दउरी बनाने वालों का बाजार

संक्रांति के अवसर पर हम लाई, चिवड़ा, गुड़ की पट्टी, तिलकुट, रेवड़ी, गुड़ का लेड़ुआ और गजक जैसी चीजें खरीदने के लिये महराजगंज बाजार गये थे। वहां गिर्दबड़गांव की धईकार बस्ती के संतोष दिखे। एक साइकिल पर बांस की दऊरी लटकाये थे।


बहुत दिनों बाद गिर्दबड़गांव की उस धईकार बस्ती की ओर गया था, जहां वे खांची, छिंटवा, दऊरी आदि बनाते हैं। उस बारे में कल ट्वीट थी –

9 जनवरी 2021 को ट्वीट। धईकार बस्ती की ओर जाने के बारे में।

मैं सोचा करता था कि उनकी बांस की बनी वस्तुओं में जो कलात्मकता है, उससे उनको व्यापक मार्केट मिल सकता है। मैंने उनसे छोटे कटोरे के आकार के बांस के बर्तन बनाने को कहा। वे बाउल जो पर्याप्त डिजाइन दार और चटक रंगों के हों। इस बात को बार बार कहने के लिये मैंने 2017 में उनकी बस्ती में कई चक्कर लगाये थे। उसी समय उनके बारे में मैंने पोस्ट भी लिखी थी – धईकार बस्ती का दऊरी कारीगर

मेरा विचार था कि लोग अपने डाइनिंग टेबल पर या ड्राइंग रूम में छोटे आकार के दऊरी का अपने अपने प्रकार से प्रयोग करना चाहेंगे। उसकी आकृति भी अर्ध गोलाकार की बजाय अगर चौकोर या दीर्घवृत्ताकार बन सके तो और सुंदर या विविध लगेगा। वह सब काफी कलात्मक होगा और उसे अमेजन जैसी साइट पर ऑनलाइन बेचना/कुरियर के माध्यम से भेजना भी सहज होगा। अगर नया उत्पाद पूरी तरह बांस का न हो तो उसमें लोहे या प्लास्टिक का छल्ला लगा कर अलग अलग आकृतियां बनाई जा सकती हैं बर्तन की।

बांस की दऊरी बिनने के बाद उसपर बांस का एक छल्ला लगता है। दऊरी की मजबूती उसी से आती है।

पर वे अपने काम को जिस ढंग से कर रहे थे, जो उनका मार्केट था, उसमें कोई बदलाव करना नहीं चाहते थे। उन्होने मुझे न भी नहीं किया, पर बनाया भी नहीं। मैंने उन्हे दो पीस छोटे बाउल बनाने के लिये उन्हे बयाना पैसा भी दिया। जो अंतत: मैंने उन्हे दिये “सहयोग” मान कर छोड़ दिया। वे नया कुछ बनाने को तैयार नहीं हुये।

शायद मेरे उन्हे प्रेरित करने के तरीके में कुछ कमी थी। मैं शायद रेलवे के अधिकारी छाप भाषा में बात कर रहा था; उनके बीच का कोई व्यक्ति बन कर नहीं।

या शायद जिस ढर्रे पर वे काम करते हैं, उसमें कोई बदलाव वे सोच ही नहीं पा रहे थे।

मकर संक्रांति के अवसर पर भरी-सजी दुकान

आज संक्रांति के अवसर पर हम लाई, चिवड़ा, गुड़ की पट्टी, तिलकुट, रेवड़ी, गुड़ का लेड़ुआ और गजक जैसी चीजें खरीदने के लिये महराजगंज बाजार गये थे। वहां गिर्दबड़गांव की धईकार बस्ती के संतोष दिखे। एक साइकिल पर बांस की दऊरी लटकाये थे। दुकान वाले को उन्होने वे दऊरियां बेंच दीं।

मैंने पूछा – कितने में बिकीं?

धईकार बस्ती के संतोष

“ढ़ाई सौ की एक। कुल नौ थीं।”

“कितने दिन लगे बनाने में?”

“दस ईग्यारह दिन। मेरे ही घर की बनी हैं। एक दिन में एक ही बन पाती है। कभी कभी वह भी नहीं।” संतोष ने बताया। उन्होने यह भी बताया कि वहां के आठ दस परिवार इसी तरह बना कर यहीं बाजार में बेचते हैं। इस पर दुकान वाला अपना पचास-सौ का मुनाफा जोड़ता होगा। मैंने दुकान वाले से उसका दऊरी का सेल प्राइस नहीं पूछा। किसी और दिन पता करूंगा। पर धईकार कारीगरों के मार्केट का मोटा अंदाज हो गया।

मैने पूछा उसके औजारों के बारे में। गंड़ासा नुमा औजार को उसने बताया – बांका।  उसका प्रयोग वह बांस काटने में करता है। उससे छोटी बांकी। बांकी से महीन काम करता है वह – बांस को छीलना, दऊरी की सींके बनाना आदि। दऊरी बुनने के बाद उसके ऊपर बांस का रिंग नुमा गोला लगाता है। उसी से दऊरी में मजबूती आती है। उसने बिनी दऊरी और गोला दिखाया मुझे।

धईकार बस्ती का दऊरी कारीगर सेे
अपनी 9 दऊरी साइकिल पर लिये महराजगंज मार्केट में संतोष

कस्बाई बाजार की हस्त निर्मित वस्तुओं की श्रम अनुसार वाजिब कीमत लगाने की क्षमता ही नहीं है। लोग बांस की इन चीजों की बजाय प्लास्टिक के टब से काम चला सकते हैं। धीरे धीरे स्थानीय शिल्प इसी प्रकार से हाशिये पर जाता और दम तोड़ता गया है। इनकी कलात्मकता की कीमत तो शहरी मध्य या उच्च-मध्य वर्ग ही सही सही लगा सकता है। पर उसके पास जाने के लिये प्रॉडक्ट में कुछ परिवर्तन करने होंगे। वही नहीं हो रहा है! 😦

आप, जो पढ़ रहे हैं, इसमें कुछ पहल कर सकते हैं? इस बारे में बेहतर जानकारी के लिये तीन-चार साल पहले की पोस्ट धईकार बस्ती का दऊरी कारीगर और झिनकू का अवश्य अवलोकन करें।


महराजगंज कस्बे का मोची – जमुना

जमुना जूता-चप्पल की मरम्मत करते हैं। उसके अलावा तल्ले बाहर से मंगवा कर उनपर जूता बनाने का भी काम करते हैं। मैंने उनसे दो तीन जोड़ी चप्पलें ली हैं। काफी मजबूत हैं।


रिटायरमेण्ट के बाद गांव में घर बनाने और बटोही (साइकिल) के साथ घूमने में जिन पात्रों से परिचय हुआ, उनमें जमुना मोची भी है। और वह यहां मिले सबसे अच्छे पात्रों में एक है। जमुना भी मूलत: यहां भदोही जिले का रहने वाला नहीं है। चालीस साल पहले यहां आया था छपरा से। उस समय महराजगंज कस्बे के बाजार मेंं इतनी दुकानें नहीं थीं। कुल चार पांच दुकानें और उनके बाद खेत और पेड़ थे। तब से जमुना यहीं रह गये।

छपरा में अपने गांव आते जाते हैं, पर रिहायश यहीं हो गयी है।

जूता-चप्पल-बैग आदि की मरम्मत करते हैं। उसके अलावा जूते चप्पलों के तल्ले बाहर से मंगवा कर उनपर जूता बनाने का भी काम करते हैं। मैंने उनसे दो तीन जोड़ी चप्पलें ली हैं। अच्छी ही चल रही हैं। काफी मजबूत हैं।

मुझे लगता है कि लोग मुझसे बात करना चाहेंगे, मेरी बोलने बतियाने का स्तर या मेरी मेधा आंकेंगे। पर इन दोनो महिलाओं (पत्नी-बिटिया) को लगता है कि लोग मेरे बौद्धिक स्तर की बजाय मेरे जूते का ब्राण्ड देखेंगे।

मेरा चमड़े का बाटा का जूता भी अब पुराना हो गया है। सोचता हूं कि बनारस या प्रयागराज की किसी हाई फाई दुकान से नया जूता खरीदने की बजाय जमुना से ही नया बनवा लिया जाये। पर मेरी पत्नीजी और मेरी बिटिया, जो मेरे व्यक्तित्व में अब भी राजपत्रित अधिकारी का अंश देखती हैं; को यह पचता नहीं कि किसी समारोह में मैं गांव के मोची का बना “चमरौधा” जूता पहन कर जाऊं। मुझे लगता है कि लोग मुझसे बात करना चाहेंगे, मेरी बोलने बतियाने का स्तर या मेरी मेधा आंकेंगे। पर इन दोनो महिलाओं (पत्नी-बिटिया) को लगता है कि लोग मेरे बौद्धिक स्तर की बजाय मेरे जूते का ब्राण्ड देखेंगे। इसलिये, फिलहाल अब तक जमुना से एक जोड़ी जूता नहीं बनवाया या खरीदा है।

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अपनी गुमटी में कार्यरत जमुना

हां, चमड़े की सभी चीजें, जिनका काम मरम्मत करा कर चल सकता है, वे मैं जमुना की गुमटी पर ले जाता हूं। उनकी जिंदगी बढ़ जाती है। एक चमड़े की बेल्ट, जो मैंने छब्बीस साल पहले खरीदी थी (जिसे मेरे एक निरीक्षक महोदय नीमच के बाजार से खरीद लाये थे), का चमड़ा अच्छी क्वालिटी का होने के बावजूद, उम्र लगभग पूरी हो चली है। उसकी लम्बाई कुछ कम करा कर एक चकत्ती लगवा कर दो बार जमुना के माध्यम से उसकी उम्र बढ़वा चुका हूं। कल फिर उसकी मरम्मत कराने जमुना के पास ले कर गया। उसका लूप (बेल्ट कमर में कसने के बाद खुला हिस्सा खोंसने वाला रिंग) टूट गया था। जमुना से नया बनवाया। दस रुपया बनवाई लगी।

jamuna mochi, cobbler,
जमुना मेरी बेल्ट मरम्मत कर देते हुये। बेल्ट पर चकत्ती पहले लगी थी, अब उसके आगे लूप लगवाया है!

एक नयी बेल्ट खरीदने की बजाय इस तरह से मरम्मत करवा कर पहनना मेरी पत्नीजी को तनिक नहीं सुहाता। पर अब उम्र बढ़ने के साथ देखता हूं कि उनका मेरी “चिरकुट” वृत्ति पर नाक-भौं सिकोड़ना पहले की अपेक्षा कम होता जा रहा है। जिंदगी भर उन्होने मुझे साहब बनाने, मेरा स्तर इम्प्रूव करने की जद्दोजहद की; अब शायद समझ गयी हैं कि मैं अपने मूल स्वभाव को त्यागने वाला नहीं हूं। 😀

जमुना

सवर्ण लोग उसकी गुमटी के सामने खड़े खड़े अपने जूते चप्पल मरम्मत करवाते हैं। उसकी दुकान पर बैठना सवर्णियत की तौहीन लगती होगी। मैं, बैठ कर उससे बतियाता हूं।

लॉकडाउन में कैसे काम चला?

प्रश्न सुन कर जमुना एकबारगी अपनी आंखें बंद कर लेता है। “उसकी तो सोचना भी खराब लगता है। कोई काम नहीं था, कोई ग्राहक नहींं। घर का खर्चा चलाने के लिये तीन लाख का कर्जा हो गया है।” – जमुना उत्तर देता है।


इस ब्लॉग पर यह 1500वीं पोस्ट है।


मैं पूछने के लिये पूछ लेता हूं – मेरे लिये जूता बना दोगे?

वह बनाये हुये जूते दिखाता है। वे पसंद नहीं आते। मैं फरमाइश करता हूं कि जूते का तल्ला अच्छा होना चाहिये, गद्देदार। जिससे चलने में सहूलियत हो। वैसा तल्ला उसके पास उपलब्ध नहीं है। मंहगे तल्ले के मंहगे जूते की मांग यहां नहीं है। वह नया तल्ला लाना भी नहीं चाहता।

“अभी जितना सामान है, जितने जूते बनाये हैं; उनकी भी ग्राहकी नहीं है। ग्राहक आ रहे हैं लॉकडाउन के बाद। पर ग्राहकों के पास पैसा नहीं है। लगन की ग्राहकी थी कुछ समय के लिये। वह भी ज्यादा नहीं। अब तो मरम्मत का ही काम मिलता है।” – जमुना के कहने से यकीन होता है कि लोग अभी दैनिक खर्च लायक खरीददारी कर रहे हैं कस्बे के स्तर पर। उनकी माली हालत सामान्य नहीं हुई है।

अपनी मरम्मत की गयी बेल्ट ले कर वापस लौटता हूं। कम से कम एक दो साल और चल जायेगी यह एण्टीक बेल्ट!

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छबीस साल पुरानी, चमड़े की मरम्मत और चकत्ती लगायी बेल्ट।