भला हो कल के प्रदोष काल के रुद्राभिषेक का। मैं रिश्ते के कारण श्रेष्ठ ब्राह्मण था सो मुझे बिना कुछ किये पण्डिज्जी लोगों के साथ पहले भोजन कराया गया। पांच सौ रुपये की दक्षिणा भी मिली (जो मैंने पूरी निष्ठा से अपनी पत्नीजी को दे दी!)
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मानस पाठ का निमंत्रण
मानस पाठ अभी भी जवान-बूढ़े सभी को अपने साथ जोड़े हुये है। तुलसीदास जी की इस कालजयी कृति की महिमा कम नहीं हुई है। धर्म, आस्था, सम्बल, मानता-मनौती और अभीष्ट पूरा होने पर ईश्वर स्मरण – सब के लिये रामचरित मानस का सहारा है।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं, तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्
आत्मबुद्धि वाला भाव दिन भर में पांच दस मिनट रहता है। वह बढ़े। सोवत जागत आत्मबुद्धि रहे। तब कोई समस्या नहीं। देह की और जीव की दशा जैसी भी हो, क्या फर्क पड़ता है तब। स्थितप्रज्ञ बनना ध्येय होना चाहिये।
