मुकेश पाठक का शहद का कॉम्बो पैक

मुकेश जी मधुमक्खी पालन में दो प्रकार से समस्याओं से जूझ रहे हैं। मधुमक्खी पालन अपने आप में चुनौती है। यह एक घुमंतू व्यवसाय है जिसमें स्थान परिवर्तन के कारण रखरखाव, लॉजिस्टिक्स और प्रबंधन की विकट समस्यायें हैं। इसके अलावा ब्राण्डेड शहद में मक्का-चावल शर्करा घोल का मिलाना दूसरी बड़ी समस्या है, जो मधुमक्खी पालन की प्रतिद्वंद्विता में सेंध लगाती है।


रामपुर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश निवासी मुकेश पाठक जी से लगभग दस साल से ट्विटर के माध्यम से परिचित हूं। उनसे बहुत समानतायें हैं। कल उनसे पहली बार बातचीत हुई तो उन्होने बताया कि उनसेे मेरी बिटिया ने उन्हें कहा था – अंकल, आपकी आवाज मेरे पिताजी सेे मिलती जुलती है।

पाठक जी मधुमक्खी पालन का व्यवसाय करते हैं। वे भाजपा की आई.टी. शाखा से सक्रिय रूप से जुड़े हैं। वे अपने को ट्विटर पर “मोदी युग का भाजपा सिपाही” कहते हैं और लिखते हैं कि उन्हे फख्र है कि प्रधानमंत्री जी ट्विटर पर उन्हे फॉलो करते हैं

मुकेश पाठक

मेरा फोन नम्बर और मेरा पता भी मेरी बिटिया के माध्यम से उन्हें मिला। बिटिया वाणी पाण्डेय ने अपनी संस्था साथ-फाउण्डेशन के लिये उन्हें सहायता और मार्गनिर्देशन हेतु सम्पर्क किया था। उसके बाद पाठक जी ने शहद का एक कॉम्बो पैक; जिसमें मल्टीफ्लोरा, अजवायन, जामुन और लीची के परागकणों द्वारा बनाये गये शहद के जार थे, कोरियर के माध्यम से मुझे भेजा। कोरियर वाला नालायक था। पाठक जी की इतने प्रेम से भेजी वस्तु अपने यहां तीन चार दिन लिये बैठा रहा और मुझे एसएमएस भेजा कि मैं उसके ऑफिस से आ कर ले जाऊं। कोई और पैकेट होता तो मैं हल्ला मचाता और उसे जा कर लेने से मना कर देता। पर पाठक जी का पैकेट था, तो उसके यहां जा कर छुड़ाया।

गांवदेहात में कोरियर सेवा वाले अभी कुशल सेवा के लिये प्रतिबद्ध नहीं हैं। अकुशल होने के साथ साथ कई तो भ्रष्ट भी हैं। पहले एक बंदा मुझसे घर ला कर सप्लाई देने के पैसे/रिश्वत मांग बैठा था। मैंने उसकी शिकायत अमेजन से की थी और तब अमेजन ने कोरियर ही बदल दिया था। ये सज्जन भी शिकायत करने लायक काम किये थे। पर पाठक जी का पैकेट मुझे मिला और शहद की चार बोतलें पा कर मैं शिकायत की बात भूल गया। 🙂

मधुमक्खी पालन कष्टसाध्य कार्य है। इनके छत्तों के बक्से ले कर स्थान स्थान पर घूमना पड़ता है। घूमने की प्रक्रिया के लिये रात भर का समय ही मिलता है।

उसके बाद मुकेश जी से मैसेज आदानप्रदान हुआ। फोन नम्बर लिया। ह्वाट्ससएप्प पर संदेश दिये लिये गये। फिर बातचीत हुई। दस साल से वर्चुअल जगत के परिचय के बावजूद भी बातचीत के असमंजस की बर्फ तोड़ने में कुछ समय लगा! इसमें शायद मेरा अंतर्मुखी होना ही जिम्मेदार है।

मधुमक्खी पालकों से मेरा पूर्व परिचय है। ब्लॉग पर ऐसे दो व्यक्तियोंं से बातचीत के आधार पर मैंने लिखा भी है:

  1. विकास चंद्र पाण्डेय, मधुमक्खी पालक
  2. मधुमक्खी का गड़रिया – शम्भू कुमार
मुकेश पाठक

पर उक्त दोनों की बजाय मुकेश पाठक जी का मधुमक्खी पालन एक अलग ही स्तर पर निकला। वे न केवल मधुमक्खी पालन और उसके व्यवसाय से गहरे से जुड़े हैं, वरन मधु की शुद्धता के बारे में जन जागरण में भी बड़ा योगदान कर रहे हैं। उनकी नेटवर्किंग की क्षमता और सोशल मीडिया पर सार्थक सक्रियता इसमें बहुत सहायक है। अपने व्यवसाय को चलाने में वे अत्यंत कुशल हैं – यह उनसे छोटी सी बातचीत से स्पष्ट हो गया।

“मधुमक्खी पालन कष्टसाध्य कार्य है। इनके छत्तों के बक्से ले कर स्थान स्थान पर घूमना पड़ता है। घूमने की प्रक्रिया के लिये रात भर का समय ही मिलता है। अगर स्थान परिवर्तन करना हो तो रात 8-9 बजे; जब बक्से सभी मधुमक्खियों के छत्ते में आने के बाद बंद किये जाते हैं; से सवेरे तक के समय में ही स्थान परिवर्तन सम्भव है। सवेरे इनको ऐसी जगह पर रख कर बक्से खोलने होते हैं, जहां तीन से पांच किमी परिधि में पर्याप्त फूल हों। इस प्रकार स्थान परिवर्तन बड़ी सूझबूझ से चुनने होते हैं। एक दो बार तो परेशानी हो गयी थी, जब बक्सों का वाहन ट्रेफिक जाम में फंस गया और अगले दिन समय से उन्हें पोजीशन कर खोलने में दिक्कत हुई। अगर मक्खियों को पराग न मिले तो उनके मरने की सम्भावना बन जाती है। ऐसी दशा में कई मधुमक्खी पालक चीनी पानी का घोल उन्हें फीड के रूप में देते हैं। हम वैसी प्रेक्टिस नहीं बनाना चाहते। जैसा शहद फूलों के पराग से मधुमक्खियां बनाती हैं, वैसा शहद हम लोगों को देते हैं और वह मशहूर ब्रांडों के शहद की अपेक्षा कैसा है, उसका निर्णय उपभोक्ता पर छोड़ते हैं।”

“मैं स्वयम भी इन टीमों में घूमा हूं। तरह तरह की अप्रत्याशित समस्याओं से जूझना पड़ा है। मधुमक्खियों ने काट भी खाया है।” – मुकेश पाठक

“मैने लगभग 150 बी-हाइव बक्सों वाली टीमें बना दी हैं। एक टीम में दो व्यक्ति होते हैं। उन्हे वैसे ही स्मार्टफोन ले दिये हैं, जैसे मेरे अपने पास हैं। उनमें ह्वाट्सएप्प के माध्यम से सम्पर्क बना रहता है। इन टीमों को मूवमेण्ट प्लान के रूप में फ्लोरल केलेण्डर बना दिये हैं। उसी आधार पर इनका स्थान परिवर्तन होता है।”

“ये टीमें उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार और झारखण्ड में जाती हैं। कभी कभी तो बेचैनी सी होती है जब यह अहसास होता है कि करीब ढाई हजार बी-हाईव बक्सों के रूप में दो-ढाई करोड़ की पूंजी खेतों-जंगलों में बिखरी हुई है! तब अपने नेटवर्क और डिस्टेण्ट मैनेजमेंट पर ही भरोसा करना होता है। मैं स्वयम भी इन टीमों में घूमा हूं। तरह तरह की अप्रत्याशित समस्याओं से जूझना पड़ा है। मधुमक्खियों ने काट भी खाया है।”

पाठक जी ने अपने ट्विटर प्रोफाइल पर एक ट्वीट पिन कर रखी है जो मधुमक्खी पालकों की एक बड़ी समस्या पर दृष्टि डालती है –

एफ.एस.एस.ए.आई. ने पिछले साल शुद्ध शहद में चावल और मक्के के सिरप को मिलाने को वैधानिक कर दिया है। आजकल यह खबरों में है कि यह सिरप चीन से आयात कर ब्राण्डेड कम्पनियाँ अपने शहद में मिलाती हैं। यह शहद एफएसएसएआई के मानक पर सही भले हो, अंतर्राष्ट्रीय मानक परीक्षणों में खरे नहीं उतर पाये। पर एफएसएसएआई की इस “छूट” के कारण मधुमक्खी पालकों के समक्ष संकट आया है। दूसरे; लोगों को ईम्यूनिटी बूस्टर शहद की बजाय चीनी का घोल मिल रहा है।

यह घोल चीन भर से नहीं आ रहा। उत्तराखण्ड में भी यह औद्योगिक स्तर पर बनाया जा रहा है। इस चावल-मक्का शर्करा घोल को 25 से 50 प्रतिशत तक शहद में मिलाने पर वह परीक्षणों में “पकड़ा” नहीं जा सकता –

मुकेश जी मधुमक्खी पालन में दो प्रकार से समस्याओं से जूझ रहे हैं। मधुमक्खी पालन अपने आप में चुनौती है। यह एक घुमंतू व्यवसाय है जिसमें स्थान परिवर्तन के कारण रखरखाव, लॉजिस्टिक्स और प्रबंधन की विकट समस्यायें हैं। इसके अलावा ब्राण्डेड शहद में मक्का-चावल शर्करा घोल का मिलाना दूसरी बड़ी समस्या है, जो मधुमक्खी पालन की प्रतिद्वंद्विता में सेंध लगाती है।

जैसा मुकेश जी की बातचीत से लगा, वे इन दोनो समस्याओं से बखूबी लोहा ले रहे हैं और बहुत सीमा तक अपनी उपलब्धि से संतुष्ट भी नजर आते हैं।

“बनारस आना होता है मेरा। शहद के फ्लोरल केलेण्डर में भी इस स्थान पर आना जाना होता है। अगली बार चक्कर लगा तो आपके यहां तक आऊंगा। आपने जिस तरह का वर्णन अपने गांवदेहात का किया है, उसके कारण जिज्ञासा भी है। लम्बे अर्से से आप से मिलने की इच्छा भी है।” – मुकेश जी ने कहा।

मुकेश पाठक जी का एक और चित्र। सभी चित्र उनके ट्विटर अकाउण्ट से लिये गये हैं।

मुकेश जी ने इस बार जो शहद मुझे भेजा, उसके पैसे नहीं लिये। “इस बार का शहद आप मेरी ओर से भेंट ही मानें। प्रयोग कर देखें कि आपको ब्राण्डेड शहद की अपेक्षा कैसा लगता है। कॉम्बो पैक में भेजने और उसकी मार्केटिंग का ध्येय भी यही है कि लोगों को यह पता चले कि मधुमक्खियां जो शहद बनाती हैं वह अलग अलग पराग कणों से अलग अलग प्रकार का बनता है। उसकी गंध भी अलग अलग होती है और स्वाद भी। वह अलग अलग सांद्रता का होता है। ब्राण्डेड शहद की तरह हमेशा एक सा नहीं होता।”

आगे मुकेश जी से ट्विटर के साथसाथ शहद भी एक और निमित्त बना जुड़ने का। मुकेश जी ने मुझे अपने बड़े भाई की तरह माना – “वे भी सन 1955 के आसपास के जन्मे हैं आप की तरह!”

मुकेश जी से आमने सामने की मुलाकात की साध बढ़ गयी है! 🙂


गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी और वामपंथ से टकराव

त्रिपाठी जी ने वामपंथ से टकराव के अनेक मामले और अनेक लोगों से मिलने के प्रसंग मुझे बताये। उनसे मिलने पर लगा कि ये वामपंथी लिबरल-वाम एजेण्डा को बड़े शातिराना ढंग से शिक्षण संस्थानों और समाज में घोलने का काम करते हैं।


एक विवाह कार्यक्रम में गया था मैं। सूबेदार गंज, प्रयागराज के रेलवे परिसर में कार्यक्रम था। पुरानी जानी पहचानी जगह। फिर भी मुझे यह लग रहा था कि मेरे परिचित कम ही लोग होंगे और मैं वहां निरर्थक हीहीहाहा किये बिना कर जल्दी लौट सकूंगा। पर वैसा हुआ नहीं। और मुझे चार पांच अच्छे लोग मिले। सार्थक हुआ वहां जाना।

मेरे बंधु ओमप्रकाश मिश्र के पुत्र का विवाह था। उन्होने मुझे कहा – भाई साहब, आपको एक महत्वपूर्ण सज्जन से मिलवाता हूं। कार्यक्रम में मेरी व्यस्तता के कारण मैं स्वयम उनके पास बैठ नहीं पाऊंगा। अत: मेरे स्थान पर आप उन्हें कम्पनी दीजिये।

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी

वे सज्जन थे श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा परिषद के अध्यक्ष हैं। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रह चुके हैं (अभी भी होंगे, शायद) और संस्कृत के भी विद्वान हैं।

मुझे अटपटा लगा। जिंदगी भर मैं ट्रेन परिचालन में थानेदारी भाषा में जूझता रहा और यह बंधु मुझे एक एकेडमिक क्षेत्र की शीर्षस्थ विभूति के साथ घंटा-डेढ़ घंटा के लिये “फंसा” रहे हैं। मेरे और उनके बीच बातचीत के कोई कॉमन मीटिंग प्वाइण्ट ही कहां होंगे?

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी से सामान्य परिचय के बाद मैं उनके पास सोफे पर बैठ गया। उनसे उनके बारे में उन्ही से पता करना शायद उनकी गरिमा के अनुकूल नहीं होता; सो मैंने इण्टरनेट सर्च की शरण ली। “Girish Chandra Tripathi BHU” के नाम से सर्च करने पर न्यूज18 का यह लेख मेरे सामने था – Meet BHU VC Girish Chandra Tripathi, A ‘Proud Swayamsevak’ Who is in Eye of The Storm .

थोड़ा अंश पढ़ कर, उन्हें लगभग सुनाते हुये मैंने कहा – वाह! यह तो लिखता है कि आपने लड़कियों की हॉस्टल की मेस में मांस निषेध कर दिया था। और वहीं से अपरिचय की बर्फ पिघलनी प्रारम्भ हुई। मेरा मोबाइल ले कर त्रिपाठी जी ने वह लेख पूरा पढ़ा। फिर उन्होने बताना शुरू किया। उसके बाद सामान्यत: वे बोलने वाले और मैं सुनने वाले की भूमिका में आ गये। उनकी बातें इतनी रोचक थीं कि मुझे अपने श्रोता होने में कोई कष्ट नहीं था।

उन्होने बताया कि यह (लेख में वर्णित) संदीप पाण्डेय विश्वविद्यालय में नौकरी करते हुये भी छात्रों के बीच राजनीति करता था। जब नहीं माना तो मुझे निकाल देना पड़ा। वामपंथी है। मेगसेसे अवार्ड विजेता भी। बहुत से मेगसेसे अवार्ड पाने वाले उसी प्रकार के हैं। अपना काम करने की बजाय यह व्यक्ति विश्वविद्यालय में येन केन वाम विचारधारा का प्रसार करने और छात्रों को उकसाने में लिप्त रहता था। और वैसा आचरण बनारस हिंदू विश्वविद्यालय तथा महामना मालवीय जी की विश्वविद्यालय की परिकल्पना के अनुकूल कदापि नहीं है।

प्रो. गिरीश चंद्र त्रिपाठी

त्रिपाठी जी ने वामपंथ से टकराव के अनेक मामले और अनेक लोगों से मिलने के प्रसंग मुझे बताये। उनसे मिलने पर (जैसा मैं पहले भी महसूस करता था) लगा कि ये लोग – शैक्षणिक संस्थानों में घुसे संदीप पाण्डेय जैसे और मीडिया के एक बड़े वर्ग के लोग मसलन राजदीप सरदेसाई, रवीश कुमार या बरखा दत्त – लिबरल-वाम एजेण्डा को बड़े शातिराना ढंग से शिक्षण संस्थानों और समाज में घोलने का काम करते हैं। इसके अलावा प्रायोजित आंदोलनों में इनकी उत्तरोत्तर विघटनकारी भूमिका उजागर हो रही है। हिंदी साहित्य में भी इनकी सोची समझी पैठ है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थापित करते समय जिन आदर्शों को महामना मालवीय जी ने सामने रखा था, उनसे इन लोगों की विचारधारा का सामंजस्य नहीं है। गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी भारतीय जीवन पद्यति, शासक के जीवन मूल्य और समाज में नारी के स्थान के बारे में विस्तार से बताने लगे। उस संदर्भ में अनेक संस्कृत के कथन भी उद्धृत किये। मैं कई बार उनसे पूछ्ता रहा – यह कहां/किस ग्रंथ में है? बाद में पढ़ने के लिये मैंने दो पुस्तकें चिन्हित कीं – कालिदास का अभिज्ञानशाकुंतल और दण्डी का दशकुमार चरित्र। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य पुस्तकें – स्वप्नवासवदत्ता, मृच्छकटिक, उत्तररामचरित्र, कुमारसम्भव, मुद्राराक्षस आदि हिंदी अनुवाद में सहजता से उपलब्ध हैं। उन सब को भी देखने पढ़ने के लिये पर्याप्त समय है मेरे पास! 🙂

“दुष्यंत मृग का पीछा करते हुये अनजाने में कण्व के आश्रम में प्रवेश कर जाते हैं। तपस्वी उन्हें चेताता है – रुको, अपना बाण नीचे करो, यह आश्रम है और यहां हरिण अवध्य है। किसी प्राणीमात्र की हत्या नहीं की जा सकती यहां।… और दुष्यंत का उसके बाद आचरण ध्यान देने योग्य है। वे रथ से उतरते हैं; अपना धनुष-बाण नीचा करते हैं। उनका सिर अपराध बोध से झुक जाता है। उन्हे पश्चाताप होता है कि वे गुरुकुल/आश्रम में प्रवेश कर गये पर अपना मुकुट उतारा नहीं! … आज के समय में इस आचरण की कल्पना की जा सकती है? आज का शासक होता तो ऐसा कहने पर बेचारे तपस्वी को तो कारागार मेंं डाल दिया जाता।… जब हम विश्वविद्यालय की सोचते हैं तो उसकी गरिमा और उसके आदर्श के रूप में यह सब सामने आता है।” – मैं श्री गिरीश चंद्र जी के शब्दों को यथावत नहीं रख पा रहा (मेरी स्मरण शक्ति उस लायक नहीं है), पर उनका आशय ऐसा ही था।

वाल्मीकि आश्रम में लव-कुश के साथ सीता। चित्र देवदत्त पटनायक की पुस्तक “सीता” से।

समाज में नारी की स्थिति के बारे में उन्होने अपने विचार रखे। राम के आदर्श की भी बात की। वनगमन के विषय में माता की बात पिता के आदेश के ऊपर थी, ऐसा उन्होने बताया। कौशल्या राम को कहती हैं – जो केवल पितु आयसु ताता; तो जिनि जाऊ जानि बड़ि माता। जो पितु मातु कहेऊं बन जाना; सो कानन सत अवध समाना। (अगर केवल पिता ने ही वनगमन का आदेश दिया है तो माता को बड़ा मान कर उनके आदेश का अनुसरण मत करो। पर अगर माता-पिता दोनो ने कहा है तो जंगल तुम्हारे लिये अवध समान है।)… माता का स्थान पिता से ऊपर है। इसी प्रकार सीता को वनवास देने के प्रसंग में राम (अपने राजधर्म की आवश्यकता के बावजूद) सीता को वन नहीं जाने देना चाहते। तब सीता उन्हें उनका राजधर्म समझाने के लिये उस कक्ष में ले कर जाती हैं, जिसमें उनके पूर्ववर्ती रघुवंशीय राजाओं के चित्र लगे हैं। सीता राम को वे चित्र दिखा कर कहती हैं – अगर वे राम के व्यक्ति को राजा के ऊपर रख कर आचरण करेंगे तो परलोक में अपने इन पूर्वजों को क्या उत्तर देंगे? … तब राम सीता के वनगमन के बारे में निश्चय कर पाते हैं।

उनके कहने में मुझे बहुत रस मिल रहा था और मैंने उन्हे बहुत नहीं टोका। एक अनुशासित श्रोता बना रहा। उनके कहने के बाद मैंने गिरीश चंद्र जी से उनके अपने लेखन की बात की; जिसे पढ़ कर मैंं उनके विचारों के विषय में और जान सकूं। उन्होने बताया कि “यह उनकी कमजोरी रही है कि उन्होने लिखा बहुत कम है”। उनसे बातचीत में लगा कि यह उनकी ही नहीं, सभी दक्षिण पन्थी विचारधारा वालों की भी कमी रही है। “दक्षिण पंथी मीडिया भी नाममात्र का है”।

श्री गिरीश चंद्र त्रिपाठी (बाँये) और मेरे मित्र श्री ओमप्रकाश मिश्र (दांये)

मैंने स्वराज्य का नाम लिया। गिरीश जी ने उस मीडिया संस्थान के विषय में भी अपना असंतोष व्यक्त किया। उनके अनुसार स्वराज्य के लोगों को भी भारतीय सोच, दर्शन, परम्पराओं और सांस्कृतिक मूल्यों की गहन समझ नहीं है। वामपंथ से जूझने के लिये यह कमजोरी है ही। … मुझे भी ऐसा लगा। मेरे दैनिक न्यूज-व्यूज और ओपीनियन खंगालने के लिये जो साइट्स हैं उनमें हैं – न्यूयॉर्क टाइम्स, गार्डियन, द टेलीग्राफ, पाकिस्तान का डॉन और भारत का द हिंदू। ये सभी वाम पंथी या लेफ्ट-ऑफ-सेण्टर की सामग्री परोसते हैं। इसके अलावा साहित्य में भी अधिकतर इसी विचारधारा का वर्चस्व दिखता है। मेरे पास ले दे कर स्वराज्य का सब्स्क्रिप्शन है, जिसे राइट या राइट ऑफ सेण्टर कहा जा सकता है।

काश गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी जैसे विद्वान नियमित लेखन कर लोगों की विचारधारा को पुष्ट करने का बड़ा कार्य करते। यहां गांव में एकांत में रहने वाले मुझे भविष्य में गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी का सानिध्य मिलेगा; कह नहीं सकता। उस समारोह में एक पत्रकार श्री मुनेश्वर मिश्र जी भी आये थे। उनको त्रिपाठी जी ने भविष्य मेंं बैठक/गोष्ठी आयोजित करने के लिये कहा है, जिसमें शायद गिरीश जी से मिलना सम्भव हो।

गिरीश चंद्र जी से मुलाकात के बाद मुझे यह जरूर स्पष्ट हुआ है कि मुझे भारतीय सोच/विचारधारा/दर्शन का बेहतर और विधिवत अध्ययन करना चाहिये; इधर उधर चोंच मारने और चुगने के अंदाज में नहीं। पर संस्कृत साहित्य को उसके मूल रूप में पढ़ना-समझना फिलहाल मेरे लिये सम्भव नहीं है – मेरी भाषा की सीमायें हैं। बारबार संस्कृत-हिन्दी शब्दकोष रेफर करना असम्भव तो नहीं, ऊबाउ काम है।

इसलिये फिलहाल मैंने अभिज्ञान शाकुंतल और दशकुमार चरित्र का हिंदी अनुवाद त्रिपाठी जी से मिलने के बाद ढूंढ़ कर पढ़ा। पैंसठ साल की उम्र में जीवन में पहली बार इन पुस्तकों को मैंने पहचाना। अभी आधा दर्जन अन्य संस्कृत के ग्रंथों के अनुवाद भी पढ़ने के लिये चिन्हित कर लिये हैं। इसके अलावा तुलसी के रामचरितमानस और विनयपत्रिका को एक बार फिर से पढ़ने की सोची है। इसी वर्ष मैंने राजाजी का महाभारत और इरावती कर्वे का युगांत पढ़ा है। और आगे यह सब जारी रखने के लिये प्राइम मूवर गिरीश चंद्र त्रिपाठी जी से उक्त वर्णित मुलाकात ही है।


नदी, मछली, साधक और भगव्द्गीता

अचिरेण – very soon – में कोई टाइम-फ्रेम नहीं है। वह ज्ञान प्राप्ति एक क्षण में भी हो सकती है और उसमें जन्म जन्मांतर भी लग सकते हैं!


मछली पकड़ने वाले और साधक में बहुत कुछ साम्य है। मैं जब भी गंगा किनारे किसी को कंटिया लगा कर शांत बैठे देखता हूं, मुझे तत्वज्ञान की तलाश में साधनालीन व्यक्ति की याद हो आती है। इस प्रकार के कई लोगों से मैं मिला हूं और उनके बारे में ब्लॉग पर भी लिखा है। सामान्यत: वह लिखने में एक प्रकार का व्यंग, सटायर या हास्य होता है। आज वैसी अनुभूति नहीं थी!

वह व्यक्ति अभी बैठा ही था कंटिया लगा कर। एक डोरी – करीब तीस फुट लम्बी – कांटा और चारा (कीड़ा/केचुआ) लगा कर नदी में फैंक रखी थी। एक दूसरी डोरी, लगभग उतनी ही लम्बी, एक डण्डी से सहारे फैंक रखी थी पानी में? अर्थात मछली पकड़ने के लिये दो कांटे लगा रखे थे।

नदी किनारे बैठा कंटिया लगाये मछेरा

अगर मछली कांटे में फंसी तो डोरी में झटका लगेगा और मछेरा उसे खींचने का उपक्रम करेगा।

“डण्डी वाली दूसरी कंटिया-डोरी में अगर मछली फंसी तो कैसे पता चलेगा?”

“किनारे पर गाड़ी डण्डी जोर से हिलने लगेगी। तब मैं अपनी डोरी छोड़ कर डण्डी वाली डोरी साधने लगूंगा।”

“किनारे पर गाड़ी डण्डी जोर से हिलने लगेगी। तब मैं अपनी डोरी छोड़ कर डण्डी वाली डोरी साधने लगूंगा।”

मेरे समझ में आ गया। दो डोरी से उस मछेरे ने अपनी मछली पकड़ने की प्रॉबेबिलिटी (सम्भावना) दुगनी कर ली है।

“तब दो ही डोरी क्यूं? चार पांच डोरियां-कंटिये क्यों नहीं लगा लिये?” – मेरी अगली जिज्ञासा थी।

“जितना सम्भाल सकता हूं, उतनी ही तो लगाऊंगा। ज्यादा लगाने पर एक साथ दो-तीन में मछली फंस गयी तो उन्हें समेटना अकेले के बूते का नहीं है?”

बहुत सही! साधक अगर संतोष का भाव अपने में नहीं ला सकता तो संसार, मोह, लालच की उधेड़बुन और मकड़जाल में; वह न तीन में रहेगा, न तेरह में! … माया मिली न राम की दशा होगी। मुझे अब समझ आया; यह मछेरा पहले ही जानता है।

“कितना समय लगता है मछली मिलने में?”

“अब क्या कहा जा सकता है। अभी दस मिनट पहले ही बैठा हूं।” वह मुंह से खैनी थूंकते हुये बोला। फिर सोच कर जोड़ा – “ज्यादा समय नहीं लगेगा। नदी और उसमें मछलियां देखते हुये जल्दी ही मिल जानी चाहियें।”

ग्रेट! अगर मैं उसके कथन को “सत्य और ज्ञान की खोज” से जोड़ूं और मछली को ज्ञान प्राप्ति के स्थान पर रख कर सोचूं तो “जल्दी ही मिल जाने” की बात तो भग्वद्गीता भी करती है! अचानक मुझे स्वामी चिन्मयानंद जी के हमको पिलानी में दिये लेक्चर याद हो आये। वे चौथे अध्याय पर बोल रहे थे और “अचिरेण” (बिना देरी के) शब्द पर रुके थे। गीता श्रद्धावान और साधनारत व्यक्ति को आश्वासन देती है कि शीघ्र ही उसे भग्वत्प्राप्ति होगी –

श्रद्धावांल्लभते ज्ञानं
तत्परं: संयतेन्द्रिय: ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्ति-
मचिरेणाधिगच्छति (मा अचिरेण अधिगच्छति) ।।गीता, 4.39।।

कहते हैं, ज्ञान आपको कहां, किस हालात में मिलेगा, कहा नहीं जा सकता। आपको अपने रिसेप्टर्स (अपनी ज्ञानेंद्रियाँ) खुले रखने हैं। आज से पैंतालीस साल पहले स्वामी जी के लेक्चर मेरी विस्मृति में तह लगे रखे थे। यह मछेरा निमित्त बन गया उन्हें पुन: स्मृति में लाने और उसपर मनन करने में। यह अपने आप में अभूतपूर्व बात है।

अचिरेण – very soon – में कोई टाइम-फ्रेम नहीं है। वह ज्ञान प्राप्ति एक क्षण में भी हो सकती है और उसमें जन्म जन्मांतर भी लग सकते हैं!

मुझे एक क्षेपक कथा स्मरण हो आयी। दो साधकों को यह प्रकटन हुआ कि जिस पीपल के पेड़ के नीचे वे तपस्या कर रहे हैं, उसमें जितने पत्ते हैं, उतने वर्षों में उन्हें भग्वत्प्राति हो जायेगी। यह जान कर एक साधक तो सिर पकड़ कर बैठ गया – मैंने इतना कुछ किया है। इतनी सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। पर अभी भी इतने साल लगेंगे। इसमें तो कई जन्म जन्मांतर गुजर जायेंगे! 😦

दूसरा साधक यह जान कर कि उसको ज्ञान प्राप्ति हो जायेगी; प्रसन्नता में नाचने लगा – मुझे इतनी जल्दी (अचिरेण) भग्वद्प्राप्ति हो जायेगी! क्या खूब!‍ कुछ ही जन्मों की तो बात है। समय तो बस गुजरते क्या देर लगती है! 😆

गंगा तट से लौटते समय मन में “प्रसन्नता से नाचने का भाव” तो नहीं था; पर यह ढाढस मन में जरूर था कि लौकिक-पारलौकिक सफलताओं की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त है। गीता नें तो वह एश्योरेंस दे ही रखा है; आज इस मछेरे ने भी वह स्मरण करा दिया!


अपने मन को साधना कितना कठिन है!

सूर्यमणि जी ने कहा – “मेरे गुरुजी कहते हैं कि अपने भौतिक जीवन (बैंक) से एकमुश्त निकासी सम्भव नहीं होती। भौतिक बेंक से एक एक रुपया के हिसाब से निकालो और एक एक रुपया आध्यात्मिक अकाउण्ट में जमा करो।” इस धीमी रफ्तार से व्यक्तित्व का रूपांतरण होगा।


मैं अपने खर्चे समेटने की जद्दोजहद कर रहा हूं। जब यहां (गांव में) आया था, तब कुटिया बनाना चाहता था। एक कुटिया, साइकिल, भ्रमण, अध्ययन और मनन/लेखन – यही चाह थी। पर कुटिया की बजाय दस बिस्वे जमीन में रेलवे के बंगले का क्लोन बन गया। और रेलवे का रहन सहन भी धीरे धीरे पसरता गया। रहन सहन के अपने खर्चे होते हैं। यद्यपि मुझमें या परिवार में गलत आदतें नहीं थीं, पर फिर भी खर्च तो होते ही हैं। अपनी आवश्यकताओं को समेटना कठिन है। अपने मन को साधना कितना कठिन है!

कमल ताल कमल से भरा है इस मौसम में।
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केदारनाथ चौबे, परमार्थ, प्रसन्नता, दीर्घायु और जीवन की दूसरी पारी

उनका जन्म सन बयालीस में हुआ था। चीनी मिल में नौकरी करते थे। रिटायर होने के बाद सन 2004 से नित्य गंगा स्नान करना और कथा कहना उनका भगवान का सुझाया कर्म हो गया है।


वे द्वारिकापुर में गंगा किनारे मिलते हैं। कथावाचक हैं। गंगा किनारे चबूतरे पर स्नानार्थियों, महिलाओं को कथा सुनाते दिखते हैं। भागवत कथा। और भी अन्य कथायें। बातचीत में रामचरित मानस, भागवत पुराण और अन्य ग्रंथों से मुक्त हस्त उद्धरण देते पाया है उन्हे। अच्छा कहते हैं। सरल आदमी हैं।

केदारनाथ चौबे

मुझसे जब भी मिलते हैं, कुछ न कुछ धर्म-कर्म की बातें सुनाते हैं। अभी फरवरी के महीने में मुझसे बोले थे कि इस चैत्र के नवरात्र में वे द्वारिकापुर के मंदिर पर भागवत कथा कहेंगे और उस संदर्भ में मेरा योगदान लेने मेरे घर पर भी आयेंगे। पर उसके बाद कोरोना संक्रमण के कारण लॉकडाउन हुआ और उनका मेरे घर आना या उनका कथा कहना नहीं हो पाया।

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