उमरहाँ के राकेश मिसिर जी


राकेश जी को छोड़ने के लिये मैं घर के गेट तक गया। उनके जाते हुये मन में विचार आया कि घर में किसी के आने पर उन्हें चाय परोसी जाये तो (लौंग-इलायची भले हो न हो) साथ में तश्तरी में एक चुनौटी और सुरती होनी ही चाहिये।

वह फीचरफोन में डूबा नामिलनसार आदमी


एक सामान्य से आदमी ने मुझे बड़े जबरदस्त तरीके से स्नब किया!
कभी कभी ही तुम्हें नहले पर दहला मिलता है। नौकरी-अफसरी के दौरान नहीं मिला; यहाँ गांवदेहात में मिला; जीडी! :-)

स्कूल बंद हैं; पढ़ाने का जिम्मा दादाजी का हो गया है।


कोरोना काल में इस बूढ़ी पीढ़ी के पास एक काम आ गया है। और वह काफी मेहनत से उसे करती दिखती है। … जय हो, इन दादाजी की!

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free