गांव में आ कर शुरू शुरू में लगता था कि यहां वह सब नहीं होगा जिसकी शिकायत शहरों और राजनीति में की जाती है। कट मनी, दबंगई, सिंडीकेट, उगाही — ये सब कहीं दूर की चीजें लगती थीं। गांव मानो बचपन में लौटने की जगह था। शायद हम गांव को देखना नहीं, याद करना चाहतेContinue reading “कहां नहीं है कट मनी, दबंगई, सिंडीकेट”
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बंधुआ मजदूरी का आधुनिक रूप
रैट रेस में अपने को पेरते लोग — क्या बंधुआ मजदूर हैं? मैं साइकिल ले कर ईंट भट्ठा वाले मजदूरों को देखता हूं और स्लिंग बैग लिये बम्बई की सबर्बन ट्रेन में बैठे मोबाइल पर फेसबुक स्क्रॉल करते या ट्रेन के गेट पर रील बनाते नौजवान की कल्पना करता हूं। कौन बंधुआ मजदूर है औरContinue reading “बंधुआ मजदूरी का आधुनिक रूप “
कंकही का भविष्य
महान पुरातत्वविद डा. बी. बी. लाल की पुस्तकें पढ़ता हूं तो अपने समय की अनेक वस्तुएं चार–पांच हजार साल पहले से जुड़ी नजर आती हैं। मोहनजोदड़ो काल की महिला की मांग का सिंदूर, बच्चों के खिलौने, दर्पण में निहारती स्त्री, गंधार काल की सुंदरी का केश-विन्यास और कंकही — सब तब भी थे और आजContinue reading “कंकही का भविष्य”
