगता है।

मैं सवेरे उठता कैसे हूं?


यही मेरे कर्मकाण्ड हैं। यही मेरा धर्म। … बस। चारधाम की यात्रा, किसी मंदिर देवालय में जाना, किसी धार्मिक समारोह में शरीक होना – यह मेरी सामान्य प्रवृत्ति नहीं है और उनके लिये सयास कर्म नहीं करता। हां, उन्हें जड़ता या उद्दण्डता से नकारता भी नहीं।

डईनिया का बुनकर पारसनाथ


यहां पारसनाथ जैसे चरित्र भी दिख जाते हैं – कम ही दिखते हैं; पर हैं; जिन्हे देख कर लगता है कि मूलभूत सरलता और धर्म की जड़ें अभी भी यहां जीवंत हैं। संत कबीर और रैदास की जीवन शैली और चरित्र अभी भी गायब नहीं हुये हैं सीन से।

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