परसों शाम अचानक आँधी आई। अस्सी किलोमीटर की रफ़्तार से धूल भरी — घटाटोप अँधेरा छा गया। अभी एक घंटा बचा था सूरज ढलने में, पर रोशनी इतनी कम कि लगे रात के आठ बज गये। हमने सारी खिड़कियाँ-दरवाज़े बंद किये। ड्राइवर अशोक को कहा कि वह अंदर आ कर बैठ जाये। पर उसने बतायाContinue reading “आँधी, आम और डालें”
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कालीन का कारीगर
गुन्नीलाल जी के यहाँ से लौट रहा था। सवेरे साढ़े आठ का समय। धूप अभी तीखी नहीं हुई थी। सामने एक आदमी साइकिल पर था — सिर पर गमछे का फेंटा बाँधे, पीठ सीधी, पीछे कैरियर में टिफिन दबाया हुआ। चाल में जल्दी थी, पर थकान भी। मैंने बिजली की साइकिल तेज़ की और बगलContinue reading “कालीन का कारीगर”
सिब्बू गुरू की बारात
आज साइकिल गुन्नीलाल जी के यहाँ मुड़ गई। ग्वाले के यहाँ से वे दूध ले कर आ चुके थे। नीम की छाँव में अपना मोबाइल स्क्रॉल कर रहे थे। मुझे देख कर उठे, स्वागत किया। नीम के नीचे ही कुर्सी और टेबल लाये — धूल साफ कर बिठाया। तब बातचीत शुरू हुई। बोले — साहेब,Continue reading “सिब्बू गुरू की बारात”
