हुबली का सौन्दर्य


मैने कहा कि मैं बिना किसी ध्येय के घूमना चाहता हूं। गंगा के कछार में। यह एक ओपन स्टेटमेण्ट था – पांच-छ रेल अधिकारियों के बीच। लोगों ने अपनी प्रवृति अनुसार कहा, पर बाद में इस अफसर ने मुझे अपना अभिमत बताया – "जब आपको दौड़ लगा कर जगहें छू कर और पैसे फैंक सूटकेसContinue reading “हुबली का सौन्दर्य”

एक (निरर्थक) मूल्य-खोज


नैनीताल के हॉलीडे होम के स्यूट में यह रूम हीटर मुंह में चमक रहा है, फिर भी अच्छी लग रही है उसकी पीली रोशनी! मानो गांव में कौड़ा बरा हो और धुंआ खतम हो गया हो। बची हो शुद्ध आंच। मेरी पत्नीजी साथ में होतीं तो जरूर कहतीं – यह है स्नॉबरी – शहरी परिवेशContinue reading “एक (निरर्थक) मूल्य-खोज”

पर्यटन क्या है?


मैं पर्यटन पर नैनीताल नहीं आया। अगर आया होता तो यहां की भीड़ और शानेपंजाब/शेरेपंजाब होटल की रोशनी, झील में तैरती बतख नुमा नावें, कचरा और कुछ न कुछ खरीदने/खाने की संस्कृति को देख पर्यटन का मायने खो बैठता। पैसे खर्च कर सूटकेस भर कर घर लौटना क्या पर्यटन है? या अब जब फोटो खीचना/वीडियोContinue reading “पर्यटन क्या है?”

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